क्या होता है जब बनारस जैसी बहुआयामी सभ्यता को पाट कर महज एक ‘डेस्टिनेशन’ में बदल दिया जाता है? जब आस्था ‘कंटेंट’ बन जाती है और भक्ति महज ‘दर्शनार्थियों की तादाद’ में बदल जाती है?