अशोक गहलोत और राष्ट्रदूत अखबार के बीच तकरार की क्या है वजह?

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीते दिनों राष्ट्रदूत अखबार पर नाराजगी जाहिर करते हुए प्रेस काउंसिल से उसपर कार्रवाई करने के लिए कहा था.

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अशोक गहलोत और राष्ट्रदूत अखबार के बीच तकरार की क्या है वजह?
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23 अक्टूबर को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पत्रकारों से बात करते हुए मीडिया पर ही बरस पड़े. उन्होंने कहा, ‘‘अफवाहों के खेल में मीडिया फंस गया है. मीडिया समझ नहीं पा रहा है, कई बार वो टेबल न्यूज़ बनाता है. 16 अक्टूबर को मेरी राहुल गांधी जी से कोई मुलाकात नहीं हुई. जो हम सुबह मिले थे वर्किंग कमेटी में. आईकैच हुआ होगा. बाकी मुलाकात कहीं नहीं हुई. शाम का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है. मीटिंग हो रही है हमारी कमेटी की. जिसमें प्रियंका गांधी जी थीं, केसी वेणुगोपाल थे और अजय माकन जी थे. और जो स्टोरी मैंने अख़बारों में पढ़ी तो मुझे बड़ी शर्म आती है कि मीडिया कहां जा रहा है.’’

इसके बाद गहलोत राष्ट्रदूत अखबार का नाम लेकर कहते हैं, ‘‘राष्ट्रदूत की बात करूं तो उनके पहले जो मालिक थे उनका एक नाम था. राष्ट्रदूत से कई लोग निकले हुए हैं और इस रूप में निकले हुए है कि मैं समझता हूं कि बड़े-बड़े पत्रकार बने हैं. वो राष्ट्रदूत जो धज्जियां उड़ा रहा है, पब्लिक में बेइज्जती करवा रहा है. फर्जी न्यूज़ प्लांट करवा रहा है. पहले मैं कई बार उदाहरण दे चुका हूं. प्रदेश में ऐसा माहौल बनाते हैं कि प्रदेशवासियों को शर्म आती है कि ऐसा अखबार राजस्थान में है. जिसका तथ्यों में दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है, तभी वह ऐसी खबरें लगाते हैं.’’

सीएम गहलोत यहीं नहीं रुकते. आगे वे राष्ट्रदूत अखबार के मालिकों और संपादकों को भी बुरा भला कहते हैं, ‘‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को कॉग्नीजन्स (संज्ञान) लेना चाहिए, ध्यान रखना चाहिए कि राजस्थान में ऐसा अखबार भी है, जिसकी कोई प्रसार संख्या नहीं है. फर्जी प्रसार संख्या बता रखी है. करोड़ों रुपए विज्ञापन के नाम पर उठा रहे हैं बिना शर्म के.”

16 अक्टूबर की मुलाकात पर राष्ट्रदूत ने क्या छापा?

राष्ट्रदूत राजस्थान का एक पुराना अखबार है. इसकी शुरुआत कांग्रेस से जुड़े रहे स्वतंत्रता सेनानी हजारी लाल शर्मा ने साल 1952 में की थी. अखबार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक राजस्थान में इसके आठ संस्करण हैं.

राजस्थान के पत्रकारों की माने तो किसी अखबार का नाम लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पहली बार इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया है. ऐसे में पहले यह जानते हैं कि राहुल गांधी और अशोक गहलोत की मुलाकात को लेकर राष्ट्रदूत ने आखिर क्या छापा, जिसको लेकर वे नाराज हो गए.

दरअसल 16 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई. जिसको लेकर अखबार ने पहले पृष्ठ पर तीन रिपोर्ट प्रकाशित कीं. इन खबरों में रेणु मित्तल की बाइलाइन है. इसमें से एक खबर सीएम गहलोत और राहुल गांधी से जुड़ी है. जिसका शीर्षक ‘मुख्यमंत्री गहलोत की राहुल गांधी के निवास पर लंबी व महत्वपूर्ण बातचीत हुई’ है.

