पाठक और प्रसार के बजाय विज्ञापन से महान बनते राजस्थानी अखबारों की कहानी

राजस्थान में ऐसे कई अखबार हैं जिन्हें केंद्र सरकार और राज्य सरकार से करोड़ों का विज्ञापन मिलता है, बावजूद इसके कि न तो उनके यहां कोई संपादकीय स्टाफ है, न असली कंटेंट है ना ही कोई भरोसेमंद सर्कुलेशन है.

WrittenBy:बसंत कुमार
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जयपुर के एक पत्रकार हैं गोपाल शर्मा. उनका अपना अखबार प्रकाशित होता है जयपुर महानगर टाइम्स नाम से. इसी साल अप्रैल महीने में अपने एक लेख में वो लिखते हैं, ‘‘महानगर टाइम्स पर कोई पीत पत्रकारिता या अवैध लेन देन का आरोप नहीं लगा सकता है और ना ही किसी पार्टी या सरकार का पिछलग्गू बता सकता है. इसी कारण सरकारी सुविधाओं और विज्ञापन लेने में हम पीछे रहे.’’

गोपाल शर्मा जिस भरोसे के साथ यह बात कहते हैं दस्तावेज उसी भरोसे के साथ उनके दावे की धज्जी उड़ा देते हैं. भारत सरकार द्वारा बीते नौ सालों में अखबारों को दिए गए विज्ञापन का आंकड़ो हमने निकाला और पाया कि इन नौ सालों में जिन 5,172 अख़बारों को विज्ञापन दिए गए हैं उसमें जयपुर महानगर टाइम्स का स्थान 37 वें नंबर पर हैं.  

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अख़बार में छपा शर्मा का लेख

इस अखबार को भारत सरकार ने मार्च 2014 से फरवरी 2023 तक 10 करोड़ 33 लाख  27 हजार 601 रुपए का विज्ञापन दिया है. अगर मौजूदा वित्त वर्ष 2023-24 (जुलाई 2023) की बात करें तो अब तक इस अखबार को 30 लाख रुपए का विज्ञापन मिल चुका है. विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) पर दी गई जानकारी के मुताबिक, राजस्थान से इस अखबार के चार संस्करण- जयपुर, कोटा, अलवर और दौसा से निकलते हैं. 

जयपुर महानगर टाइम्स

जयपुर महानगर टाइम्स (जेएमटी)  राजस्थान में विज्ञापन पाने वाले स्थानीय अखबारों में जागरूक टाइम्स के बाद आता है. राजस्थान के सिरोही जिले से निकलने वाले जागरूक टाइम्स अखबार को भारतीय जनता पार्टी के सिरोही जिला के अध्यक्ष नारायण पुरोहित के छोटे भाई गोविंद पुरोहित चलाते हैं. बीते नौ सालों में तकरीबन 13 करोड़ का विज्ञापन पाने वाला यह अखबार दैनिक जागरण, प्रभात खबर, जनसत्ता आदि अखबारों से संपादकीय और संपादकीय पन्ने पर छपने वाला लेख कॉपी कर छापता है. इस पर न्यूज़लॉन्ड्री ने विस्तार से रिपोर्ट की थी.

सरकारी विज्ञापन के लिए अखबारों का सर्कुलेशन सबसे महत्वपूर्ण अर्हता है. हालांकि, नियमों के मुताबिक अधिकारियों को अख़बारों का कंटेंट भी देखना चाहिए. डीएवीपी के एक अधिकारी बताते हैं, ‘‘सर्कुलेशन की जानकारी लेना हमारे लिए आसान है. अखबार के लिए कितना कागज आया. प्रिंटिंग प्रेस से कितना पेपर छप कर निकला. इस सब की लिखित जानकारी होती है. कंटेंट हम कितने ही अखबारों का देख सकते हैं? देश में पांच हजार से ज्यादा अखबार हैं.’’  

जेएमटी के कंटेंट की अगर बात करें तो यह अखबार संपादकीय लेख भी दूसरे अखबारों से उठाता है. कभी-कभी नहीं बल्कि हर रोज. मसलन, 14 जुलाई को फ्रांस और भारत के रिश्ते को लेकर जो संपादकीय इस अखबार में छपा है, यह दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर 13 जुलाई को छपे आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विदेश नीति प्रभाग के उपाध्यक्ष हर्ष वी पंत का लेख था. अखबार ने कहीं भी पंत या जागरण को क्रेडिट नहीं दिया है.

14 जुलाई को अखबार के संपादकीय पन्ने पर दो लेख प्रकाशित हुए. एक केंद्रीय मंत्री आरके सिंह का और दूसरा हिमालय को लेकर शम्भूनाथ शुक्ला का. ये दोनों ही लेख दूसरे अख़बारों में एक दिन पहले प्रकाशित हो चुके थे. इनमें से सिंह का लेख पंजाब केसरी में तो शुक्ला का लेख प्रभात ख़बर में 13 जुलाई को छपा था. 

यह कहानी सिर्फ एक दिन की नहीं है. जेएमटी दूसरे अख़बारों के लेख या संपादकीय से कुछ हिस्सा नहीं बल्कि पूरा लेख शब्दशः उठाता है.

हर साल एक करोड़ रुपए से ज्यादा का विज्ञापन लेने वाले इस अखबार में ज्यादातर ख़बरें प्रेस रिलीज से प्रकाशित होती हैं.  हालांकि, इन ख़बरों में कांग्रेस और भाजपा से जुड़ा संतुलन नजर आता है. कुछ लोग कांग्रेस शासित राज्य सरकार से मिलने वाले विज्ञापन को इस संतुलन की वजह बताते हैं.

