अरावली के बीच डंपिंग ग्राउंड: आसपास के गांवों में फैली बीमारियां, तो पशु-पक्षी हुए गायब

ग्रामीणों की माने तो पहले सुबह-शाम पक्षियों की चहचाहट से आसपास गुलजार रहता था. लेकिन डंपिंग ग्राउंड बनने के बाद से वे गायब होते गए.

अरावली के बीच डंपिंग ग्राउंड: आसपास के गांवों में फैली बीमारियां, तो पशु-पक्षी हुए गायब
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न्यूज़लॉन्ड्री के अरावली सीरीज के पहले और दूसरे पार्ट में आपने जाना की कैसे अवैध निर्माण कर जंगल को बर्बाद किया गया. ऐसा करने वाले जिम्मेदार व्यक्ति हैं और सरकारी एजेंसियों के सहयोग से वे ऐसा करते हैं. इस पार्ट में जानिए कि कैसे खुद सरकार ने अरावली, वहां रहने वाले पशु-पक्षी और आसपास के लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी जो उनके अस्तित्व के खात्मे का कारण बन गया है.

गुरुग्राम-सूरजकुंड रोड पर बांधवाड़ी गांव पड़ता है. चमचमाती सड़क से उतरकर इस गांव में जाने का रास्ता है. गांव में प्रवेश करते ही खूबसूरत क्रिकेट स्टेडियम है. आगे बढ़ने पर घरों की दीवारें पर अलग-अलग देवी देवताओं और स्वाधीनता आंदोलन के नेताओं की पेंटिंग बनी है. यहां आलिशान घर हैं. पहली नजर में किसी को यह आम गांवों की तुलना में समृद्ध गांव लगेगा. गुरुग्राम से महज 14 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव आर्थिक रूप से तो समृद्ध है ही लेकिन हरियाणा सरकार के एक निर्णय ने यहां के लोगों की जिंदगी को दूभर कर दिया है.

हरीश रावत

हरीश रावत

यहां के रहने वाले 44 वर्षीय हरीश रावत कहते हैं, ‘‘हमें घमंड था कि हम प्रकृति की गोद में बैठे हैं. सुबह-शाम पक्षियों की आवाज सुनाई देती थी. मोर दिखते थे, लेकिन अब यह सब गायब हैं. आप समझिए कि कई पक्षी तो अब दिखते तक नहीं हैं. आप गर्मी के मौसम में यहां आइए. बैठना तक दूभर हो जाएगा और गलती से हवा इधर की तरफ हुई तो सांस तक ठीक से नहीं लिया जाता है. यहां कूड़ा घर बनवाकर सरकार ने हमें बीमारियां दीं और प्रकृति से दूर कर दिया. अब तो कई पक्षी दिखने बंद हो गए जिन्हें हम बचपन से ही देखते आए थे. गुरशाम, घोड़ाकोको और एक लाल रंग की छोटी सी चिड़िया पहले खूब दिखती थी. अब दिखती भी नहीं है.’’

ऐसी कहानी सिर्फ रावत ही नहीं सुनाते बल्कि गांव का हर दूसरा शख्स सुनाता है. दरअसल 2013 में बांधवारी गांव से महज दो किलोमीटर दूर भंडारी गांव में सरकार ने कूड़ा डालने का फैसला किया. अब यह पहाड़ का रूप ले चुका है. रावत पेशे से ट्रक ड्राइवर रहे हैं. शुरूआती दिनों में वे भी इस डंपिंग ग्राउंड में अपने ट्रक से कूड़ा डालने का काम करते थे लेकिन बाद में छोड़ दिया.

गुरुग्राम में बांधवारी लैंडफिल

गुरुग्राम में बांधवारी लैंडफिल

वे बताते हैं, ‘‘यह डंपिंग ग्राउंड कब बना इसका साल तो ठीक से याद नहीं लेकिन करीब 10 साल हो गए. आपको यह जितना ऊपर दिख रहा उससे ज्यादा नीचे दबा हुआ है. जहां डंपिंग ग्राउंड बना है वहां पहले बदरपुर का खनन होता था. खनन के कारण एक हजार फूट से ज्यादा का गड्डा बन गया था तो सरकार ने इसमें कूड़ा डालने का फैसला किया. शुरुआत में इसका विरोध हुआ, लेकिन कुछ असर नहीं हुआ और कूड़ा डालने का सिलसिला जारी रहा. मैं भी कुछेक महीनों तक अपने ट्रक से गुड़गांव का कूड़ा यहां लाकर डालता रहा. जब खनन के कारण बना गढ्ढा भर गया तो मैं छोड़ दिया.’’