खबर के मुताबिक राहुल गांधी के 12 तुगलक रोड स्थित आवास पर अशोक गहलोत और राहुल गांधी की मुलाकात हुई. जिसमें कांग्रेस महासचिव अजय माकन भी मौजूद थे. सीडब्ल्यूसी की मीटिंग के बाद इसमें प्रियंका गांधी और केसी वेणुगोपाल भी शामिल हुए.

खबर में आगे लिखा है, ‘‘दो दिवसीय यात्रा के दौरान सीएम गहलोत को सोनिया गांधी से भेंट करने का समय नहीं मिला जो हमेशा से उनकी समर्थक एंव शुभचिंतक रही हैं. उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक राजस्थान सरकार की कार्यशैली को लेकर कांग्रेस हाईकमान नाखुश है.’’

रिपोर्टर मित्तल आगे लिखती हैं कि मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ भारी शिकायतें हैं क्योंकि वे अधिकांश समय जनता से दूरी बनाकर रहे. इसके बाद खबर में सीडब्ल्यूसी की मीटिंग का भी जिक्र है, ‘‘सीडब्ल्यूसी की मीटिंग के दौरान बोलते हुए मुख्यमंत्री शिकायती अंदाज में थे. उन्होंने राहुल गांधी से कहा कि इससे पहले जब आप हमसे मिला करते थे तब हमें लंच या डिनर दिया करते थे और बात किया करते थे. लेकिन अब आप किसी राजनीतिक प्रश्न पर चर्चा नहीं करते और न ही उसका उत्तर देते हैं. आपका ध्यान सिर्फ गैर-राजनीतिक मुद्दों पर है.’’

19 अक्टूबर को राहुल गांधी और अशोक गहलोत की इस मुलाकात पर राष्ट्रदूत अखबार में रेणु मित्तल की एक और रिपोर्ट छपी. मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों की माने तो नाराजगी इस रिपोर्ट को लेकर ज्यादा है.

इस रिपोर्ट का शीर्षक है ‘राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री को दिल्ली तलब किया.’ रिपोर्ट में रेणु मित्तल लिखती हैं कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राहुल गांधी ने तलब किया है. ऐसी संभावना है कि राज्य में जिन लोगों को राजनैतिक नियुक्तियां दी जानी हैं, उसकी सूची लेकर वे 22 अक्टूबर को दिल्ली आएंगे.

वह रिपोर्ट में आगे लिखती हैं, सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी के साथ चंद रोज पहले हुई गहलोत की मीटिंग में, राहुल ने उनसे पूछा था कि क्या वे पार्टी के हाईकमान बनना चाहते हैं?

केसी वेणुगोपाल तथा अजय माकन ने राजनैतिक नियुक्तियों के लिए 50 लोगों की सूची बना ली थी. जिसे हाईकमान का अनुमोदन मिल गया था. यह सूची अशोक गहलोत को दी गई थी तथा उसपर अमल करने को कहा गया था किंतु उन्होंने उनकी उपेक्षा कर दी थी तथा उसपर अमल करने से इंकार कर दिया. जब राहुल गांधी ने उनसे पूछा कि उस सूची का क्या हुआ तो गहलोत वेणुगोपाल और अजय माकन की ओर देखने लगे. इसपर राहुल गांधी ने उनसे कहा कि वे उनकी (राहुल) ओर देखें तथा सीधे उन्हीं को बताएं.

इस खबर में आगे यह बताया गया है कि नाराज राहुल गांधी ने अशोक गहलोत की खिंचाई भी की.

राहुल गांधी मीटिंग में थे या नहीं?

राष्ट्रदूत के इस विवाद पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने नाराजगी तो दर्ज कराई ही. साथ ही उनके ओएसडी लोकेश शर्मा ने इसको लेकर 20 अक्टूबर को एक ट्वीट भी किया.

