दैनिक जागरण: करोड़ो रुपए के सरकारी विज्ञापनों के दबाव में कैसे गायब हुई जरूरी ख़बरें

दैनिक जागरण ने उत्तर प्रदेश सरकार से 11 करोड़ विज्ञापन राशि की मांग की, अखबार ही हालिया रिपोर्टिंग बताती है कि इस दौरान लगातार सरकार की खुशामद में लगा रहा.

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मार्च-अप्रैल के महीने में पूरा देश कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन में था. लोगों की नौकरियां जा रही थीं. मजदूरों के पास खाने रहने के लिए पैसे नहीं थे. बड़ी संख्या में लोग पलायन कर अपने घरों को लौट रहे थे. हालत यह हो गई थी कि सरकारें अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाने की बात करने लगी थीं. कुल मिलाकर देश बुरी स्थिति से गुजर रहा था.

उसी लॉकडाउन के दौर में हिंदी बेल्ट के सबसे बड़ी प्रसार संख्या वाले अखबार दैनिक जागरण ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक पत्र लिखा. इसमें अखबार ने पिछले सात साल से सरकार द्वारा रुके हुए अपने विज्ञापन राशि के भुगतान की मांग की थी. दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने तत्परता दिखाते हुए 11 करोड़ से अधिक की इस विज्ञापन राशि के भुगतान को यथाशीघ्र जारी करने संबंधी पत्र महीने भर में जारी कर दिया.

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बता दें कि दैनिक जागरण ने 14 अप्रैल को यह पत्र उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा निदेशक को लिखा था. इस पत्र में साल 2014 से 2020 तक रुके हुए विज्ञापन भुगतान को जारी करने की मांग की गई थी. यह राशि 11,05,04,781 रुपये थी. इस पत्र को संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा निदेशक सर्वेंद्र विक्रम बहादुर सिंह ने 2 जून को एक पत्र जारी कर इस पूरी राशि के भुगतान का आदेश जारी किया.

यह उस समय की बात है जब दिल्ली सहित अन्य प्रदेशों में मजदूरी कर रहे लोग अपने घरों को वापस लौट रहे थे. क्योंकि उनके पास उस समय न कोई काम था और न पैसे. ऐसे में उन्होंने अपने घर की ओर रुख करना ही बेहतर समझा. तब देश में चारों ओर से मजदूरों के लिए सरकार द्वारा मदद किए जाने की मांग उठ रही थी. इन लोगों के लिए न तो काम, न ही ठहरने का उचित इंतजाम सरकारें कर पायी लिहाजा हमने देखा देश के बांटवारे के बाद सबसे बड़ा पलायन भारत की सड़कों पर हुआ. लेकिन उसी समय में सरकार ने बड़ी दिलेरी से दैनिक जागरण के भारी-भरकम राशि को जारी करने का आदेश दे दिया.

न्यूजॉलान्ड्री का हमेशा से यह विजन और स्टैंड रहा है कि अगर खबरों पर विज्ञापन का दबाव होगा तब मीडिया घराने जनहित की पत्रकारिता नहीं कर सकते. खबरों को राजनीतिक और कारपोरेशन के दबाव से आजाद रखने के लिए जरूरी है कि इसमें वो लोग योगदान करें जिनके लिए खबरें होती हैं, यानि देश के नागरिक, यहां के लोग. दैनिक जागरण ने इस 11 करोड़ की विज्ञपन राशि के लिए किस किस तरह से जनहित को दांव पर लगाया है इसे समझने के लिए एक हालिया घटना का उदाहरण देना ठीक रहेगा.

हाल ही में हुए हाथरस में दलित बालिका से हुई बलात्कार और हत्या के मामले की बात करते हैं. इस मामले में जांच चल रही है कि दोषी कौन है, मामला अब सीबीआई के पास पहुंच चुका है. लेकिन दैनिक जागरण ने नौ अक्टूबर को इस मामले में पहले पन्ने पर एक ख़बर छापी जिसका शीर्षक था- "युवती की मां व भाई ने की हत्या". इस शीर्षक के ऊपर छोटे अक्षरों में लिखा था- "नया मोड़: हाथरस कांड के आरोपितों ने एसपी को पत्र भेज लगाया आरोप". सवाल यह है कि जिस मामले पर देश और देश के बाहर के लोगों की आंखे लगी हुई हैं वहां हिंदी बेल्ट का एक बड़ा अखबार इस तरह की भ्रामक खबर क्यों छापता है. जबकि मामले में अभी जांच चल रही है. जिस तरह से सरकार और प्रशासन पीड़िता के पक्ष पर सवाल खड़ा कर रहे हैं उसी सुर से दैनिक जागरण भी सुर मिला रहा है.