डंपिंग ग्राउंड के रूप में इस्तेमाल की जा रही 30 एकड़ में से 14.86 एकड़ भूमि वन संरक्षण अधिनियम के तहत थी.

दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों को मरुस्थल बनने से बचाने के अलावा अरावली की एक और महत्वपूर्ण भूमिका यहां के ग्राउंड वाटर को रीचार्ज करना है. जानकार बताते हैं कि अरावली में बने बड़े गढ्ढों में बारिश का पानी जमा होता है जिससे ग्राउंड वाटर का स्तर बेहतर रहता है. हालांकि जिस क्षेत्र पर आसपास के इलाकों के लिए पानी उपलब्ध कराने की बात की जाती है वहां के लोगों को ही पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है.

बांधवाड़ी गांव में हरियाणा आयुष विभाग ने एक छोटा अस्पताल खोला है. यहां हमारी मुलाकात गांव के रहने वाले 28 वर्षीय मंजीत से हुई. मंजीत अपनी पत्नी और नवजात बच्चे को लेकर अस्पताल आए हुए थे. डंपनिंग ग्राउंड से होने वाली परेशानी को लेकर हम जैसे ही मंजीत से सवाल करते हैं वे बिफर पड़ते हैं. वे कहते हैं, ‘‘जब मेरी पत्नी गर्भवती हुई तब से हम उसके लिए फिल्टर वाटर खरीद कर लाते हैं. यह सिलसिला बच्चे के जन्म के बाद भी जारी है. जिसके लिए हर रोज 10 रुपए खर्च होते हैं. ऐसे में महीने भर के 300 रुपए इसी के लिए चाहिए.’’

मंजीत आगे कहते हैं, ‘‘मैं अपनी पत्नी और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए फिल्टर वाटर का इंतजाम करता हूं, बाकी गांव में कई लोग तो ऐसे हैं जिनके घर चार से पांच बोतल हर रोज आता है. जबकि एक समय था जब हमारे यहां का पानी एकदम साफ और स्वादिष्ट आता था. अब इस डंपिंग ग्राउंड के कारण पानी से बदबू आती है.’’

इस डंपिंग ग्राउंड को गुरुग्राम नगर निगम (एमसीजी) द्वारा एक निजी कंपनी इको ग्रीन के साथ मिलकर चलाया जा रहा है जहां पिछले आठ वर्षों में 27 लाख टन से अधिक कचरा जमा किया है. जैसे-जैसे यहां की हवा, पानी खराब हुआ स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन कर अधिकारियों से अपनी चिंताएं जाहिर की. तत्काल कार्रवाई हुई लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

2018 में, बांधवाड़ी और आसपास के गांवों के रहने वालों ने डंपिंग ग्राउंड के असर को लेकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात की. जननायक जनता पार्टी के एक स्थानीय राजनेता मनोज बंधवाड़ी उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे. मनोज ने न्यूज़लांड्री को बताया, ‘‘मुख्यमंत्री खट्टर डंपिंग ग्राउंड को यहां से हटाने के लिए सहमत हो गए थे, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच राजनीति ने इसे मुश्किल बना दिया.’’

मनोज बांधवाड़ी ने दावा किया, ‘‘डंपिंग ग्राउंड से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए मुख्यमंत्री ने गांव में सड़क बनाने और बिजली बिल माफ करने की पेशकश की. जिसपर कुछ स्थानीय नेता तुरंत तैयार हो गए. इससे उन्हें भरोसा हो गया कि गांव के लोग डंपिंग ग्राउंड हटाने के लिए गंभीर नहीं हैं. अब हमारे गांव में सड़क है, बिजली का बिल भी नहीं लग रहा,

लेकिन डंपिंग ग्राउंड को हटाने का फैसला ठंडे बस्ते में चला गया है.’’

हालांकि, बांधवाड़ी के निवासियों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि मुख्यमंत्री ने बिजली को लेकर बात की थी लेकिन उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ. मनोज बांधवाड़ी इसके लिए बिजली विभाग में एक ‘सॉफ्टवेयर त्रुटि’ को जिम्मेदार बताते हैं. हालांकि अब उसे ठीक कर लिया गया है.

