अंसल रिट्रीट: जहां अरावली बचाने को लेकर कोर्ट का कोई भी आदेश लागू नहीं होता!

संबंधित अधिकारियों के नोटिस और आदेश के बावजूद यहां मौजूद फार्म हाउस जस के तस हैं, साथ ही नए निर्माण भी जारी हैं.

अंसल रिट्रीट: जहां अरावली बचाने को लेकर कोर्ट का कोई भी आदेश लागू नहीं होता!
Shambhavi thakur
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गुरुग्राम शहर से करीब एक घंटे के सफर के बाद रायसीना हिल्स पड़ता है. यह राष्ट्रपति भवन समेत दूसरे सरकारी दफ्तरों वाला रायसीना हिल्स नहीं है, बल्कि यह वह जगह है जहां जंगलों को खत्म कर अवैध रूप से फार्म हाउस बनाए गए हैं.

जब अरावली की पहाड़ियों के बीच चमचमाती सड़कों से होते हुए हम यहां पहुंचते हैं, तो रास्ते में एक चौराहे पर कुछ बोर्ड लगे दिखाई देते हैं. इनमें से एक पीले रंग का बोर्ड कीकर (अरावली में मौजूद एक तरह का पेड़) की डालियों से ढका नजर आता है. बोर्ड पर क्या लिखा उसे पढ़ने के लिए डालियों को हटाना पड़ता है.

इस पुराने से बोर्ड पर लिखा है, ‘‘सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि यह क्षेत्र पंजाब भूमि परीक्षण अधिनियम 1900 की धारा 4 व 5 के अंतर्गत बंद है. जिसको माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वन क्षेत्र माना गया है. इसके अंदर गैर वानिकी कार्य करना दंडनीय अपराध है.’’

इस बोर्ड की बगल में चमचमाती सड़क है. जिसका उद्धाटन हरियाणा सरकार के मंत्री रहे राव नरबीर सिंह ने किया है. यह सड़क बताने के लिए काफी है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का किस तरह पालन हो रहा है.

यहां से हम आगे बढ़ते हैं तो कुछ ही दूरी पर बड़ा सा गेट लगा नजर आता है. गेट के पास ही सुरक्षाकर्मियों के लिए कमरा बना हुआ है. यहां दो प्राइवेट सुरक्षाकर्मी कुर्सी पर बैठे नजर आते हैं. पुलिस बैरिकेडनुमा लोहे के गेट पर ‘वेल कॉम टू अंसल रिट्रीट’ लिखा हुआ है. जो यहां के रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा लगवाया गया है. गेट पर जांच के उद्देश्य से रुकने के लिए अपील की गई है हालांकि यहां हमें कोई जांच के लिए नहीं रोकता है. हम इस सड़क से होते हुए आगे बढ़ जाते हैं. दोनों तरफ पहाड़ी का खूबसूरत नजारा है. आगे बढ़ने पर पेड़ पौधों के बीच फार्म हाउस दिखता है.

एक तरफ जहां दिल्ली में रायसीना पहाड़ी पर तमाम बड़े मंत्रालयों के कार्यालय हैं. वहीं हरियाणा का रायसीना गांव जो अब ‘अंसल रिट्रीट’ के नाम से जाना जाता है, यह अरावली को गंभीर नुकसान कर रहा. यहां 1,200 एकड़ संरक्षित वन भूमि थी जहां अब महलनुमा घर, फार्म हाउस और स्विमिंग पूल बन गए हैं. यहां पेड़ों को काट दिया गया है.

रायसीना गांव के बारे में स्थानीय निवासी बताते हैं, ‘‘यहां के ग्रामीणों ने एक अंग्रेज सैनिक की हत्या कर दी थी. जिसके बाद नाराज अंग्रेजी सरकार ने गांव के लोगों की जमीन, जिसमें एक पहाड़ी भी शामिल थी, को अपने कब्जे में ले लिया और पास के ही गांव के एक अमीर व्यक्ति को बेच दिया.’’ 1980 के दशक में यह जमीन अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर (एपीआई) लिमिटेड को बेची गई थी.

जून 1989 में इस पहाड़ी को ‘अंसल अरावली रिट्रीट’ नाम देकर एपीआई लिमिटेड यहां एक और दो एकड़ की जमीन बेचने लगा.