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कायदे से जागरण का सवाल होना चाहिए था कि आरोपियों से जेल में यह चिट्ठी कौन लिखवा रहा है, हत्या और बलात्कार के आरोपियों को जेल से चिट्ठी लिखकर जांच को प्रभावित करने की छूट उत्तर प्रदेश पुलिस क्यों दे रही है? यह जांच का विषय है कि दोषी कौन है, कौन नहीं. लेकिन अखबार इस इस तरह से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर क्यों फैला रहा है. आरोपियों की कथित चिट्ठी को आधार बनाकर पीड़िता के पक्ष को कमजोर कर रहा है. अखबार लिखता है- "गुरुवार को जेल से पत्र भेजकर उन्होंने आरोप लगाया कि मृत लड़की के भाई और मां ने उसकी पिटाई की थी, जिससे उसकी मौत हुई.”

यह पत्र सोशल मीडिया में भी काफी वायरल हो रहा है. इस पत्र की एसपी ने भी पुष्टि की है. आरोपी संदीप ने चिट्ठी में लिखा- “घटना के दिन उसकी युवती से खेत में मुलाकात हुई थी. उनकी दोस्ती को लेकर पीड़िता की मां और उसके भाई ने युवती की पिटाई की है जिससे उसे गंभीर चोट आई थीं. बाद में उसकी मौत हो गई. हम निर्दोष हैं."

जागरण इस तरह की संवेदनशील खबरों में पहले भी इसी तरह की असंवेदनशीलता प्रदर्शित करता रहा है. इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा. सरकार के रुख को समर्थन देने वाली खबरों के पीछे असल में सरकारों से मिलने वाले विज्ञापन के इसी मोटे पैसे की भूमिका है जिसका जिक्र ऊपर आ चुका है. 2018 में जागरण ने जम्मू के कठुआ में हुए नाबालिक बालिका से बलात्कार के मामले में भी इसी तरह से खबरों में छेड़छाड़ की थी. उस समय जागरण ने पहले पन्ने पर हेडिंग कुछ यूं लगाई थी- "कठुआ में बच्ची से नहीं हुआ था दुष्कर्म".

तब बिना किसी दस्तावेज के ही जागरण ने यह खबर अखबार और अपनी वेबसाइट पर प्रमुखता से छापी थी. बाद में जागरण के डिजिटल प्लेटफॉर्म से यह ख़बर हटा दी गई. फिर करीब आठ घंटे बाद बिना किसी बदलाव के फिर से उसे अपलोड कर दिया गया. इस ख़बर की सत्यता पर उस समय न्यूज़लॉन्ड्री ने फैक्टचेक में पाया कि दैनिक जागरण की खबर बेबुनियाद और तथ्यहीन थी. उस समय जागरण के डिजिटल संपादक कमलेश रघुवंशी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया था, "प्रिंट और डिजिटल के नियम अलग-अलग होते हैं. जरूरी नहीं कि जागरण डिजिटल अपने प्रिंट का नकल हो.”

फिर उन्होंने स्टोरी हटाई क्यों. इस सवाल पर रघुवंशी ने कहा, “हमारे पास शुरुआत में रिकॉर्ड और प्रमाण नहीं थे, इसलिए हमने स्टोरी हटा दी थी. हमने रिपोर्टर से कहा कि सबसे पहले हम तथ्यों को एक बार जांच लेंगे फिर प्रकाशित करेंगे.” तो फिर पहली बार में आपने स्टोरी को छापा ही क्यों? इस सवाल के जवाब में रघुवंशी ने कहा, “चूंकि प्रिंट (दैनि जागरण अखबार) ने छाप दी थी इसलिए शुरुआत में डिजिटल में भी प्रकाशित कर दिया गया. लेकिन जब हमें लगा कि तथ्यों की पड़ताल कर लेनी चाहिए, तब हमने स्टोरी हटा ली.” तो क्या प्रिंट ने बिना तथ्यों की पुष्टि किए ही स्टोरी छाप दी थी? इस पर रघुवंशी ने कहा, “नहीं ऐसा नहीं है. हमारे रिपोर्टर ने डॉक्युमेंट देख लिए थे. पर हमने कहा कि देखने से काम नहीं चलेगा. हमें भेजो.” हालांकि वो दस्तावेज हमें दिखाने के सवाल पर रघुवंशी मुकर गए.