हरीश रावत के लिए बिजली बिल प्राथमिकता नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘सरकार ने न हमें प्रकृति से दूर कर दिया है बल्कि आज हम कई बीमारियों की चपेट में हैं.’’

हरीश रावत का घर बांधवाड़ी गांव से उस तरफ है जहां से डंपिंग ग्राउंड 500 से 700 मीटर की दूरी पर है. जब हम उनके यहां पहुंचे तो उन्होंने पीने के लिए पानी देते हुए कहा, ‘‘यहां का पानी नहीं है. हम पीने के लिए पानी खरीदते हैं. सामने देखिए प्लास्टिक की बोतलों में 20-20 लीटर का पानी रखा हुआ है. हर रोज ऐसे ही चार-चार बोतल हम पीने के लिए मंगाते हैं. एक बोतल का 20 रुपए देना पड़ता है. पहले हमारे यहां मीठा पानी आता था, लेकिन अब सरकारी बोरवेल से जो पानी निकलता है उसमें से बदबू आती है. जिसे मजबूरी में हम नहाने और बर्तन आदि साफ करने में इस्तेमाल करते हैं. खराब पानी की वजह से यहां लोगों में बीमारियां बढ़ रही हैं.’’

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने यहां के पानी का परीक्षण किया था. तब सामने आया कि पानी में जहरीले यौगिक मौजूद हैं जो आगे चलकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. सीपीसीबी के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान ने अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि अपनी स्थापना से लेकर अब तक डंपिंग ग्राउंड की वजह से लगभग 148 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय नुकसान हुआ है.

2020 के अध्ययन के बाद सीपीसीबी ने एक तीन-चरणीय प्रक्रिया तैयार की जिसके द्वारा निगम पुराने और ताजे कचरे को अलग कर सकता है. इसमें यह था कि कूड़े को देखकर अलग-अलग रखना था. 2020 के मार्च में नगर निगम ने एनजीटी से कहा कि अब बांधवाड़ी में ताजा कचरा डंप करना बंद कर दिया जाएगा. इसके साथ 18 टन पुराने कचरे के उपचार के लिए 18 ट्रोमेल्स (एक स्क्रीनिंग मशीन जो कचरे को अलग करने में मदद करती है) लगाई जाएगी.

हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. करीब छह महीने बाद सितंबर 2020 में सीपीसीबी ने एनजीटी को बताया कि यहां ताजा कचरा आना बंद नहीं हुआ. यहां हर रोज 2,000 टन कचरा रोज आ रहा है. एक तरफ जहां 18 ट्रोमेल से पुराने कचरे के निस्तारण की बात की गई थी वहीं सिर्फ आठ ट्रोमेल बेतरतीब ढंग से काम कर रहे थे और केवल 0.85 लाख टन पुराने कचरे का उपचार किया गया था. जो निर्धारित लक्ष्य के एक प्रतिशत से भी कम था.

बंधवारी में अपने घर के बाहर हरपाल हरसाणा

बंधवारी में अपने घर के बाहर हरपाल हरसाणा

बांधवाड़ी गांव नगर निगम का हिस्सा बन गया है. पहले यहां के सरपंच रहे राजाराम हरसाणा के भाई हरपाल हरसाणा गांव में पानी फिल्टर करने की मशीन लगाए हैं. सेना से रिटायर हरसाणा बताते हैं, ‘‘गांव में खराब पानी की स्थिति देखकर हमने साफ पानी के लिए फिल्टर लगाने का फैसला किया. हम दो जगह पर लगाए थे लेकिन एक जगह पानी खराब आता था तो वो बंद कर दिया गया. हमारे यहां से जो लोग एक दो बोतल पानी लेते हैं उन्हें हम 10 रुपए में देते हैं. वहीं जो लोग 10-20 बोतल बेचने के लिए ले जाते हैं उन्हें पांच रुपए में देते हैं. हर रोज 60 से 70 बोतल पानी लोग खरदीते हैं.’’