लेकिन यह संतुलन इस अखबार के फेसबुक पर मौजूद वीडियोज में नहीं नजर आता है. यहां पर अखबार पूरी तरह से भाजपा के पक्ष में खड़ा नजर आता है. मसलन, पीएम मोदी की राजस्थान यात्रा से पहले एक जून को एक वीडियो पब्लिश हुआ. जिसका थंबनेल था- ‘‘राजस्थान में फ्री बिजली पर सियासत, पीएम मोदी की सभा से डरे मुख्यमंत्री गहलोत’’. इसी तरह 25 जून को एक वीडियो पब्लिश हुआ. इका थंबनेल था, ‘डोटासरा और राजेंद्र पारीक के बीच लंबी बहस, गहलोत अपने मंत्रियों को कंट्रोल में करें’. 

वहीं, भाजपा से संबंधित जो वीडियो जयपुर महानगर टाइम्स ने अपने फेसबुक पर साझा किए, उसके थंबनेल पार्टी के पक्ष में लिखे गए हैं. उदाहरण के लिए ‘राजस्थान की आगामी चुनावी रण के लिए भाजपा की विजय संकल्प टीम तैयार’. यह खबर 2 जुलाई को प्रकाशित हुई थी. 8 जुलाई को जब भाजपा ने राजस्थान चुनाव के लिए अपने प्रभारी, सहप्रभारी नियुक्त किए उसके बाद इस अखबार ने ‘राजस्थान में भाजपा ने लगाया मास्टरस्ट्रोक, कांग्रेस चारों खाने चित्त.’’

महानगर टाइम्स के यूट्यूब चैनल पर फेसबुक के मुकाबले ज्यादा वीडियो पब्लिश होते हैं, जबकि इसके सब्सक्राइबर कम हैं. 

राजस्थान में लंबे समय से पत्रकारिता करने वाले एक पत्रकार बताते हैं, ‘‘महानगर टाइम्स ही नहीं राजस्थान के अन्य दूसरे मझौले अखबारों का झुकाव यहां जो पार्टी सत्ता में होती है, उसकी तरफ होता है. महानगर टाइम्स का झुकाव भाजपा की तरफ तो है लेकिन राज्य सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों को खोने के डर से वो संतुलन बनाकर चलते हैं.’’ 

अखबार का संतुलनवादी चरित्र इसके संपादक प्रभारी जिज्ञासु शर्मा के फेसबुक से पता चलता है. वे इसी साल, 26 जनवरी को जेपी नड्डा के साथ तस्वीर साझा कर लिखते हैं, ‘‘भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रधानमंत्री मोदी जी के सेनापति और भारत के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक श्री जेपी नड्डा जी द्वारा जयपुर में आयोजित निजी कार्यक्रम के दौरान आशीर्वाद लेते हुए.’’ 

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साल 2019 में शर्मा गहलोत से भी आशीर्वाद लेते नजर आए थे. नवंबर 2019 में अपने फेसबुक पर सीएम गहलोत के साथ तस्वीर साझा करते हुए जिज्ञासु लिखते हैं, ‘‘राजस्थान के जननायक, यशश्वी मुख्यमंत्री आदरणीय श्री अशोक गहलोत से मुलाकात कर आशीर्वाद लिया. उनसे मिले स्नेह और सम्मान से अभिभूत हूं.’’ 

इसके अलावा भी सीएम गहलोत के साथ उनकी कई और तस्वीरें हैं. जिसमें वे गहलोत का गुणगान करते नजर आते हैं. 

जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार ने हमें बताया कि यह अखबार संतुलनवादी रवैये के बावजूद भी यह भाजपा की तरफ ज्यादा झुका नजर आता है. इसके पीछे वजह है, जिज्ञासु शर्मा के पिता और अखबार के संस्थापक संपादक और मालिक गोपाल शर्मा. शर्मा, एक इंटरव्यू में भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत को पितातुल्य बताते नजर आते हैं.

शर्मा इस दौरान बताते हैं कि जब वे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे तब शेखावत वहां छात्र नेता के तौर पर भाषण देने आए थे. वहीं, वे उनसे प्रभावित हुए और जुड़ गए. आगे चल शेखावत ने उन्हें जयपुर बुलाया तो वे इस उम्मीद में आए थे कि कहीं नौकरी लगा देंगे लेकिन उन्होंने (शेखावत ने) कहा कि पत्रकारिता क्यों नहीं कर लेते? उसके बाद वे पत्रकारिता में आए. 

गोपाल शर्मा के फेसबुक पोस्ट उनके लेखक होने के साथ-साथ ब्राह्मणवादी होने की भी गवाही देते हैं. अक्सर वो ब्राह्मण समाज और परशुराम जयंती में शामिल होते नजर आते हैं. एक मई को मानसरोवर ब्राह्मण समाज की ओर से आयोजित युवक-युवतियों के परिचय सम्मेलन में शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे. इस आयोजन की खबर महानगर टाइम्स में ‘‘भगवान परशुराम के आशीर्वाद से चिरस्मरणीय बनेगा आयोजन: डॉ शर्मा "शीर्षक से छपा. अन्य पोस्ट भी भगवान परशुराम और ब्राह्मणवादी होने से जुड़े नजर आते हैं. वे सामूहिक जनेऊ कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं."

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इन दिनों शर्मा, जयपुर के सांगानेर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की टिकट के लिए मेहनत करते नजर आ रहे हैं. यह सीट 2003 से ही भाजपा जीत रही है. यहां के लोगों के बीच भाषण देते हुए अक्सर वो हिंदुओं की ताकत की बात करने लगते हैं.  

इसकी गवाही, इनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर मौजूद एक रील भी देती है, जिसका थंबनेल है- ‘हिंदू किसी को छेड़ता नहीं और छेड़ता है तो…’  इस वीडियो में वो कुछ लोगों के सामने भाषण दे रहे हैं. जिसमें वे कहते हैं, "एक पांच फुट का नेता है, योगी आदित्यनाथ. सारे उत्तर प्रदेश के अपराधी उत्तर प्रदेश छोड़कर भाग गए." 