साल 1992 में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने अरावली पहाड़ी को बचाने के लिए अरावली अधिसूचना पेश की. इस अधिसूचना के बाद यहां पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही वन भूमि पर उद्योग, खनन, निर्माण और विद्युतीकरण के लिए सरकार की अनुमति जरूरी कर दी गई. यह आदेश हरियाणा के गुरुग्राम और राजस्थान के अलवर में लागू हुआ. इसमें भूमि को पांच श्रेणियों (पहाड़ियों, चट्टानों, घाटियों, चरागाहों और तलहटी) में बांटा गया. रायसीना पहाड़ी जहां आज अंसल रिट्रीट है, इस पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत आती है. जिसे हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा लागू किया जाता है.

पर्यावरण कार्यकर्ता चेतन अग्रवाल न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘अरावली अधिसूचना विशेष रूप से रायसीना पहाड़ी पर निर्माण को रोकने के लिए लाई गई थी. दरअसल 1980 और 1990 के दशक की शुरुआत में दिल्ली के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अंसल द्वारा बेचे गए जमीन पर हो रहे काम को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. कोर्ट ने इसको लेकर मंत्रालय से सवाल किया तब पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 1992 में यह आदेश लाया गया.’’

कंपनी के रिकॉर्ड के अनुसार 2021 तक अंसल रिट्रीट के पास 675 फार्म प्लॉट थे. जिनमें से 457 एक एकड़ का और 218 दो एकड़ के थे. इनमें से कम से कम 108 ने अपनी जमीन पर फार्म हाउस बनाए हैं. जो कि अधिकांश अवैध हैं.

हालांकि अंसल रिट्रीट के आरडब्ल्यूए के लिए काम करने वाले लोग अलग ही आंकड़े बताते हैं. 30 वर्षीय फखरुद्दीन साल 2009 से अंसल रिट्रीट के आरडब्ल्यूए में फैसिलिटी मैनेजर हैं. न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए फखरुद्दीन बताते हैं, ‘‘अंसल रिट्रीट का पूरा क्षेत्र 1200 एकड़ में फैला हुआ है. 1989 के जून महीने में यहां अंसल ने प्लॉट काटकर बेचना शुरू किया. शुरू में यहां एक और दो एकड़ का प्लॉट कटा. कुछ लोगों ने दो-दो प्लॉट एक साथ ले लिए. ऐसे में यहां अभी 580 फार्म हाउस हैं. जिसमें से 250 पूरी तरफ चालू हैं. 10 लोगों का परिवार तो यही रहता है. वहीं बाकी लोग शुक्रवार-शनिवार को आते हैं. हालांकि कोरोना टाइम में यह जगह काफी गुलजार रही. दिल्ली और गुरुग्राम से लोग यहां आकर रह रहे हैं.’’

जब हम आरडब्ल्यूए ऑफिस के बाहर फकरुद्दीन से बात कर रहे थे तभी एक शख्स वहां पहुंचे. इन्हें फार्म हाउस खरीदना था. उनके सवालों का जवाब देते हुए फकरुद्दीन कहते हैं, ‘‘यहां अभी सर्कल रेट एक एकड़ का 70 लाख रुपए है.’’

क्या यह एक पहाड़ी या 'गैर मुमकिन फार्म हाउस' है?

एक तरफ सरकार नियम ला रही थी. सुप्रीम कोर्ट आर्डर जारी कर रहा था वहीं दूसरी तरह यहां अवैध निर्माण जारी था. यहां फार्म हाउस बनाने वाले लोग रसूख वाले है. पर्यावरण संरक्षण अधिनियम से बचने के लिए इन्होने पारंपरिक राजस्व रिकॉर्ड में पहाड़ की बदली हुई स्थिति की ओर ध्यान दिलाया जो 1947 से पहले अविभाजित पंजाब की है.

अरावली अधिसूचना द्वारा संरक्षित भूमि की पांच श्रेणियों में से एक ‘गैर मुमकिन पहाड़’ भी है. गुरुग्राम (तब गुड़गांव) के कुछ क्षेत्रों को 7 मई 1992 तक राजस्व रिकॉर्ड में ‘गैर मुमकिन पहाड़’ माना गया है. रायसीना भी इसी में आता है.

