नागपुर में आरएसएस के विजयादशमी उत्सव में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ता का भाषण अखबार की संपादकीय निष्पक्षता और हिंदी पत्रकारिता की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है.
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विजयादशमी उत्सव में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ताा मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए. संघ के शताब्दी वर्ष के समापन से जुड़े इस आयोजन में उन्होंने न सिर्फ संगठन की तारीफ की बल्कि दैनिक जागरण की संपादकीय नीति और संघ की विचारधारा के बीच समानता का भी खुलकर ऐलान किया.
गुप्ता ने अपने भाषण में कहा, “देखा जाए तो संघ और जागरण की विचारधारा भारतीय सनातन संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा एवं समर्पण के बिंदु पर एक ही है.”
एक बड़े हिंदी अखबार के शीर्ष संपादक का यह बयान महज किसी आयोजन में की गई कोई तारीफ नहीं है. यह उस बुनियादी सवाल को सामने लाता है जो किसी भी लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका के केंद्र में होना चाहिए. क्या एक अखबार का काम किसी विचारधारा का प्रचार करना है या उस विचारधारा समेत सत्ता, राजनीति और समाज के सभी प्रभावशाली पक्षों की निष्पक्ष पड़ताल करना?
संजय गुप्ता ने अपने भाषण में कहा, “दैनिक जागरण एक आस्तिक, आस्थावान, राष्ट्रभक्त और सनातन भारतीय मूल्यों का संवाहक समाचार पत्र है. जिसके संस्कार ही सनातन भारतीय हैं. ऐसा समाचार पत्र जिसकी नियति और प्रकृति में पूर्ण आस्था है. जो सकारात्मक सोच के साथ समर्थ सत्ता व सद्भावना का आचरण अपनाते हुए अपने पाठकों को भी इसके लिए निरंतर प्रेरित करता है. जिसका लक्ष्य देशवासियों में इस भावना को जागृत करना भी है कि वो देश के लिए क्या कर सकते हैं. देश को क्या दे सकते हैं. देखा जाए तो संघ और जागरण की विचारधारा भारतीय सनातन संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति निष्ठा एवं समर्पण के बिंदु पर एक ही है.”
गौरतलब है कि किसी मीडिया संस्थान का अपनी वैचारिक पहचान बताना अपने आप में असामान्य नहीं है. समस्या तब पैदा होती है जब उसी संस्थान का दावा ‘निष्पक्ष समाचार’ देने का भी हो और उसकी घोषित वैचारिक प्रतिबद्धता खबरों के चयन, प्रस्तुति और तथ्यों की व्याख्या पर सवाल खड़े करने लगे. पाठक को यह जानने का अधिकार है कि वह समाचार पढ़ रहा है, विचार पढ़ रहा है या किसी संगठन के नजरिये से तैयार की गई दुनिया देख रहा है.
संजय गुप्ता के भाषण ने इस सवाल को और प्रासंगिक बना दिया है.

खबरों का अखबार या विचारधारा का वाहक?
गुप्ता के भाषण का बड़ा हिस्सा नागरिकों के कर्तव्यों, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण पर केंद्रित था. उन्होंने कहा कि नागरिकों को केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि देश उन्हें क्या दे रहा है, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि वे देश को क्या दे सकते हैं. उन्होंने संघ को इन चुनौतियों को समझने वाला संगठन बताया और दैनिक जागरण के सात सामाजिक सरोकारों का भी उल्लेख किया.
सामाजिक सरोकारों की बात करने में कोई बुराई नहीं है. शिक्षा, पर्यावरण, जल संरक्षण, महिला सशक्तीकरण और गरीबी उन्मूलन जैसे मुद्दे निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं. लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या किसी अखबार की राष्ट्रभक्ति की परिभाषा एक खास सांस्कृतिक और राजनीतिक विचारधारा से जुड़नी चाहिए? क्या सरकार की नीतियों, सत्तारूढ़ दल के दावों और संघ परिवार की गतिविधियों की जांच करना भी राष्ट्र के प्रति नागरिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है?
गुप्ता ने अपने भाषण में यह भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश में ऐसा कोई संगठन नहीं था जो सनातन भारतीय मूल्यों का प्रचार-प्रसार करता और लोगों को उनका महत्व समझाता. यह एक व्यापक ऐतिहासिक दावा है, जिस पर सवाल उठना स्वाभाविक है. भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अनेक विचारधाराओं, सामाजिक सुधार आंदोलनों, धार्मिक परंपराओं और राजनीतिक संगठनों से मिलकर बना था. ऐसे में किसी एक संगठन को भारतीय मूल्यों के प्रचार का केंद्रीय या अनिवार्य वाहक बताना इतिहास की विविधता को सीमित करने जैसा है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संघ की प्रशंसा करना और उसकी विचारधारा को अपनी संपादकीय नीति के समान बताना दो अलग बातें हैं. पहला किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अतिथि का विचार हो सकता है, जबकि दूसरा एक मीडिया संस्थान की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जुड़ा सवाल है.