तभी भीड़ से एक युवक कहता है, सांगानेर आ गए.

इसके बाद शर्मा कहते हैं, ‘‘सांगानेर आकर तो उन्होंने बहुत बड़ा खतरा मोल ले लिया. यहां तो सांगा बाबा विराजमान हैं. सांगा बाबा के भक्त हिंदू भी हैं और हिंदू किसी को छेड़ता नहीं और छेड़ता है तो छोड़ता नहीं है.’’ 

भीड़ में मौजूद लोग नारा लगाते हैं, ‘‘जय श्री राम.’’

इसी जगह बोलते हुए शर्मा एक और बात कहते हैं, ‘‘कौन जनता था, मोदी जी जैसा आदमी आएगा. कहां चाय की दुकान पर अपने पिताजी का मदद करने वाला. आज बाइडेन और पुतिन जैसे राष्ट्रपति उनसे भयभीत रहते हैं. जो बाइडेन का कंधा थपथपाने की ताकत रखते हैं. यह किसकी ताकत है?, हिंदुओं की ताकत है.’’

भीड़ एक बार फिर नारा लगाती हैं, ‘‘जय श्री राम.’’

हाल ही में शर्मा सांगानेर में बन रहे एक अल्पसंख्यक हॉस्टल के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे. उनके पीछे जो भीड़ चल रही थी, उसके हाथों में ‘हिंदुओं एक हो जाओ’ की तख्ती थी. तब भाषण देते हुए शर्मा ने कहा था कि किसी भी हाल में यहां अल्पसंख्यक हॉस्टल नहीं बनने दिया जाएगा. 

दरअसल, यह भीड़ हिंदूवादी संगठनों की थी. जब यह प्रदर्शन चल रहा था उस समय महानगर टाइम्स पर इससे जुड़ी कई खबरें प्रकाशित हुईं. यहां हमें इस अखबार की एक चालाकी नजर आती हैं. अखबार में जो खबरें छपती उसमें न शर्मा की तस्वीर थी और न ही उनकी बाइट. वहीं डिजिटल में जो खबरें छपी उसमें प्रमुखता से इनकी तस्वीरें दिखाई गई. 

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महानगर टाइम्स ने डिजिटल में यह खबर खूब चलाई. जिसमें गोपाल शर्मा की तस्वीरें प्रमुखता से लगी थीं. 18 मई को ‘सांगानेर में अल्पसंख्यक हॉस्टल के विरोध में हिंदू संगठनों ने निकाला पैदल मार्च’ शीर्षक से जो खबर छपी उसमें भाजपा विधायक और अन्य लोगों के साथ शर्मा की तस्वीर लगी लगी है और लिखा है, ‘‘इस दौरान महानगर टाइम्स के संस्थापक संपादक डॉ गोपाल शर्मा, सांगानेर विधायक अशोक लाहोटी, सांसद रामचरण बोहरा व हिन्दू संगठन के सभी कार्यकर्ताओं द्वारा 5 आवासन मंडल कार्यालय पर ज्ञापन दिया गया. डॉ गोपाल शर्मा ने बताया कि 'सरकार अल्पसंख्यक छात्रावास के भूमि आवंटन को रद्द करे, तुष्टिकरण की राजनीति ना करे'.’’

हिंदूवादी संगठनों के साथ सड़कों पर उतरे शर्मा का फेसबुक उनके आरएसएस के करीब होने की भी गवाही देता है. इसी साल एक अप्रैल को शर्मा ने आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की तस्वीर के सामने हाथ जोड़े खड़े होकर तस्वीर साझा की थी. जिसमें उन्होंने लिखा था कि, ‘‘सहस्त्राब्दी के महानायक… हमारे आराध्य प. पू. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की जयंती पर कोटिशः नमन !! हे युगदृष्टा, हे महायति, पदवंदन ! हे केशव कोटि-कोटि अभिनंदन !!’’ 

16 जुलाई को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जयपुर आते हैं तो शर्मा उनके स्वागत के लिए पहुंचते हैं.  

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ शर्मा

शर्मा अक्सर मीडिया की शुचिता पर बोलते हैं लेकिन खुद उनका अखबार ही दूसरे अखबारों के संपादकीय प्रकाशित करता है. राजस्थान के एक सीनियर पत्रकार हंसते हुए कहते हैं, ‘‘अब जब संपादक जी हनुमान चालीसा पढ़वाने और हिंदुओं को एक करने के मिशन पर होंगे तो अखबार के लिए लिखेंगे कब?’’

यह वरिष्ठ पत्रकार एक और गंभीर मसले की तरफ ध्यान दिलाते हैं. वे कहते हैं, ‘‘गोपाल शर्मा हो या दूसरे किसी अखबार के मालिक, ये कभी वर्किंग जर्नलिस्ट भी थे. शर्मा तो राजस्थान में वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष भी रहे हैं. ऐसे लोगों से उम्मीद की जाती है कि पत्रकारों को वाजिब मेहनताना मिलेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है. मालिक बनते ही इनकी भाषा बदल जाती है. सेठों वाली भाषा हो जाती है. आज जयपुर टाइम्स में भी काम करने वालों को ठीक सैलरी नहीं मिल पाती है.’’ 

डीएवीपी पर दी जानकारी के मुताबिक, जयपुर महानगर टाइम्स अलवर और दौसा जिले में प्रसार के मामले में ‘बिग’ की सूची में है.  इन जगहों से इसकी क्रमशः 85 हजार 800 और 86 हजार 200 प्रतियां छपती हैं. वहीं, जयपुर और कोटा में यह ‘स्मॉल’ की सूची में हैं. इन दोनों जगहों से 25-25 हजार प्रतियां छपती हैं.   