हालांकि, साल 2000 में अंसल प्रॉपर्टीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और अन्य, बनाम हरियाणा राज्य प्रदूषण बोर्ड के मामले में यह सामने आया कि हरियाणा के राजस्व रिकॉर्ड में रायसीना पहाड़ी की स्थिति ‘गैर मुमकिन पहाड़’ नहीं थी, बल्कि ‘गैर मुमकिन फार्म हाउस’ थी. कथित रूप से बदलाव 1991 में हुआ था.

इस फैसले को फार्म हाउस मालिक पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय लेकर पहुंचे और तर्क दिया कि अरावली अधिसूचना में उनकी संपत्तियों को शामिल नहीं किया गया है. ऐसे में उनकी जमीन पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत नहीं आती है.

हाईकोर्ट में बहस के दौरान हरियाणा राज्य प्रदूषण बोर्ड ने बताया, “रायसीना गांव में स्थित विवादित भूमि को शुरू से ही राजस्व रिकॉर्ड में अरावली ‘गैर मुमकिन पहाड़’ के रूप में दर्शाया गया था. राजस्व अधिकारियों ने पहाड़ को ‘गैर मुमकिन फार्म हाउस’ के रूप में दिखाने के लिए ‘राजस्व रिकॉर्ड’ में अवैध रूप से बदलाव किया.’’

कोर्ट में यह विवाद 2007 तक चला. साल 2007 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रदूषण बोर्ड के तर्क को स्वीकार कर अपना फैसला सुनाया. रायसीना गांव की जमीन को ‘गैर मुमकिन पहाड़’ ही माना गया. कोर्ट ने भी माना कि जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव किया गया है.

अरावली अधिसूचना के लगभग तीन दशक और कानूनी रोक के बावजूद अंसल रिट्रीट में निर्माण बेरोकटोक जारी है. आज वहां विशालकाय स्कूल, बहुमंजिला फार्म हाउस, शानदार पक्की सड़कें हैं. यहां बिजली मौजूद है. पानी के लिए जगह-जगह ट्यूबवेल बने हुए हैं. यह स्थिति तब है जब सरकार का एक विभाग यहां बन रहे फार्म हाउस को अवैध मानता है. जबकि वहीं दूसरा विभाग यहां पानी, बिजली पहुंचा देता है और यहां लगातार निर्माण होने देता है.

हरियाणा देश का सबसे कम वन क्षेत्र वाला राज्य है. 2019 में भारतीय वन राज्य की रिपोर्ट में सामने आया कि 2017 और 2019 के बीच हरियाणा में वन क्षेत्र में मामूली वृद्धि हुई. यहां वन क्षेत्र में 3.59 प्रतिशत से 3.62 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की. हालांकि जहां हरियाणा में 0.03 की वृद्धि वहीं देशभर में यह वृद्धि 0.56 प्रतिशत थी.

इस दौरान गुरुग्राम को लेकर जो आंकड़े आए वे बेहद चिंताजनक रहे. 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है कि वनों के बचाव के लिए जिस जिले में अधिसूचना जारी की गई उसने (गुरुग्राम) 2015 और 2017 के बीच 0.82 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र खो दिया है. यह हरियाणा के किसी भी दूसरे जिले से अधिक था.

इसी बीच साल 2020 में हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को बताया कि उसने अरावली अधिसूचना के उल्लंघन के मामले में 513 मामले दर्ज किए थे. प्रदूषण बोर्ड द्वारा जारी 425 मामलों की सूची में से 350 अंसल रिट्रीट के थे.

दिसंबर 2021 में न्यूज़लॉन्ड्री रायसीना पहाड़ी पर पहुंचा तो यहां कई जगहों पर चारदीवारी का र्निर्माण किया जा रहा था. लोहे का बड़ा सा गेट लगाया जा रहा था. महलनुमा फार्म हाउस के बाहर ऊंची दीवारें शान से मौजूद हैं. एक जगह चारों तरफ ऊंचाई तक नीले रंग का टीन लगा नजर आया. वहां मजदूरों से बात करने पर पता चला कि ऐसा जमीन समतल कर नया फार्म हाउस बनाने के लिए किया गया है.’’