हरीश रावत, हरपाल हरसाणा और मंजीत तीनों गांव में बढ़ती बीमारियों का जिक्र करते हैं. यहां बने आयुष सेंटर में काम करने वाली गांव की एक महिला नाराज होकर बताती हैं, ‘‘खत्ता (डंपिंग ग्राउंड) बनने से यहां कैंसर से लोग मर रहे हैं. अभी दो लोगों को कैंसर हैं. एक की छाती में और एक के मुंह में. कैंसर के अलावा चर्म रोज तो आम बात हो गई है.’’

आयुष सेंटर की डॉक्टर की माने तो एक ओपीडी में औसतन 40 से 45 प्रतिशत स्किन डिजीज (चर्म रोग) के मामले आते हैं. हालांकि डॉक्टर बढ़ते चर्म रोग और डंपिंग ग्राउंड के बीच के संबंध जानने के लिए रिसर्च होने की बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘जब तक रिसर्च नहीं होगा तब तक यह कहना कि डंपिंग ग्राउंड की वजह से चर्म रोग बढ़ रहा गलत होगा.’’

कैंसर से मौत लेकिन लोकलाज के कारण लोग बोल नहीं रहे

बांधवाड़ी गांव में कैंसर एक बड़ी समस्या बन चुका है. 2018 में हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि अक्टूबर 2017 और जून 2018 के बीच बांधवाड़ी में कैंसर के कारण कम से कम 13 लोगों की मौत हुई. अगर डंपिंग ग्राउंड के आसपास के तीन गांव मंगर, डेरा और ग्वाल में हुई मौतों की बात करें तो यह संख्या 21 पहुंच जाती है. वहीं स्थानीय लोगों का अनुमान है कि 2013 के बाद से इस क्षेत्र में कम से कम 100 कैंसर से संबंधित मौतें हुई हैं.

यहां पर कैंसर से मौत को लेकर अलग-अलग आंकड़ें हैं. ‘अरावली बचाव सिटीजन ग्रुप’ ने इसे हटाने को लेकर ‘चेंज ओआरजी’ पर हस्ताक्षर अभियान चलाया. इस अभियान के पक्ष में करीब 34 हजार लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं. जिसमें बांधवाड़ी गांव के रहने वाले तेजपाल हरसाना ने बताया कि डंपिंग ग्राउंड आने के बाद यहां 60 लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी है. हरसना के मुताबिक, ‘‘जब से यहां डंपिंग ग्राउंड आया है तब से स्थानीय लोगों में कैंसर, हृदय की समस्याएं और सांस लेने की बीमारियां हो रही हैं.’’

बांधवारी में वाटर फिल्टरेशन प्लांट

बांधवारी में वाटर फिल्टरेशन प्लांट

इस अभियान को लेकर लिखे लेख में आम लोगों पर होने वाले असर के साथ-साथ पर्यावरण के नुकसान का जिक्र किया गया है. अभियान के मुताबिक, ‘‘यहां का भूजल जहरीले रसायनों से दूषित है. जिसकी पुष्टि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान जैसी प्रतिष्ठित सरकारी एजेंसियों ने परीक्षण के बाद किया है. इस जहरीले पानी को पीने से इस क्षेत्र में सियार, मोर और अन्य जानवरों के साथ-साथ आसपास के गांवों के मवेशी भी मर रहे हैं.’’

इसका पशुओं पर होने वाले असर को लेकर हरीश न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘गांव के लोग जंगल में अपनी गायों को चरने के लिए छोड़ देते थे जिसमें कम से कम एक हजार गायें इस डंपिंग ग्राउंड साइट से निकलने वाले पानी को पीकर और वहां अपशिष्ट खाकर मर चुकी हैं. अब लोगों ने अपने पशुओं को जंगल में चरने के लिए छोड़ना बंद कर दिया है.’’

ज्यादातर रिपोर्ट और जमीनी हकीकत यह है कि गांव में लोग कैंसर से मर रहे हैं. हालांकि मृतकों के आंकड़ें कितने है इसको लेकर सबके अलग-अलग नंबर है. गांव के कई लोग कैंसर से हो रही मौत को गलत बताते हैं. हालांकि इसके पीछे का कारण है गांव की छवि खराब होने का डर. यहां के एक बुजुर्ग नागरिक न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं, ‘‘बीते दो साल में बांधवाड़ी गांव में करीब 35 लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी है. जबकि कई लोग अभी भी जूझ रहे हैं, लेकिन यह बात खुलकर लोग इसीलिए कहने से बच रहे हैं क्योंकि अगर बात जगह-जगह फैल गई तो यहां कोई शादी नहीं करेगा. इसके अलावा भी कई समस्याएं आएंगी.’’