न्यूज़लांड्री ने जयपुर महानगर टाइम्स के प्रमुख गोपाल शर्मा से बात की. जब हमने दूसरे अखबारों से संपादकीय और लेख उठाने को लेकर सवाल किया तो उन्होंने कहा कि यह मेरी जानकारी में नहीं है. मैं इसे देखता हूं. अगर ऐसा तो गलत है. 

भाजपा और हिंदुओं को लेकर उनके सोशल मीडिया पोस्ट पर भी हमने सवाल किए. उनसे पूछा कि जो आप पोस्ट डालते हैं वो अखबार के संपादक के नाते होते हैं या किसी नेता के नाते? इस पर वे कोई स्पष्ट जवाब नहीं देते हैं. वहीं, सांगानेर से चुनाव लड़ने के सवाल पर कहते हैं, ‘‘मन में तो चुनाव लड़ना है. आगे क्या होगा किसे पता है.’’

अखबार को मिलने वाले विज्ञापन पर शर्मा कहते हैं, ‘‘सालाना एक करोड़ का विज्ञापन कोई बड़ी रकम नहीं है. महीने के आठ लाख होते हैं. ये तमाम राशि हम अखबार निकालने में खर्च करते हैं.’’

राष्ट्रदूत, 10 करोड़ का विज्ञापन 

`राष्ट्रदूत अखबार को बीते नौ सालों में 10 करोड़ के करीब विज्ञापन मिला है. वहीं, इस साल की बात करें तो जुलाई तक इसे लगभग 23 लाख रुपए का विज्ञापन मिला है. डीएवीपी पर दी गई जानकारी के मुताबिक, इसके आठ संस्करण प्रकाशित होते हैं. 

अभी तक हमने जितने अखबार देखे उसकी तुलना में राष्ट्रदूत एक मामले में अलग है. यहां रिपोर्टर्स की बाइलाइन ख़बरें नजर आती हैं. वहीं, इसका संपादकीय भी कॉपी (नकल किया हुआ) नहीं होता है. हालांकि यह अखबार धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है. इसके पीछे इसके मैनेजमेंट का ‘व्यक्तिवादी’ रवैया है. 

इसे ठीक से समझाते हुए जयपुर के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘एक समय राष्ट्रदूत, राजस्थान का सबसे अग्रणी अखबार हुआ करता था. लेकिन धीरे-धीरे व्यक्तिवादी हो गया. जैसे अभी देखें तो यह पायलट की तरफ है. प्रदेश में गहलोत और सचिन पायलट के बीच विवाद शुरू हुआ तो यह सचिन पायलट के पक्ष में खबरें करने लगा. कई बार जबर्दस्ती के आरोप भी लगाए गए. दिल्ली से रेनू मित्तल नाम की एक पत्रकार लगातार पायलट के पक्ष में रिपोर्ट करती हैं.’

जिसका नतीजा यह हुआ कि राजस्थान सरकार ने इसका विज्ञापन रोक दिया. साल 2021 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रेस काउंसिल से राष्ट्रदूत अख़बार पर कार्रवाई करने के लिए कहा था. तब गहलोत ने कहा था, "राष्ट्रदूत की बात करूं तो उनके जो पहले मालिक थे, उनका एक नाम हुआ करता था. राष्ट्रदूत से कई लोग निकले हैं और बड़े-बड़े पत्रकार बने हैं. वो राष्ट्रदूत जो धज्जियां उड़ा रहा है, आज पब्लिक में बेइज्जती करवा रहा है. फर्जी न्यूज़ प्लांट करवा रहा है. पहले मैं कई बार उदाहरण दे चुका हूं. प्रदेश में ऐसा माहौल बनाते हैं कि प्रदेशवासियों को शर्म आती है कि ऐसा अखबार राजस्थान में है, जिसका तथ्यों में दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है, तभी वह ऐसी ख़बरें लगाते हैं."

दरअसल, 16 अक्टूबर  2021 को अखबार ने राहुल गांधी और अशोक गहलोत की दिल्ली में हुई मुलाकात पर रिपोर्ट की थी. यह रिपोर्ट रेनू मित्तल की ही थी, जिसमें लिखा था, ‘‘सीडब्ल्यूसी की मीटिंग के दौरान बोलते हुए मुख्यमंत्री शिकायती अंदाज में थे. उन्होंने राहुल गांधी से कहा कि इससे पहले जब आप हमसे मिला करते थे तब हमें लंच या डिनर दिया करते थे और बात किया करते थे. लेकिन अब आप किसी राजनीतिक प्रश्न पर चर्चा नहीं करते और न ही उसका उत्तर देते हैं. आपका ध्यान सिर्फ गैर-राजनीतिक मुद्दों पर है.’’

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इसी बात से सीएम कार्यालय नाराज हुआ था. तब कहा गया था कि यह तथ्यहीन खबर है. इसके बाद भी यह अखबार अशोक गहलोत के खिलाफ ऐसी ख़बरें प्रकाशित करता रहा जिनसे ऐसा लगा रहा था कि कांग्रेस आलाकमान, गहलोत सरकार से खफा है. 

अखबार ने 29 अक्टूबर 2021 को एक ख़बर प्रकाशित की. जिसका शीर्षक था, ‘सचिन पायलट दिवाली तक सरकार में, और फरवरी तक मुख्यमंत्री?’ इस तरह सचिन के पक्ष की ख़बरों का सिलसिला जारी रहा और नतीजतन गहलोत सरकार ने अखबार के विज्ञापन पर रोक लगा दी.