अपने ट्वीट में शर्मा लिखते हैं, ‘‘16 अक्टूबर को माननीय मुख्यमंत्री की राहुल गांधी से कोई मुलाकात नहीं हुई. राहुल गांधी के आवास पर राजस्थान को लेकर बनी हुई AICC समिति की बैठक हुई थी. इस बैठक में अशोक गहलोत, प्रियंका गांधी, केसी वेणुगोपाल, अजय माकन शामिल थे. लेकिन कुछ मीडिया संस्थान इस बैठक में राहुल के शामिल होने की अफवाह फैलाकर गलत खबरें चला रहे हैं. किसी भी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान द्वारा ऐसी मनगढंत खबरें चलाना शर्मनाक है.’’

इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि राहुल गांधी मीटिंग में थे या नहीं?

दिल्ली में कांग्रेस कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, ‘‘अगर मीटिंग राहुल गांधी के घर पर हो रही है तो कोई भी अनुमान लगाएगा कि उस दौरान वे वहां मौजूद होंगे. जहां तक कहा जा रहा है कि यह मीटिंग राजस्थान को लेकर बनी कांग्रेस कमेटी की थी तो उसमें प्रियंका गांधी कैसे शामिल हुईं? उस कमेटी में तो अजय कामन, केसी वेणुगोपाल और अहमद पटेल थे. अहमद पटेल तो अब हैं नहीं. मीटिंग में राहुल गांधी नहीं थे ऐसा तभी मुमकिन है जब उस दौरान वे दूसरे कमरे में या बाहर थे. लेकिन समान्य समझ तो यही कहती है कि राहुल गांधी के घर पर मीटिंग हुई तो वे उसमें जरूर शामिल होंगे.’’

इसको लेकर लोकेश शर्मा कहते हैं, ‘‘सेंट्रल लीडरशिप ने मीटिंग कहां होगी इसको लेकर फैसला किया. दूसरी बात जो राजस्थान के लिए कमेटी बनी हुई थी उसमें राहुल गांधी तो हैं नहीं. जहां तक रही प्रियंका गांधी की बात तो उन्होंने इस मीटिंग की पहल की थी, ऐसे में हो सकता है कि वो ही तय कर रही हों. लेकिन यह जरूरी नहीं है कि जिनके घर पर मीटिंग हो उसमें वो भी शामिल हों. यह तो वही कंफर्म कर सकते हैं जो अंदर मीटिंग में थे.’’

कांग्रेस को कवर करने वाले एक दूसरे पत्रकार न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, “16 अक्टूबर को हुई मीटिंग में राहुल गांधी भी मौजूद थे. इसकी जानकारी सूत्रों के जरिए मिली. अगर नहीं थे तो उसी दिन अशोक गहलोत को बताना था. मीटिंग से निकलते हुए उनसे सवाल पूछा गया तो वे बिना जवाब दिए निकल गए.”

इसके अलावा कई दूसरे पत्रकार जो कांग्रेस को लंबे समय से कवर करते हैं वे भी इस बात से सहमत नजर आते हैं कि मीटिंग के दौरान राहुल गांधी वहां थे. हालांकि अशोक गहलोत और उनके समर्थक यह दावा कर रहे हैं कि मीटिंग में राहुल गांधी नहीं थे.

राष्ट्रदूत अखबार के संपादक राजेश शर्मा इस पर कहते हैं, ‘‘जहां तक रही राहुल गांधी के मीटिंग में मौजूद नहीं होने की बात तो यह सरासर गलत है. उनके घर पर मीटिंग रखने का क्या मतलब, जब वे मौजूद ही नहीं थे.’’

अशोक गहलोत और राष्ट्रदूत के बीच विवाद

अशोक गहलोत के बयान के अगले दिन राष्ट्रदूत में रेणु मित्तल का एक लंबा लेख छपा. जिसका शीर्षक था, ‘‘अशोक गहलोत को गुस्सा क्यों आता है.’’