मांगर गांव, बांधवाड़ी के पास में ही है. यहां के रहने वाले सुनील हरसाणा, पर्यावरण को लेकर लंबे समय से काम कर रहे हैं. कैंसर से मृतकों के अलग-अलग आंकड़ों को लेकर न्यूज़लॉन्ड्री को वो बताते हैं, ‘‘कैंसर से हुई मौत के आंकड़ें अलग-अलग होने की वजह यह है कि जिन गांवों में इसका असर है उसमें से कुछ दिल्ली में, कुछ गुरुग्राम में तो कुछ फरीदाबाद में हैं. जैसे मेरा गांव मांगर फरीदाबाद में है. वहीं बांधवाड़ी गुरुग्राम में. भाटी दिल्ली में है. मेरे गांव की बात करे तो यहां बीते 10 सालों में करीब 15 लोगों की मौत कैंसर से हुई है. इससे पहले यहां कैंसर से किसी की मौत नहीं होती थी. अब सही आंकड़ा तो स्वास्थ्य विभाग देगा. तीनों जगह का स्वास्थ्य विभाग अगर जांच करे तभी सही आंकड़ें आ पाएंगे.’’

जहरीला पानी और उसकी दमघोटू बदबू

डंपिंग ग्राउंड की देखभाल नगर निगम के साथ मिलकर इको ग्रीन नाम की एक कंपनी करती है. यहां मौजूद नगर निगम के एक कर्मचारी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘‘लैंडफिल की वजह से आसपास के गांवों का पानी खराब हुआ है. हालांकि अब तक इसका कोई प्रमाण सामने नहीं आया है. तो इस कारण लोगों को बीमारी या मौत हो रही ऐसा नहीं कहा जा सकता है. यहां हम काफी एहतियात से काम करते हैं. यहां से निकलने वाले लीचेट (गंदा पानी) को रिसाइकल कर बाहर सड़क किनारे लगे पेड़ पौधों में डालते है. तो यह कहना कि यहां से निकले हुए पानी को पीकर जानवरों की मौत हो रही यह भी सही नहीं है.’’

हालांकि एनजीटी ने बांधवाड़ी लैंडफिल को लेकर एक मामले की सुनवाई के दौरान नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था, ‘‘यह रिकॉर्ड में है कि आम नागरिकों के स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को सुरक्षित रखने में अब तक गुरुग्राम और फरीदाबाद के निकाय अधिकारियों की गंभीर विफलता रही है.’’

हालांकि न्यूज़लॉन्ड्री के रिपोर्टर ने एनजीटी के इस कथन को नगर निगम के अधिकारी को पढ़कर सुनाया तो वे इधर उधर देखने लगे और कहा ‘‘यहां कूड़ा जमा होता है तो बदबू आएगी. इससे इंकार तो नहीं किया जा सकता है. लोग बाहर रहकर कई बातें करते हैं, लेकिन एकबार साइट पर आकर हमारा काम देखिए फिर आपको पता चल जाएगा कि किस तरह से हम मेहनत कर रहे हैं.’’

गुरुग्राम नगर निगम द्वारा संचालित बांधवाड़ी डंपिंग ग्राउंड में प्रतिदिन 2,000 मीट्रिक टन ताजा कचरा गुरुग्राम और फरीदाबाद से आता है. पिछले आठ वर्षों में इसमें 27 लाख टन से अधिक कचरा एकत्र हुआ जिस कारण इसकी ऊंचाई जमीन से 40 मीटर हो गई है.

मीडिया रिपोर्टस की मानें तो साल 2019 में नाराज एनजीटी ने गुरुग्राम नगर निगम को बांधवाड़ी लैंडफिल से अगले छह महीने में 25 लाख टन कचरा हटाने का आदेश दिया था. तब एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली बेंच ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था, ‘‘अगर आदेश का पालन नहीं किया गया तो कड़े कदम उठाए जाएंगे यहां तक कि निगम अधिकारियों की सैलरी भी रोकी जा सकती है.’’

शायद सैलरी कटने के डर से निगम अधिकारियों की आंखें दूषित हवा में सांस लेने, गंदे पानी के लिए खर्च करने और बीमारियों के डर के साए में जीने वालों को लेकर खुल जाएंगी.

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