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इस अखबार की शुरुआत कांग्रेस से जुड़े रहे स्वतंत्रता सेनानी हजारी लाल शर्मा ने साल 1952 में की थी. अब इसके संपादक उनके बेटे राजेश शर्मा हैं. वहीं, जिस कंपनी के तहत यह अखबार चलता है उसके तीन डायरेक्टर हैं, राजेश शर्मा, राकेश शर्मा और सोमेश शर्मा.’

जहां बाकी अखबार संतुलनवादी रवैया अपनाते हैं, वहीं राष्ट्रदूत व्यक्तिवादी झलक देता है. ऐसा क्यों? इसके जवाब में एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘‘इसके पीछे मुख्य वजह इस अखबार का ब्राह्मणवादी चरित्र है. एक समय राजस्थान में कांग्रेस की लीडरशिप में ज़्यादातर सवर्ण ही थे लेकिन कांग्रेस में गहलोत के मजबूत होने से यह सिलसिला टूट गया. ऐसे में अखबार को लगता है कि कांग्रेस में फलाना व्यक्ति गहलोत को चुनौती दे सकता है, उसे यह अखबार प्रमुखता से छापने लगता है. जो जगह आज सचिन पायलट को अखबार में मिल रही है वो कुछ साल पहले बाड़मेर से कांग्रेस सांसद सोनाराम को मिलती थी.’’

वरिष्ठ पत्रकार आगे कहते हैं, ‘‘मैं इस अखबार को ब्राह्मणवादी कह रहा इसके पीछे वजह है. दरअसल, राज्य में एक समय कांग्रेस में नवल किशोर शर्मा और भाजपा में भंवरलाल शर्मा, ये दो नेता हुआ करते थे. यह अखबार उन्हें ‘जी’ लिखता था. जैसे- नवल किशोर शर्मा जी ने कहा, नवल जी यहां पहुंचे आदि.’’ 

अखबार मुख्यमंत्री गहलोत के पीछे पड़ा रहता है, इसका एक उदाहरण 21 जुलाई को जयपुर एडिशन के पहले पेज पर छपी पहली स्टोरी है. यह खबर भी रेनू मित्तल की है. इसमें राजस्थान सरकार की एक होर्डिंग की तस्वीर लगाई गई है. जिस पर सीएम गहलोत की तस्वीर के साथ लिखा है, ‘जन सम्मान वीडियो कांटेस्ट, वीडियो बनाओ, इनाम पाओ’. यह राजस्थान सरकार का कार्यक्रम है. इसका कैप्शन देते हुए अखबार ने लिखा कि इसमें न राहुल गांधी की तस्वीर है, ना सोनिया गांधी की, न मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे की और न ही कांग्रेस के चुनाव चिन्ह हाथ का निशान और न ही गहलोत सरकार के किसी मंत्री का फोटो है.’’

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रेनू मित्तल की लिखी इस रिपोर्ट में भाषा भी बेहद लचर है. ऐसा लगता है कि रिपोर्ट नहीं कोई सोशल मीडिया पोस्ट हो. वो लिखती हैं, ‘‘विज्ञापन फिल्में बदलकर फिर से बनाई गई हैं लेकिन होर्डिंग्स तथा बैनर को कचरे में फेंकना अभी बाकी है.’’ आगे वो एक जगह लिखती हैं, ‘‘गहलोत द्वारा बड़ी धूमधाम से लाई गई सभी योजनाएं राजकीय कोष को बड़ी महंगी पड़ रही हैं लेकिन गहलोत इसे इस तरह से प्रस्तुत कर रहे हैं मानो ये उनके द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर जनता के लिए लाई गई योजनाएं हों तथा उसके लिए इन्होंने अपनी जेब से पैसे दिए हों.’’

अखबार इन दिनों अशोक गहलोत की तस्वीर छापता ही नहीं है. उनसे जुड़ी खबरें भी इस अखबार में नजर नहीं आती हैं. 22 जुलाई को गहलोत ने जयपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. जिसमें उन्होंने भाजपा द्वारा मणिपुर से राजस्थान की तुलना करने पर नाराजगी जताई. अगले दिन अखबार में इस ख़बर को कोई जगह नहीं मिली. वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी, पूर्व अध्यक्ष सतीश पूनिया समेत भाजपा नेताओं के बयानों को ख़बर के रूप में छापा गया.

न्यूज़लॉन्ड्री ने अखबार के मालिकों में से एक राकेश शर्मा से अख़बार के व्यक्तिवादी रवैये को लेकर सवाल किया तो वे कहते हैं, ‘‘कोई अखबार कैसे किसी एक व्यक्ति के पक्ष में रिपोर्ट कर सकता है? राष्ट्रदूत, राजस्थान का सबसे पुराना अखबार है. अशोक गहलोत सरकार के एक साल पूरे होने के बाद, 2020 से उन्होंने हमारा विज्ञापन रोका हुआ है. प्रेस काउन्सिल भी विज्ञापन देने के लिए कह चुका है, इसके बाद भी नहीं दिया जा रहा है.’’

लेकिन अशोक गहलोत के खिलाफ राष्ट्रदूत लगातार खबरें छाप रहा है. सरकारी विज्ञापनों पर पार्टी नेता की तस्वीर नहीं छाप सकती बावजूद इसके लिखा जाता है कि गहलोत खुद को बड़ा दिखाने के लिए ये कर रहे हैं. इस सवाल पर शर्मा कहते हैं, ‘‘अशोक गहलोत को परेशानी है तो वो शिकायत करें. उनकी शिकायत तो एक भी नहीं है. पूर्व में सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीरें तो छपती थी, अब नहीं छप रही है तो लिखा जाएगा.’’

बता दें कि विज्ञापनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, जिसमें साफ-साफ बताया गया है कि किसकी तस्वीर छप सकती हैं और किसकी नहीं. राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने को लेकर विज्ञापन में तस्वीरें छापने पर साफ मनाही है.