इस लेख में मित्तल सीएम गहलोत को सीधे निशाने पर लेते हुए लिखती हैं, ‘‘क्या गहलोत मेरी न्यूज़ पर इतने विचलित इसलिए हुए कि वह न्यूज़ सच्चाई के बहुत नजदीक थी.’’

हालांकि लोकेश शर्मा कहते कि सरकार को तथ्यों पर आधारित खबरों के जरिए होने वाली आलोचना से दिक्क्त नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘मुख्यमंत्री जी तो सरकार की आलोचना को पसंद करते हैं ताकि सरकार उस दिशा में काम कर सकें. लेकिन तथ्यहीन खबरों से मीडिया पर भी सवाल होते हैं. राहुल गांधी जी से मुलाकात की खबर तथ्यहीन थी. वह एजेंडे के तहत लिखी हुई थी. ऐसा लगता है कि कोई खबर प्लांट करवा रहा है. उन्होंने अपनी खबर में लिखा कि राहुल गांधी ने सीएम को 22 अक्टूबर को दिल्ली तलब किया है. हकीकत यह है कि 22 को सीएम दिल्ली गए ही नहीं. तो इस तरह से तथ्यविहीन खबरें कोई छापेगा गलत तो है ही.’’

आखिर कौन खबर प्लांट करवा रहा है? इस सवाल पर लोकेश शर्मा कोई स्पष्ट जवाब नहीं देते हैं.

इसी सवाल पर राजस्थान में लंबे समय से पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘‘मुझे लगता है कि मुख्यमंत्री का इशारा सचिन पायलट की तरफ था. अखबार आये दिन सचिन पायलट को लेकर खबरें छापता रहता है. अभी आज (27 अक्टूबर) की ही खबर देखिए कि इन्होंने लिखा है कि सचिन पायलट दिवाली तक सरकार में आ जाएंगे और फरवरी में मुख्यमंत्री बनेंगे.”

दरअसल अखबार में 27 अक्टूबर को सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनने की छपी. खबर में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि पायलट दिवाली तक सरकार में शामिल हो जाएंगे. यह उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की दिशा में पहला कदम होगा.’’

वरिष्ठ पत्रकार अशोक गहलोत और राष्ट्रदूत के बीच के संबंधों पर कहते हैं. ‘‘अशोक गहलोत की ऐसी भाषा कभी नहीं रही है. उनका अखबार के मालिकों के साथ संबंध भले ही जैसा भी रहा हो लेकिन वर्किंग जर्नलिस्ट के स्तर पर उनका रवैया हमेशा से सही रहा है. उनके खिलाफ लोग बहुत खबरें छापते थे, लेकिन किसी खबर पर वे कभी खफा नहीं हुए. राष्ट्रदूत से उनका लंबे समय से विवाद चल रहा है. दरअसल अखबार भी तमाम सीमाओं को पार कर रहा है. एक दिन उनका हेडिंग था, ‘‘मुख्यमंत्री राज्य का सबसे बड़ा जेबकतरा’’. अभी कुछ दिन पहले की ही बात है जब लिखा था कि मुख्यमंत्री गहलोत ने नीलामी में मुख्यमंत्री की कुर्सी ली है. गांधी परिवार नीलामी में कुर्सी बेचता है. हम पत्रकारों को भाषा और तथ्य के स्तर पर अपनी सीमाओं को नहीं लांघना चाहिए.’’

‘‘राष्ट्रदूत में बीते पांच छह सालों में यह बदलाव आया है. जहां तक मुझे ध्यान है पिछले चुनाव में इन्होंने एक रिपोर्ट छापी थी कि अशोक गहलोत घबराए हुए हैं और तांत्रिक के पास जा रहे हैं. जिस तांत्रिक का नाम छापा उसको मरे हुए 10 साल हो गए थे.’’ वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं.

