हिमाचल प्रदेश: जलवायु परिवर्तन के असर को कम नहीं किया तो और बढ़ेंगी प्राकृतिक आपदाएं

चालू मानसून सीजन में चंबा, कांगड़ा, किन्नौर और लाहौल स्पीति में बादल फटने, भूस्खलन, चट्टानों के टूटने और बाढ़ की घटनाएं हुई हैं.

WrittenBy:रोहित पराशर
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इसके अलावा एशियन डेवल्पमेंट बैंक की ओर से क्लाइमेट चेंज अडोप्सन इन हिमाचल प्रदेश को लेकर तैयार की गई रिपोर्ट में भी हिमाचल प्रदेश को प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशिल बताया गया है. इस रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश में एक्स्ट्रीम इवेंट्स में वृद्धि की बात कही गई है. इसमें बताया गया है कि हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियां यहां प्राकृतिक आपदाओं में ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं. इसलिए हिमाचल प्रदेश में इन्फ्रास्ट्रचर में इन्नोवेटिव इंजीनियरिंग का प्रयोग करना चाहिए. इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि हिमाचल मे 2,30,00 हैक्टेयर भूमि बाढ़ संभावित क्षेत्र के तहत आती है. इसलिए इससे निपटने के लिए भी पहले से ही तैयारियां की जानी चाहिए ताकि नुकसान को कम किया जा सके.

बिल्डिंग मेटेरियल एडं टेक्नोलॉजी प्रमोशन कांउसिल की एक रिपोर्ट बताती है कि हिमाचल में 40 फीसदी क्षेत्र उच्च संवेदनशील और 32 फीसदी क्षेत्र अति संवेदनशील केटेगरी में आता है. इसलिए हमें भवन निर्माण के दौरान ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है.

इंपैक्ट एडं पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिसर्च फैलो व शिमला नगर निगम शिमला के पूर्व डिप्टी मेयर टिकेंद्र पंवर ने बताया, "हिमाचल प्रदेश में बहुत ज्यादा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और नेशनल हाइवे प्रोजेक्ट का काम चल रहा है. इनके निर्माण के समय नियमों को ताक में रखा जा रहा है. पहाड़ियों में खुदाई के दौरान न ही तो हाइड्रोलॉजिस्ट और न ही जियोलॉजिस्ट की राय का ध्यान रखा जाता है. जिससे भूस्खलन की घटनाओं में बेतहाशा बढोतरी हो रही है." इसके अलावा उनका कहना है कि हिमाचल में पॉलिसी इंम्पलीमेंटेशन को लेकर बहुत सारी खामियां हैं।

स्टेट स्ट्रैटेजी एडं एक्शन प्लान फार क्लाइमेट चेंज में सतत कृषि, जल संसाधन, वन और जैव विविधता, स्वास्थ्य और पर्यटन, शहरी विकास और उर्जा क्षेत्र में सुधार लाने को लेकर सुझाव दिए गए हैं. इस एक्शन प्लान के लिए 1560 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया था, लेकिन अभी ज्यादातर क्षेत्रों में बहुत काम करने की जरूरत है. ताकि भविष्य में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली प्राकृतिक आपदाओं और आने वाले बड़ी चुनौतियों के लिए समय रहते तैयारी की जा सके और नुकसान को कम किया जा सके.

(साभार डाउन टू अर्थ)

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