वहीं, गहलोत की तस्वीर नहीं छापने के सवाल पर वे कहते हैं, ‘‘नहीं ऐसा नहीं है. हम उनसे जुड़ी खबरें प्रकाशित करते हैं.’’

समाचार जगत, 6 करोड़ 75 लाख 

राजस्थान के जयपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार जगत अखबार को भारत सरकार ने बीते बीते नौ सालों में 6 करोड़ 75 लाख का विज्ञापन दिया है. डीएवीपी के मुताबिक, इस अखबार के जयपुर से ही दो एडिशन निकलते हैं. एक दैनिक प्रातः और एक दैनिक सांध्य.

इस अखबार पर सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 6 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया था. अख़बार प्रबंधन द्वारा वित्त वर्ष 2022-23 तक इसके जयपुर के अलावा दिल्ली से भी प्रकाशित होने का दावा किया जाता था. जिसके चलते इसके दिल्ली एडिशन को भी विज्ञापन मिलते थे. लेकिन 2023-24 में इसके केवल जयपुर एडिशन को ही विज्ञापन मिल रहे हैं.

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समाचार जगत के विज्ञापनों में भारी गिरावट आई है. वित्त वर्ष 2023-24 के जुलाई महीने तक इसे सिर्फ 10 लाख का विज्ञापन मिला है.

इस अखबार की शुरुआत राजेंद्र के. गोधा ने की थी. वर्तमान में इसके मालिक और संपादक गोधा के बेटे शैलेन्द्र गोधा हैं. राजस्थान के एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि राजेंद्र के. गोधा कांग्रेसी विचारधारा वाले थे लेकिन राजस्थान के तमाम अखबार मालिकों और संपादकों की तरह वे भी जिसकी सरकार उसके साथ होते थे. जब राजस्थान में वसुंधरा जी मुख्यमंत्री थीं तो वे उनके करीब थे. उन्होंने एप का उद्घाटन भी उनसे ही करवाया था.

यह अखबार अपने शुरूआती समय से जैन समुदाय के बीच सिमटकर रह गया. इसकी वजह बताते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार, जो एक हिंदी अखबार के साथ लंबे समय से जुड़े हुए थे, कहते हैं, ‘‘यह अखबार कभी राजस्थान में उतना प्रोमिनेन्ट नहीं रहा.  इसकी जैन समाज में अच्छी पकड़ है. राजेंद्र जी, जैन समाज के संगठन के प्रदेश अध्यक्ष थे. ये अखबार जैन समाज के लिए छपता था और वो ही लोग खरीदते थे. आज भी कमोबेश यही हाल हैं.’’

आज भी इस अखबार में जैन समाज और उनके मुनियों को लगभग रोजाना ही जगह दी जाती है. देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं भी जैन मुनियों का कार्यक्रम होता है, यहां उनके बयानों को छापा जाता है. 

जयपुर महानगर टाइम्स की तरह यह अखबार संपादकीय या संपादकीय पर छपे लेख शब्दशः तो कॉपी नहीं करता है लेकिन हमने पाया कि कई जगह से कंटेंट लेकर उसे आगे-पीछे कर छाप देता है. मसलन, एक उदाहरण से समझते हैं. 15 जुलाई को अखबार ने ‘नशे के चंगुल में फंसते जा रहे युवा’ शीर्षक से संपादकीय लिखा. जिसमें युवाओं में बढ़ते नशा और उसके प्रभाव का जिक्र था.

इस संपादकीय को एक नहीं कई अलग-अलग जगहों से कॉपी किया गया. इसमें से एक हिस्सा दैनिक जागरण में 2012 में छपी एक ख़बर से शब्दशः लिया गया था. ऐसे ही एक हिस्सा अमर उजाला पर अक्टूबर 2022 को छपी ख़बर का है. वहीं तीसरा हिस्सा पंजाब केसरी में जनवरी 2023 में छपे ब्लॉग से लिया गया है.

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इस अखबार में ज्यादातर ख़बरें प्रेस रिलीज से प्रकाशित होती हैं. कई बार तो हालात यह होते हैं कि अखबार प्रेस रिलीज को एडिट करना भी जरूरी नहीं समझता. मसलन, 17 जुलाई को करणी सेना के अध्यक्ष ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से मुलाकात की थी. अक्सर प्रेस रिलीज लिखने वाले, मुख्यमंत्री या दूसरे लोगों के नामों में जी और श्री का संबोधन लगाते हैं. अखबार ने इसे हूबहू छाप दिया (नीचे की तस्वीर में आप इसे देख सकते हैं) यानी थोड़ा सा भी एडिट करना जरूरी नहीं समझा गया.  

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राजस्थान में कई अखबारों को वहां की सरकार ने सस्ती दरों पर जमीन दी है. समाचार जगत को भी ऐसे ही जमीन मिली है. नियम के मुताबिक, इस जमीन का इस्तेमाल अखबार से जुड़े कारोबार के लिए ही होगा लेकिन इसने जमीन को एक कोचिंग सेंटर को किराये पर दिया हुआ है.

इस अखबार की प्रसार संख्या की बात करें तो डीएवीपी पर दी गई जानकारी के मुताबिक, जयपुर से इसकी 1,28,591 प्रतियां निकलती हैं. वहीं इसके इविनिंग एडिशन में 16 हज़ार 788 प्रतियां निकलती हैं. यह सरकारी आंकड़ा है, लेकिन एक युवा पत्रकार जिसने हाल ही जयपुर के हरदेव जोशी मीडिया संस्थान से पढ़ाई की. उसने बताया कि यह अखबार उसे कभी नजर नहीं आया.

