37 साल और हजारों करोड़ का बजट: गंगा में सीधा गिराया जा रहा 60 फीसदी घरेलू सीवेज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद ने छह वर्ष में एक बार ही बैठक की है जबकि नियम हर वर्ष बैठक का था.

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37 साल और हजारों करोड़ का बजट: गंगा में सीधा गिराया जा रहा 60 फीसदी घरेलू सीवेज
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37 वर्षों के प्रयास के बाद भी गंगा में बिना किसी उपचार के 60 फीसदी सीवेज की निकासी जारी है. यह तब हो रहा है जब इस राष्ट्रीय नदी के बिगड़े रंग-रूप को संवारने के लिए 30 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का बजट बनाया गया था. गंगा की स्वच्छता के हालात का जायजा लेने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद भी निष्क्रिय हो गई है. इस परिषद के गठन को करीब छह वर्ष बीतने वाले हैं और अभी तक सिर्फ एक बार ही इस परिषद की बैठक की जा सकी है.

केंद्र सरकार की ओर से 7 अक्तूबर, 2016 को गंगा नदी (संरक्षण, सुरक्षा एवं प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश जारी किया गया था, जिसके मुताबिक पीएम मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद को वर्ष में कम से कम एक बार या उससे ज्यादा बार बैठक कर गंगा की सफाई और परियोजनाओं के अमल का जायजा लेना था.

वहीं, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के मुताबिक गंगा से जुड़ी परियोजनाओं के बजट और क्रियान्वयन को लेकर कार्यकारी समिति (एग्जीक्यूटिव कमेटी) की बैठकें जारी हैं. जिसमें परियोजनाओं और उनके खर्च को लेकर बातचीत ज्यादा होती है. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट को नमामि गंगे के तहत खर्च किए गए बजट का ब्यौरा सरकार की ओर से नहीं दिया जा सका है. वर्ष 2017 से लेकर जुलाई, 2022 तक कुल 43 बैठकें संपन्न हुई हैं. हालांकि, नियमों के मुताबिक पीएम के अध्यक्षता वाली गंगा परिषद को इनकी समीक्षा करना चाहिए था.

राष्ट्रीय गंगा परिषद की पहली बैठक 2019 में यूपी के कानपुर में हुई थी, इसकी अध्यक्षता पीएम मोदी ने की थी. इसके बाद से ऐसी कोई बैठक नहीं हुई.

2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने गंगा की स्वच्छता को अपनी उच्च प्राथमिकता वाला काम बताया था और इसके लिए नमामि गंगे नाम योजना की घोषणा की गई थी, जिसका मकसद गंगा के बिगड़े रंग-रूप को बदलना और प्रदूषण पर रोकथाम था. हालांकि, इस पर काम 2016, अक्टूबर के आदेश के बाद से ही शुरू हुआ.

वित्त वर्ष 2014-15 से लेकर 2020-2021 तक इस नमामि गंगे योजना के तहत पहले 20 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का रोडमैप तैयार किया गया था जो कि बाद में बढाकर 30 हजार करोड़ रुपए कर दिया गया. हालांकि, अभी इस स्वीकृत बजट में से करीब 50 फीसदी बजट ही आवंटित हो पाया है. नमामि गंगे के तहत बड़े बजट की घोषणा दरअसल गंगा एक्शन प्लान की विफलता के बाद लाया गया था जिससे जनता में गंगा की सफाई की उम्मीद जगाई गई थी.

विफल रहे गंगा एक्शन प्लान को 14 जनवरी, 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शुरू किया था. इसके दो चरण कई वर्षों तक चले और नतीजा कुछ नहीं निकला. इसके बाद 2009 में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण बनाया गया. गंगा एक्शन प्लान से लेकर 2017 तक इन तीनों कदमों के तहत 6788.78 करोड़ रुपए सरकार की ओर से जारी किए गए. हालांकि, सरकार के मुताबिक 30 जून, 2017 तक 4864.48 करोड़ रुपए खर्च हो पाए. इन खर्चों पर एनजीटी में सुनवाई के दौरान संदेह भी उठा. पर्यावरण अदालत को भी इन खर्चों की सही जानकारी नहीं मिल पाई.