कठुआ मामले में खबर और तथ्य के बीच की दूरी
उल्लेखनीय है कि दैनिक जागरण की पत्रकारिता पर सवाल उठाने के लिए उसके पुराने उदाहरणों को देखना जरूरी है. इनमें सबसे गंभीर मामला 2018 का कठुआ बलात्कार और हत्याकांड का है.
जब जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ यौन हिंसा और हत्या के मामले में 20 अप्रैल 2018 को दैनिक जागरण ने पहले पन्ने पर एक खबर प्रकाशित की थी. इसका शीर्षक था, “कठुआ मामले में बच्ची से दुष्कर्म नहीं हुआ.” खबर में पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देकर दावा किया गया था कि रिपोर्ट में बलात्कार का उल्लेख नहीं है.
यह महज किसी खबर के शीर्षक में हुई चूक का मामला नहीं था. एक संवेदनशील आपराधिक मामले में, जिसमें एक बच्ची की हत्या हुई थी, मेडिकल रिपोर्ट की सीमित व्याख्या के आधार पर यौन हिंसा से इनकार करने वाला निष्कर्ष प्रकाशित किया गया. जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किसी निष्कर्ष का स्पष्ट उल्लेख न होना अपने आप में यौन हिंसा न होने का प्रमाण नहीं है.
स्क्रॉल और ऑल्ट न्यूज़ समेत अन्य समाचार संस्थानों ने इस रिपोर्ट की आलोचना की. जम्मू-कश्मीर पुलिस ने भी स्पष्ट किया था कि मेडिकल विशेषज्ञों की राय के आधार पर बच्ची के साथ यौन हिंसा की पुष्टि हुई थी.
बाद में दैनिक जागरण ने खबर को अपनी वेबसाइट से हटा दिया. उस समय जागरण डॉट कॉम के संपादक कमलेश रघुवंशी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया था कि खबर को अधिक जांच के लिए हटाया गया है. लेकिन सवाल यह था कि अगर तथ्यों की जांच बाकी थी, तो ऐसी खबर को कई प्रिंट संस्करणों के पहले पन्ने पर जगह कैसे मिल गई? इस बारे में आप हमारी यह रिपोर्ट भी पढ़ सकते हैं.
इस मामले की गंभीरता इसलिए भी अधिक थी क्योंकि कठुआ प्रकरण को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिशें हो रही थीं. ऐसे माहौल में किसी प्रमुख अखबार की जिम्मेदारी थी कि वह उपलब्ध तथ्यों को सावधानी से पेश करे, न कि अधूरी जानकारी के आधार पर ऐसा निष्कर्ष प्रकाशित करे जो यौन हिंसा के आरोपों को ही संदेह के घेरे में डाल दे.
पत्रकारिता में गलती हो सकती है. लेकिन गलती स्वीकार करने, सुधार प्रकाशित करने और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है. कठुआ मामले ने दैनिक जागरण की तथ्य-जांच और संपादकीय निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए थे.
2017 का एग्जिट पोल: चुनाव आयोग को दखल क्यों देना पड़ा?
इसके पहले दैनिक जागरण के राजनीतिक कवरेज से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का है.
पहले चरण के मतदान के बाद अखबार की वेबसाइट पर एक एग्जिट पोल प्रकाशित हुआ था. इसमें भाजपा को बढ़त मिलने का अनुमान जताया गया था, जबकि बसपा को दूसरे और सपा-कांग्रेस गठबंधन को तीसरे स्थान पर दिखाया गया था.
उस समय चुनाव आयोग ने इसे चुनाव के दौरान एग्जिट पोल प्रकाशित करने पर लागू प्रतिबंधों का उल्लंघन माना और उत्तर प्रदेश के 15 जिलों में प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए. आयोग ने जनप्रतिनिधित्व कानून के संबंधित प्रावधानों और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 का हवाला दिया था.

दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्ता ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा था कि एग्जिट पोल अखबार में नहीं, बल्कि वेबसाइट पर विज्ञापन विभाग ने प्रकाशित किया था और उसे हटा दिया गया था.
इस मामले में चुनाव आयोग की कार्रवाई को किसी चुनावी नतीजे या भाजपा की जीत के अनुमान के सही अथवा गलत होने के प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. असल मुद्दा चुनावी नियमों का पालन और संस्थान के भीतर संपादकीय तथा व्यावसायिक विभागों के बीच जवाबदेही का है. यदि किसी मीडिया संस्थान की वेबसाइट पर चुनावी नियमों के विरुद्ध सामग्री प्रकाशित होती है, तो यह स्पष्टीकरण कि उसे विज्ञापन विभाग ने डाला था, अपने आप में जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकता.