इसकी तस्दीक जयपुर में जागृति न्यूज़ पेपर एजेंसी के प्रमुख मुकेश यादव भी करते हैं. यादव रोजाना अलग-अलग अखबारों की करीब 1300 प्रतियां बांटते हैं. जयपुर महानगर टाइम्स और समाचार जगत की कितनी कॉपी आप रोजाना बांटते हैं? इसपर वे कहते हैं, ‘‘इन अखबारों की सात से आठ कॉपी ही मैं बांटता हूं जिसमें से ज्यादातर उद्योग भवन और पर्यटन भवन जैसे दफ्तरों में जाती हैं. अलग से तो एक दो लोग ही लेते हैं. ये लोग प्रचार ही नहीं करते तो कोई कैसे पढ़ेगा?’’

समाचार जगत के संपादक तरण रावल से इधर-उधर से संपादकीय कॉपी करने और प्रेस रिलीज को शब्दशः छापने के सवाल पर कहते हैं, ‘‘जिसने संपादकीय लिखा है उसने कुछ करा होगा. इधर-उधर से सदंर्भ सब लेते हैं.’’ हमने आगे पूछा तो वो कहते हैं कि आपको जो ठीक लगे लिख लीजिए. जिसने संपादकीय लिखा होगा उससे बात की जाएगी. 

वहीं, सूचना मंत्रालय द्वारा छह लाख रुपए की रिकवरी और सरकारी दर पर मिली जमीन को किराये पर देने को लेकर सवाल किया तो वे कहते हैं, ‘‘ये सवाल आप अखबार के जनरल मैनेजर पवन जैन से पूछिए.”

जब हमने पवन जैन से सरकार को छह लाख रुपए वापस करने को लेकर सवाल किया तो वे कहते हैं, ‘‘पीआईबी ने चार महीने बाद जांच की जबकि उसकी बिलिंग हो गई थी. उन्होंने प्रसार में गड़बड़ी होने की बात की लेकिन हमारा प्रसार ठीक था लेकिन उन्हें क्या कह सकते हैं. उन्होंने कहा कि पैसे देने होंगे तो हमने दे दिए.’’ 

संध्या ज्योति दर्पण, 4 करोड़ का विज्ञापन

राजस्थान में विज्ञापन पाने वाले अखबारों में संध्या ज्योति दर्पण भी है. विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) पर दी गई जानकारी के मुताबिक, राजस्थान से इस अखबार के चार एडिशन- नागौर, अलवर, भरतपुर और जयपुर से प्रकाशित होते हैं. 

इस सांध्यकालीन पेपर को बीते नौ सालों में 4 करोड़ 16 लाख 33 हज़ार 138 रुपए का विज्ञापन मिला हैं.  वहीं, इस इस साल की बात करें तो जुलाई तक इसे 15 लाख का विज्ञापन मिला है. इसे राजस्थान सरकार का भी नियमति विज्ञापन मिलता है.

इस अख़बार के संपादकीय पन्ने को पढ़ने के बाद लगता है कि जनसत्ता और दिल्ली से छपने वाले दूसरे अख़बार इनके लिए भी काम करते हैं. हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, उसके लिए 20 जुलाई को छपे संध्या टाइम्स का ही उदाहरण लेते हैं.

इस दिन का संपादकीय जनसत्ता से शब्दशः लिया गया.  जो उत्तराखंड के चमोली में नमामि गंगे योजना में हुए हादसे और उसमें हुई मौतों से जुड़ा था. जनसत्ता में 20 जुलाई को ही छपा था. यानी यहां सुबह प्रकाशित किया और दोपहर में संध्या टाइम्स ने उठा लिया.

इस दिन अखबार ने संपादकीय पन्ने पर पहला लेख शिक्षा व्यवस्था को लेकर गिरीश्वर मिश्रा का प्रकाशित किया. यह लेख 19 जुलाई को दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ था. दूसरा लेख खालिस्तानियों को लेकर विवेक काटजू का था. यह लेख भी 19 जुलाई को दैनिक जागरण के संपादकीय पन्ने पर प्रकाशित हुआ था. तीसरा लेख जिसे बताया गया कि विदेशी अखबारों से है, वह भी जागरण में 19 जुलाई को प्रकाशित हुआ था.

यह सिर्फ एक दिन की कहानी नहीं है. अखबार का संपादकीय पेज अक्सर ऐसे ही दूसरे अखबारों से लेख या संपादकीय कॉपी करके प्रकाशित करता है. 12 जुलाई को अखबार ने ‘अर्बन प्लानिंग पर दें ध्यान’ शीर्षक से संपादकीय प्रकाशित किया, जो नवभारत टाइम्स में उसी दिन छपा था. इस पेज पर मौजूद दूसरा लेख ‘नाटो में जेलेंस्की को झटका’ को लेकर छपा वो भी उसी दिन नवभारत टाइम्स में छपा था.

हमने पाया कि कई बार यह अखबार कॉपी भी ठीक से नहीं कर पाता है. जैसा कि 12 जुलाई को हुआ. अखबार ने पश्चिम बंगाल में हुई चुनावी हिंसा पर प्रभात ख़बर के संपादक आशुतोष चतुर्वेदी के नाम से लेख प्रकाशित किया.  यह प्रभात खबर में 10 जुलाई को छपा तो था लेकिन जयंत घोषाल का लेख था. इसी रोज संपादकीय पेज पर छपा दूसरा लेख ‘सामंती सोच पर चोट की ज़रूरत’ डीके वर्मा के नाम से छपा, यह लेख प्रभात ख़बर के संपादक आशुतोष चतुर्वेदी का था, जो 10 जुलाई को ही छपा था. कहते हैं न नकल के लिए भी अक्ल की ज़रूरत होती है बाकि दिनों में भी कुछ-कुछ यही हालत रहे. 

संपादकीय के अलावा अखबार के दूसरे कंटेंट की बात करें तो राजनीतिक रिपोर्टिंग यह अखबार प्रेस रिलीज के जरिए करता है. वहीं जो बाकी पेज आते हैं, वहां भी कॉपी पेस्ट कर कंटेंट छापता है. 