ऐसा नहीं है कि अखबार और सीएम के बीच विवाद 16 अक्टूबर के मुलाकात के बाद शुरू हुआ. यह विवाद लंबे समय से चल रहा है. नाराज गहलोत सरकार ने करीब डेढ़ साल तक अखबार का विज्ञापन बंद रखा था.

राष्ट्रदूत के संपादक और मालिक राजेश शर्मा न्यूज़लॉन्ड्री से अपनी स्टोरी के साथ खड़े होने का दावा करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘मीटिंग में मौजूद सूत्रों से मिली जानकारी के बाद ही खबर लिखी गई है.’’

शर्मा कहते हैं, ‘‘राष्ट्रदूत को राज्य सरकार ने करीब डेढ़ साल तक एक रुपए का विज्ञापन नहीं दिया. जिसके बाद हम प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया गए. वहां हमने केस डाला. केस अभी पेंडिग है क्योंकि उन्होंने सरकार से डिटेल्स मांगी हैं कि आपकी विज्ञापन की पॉलसी क्या है. जब हम प्रेस काउंसिल गए तो इन्होंने हमें दोबारा विज्ञापन देना शुरू कर दिया. अब खबर आ रही है कि हमारा विज्ञापन बंद करने वाले हैं. अगर आप आज का ही अखबार देखें तो उसमें सरकारी विज्ञापन बेहद कम मिलेंगे.’’

मुख्यमंत्री ने कहा था कि अखबार अपनी प्रसार संख्या ज्यादा बताकर विज्ञापन लेता है. इसको लेकर शर्मा कहते हैं, ‘‘बड़ी बिडंबनापूर्ण बात है कि एक तरफ वे कहते हैं कि इनकी प्रसार संख्या कम है. दूसरी तरफ कहते हैं कि मैं इनको पढ़ता हूं और ये राजस्थान के पॉलिटिकल मूड को सेट करते हैं. दोनों चीजें विरोधाभाषी हैं. जहां तक रही लोकेश शर्मा की बात तो अभी दिल्ली में उनपर ऑडियो रिकॉर्डिंग को लेकर क्रिमिनल केस चल रहा है. उनकी बेहद कम विश्वनीयता है.’’

मुख्यमंत्री के बयान और विज्ञापन बंद करने की आशंकाओं के बीच संस्थान आगे क्या करने वाला है. इसपर राजेश कहते हैं, ‘‘ऐसा राष्ट्रदूत के इतिहास में पहली बार नहीं हुआ है. पहले पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया साहब ने भी हमारा विज्ञापन बंद कर दिया था. विज्ञापन रोकने की तकनीक बेहद पुरानी है. शायद बाकी जगह चलता हो लेकिन हमारे यहां नहीं चलने वाला है.’’

हालांकि लोकेश शर्मा सरकार द्वारा राष्ट्रदूत का विज्ञापन बंद करने के दावे को सही नहीं मानते हैं.

सचिन पायलट द्वारा खबर प्लांट कराने के आरोप पर पत्रकार रेणु मित्तल कहती हैं, "जो आरोप लगा रहे हैं क्या उन्होंने आकर देखा था कि सचिन पायलट खबर प्लांट करा रहे हैं. उन्हें प्लाट कराने की क्या जरूरत है. राजस्थान कांग्रेस में क्या चल रहा यह कौन नहीं जानता है. सचिन पायलट और कांग्रेस हाईकमान के बीच जो लिखित तय हुआ था उसे अशोक गहलोत पूरा करने की बजाय आगे बढ़ा रहे हैं. दो साल से कैबिनेट का विस्तार नहीं कर रहे हैं. वहीं आय दिनों पायलट की प्रियंका और राहुल गांधी से मुलाकात हो रही. रिपोर्ट तथ्यों पर लिखी जाती है और मैंने भी ऐसा ही किया."

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