आज जब उसी संस्थान के प्रधान संपादक संघ की विचारधारा को अपनी संपादकीय नीति के समान बताते हैं, तो ऐसे पुराने मामले पाठकों के लिए और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं. वे यह पूछने का आधार देते हैं कि अखबार राजनीतिक और चुनावी खबरों में अपनी स्वतंत्रता और पेशेवर मानकों की रक्षा कैसे करता है?
गाहे-बगाहे भी जागरण करता रहता है ‘बदमाशी’
ऐसा नहीं है कि दैनिक जागरण के ये सिर्फ दो ही उदाहरण हैं. गाहे-बगाहे भी दैनिक जागरण में ऐसी ख़बरें प्रकाशित होती रहती हैं, जिन्हें ख़बरें कम और ‘फर्जीवाड़े के नये’ अध्याय कहना गलत नहीं होगा. जैसे कि बात चाहे कोरोना काल की हो या फिर यूपी के बुलडोजर मॉडल की तारीफ की या फिर फर्जी सर्जिकल स्ट्राइक की. ख़बरों को तोड़ना- मरोड़ना या ‘चंदे के बदले’ ख़बरों को नेपथ्य में भेजना जागरण के लिए कोई नहीं बात नहीं है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने न सिर्फ इन मामलों पर कई बार फैक्ट चेक किया है बल्कि अखबार की संपादकीय नीति को भी सवालों के घेरे में रखा है. जागरण पर हमारी विस्तृत कवरेज पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें और इसके मालिकाना हक पर ज्यादा जानकारी के लिए यह रिपोर्ट पढ़िए.
अखिलेश यादव की बहिष्कार की अपील और मीडिया पर भरोसे का संकट
अप्रैल, 2025 में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण के बहिष्कार की अपील की थी. उन्होंने अपने समर्थकों से अखबार पढ़ना और खरीदना बंद करने को कहा था. यह अपील उन्होंने अखबार की रिपोर्टिंग को लेकर अपनी नाराजगी के बीच की थी.
अखिलेश यादव की अपील को भी आलोचनात्मक नजर से देखने की जरूरत है. किसी राजनीतिक नेता को अपनी आलोचना करने वाले अखबार का बहिष्कार करने की अपील करने के बजाय तथ्यों के साथ अपनी असहमति दर्ज करानी चाहिए. किसी मीडिया संस्थान पर दबाव डालने या पाठकों को उसे न पढ़ने के लिए कहने से स्वतंत्र पत्रकारिता मजबूत नहीं होती.
लेकिन इस अपील को केवल एक नेता की नाराजगी कहकर खारिज करना भी पर्याप्त नहीं है. यह देखना जरूरी है कि आखिर राजनीतिक दलों और मीडिया संस्थानों के बीच भरोसे का संकट क्यों पैदा हो रहा है. क्या खबरों में सभी राजनीतिक दलों के प्रति एक जैसे मानक अपनाए जा रहे हैं? क्या बेरोजगारी, किसानों के सवाल, सामाजिक असमानता और सरकार की जवाबदेही को उतनी ही प्रमुखता मिलती है जितनी सत्तारूढ़ दल की उपलब्धियों और राजनीतिक संदेशों को?
इन सवालों के जवाब किसी नेता की अपील से तय नहीं हो सकते. उनका जवाब अखबार की प्रकाशित खबरों, सुर्खियों, संपादकीय फैसलों और तथ्यों की जांच से ही मिलना चाहिए.
आरएसएस की विचारधारा और पत्रकारिता की स्वतंत्रता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक है. 1925 में स्थापित संघ ने दशकों में एक बड़ा संगठनात्मक ढांचा तैयार किया है और भारतीय राजनीति, खासकर भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि, में उसकी भूमिका पर लंबे समय से चर्चा होती रही है.
संघ खुद को सांस्कृतिक और राष्ट्र निर्माण से जुड़ा संगठन बताता है. वहीं उसके आलोचक हिंदुत्व की उसकी अवधारणा, राष्ट्रवाद की परिभाषा और अल्पसंख्यकों तथा धार्मिक विविधता के सवालों पर उसकी भूमिका को लेकर आपत्तियां उठाते रहे हैं. संघ के राजनीतिक प्रभाव और भाजपा के साथ उसके संबंधों पर भी व्यापक बहस होती रही है.