उदाहरण के लिए, 13 जुलाई को ही अखबार ने ‘व्यंजन ज्योति’ करके एक पन्ना प्रकाशित किया. इसमें अलग-अलग खानों की रेसिपी बताई गई हैं. इसमें से 6 खानों की रेसिपी डिटेल में बताई गई और यह सभी खबरें Her Zindagi नाम की वेबसाइट से शब्दशः ली गईं. मालूम हो कि यह वेबसाइट दैनिक जागरण समूह की है. 

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इस अखबार की शुरुआत बीएम शर्मा ने की थी. जो इन दिनों जयपुर के करीब स्थित ‘खोले के हनुमान मंदिर’ से जुड़े हैं. वे यहां की संचालन कमेटी के सेक्रेटरी हैं. यह बेहद ही नामचीन मंदिर है. यहां भाजपा नेता और पूर्व सीएम वसुंधरा राजे, वर्तमान सीएम अशोक गहलोत समेत तमाम बड़े नेता पूजा करने के लिए आते हैं. एक पत्रकार एक मंदिर के संचालन कमेटी का सदस्य क्यों ही होगा? यह सवाल पूछने पर जयपुर में एक राष्ट्रीय अखबार के रिपोर्टर न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘यह कोई समान्य सा मंदिर नहीं है, लोगों में इसके प्रति काफी आस्था है. यहां नेताओं के साथ-साथ अधिकारी भी आते हैं. ऐसे में संपर्क बनाये रखने को लिए यह सही जगह है.’’

वर्तमान में इस अखबार के संपादक महेंद्र कुमार यादव हैं. वहीं, मुद्रक और प्रकाशक सरोज शर्मा हैं. सरोज शर्मा, बीके शर्मा की पत्नी हैं. इनके बेटे अजय शर्मा भी अखबार से ही जुड़े हुए हैं.

समाचार जगत की तरह इस अखबार को भी राज्य सरकार की तरफ से सस्ते दर पर दफ्तर के लिए जमीन मिली है. इस अखबार ने भी अपने दफ्तर के ऊपरी हिस्सा आईआईटी की कोचिंग देने वाले संस्थान फिटजी को बीते दस सालों से किराये पर दिया हुआ है. 

दूसरे अखबारों से संपादकीय शब्दशः कॉपी करने के सवाल पर इसके सम्पादक महेंद्र कुमार यादव कहते हैं, ‘‘ये हमारे डेस्क वाले लापरवाही कर देते हैं. क्या करें? मैं इसको देखता हूं.’’ संपादकीय तो अखबार का अपना होना चाहिए, इस पर यादव कहते हैं, ‘‘कई बार संपादकीय नहीं होता तो क्या कर सकते हैं.’’

वहीं, सरकार से रियायती दरों पर मिली जमीन को किराये पर देने को लेकर सवाल किया तो उन्होंने इसे सही बताया. वे आगे कहते हैं कि ऐसा करना गलत नहीं है. यह नियमों के तहत है. हमारे अलावा अन्य अखबार भी करते हैं. 

पिछले 8-9 सालों में जहां राजस्थान में एक तरफ अखबारों को मिलने वाली विज्ञापन राशि में वृद्धि हुई तो वहीं विज्ञापन पाने वाले अखबारों की संख्या कम होती गई. आंकड़ों की बात करें तो 2015-16 में 661 अखबार विज्ञापन पाते थे, वहीं 2022-23 में यह संख्या 203 थीं और 2023-24 में यह संख्या घटकर 190 रह गई है. 2022-23 में 203 अखबारों को केंद्र सरकार ने 15 करोड़ 73 लाख 12 हज़ार 440 रुपए के विज्ञापन दिए. वहीं 2021-22 में 529 अखबारों को 6 करोड़ 36 लाख 74 हज़ार 231 रुपए का विज्ञापन दिए हैं. 

बता दें कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अप्रैल 2014 से 13 जुलाई 2023 तक अखबारों को कुल 23 अरब 56 करोड़ 33 लाख 66 हज़ार 819 रुपए का विज्ञापन दिया है यानी सरकार बीते नौ सालों से रोजाना विज्ञापन पर 70 लाख रुपए खर्च कर रही है. 

आलोचना के बाद धीरे-धीरे केंद्र सरकार विज्ञापन पर खर्च कम करती गई, दूसरी तरफ भाजपा शासित राज्य सरकारों का विज्ञापन बढ़ता जा रहा है. वहीं जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है, वहां अब भी विज्ञापनों पर सरकार जमकर खर्च कर रही है.

राजस्थान इन्हीं राज्यों में से एक है. वित्त वर्ष 2023-24 में 13 जुलाई तक केंद्र सरकार ने यहां के 188 अखबारों को 5 करोड़ 82 लाख 92 हज़ार 894 रुपए का विज्ञापन दिया है. वहीं इस बीच यूपी के 366 अखबारों को 3 करोड़ 97 लाख 16 हज़ार 348 रुपए का, मध्य प्रदेश के 133 अखबारों को 2 करोड़ 41 लाख 42 हज़ार 445 रुपए विज्ञापन दिए गए हैं. इस दौरान राजस्थान से ज्यादा विज्ञापन दिल्ली और महाराष्ट्र में दिए गए.

न्यूज़लॉन्ड्री के पास वित्त वर्ष 2015-16 से वित्त वर्ष 2022-23 (जुलाई तक) के राज्यवार आंकड़े मौजूद हैं. इस दौरान राजस्थान के अखबारों को मोदी सरकार की तरफ से 1 अरब 80 करोड़ 59 लाख 82 हज़ार 903 रुपए का विज्ञापन यहां दिया गया. 

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