सीबीआई जांच के आदेश, जांच और रिपोर्ट दोनों नहीं

एसटीपी या सीवेज नेटवर्क में पब्लिक का पैसा बर्बाद करने के लिए गंगा मामले में पहली बार सीबीआई जांच का भी आदेश किया गया. हालांकि, सीबीआई जांच से जुड़ी कोई रिपोर्ट आजतक नहीं आई है. 14 फरवरी, 2017 को गंगा सफाई मामले में ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश जल निगम के अधिकारियों पर हापुड़ जिले में गढ़ स्थित एसटीपी के डिजाइन और कंस्ट्रक्शन में खराबी को लेकर सीबीआई जांच का आदेश दिया था.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एमसी मेहता मामले में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से गंगा एक्शन प्लान के खर्च की जानकारी दी गई थी लेकिन वह संतुष्ट करने लायक नहीं थी. जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में 13 जुलाई, 2017 में फैसला सुनाते हुए कहा था कि गंगा इस वक्त देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदी है. कई वर्षों के बाद भी सरकार ने कई घरेलू और औद्योगिक सीवेज उपचार के लिए परियोजनाओं को गंगा एक्शन प्लान के तहत शुरू किया. हालांकि, यह गौर करने लायक है कि एक बड़ी राशि एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) और इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) पर खर्च होने के बाद भी नदी प्रदूषित है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 और 2017 में 1985 से चल रहे गंगा मामले की सुनवाई और निगरानी के लिए पर्यावरण मामलों की अदालत एनजीटी को भेज दिया था. एनजीटी तबसे इस मामले की निगरानी कर रही है. 22 जुलाई, 2022 को एनजीटी ने राष्ट्रीय गंगा परिषद की ताजा रिपोर्ट के आधार पर कहा कि इतनी घोषणाों के होने के बाद भी जुलाई, 2022 तक पांच प्रमुख गंगा राज्यों- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में गंगा नदी में 60 फीसदी बिना उपचार वाले सीवेज की निकासी जारी है.

एनजीटी ने 22 जुलाई, 2022 को रिपोर्ट में पाया कि गंगा राज्यों में एसटीपी और सीईटीपी न सिर्फ 60 फीसदी तक कम हैं बल्कि अपनी क्षमताओं से भी कम काम कर रहे हैं.

केंद्र सरकार की सूचना के मुताबिक 21 मार्च, 2022 तक वित्त वर्ष 2014-15 से लेकर 28 फरवरी, 2022 तक गंगा सफाई और पुनरुद्धार के लिए कुल 15,524 करोड़ रुपए आवंटित किए गए. इनमें से भारत सरकार ने 11567.02 करोड़ रुपए एनएमसीजी को दिया और एनएमसीजी ने यह फंड राज्यों और जिलों में परियोजनाओं के लिए अमल के लिए दिया.

केंद्र सरकार के मुताबिक गंगा में प्रदूषण की रोकथाम और सौंदर्य की विविध परियोजनाओं के लिए स्वीकृत 30853.53 करोड़ रुपए से कुल 364 परियोजनाओं को आकार देना है, हालांकि 21 मार्च, 2022 तक सिर्फ 183 परियोजनाएं ही पूरी की जा सकीं. घरेलू और औद्योगिक सीवेज रोकने के लिए एसटीपी और सीईटीपी का निर्माण इन परियोजनाओं में शामिल हैं.

1985 से फंड का प्रवाह जारी है और गंगा का प्रवाह थम गया है. 22 जुलाई, 2022 को एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि गंगा का पर्यावरणीय प्रवाह भी काफी मंद पड़ गया है. केंद्र सरकार ने जिस तरह से बढ़-चढ़ कर गंगा की स्वच्छता को लेकर घोषणाएं की थी, दरअसल वह अभी तक कागजों पर ही उतर पाई हैं.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 22 जुलाई, 2022 को सुनवाई के दौरान एनएमसीजी की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद कहा कि यह चिंताजनक है कि गंगा में प्रदूषण का ग्राफ गिरने के बजाए बढता जा रहा है.

60 फीसदी सीवेज गंगा में

प्रमुख पांच गंगा राज्यों: बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 10139.3 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) सीवेज पैदा होता है और महज 3959.16 एमएलडी (40 फीसदी) सीवेज का ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए उपचार हो रहा है बाकी 6180.2 एमएलडी (60 फीसदी) को सीधे गंगा में गिराया जा रहा है.