ऐसे संगठन के कार्यक्रम में किसी अखबार के प्रधान संपादक का मुख्य अतिथि बनना अपने आप में पत्रकारिता के खिलाफ कोई अपराध या निष्पक्षता के उल्लंघन का प्रमाण नहीं है. पत्रकारों और संपादकों को सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का अधिकार है. लेकिन जब संपादक सार्वजनिक मंच से अपने अखबार और संगठन की विचारधारा को एक बताते हैं, तो उस संस्थान की संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
यह सवाल संघ के प्रति किसी की पसंद या नापसंद का नहीं है. यही कसौटी किसी भी राजनीतिक दल, सरकार, कॉरपोरेट समूह, धार्मिक संगठन या सामाजिक आंदोलन के लिए लागू होनी चाहिए. मीडिया की जिम्मेदारी किसी संगठन की छवि चमकाना नहीं, बल्कि उसके दावों, कामकाज और प्रभाव की स्वतंत्र जांच करना है.
करोड़ों पाठकों तक पहुंच, इसलिए जवाबदेही भी बड़ी
दैनिक जागरण का प्रभाव इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के दस्तावेजों में अखबार अपने कंपनी समूह के विवरण में 300 से ज्यादा संस्करणों/क्षेत्रीय-संस्करणों और 13 राज्यों में मौजूदगी का उल्लेख करता है. कंपनी संबंधी जानकारी में जागरण 8.30 करोड़ पाठक होने का दावा करता है. 10 से ज्यादा भाषाओं में उसकी मौजूदगी है. 39 रेडियो स्टेशन और 8 अलग-अलग प्रकाशन इस समूह का हिस्सा हैं.
ऐसे में इतने बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचने वाला अखबार केवल खबरें नहीं पहुंचाता, बल्कि सार्वजनिक विमर्श को भी प्रभावित करता है. उसकी सुर्खियां तय करती हैं कि लोग किसी घटना को किस नजर से देखेंगे, किन मुद्दों को जरूरी मानेंगे और किन सवालों को नजरअंदाज कर देंगे.
इसीलिए उसकी जिम्मेदारी किसी छोटे प्रकाशन से कहीं अधिक है. अगर किसी अखबार की संपादकीय नीति में एक खास वैचारिक प्रतिबद्धता प्रमुख है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह प्रतिबद्धता तथ्यों की जांच, खबरों की विविधता और आलोचनात्मक रिपोर्टिंग पर हावी न हो. और यदि वह अपने पाठकों को अपनी विचारधारा के बारे में स्पष्ट जानकारी देता है, तो उसे अपने संपादकीय दावों के प्रति भी जवाबदेह होना चाहिए.
यहां एक और फर्क समझना जरूरी है: किसी अखबार की विचारधारा का आलोचनात्मक विश्लेषण करना और उसकी हर खबर को गलत घोषित कर देना एक ही बात नहीं है.
दैनिक जागरण की किसी खबर की विश्वसनीयता का आकलन उसके तथ्यों, स्रोतों और रिपोर्टिंग के आधार पर होना चाहिए. लेकिन कठुआ मामले और 2017 के एग्जिट पोल जैसे उदाहरणों को नजरअंदाज करके उसकी संपादकीय स्वतंत्रता पर उठते सवालों को भी खारिज नहीं किया जा सकता.

सवाल सिर्फ दैनिक जागरण का नहीं है
नागपुर में संजय गुप्ता के भाषण ने हिंदी पत्रकारिता के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया है. क्या समाचार पत्र का काम नागरिकों को यह बताना है कि उन्हें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य कैसे निभाने चाहिए, या यह भी सुनिश्चित करना है कि वे सरकार, राजनीतिक दलों और प्रभावशाली संगठनों से उनके कर्तव्यों और जवाबदेही के बारे में सवाल पूछ सकें?
राष्ट्र के प्रति नागरिकों के कर्तव्य पर चर्चा जरूरी है. लेकिन लोकतंत्र में नागरिक का एक कर्तव्य सत्ता से सवाल पूछना भी है. इसी तरह मीडिया का कर्तव्य सिर्फ सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उन तथ्यों को सामने लाना भी है जिन्हें सत्ता या प्रभावशाली संगठन छिपाना चाहते हैं.
अगर किसी अखबार का प्रधान संपादक कहता है कि उसका संस्थान और एक प्रभावशाली संगठन एक ही विचारधारा साझा करते हैं, तो उस अखबार को अपनी निष्पक्षता के बारे में उठने वाले सवालों का जवाब देना चाहिए. उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि असहमति रखने वाले नागरिकों, विपक्षी दलों, अल्पसंख्यकों और सत्ता की आलोचना करने वालों को उसकी खबरों में किस तरह जगह मिलती है.
आखिरकार, अखबार की विश्वसनीयता उसके घोषित राष्ट्रवाद से नहीं, बल्कि उन तथ्यों से तय होती है जिन्हें वह अपने पाठकों के सामने रखता है और उन सवालों से भी, जिन्हें वह पूछने से नहीं बचता.
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