यहां ज्यादातर फार्म हाउस के गेट पर इसके मालिकों का नाम लिखा हुआ है. इसमें किसी के मालिक डॉक्टर तो किसी के वकील हैं. यहां सेना के कर्नल और भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी का भी घर है. अंसल रिट्रीट के निर्माण के समय जुड़े रहे एक इंजीनियर बताते हैं कि कई ऐसे फार्म हाउस मौजूद हैं जिनके वास्तविक मालिक कोई और हैं और जमीन किसी और के नाम पर है. ऐसे लोगों में ज्यादातर राजनेताओं का नाम गिनाते हैं.

एक दशक से अधिक समय से यहां के आरडब्ल्यूए के साथ काम कर रहे फकरुद्दीन न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘सोहना प्रशासन ने यहां के लगभग हर फार्म हाउस को नोटिस दिया है. नोटिस में लिखा गया है कि यहां आपने जो निर्माण किया है वो अवैध है. आप खुद इसे हटा दें नहीं तो हम हटा देंगे.’’

यह नोटिस सोन्या घोष बनाम हरियाणा राज्य और हरियाणा वेलफेयर सोसाइटी बनाम भारत संघ के मामलों में एनजीटी के अक्टूबर 2018 के फैसले के बाद जारी किया गया था. तब ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा था, ‘‘वन क्षेत्र या अरावली अधिसूचना के तहत सुरक्षित क्षेत्र में कोई भी निर्माण, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना अवैध है. उसे वन भूमि के रूप में माना जाएगा.’’

एनजीटी या किसी भी कोर्ट का फैसला चाहे जितना कठोर लगे, अंसल रिट्रीट के निवासियों पर इसका बेहद कम प्रभाव पड़ा है. नोटिस में नाराजगी और तोड़ने की बात कहने के बाद यहां अब तक कोई तोड़फोड़ नहीं की गई है.

एक तरह एनजीटी के आदेश के बाद यहां नगर निगम तोड़ने का नोटिस दिया है. वहीं फकरुद्दीन बताते हैं, ‘‘अंसल रिट्रीट में अभी हर सप्ताह आधा दर्जन से ज्यादा लोग जमीन खरदीने के लिए पूछताछ करने आते हैं.’’ यहां अभी जमीन की कीमत क्या है, ‘‘यहां संपत्ति की कीमत 70 लाख रुपए प्रति एकड़ है. इसपर खरीदार पांच से सात फीसदी टैक्स देते हैं.’’

रायसीना जैसी पहाड़ियों से वन खत्म कर उसपर निर्माण करना हानिकारक साबित हो रहा है. खासकर हरियाणा में, इन क्षेत्रों में वनों की कटाई से मिट्टी का लगातार क्षरण हुआ है और राजस्थान के रेगिस्तान से रेत हरियाणा में पहुंचने लगा है.

अरावली को लेकर भारतीय वन्यजीव संस्थान ने 2017 में अध्ययन किया जिसमें इसकी गंभीरता की तरफ इशारा किया गया है. अध्ययन में कहा गया, ‘‘वनों की कटाई ने मिट्टी के कटाव की प्रक्रिया को तेज कर दिया है. जिससे नदी और जलाशयों में गाद जमा हो गई है.’’

दो साल बाद अक्टूबर 2019 में अंसल रिट्रीट की आरडब्ल्यूए ने दक्षिण हरियाणा बिजली बोर्ड के खिलाफ हरियाणा विद्युत नियामक आयोग से शिकायत की. आरडब्ल्यूए ने अपनी याचिका में कहा था, ‘‘साल 1992 से पहाड़ी में 300 बिजली कनेक्शन हैं. जो लगभग 1,200 बिजली के खंभों की सहायता से लोगों तक पहुंचते हैं. सरकारी बिजली बोर्ड इन कनेक्शनों से हर महीने 10 लाख रुपए कमाता है. वहीं हरेक पोल से तकरीबन 50 हजार रुपए का राजस्व प्राप्त होता है. ऐसे में हर साल बिजली बोर्ड यहां से 1.80 करोड़ रुपए कमाता है.’’