एनजीटी ने गौर किया कि गंगा के प्रमुख पांच राज्यों में कुल 10139.3 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) सीवेज के उपचार के लिए 5822.38 एमएलडी क्षमता वाले कुल 245 एसटीपी मौजूद हैं. हालांकि एनजीटी ने गौर किया कि 245 में कुल 226 एसटीपी ही काम के हैं जो अपनी क्षमता का महज 68 फीसदी ही काम कर रहे हैं.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) सिर्फ 136 एसटीपी की निगरानी करती है, जिसमें से 105 ऑपरेशनल एसटीपी में 96 एसटीपी नियम और मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं. नियम और मानक से मुराद यह है कि इन एसटीपी से निकलने वाले पानी में बीओडी, फीकल कॉलिफोर्म, टीएसएस जैसे मानक संतुलित नहीं पाए जाते हैं. सीपीसीबी के मुताबिक इस पैमाने पर महज 9 एसटीपी ऐसे हैं जो नियमों और मानकों का पालन कर रहे हैं.

सीपीसीबी की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा डाउनस्ट्रीम में नारोरा के बाद 97 स्थानों पर पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं है. कुछ स्थानों पर फीकल कोलीफॉर्म 500 एमपीएन (मोस्ट प्रोबेबल नंबर) प्रति 100 मिलीलीटर है, जिसकी वजह से गंगा का पानी आचमन लायक नहीं है.

सीईटीपी भी खराब

एसटीपी ही नहीं, औद्योगिक प्रवाह के अपशिष्ट का उपचार करने वाला संयंत्र जिसे कॉमन इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) कहा जाता है वह भी ठीक ढंग से काम नहीं कर रहे हैं. एनजीटी ने 22 जुलाई, 2022 को एनएमसीजी की रिपोर्ट पर गौर करने पर पाया कि आठ में से सिर्फ दो सीईटीपी ही मानकों पर काम कर रहे हैं. सबसे ज्यादा चिंता का विषय उत्तर प्रदेश के कानपुर में जाजमऊ, उन्नाव, बंथर स्थित टैनरीज के सीईटीपी का है.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में राष्ट्रीय गंगा स्वच्छ मिशन (एनएमसीजी) की ओर से एसटीपी और सीईटीपी के प्रदर्शन वाली यह पांचवी तिमाही रिपोर्ट 15 जुलाई, 2022 को एमसी मेहता बनाम भारत सरकार मामले में दी गई थी. एनजीटी ने इस मामले में राज्यों से 14 अक्तूबर तक कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है.

प्रमुख गंगा के 5 राज्यों में एसटीपी से सीवेज उपचार की स्थिति

सीवेज उपचार के मामले में सबसे खराब स्थिति बिहार की है. रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 1100 एमएलडी सीवेज की निकासी होती है और सिर्फ 99 एमएलडी (एसटीपी क्षमता का 44 फीसदी) सीवेज का उपचार किया जा रहा है. यानी 1010 एमएलडी सीवेज सीधे गंगा में गिराया जा रहा है. बिहार में 224.50 एमएलडी क्षमता वाले सात एसटीपी हैं जो अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं.

झारखंड में 452 एमएलडी सीवेज की निकासी होती है जबकि राज्य में 107.05 एमएलडी क्षमता वाले 16 एसटीपी काम कर रहे हैं और अपनी क्षमता से काफी कम केवल 68 फीसदी (72.794 एमएलडी) का ही उपचार कर रहे हैं.

सीवेज उपचार के मामले में उत्तराखंड में कुल 329.3 एमएलडी सीवेज की निकासी होती है और इन्हें प्रबंधित करने के लिए कुल 67 एसटीपी 397.20 एमएलडी क्षमता के मौजूद हैं, हालांकि सिर्फ 234.23 एमएलडी यानी 59 फीसदी सीवेज का ही उपचार होता है.

उत्तर प्रदेश में 5500 एमएलडी सीवेज निकासी होती है. इसके लिए राज्य में अभी कुल 118 एसटीपी हैं जिनकी क्षमता 3655.28 एमएलडी है. हालांकि यहां भी क्षमता से काफी कम 3033.65 एमएलडी यानी एसटीपी की कुल क्षमता का 83 फीसदी ही सीवेज का उपचार हो रहा है.

पश्चिम बंगाल में 2758 एमएलडी सीवेज की निकासी हर रोज होती है जबकि 1236.981 एमएलडी सीधे गंगा में गिराया जा रहा है. राज्य में कुल 37 एसटीपी हैं जिनकी क्षमता 1438 एमएलडी सीवेज की है.

(सीवेज उपचार स्थिति सबंधी आंकड़ों का विश्लेषण एनएमसीजी के आंकड़ों के आधार पर किया गया है.)

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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