सवाल यही है कि इतना बड़ा अखबार इतने संवेदनशील केस में ख़बर छापने के बाद तथ्यों की जांच करता है. इसी तरह अब हाथरस मामले में दिख रहा है. जागरण द्वारा इस तरह की भ्रामक खबरें छापना जारी है. बता दें कि कठुआ घटना के वक्त इस अखबार का काफी विरोध हुआ था. इससे आहत लोगों ने कई जगहों पर अखबार जलाकर प्रदर्शन भी किया था. इसी तरह जागरण ने दिल्ली में सीएए और एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन पर भी भ्रामक खबरें छापी. 21 मार्च को छपी एक खबर में लिखा- "शाहीन बाग के दो प्रदर्शनकारी भी चपेट (करोना की) में". जबकि शाहीन बाग के जिन दो प्रदर्शनकारियों के कोरोना संक्रमित होने की खबर दी गई थी, उनके न तो दिए गए थे, न ही उनसे या उनके परिवार के किसी सदस्य से बातचीत की गई.

पहली ही नजर में यह खबर इसकी विश्वसनीयता पर कई सारे सवाल खड़े करती है और इसके फर्जी होने का संकेत देती है. लिखने वाले को खुद भी पता नहीं है कि ये लोग प्रदर्शन का हिस्सा थे या नहीं. खबर के अंदर लिखा है, “बताया जा रहा है कि वे शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन में भी शामिल हुए हैं. ऐसे में संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने इसकी पुष्टि नहीं की है.” खबर को लिखने से पहले न किसी से बात की गई है ना किसी सोर्स का हवाला ही दिया गया है. सिर्फ इतना लिखा है कि जहांगीरपुरी निवासी महिला और उनका बेटा छह कोरोना संक्रमित लोगों में शामिल हैं और “दोनों शाहीन बाग प्रदर्शन में शामिल हुए थे.” इस खबर में बाकी चार संक्रमितों की भी कोई चर्चा नहीं है.

यानी जागरण ने अपनी वेबसाइट पर जो खबर छापी उसे पढ़कर लगता है कि पूरी खबर शाहीन बाग में चल रहे आंदोलन को बदनाम करने की नीयत से मनगढ़ंत तरीके से लिखी गई. कुल मिलाकर पूरी खबर चतुराई से, सनसनीखेज तरीके से शाहीन बाग को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश नजर आती है.

ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस की जून-दिसंबर 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक दैनिक जागरण भारत का दूसरा सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार है. देश के लाखों लोगों का विश्वास इस पेपर पर है लेकिन अपने पाठकों के विश्वास पर क्या अखबार खरा उतर रहा है? उत्तर प्रदेश सरकार से जुड़े अहम मुद्दों को कैसे कवर किया, हमने यह भी जानने की कोशिश की है. कोरोना वायरस ने जीवन के सभी क्षेत्रों को हानि पहुंचाई हैं लेकिन सबसे ज्यादा असर मीडिया के व्यवसाय पर हुआ है. यह सर्वविदित हैं कि इस कोरोनाकाल का सबसे ज्यादा असर प्रिंट मीडिया पर हुआ है. जिसके कारण प्रिंट मीडिया से जुड़े हजारों लोगों की नौकरियां देश भर में गईं.

अखबार पर कोरोना के मामलों को भी सही से कवर नहीं करने का आरोप लगा है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा शुरुआती दिनों में कोरोना के मामलों को सही से नहीं संभाला गया, इसके बाद से आगरा का केस पूरे देश में छा गया. अखबार ने अपने कर्मचारियों का भी ध्यान नहीं रखा. जिसकी रिपोर्ट न्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित हुई थी. जागरण के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ट के मामले में सभी स्थानीय पत्रकारों ने जिला प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाया था लेकिन दैनिक जागरण ने अपने पत्रकार के पक्ष में न तो जिला प्रशासन से सवाल किया और ना ही प्रदेश सरकार से. उल्टे उनकी मौत की ख़बर को आगरा एडिशन के भीतर के पन्ने में समेट दी थी.

प्रदेश में कोरोना के बढ़ते मामलों पर दबी-छुपी रिपोर्टिंग का कारण तो जागरण जाने लेकिन विज्ञापन के पैसे के दबाव में जागरण से जनहित की खबरों की उम्मीद नहीं की जा सकती. जागरण को विज्ञापन की राशि जारी करने के पत्र के साथ बेसिक शिक्षा निदेशक ने जिलावार बकाया राशि की लिस्ट भी जारी की है. इस पत्र में बेसिक शिक्षा परिषद के निदेशक डॉ. सर्वेन्द्र विक्रम बहादुर सिंह ने जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों को पत्र लिखते हुए अखबार को तत्काल भुगतान सुनिश्चित कराने की बात कही. हालांकि अभी तक यह भुगतान हो चुका है या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है.

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