यह हैरान करने वाली बात है, जो सरकारी विभागों की लापरवाही की तरफ इशारा करता है. अरावली अधिसूचना के मुताबिक यहां ‘‘विद्युतीकरण (नई ट्रांसमिशन लाइन बिछाने), सड़क, घर, फार्म हाउस बनाने, शेड लगाने या किसी भी तरह के निर्माण की वन भूमि पर नहीं है.’’

2013 में लीना मिश्रा नाम की एक महिला, जिनके पास अंसल रिट्रीट में एक एकड़ का प्लॉट था, राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खिलाफ अदालत पहुंच गईं. मिश्रा ने दावा किया कि उन्हें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज एक शिकायत में ‘गलत’ फंसाया गया था.

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसकी संपत्ति पर बाड़ लगाने के लिए 82 खंभों, एक स्टील का गेट और कांटेदार तारों को छोड़ कोई अनधिकृत निर्माण नहीं हुआ था. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उच्च न्यायालय को बताया कि अंसल रिट्रीट के भूमालिकों ने अरावली अधिसूचना को अवैध रूप से दरकिनार कर राजस्व अधिकारियों से मिलीभगत कर यहां की भूमि का रूप बदलने का प्रयास किया था.

न्यायाधीश रितु बाहरी ने लीना मिश्रा की याचिका यह देखते हुए खारिज कर दी कि 82 खंभे या स्टील गेट लगाना अरावली अधिसूचना के तहत निर्माण से जुड़ी किसी भी अन्य गतिविधि के तहत आता है.

लंबे समय तक इस जगह की देखरेख अंसल ने खुद की, लेकिन अब इसकी जिम्मेदारी आरडब्ल्यूए की है. न्यूज़लॉन्ड्री ने रिट्रीट के आरडब्ल्यूए उपाध्यक्ष राजेश वत्स से पहाड़ पर निर्माण कार्य को लेकर बात की. उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस बारे में बात करने के लिए सही व्यक्ति नहीं हूं. आपको सोहना की नगर परिषद से पूछना चाहिए कि यहां निर्माण क्यों और किसकी मंजूरी से होता है.’’

फकरुद्दीन के मुताबिक अंसल अरावली रिट्रीट में अब 17 किलोमीटर सड़कें हैं. वहीं पानी के लिए 12 ट्यूबवेल लगे हैं.

तीन दशकों से अधिक समय तक रिट्रीट में काम करने वाले एक इंजीनियर आनंद का कुछ और ही कहना है. उनके मुताबिक रिट्रीट में फार्म हाउस मालिकों ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसकी रक्षा की है. वे बताते हैं, ‘‘जब 1988 के आसपास अंसल के लिए काम करने आया था तो यहां गिने चुने पेड़-पौधे थे. यहां हमने पेड़ पौधे लगाए और बाद में फार्म हाउस वालों ने भी लगाए. जिसके बाद यहां हरियाली दिख रही है. फार्म हाउस यहां नहीं होता तो अब तक यह भी अरावली के बाकी पहाड़ों की तरह हो गया होता. सिर्फ कीकर के ही पेड़ होते.’’

न्यूज़लॉन्ड्री के ‘अरावली की लूट’ सेना प्रोजेक्ट की तीन रिपोर्ट्स में आपने पढ़ा कि कैसे अवैध निर्माण कर जंगल को बर्बाद किया गया. ऐसा करने वाले जिम्मेदार व्यक्ति हैं और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से वे ऐसा करते हैं. कैसे खुद सरकार ने अरावली, वहां रहने वाले पशु-पक्षी और आसपास के लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी जो उनके अस्तित्व के खात्मे का कारण बन गया है. वहीं अब रायसीना हिल्स की कहानी बताती है कि कैसे कोर्ट के फैसले को लोग ठेंगा दिखाकर अरावली को बर्बाद कर रहे हैं. जिसमें हरियाणा प्रशासन उनका एक तरफ साथ दे रहा है तो दूसरी तरफ विरोध कर रहा है.

चार हिस्सों की सीरीज का यह चौथा पार्ट है, आप पहला, दूसरा और तीसरा पार्ट यहां पढ़ सकते हैं.

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