इरादों का पक्का रहा है इज़रायल, समय आने पर साबित भी किया!

मज़बूत इरादों वाले इज़रायल के लिए दुश्मन कितना भी बड़ा क्यों न हो वो लड़ता अपनी पूरी ऊर्जा के साथ है ऐसा इतिहास में दर्ज घटनाओं से मालूम पड़ता है.

इरादों का पक्का रहा है इज़रायल, समय आने पर साबित भी किया!
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अब समझिए दुनिया के कौन देश किसके साथ खड़े हैं. हमास को चीन और पाकिस्तान आतंकी संगठन नहीं मानता है. तो रूस इज़रायल और फ़िलिस्तीन दोनों को आत्मरक्षा के अधिकार की वकालत करता है. अमेरिका और 25 अन्य देश इज़रायल के साथ खुल कर खड़े हुए हैं. वहीं तुर्की के साथ अन्य अरब देश फ़िलिस्तीन में ख़ुद की सेना के निर्माण में सहायता करने का प्रस्ताव पूर्व में दे चुके हैं. 57 देशों का इस्लामिक कॉरपोरेशन चाहता तो है फ़िलिस्तीन की मदद करना, लेकिन अमेरिका और अन्य देशों के कारण कभी खुल कर सामने आ पाने की स्थिति में वो नहीं करता. हालांकि अगर ये हुआ तो इज़रायल पर तुर्की के एस 400 जैसे रॉकेट भारी पड़ सकते हैं.

लेकिन इन मिडिल ईस्ट के देशों को अमेरिका ग्रेटर इज़रायल के प्लान से अवगत कराता रहता है. वहीं प्लान जिसमें इज़रायल का इरादा इजिप्ट, सऊदी अरब, क़तर, इराक़, सीरिया जैसे देशों को इज़रायल में शामिल कर ग्रेटर इज़रायल बनाना है. इसकी कोशिशें भी इज़रायल करता रहता है.

सीधे तौर पर देखा जाए तो इज़रायल अपनी चाह है तो राह है की नीति पर चला है, भले ही रास्ते ग़लत हों. लेकिन दुनिया के अन्य देशों ने भी वहीं रास्ते अपनाए हैं चाहे चीन ने अक्साई चीन को क़ब्ज़ा कर या फिर पाकिस्तान ने पीओके पर क़ब्ज़ा करके. चीन का तिब्बत को हड़पना और नेपाल, भूटान, लद्दाक और अब अरुणांचल को लेकर कही जाने वाली बातें ऐसी ही श्रेणी में रखी जा सकती हैं.

अब भारत को चाह कर भी इज़रायल पर खुल के समर्थन करने का समय नहीं हैं क्योंकि 18 फ़ीसदी से ज़्यादा व्यवसाय हम मिडिल ईस्ट से कर रहे हैं. वहीं इज़रायल से मात्र एक फ़ीसदी के क़रीब. ऐसे में ज़मीनी विवाद पर भारत का सीधा बोलना ख़ुद के ज़मीनी विवाद पर उल्टा पड़ सकता है. हमें संयम से काम लेना चाहिए जो हमने अब तक लिया भी है. हर देश शांति और अमन चैन चाहता है इजिप्ट के प्रधानमंत्री अनवर सादत ने इज़रायल और इजिप्ट के रिश्ते में शांति लाने का प्रयास किया, वहीं फ़िलिस्तीन के यासीर अराफ़ात को दुनिया में शांति के एक प्रारूप की तरह पेश किया गया. ख़ुद इज़रायल के पूर्व प्रधानमंत्री जितिज रोबिन इज़रायल की तत्कालीन स्थिति को लेकर ख़ुश थे. आपको आश्चर्य होगा तीनों को शांति का नोबल पुरस्कार मिला लेकिन बाद में तीनों की मौतें एक हादसे की तरह हुईं. हालांकि इस पर भी संशय रहता है. इज़रायल और फ़िलिस्तीन का विवाद भविष्य में शायद ही समाप्त हो.

भारत मौजूदा इज़रायली और फ़िलिस्तीन विवाद पर ख़ुद को किसी भी तरह फंसाने की स्थिति में नहीं है. यही होना भी चाहिए. नहीं चीन का नाइन डैश लाइन का सपना साकार होगा. लाल सागर मेन खुलकर क़ब्ज़ा करके पेट्रोल का दोहन करने लगेगा. वह खुले तौर पर इज़रायल के पद चिन्हों पर चलेगा और भारत पर दबाव बनाता रहेगा. जिसके चलते भारत और जापान के रिश्ते भी खराब हो सकते हैं.

11 दिनों तक चले इज़रायल और फ़िलिस्तीन के बीच संघर्ष अब थम चुका है लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय घटना के मायने दूरगामी हैं. इज़रायल ने ट्वीट करके जिन 25 देशों का धन्यवाद दिया है उसमें भारत नहीं है. और अगर भारत भविष्य में इस्लामिक कॉरपोरेशन के 57 देशों के सदस्यों को नाराज़ करके इज़रायल के साथ खुला समर्थन भी करता है तो 18 फ़ीसदी व्यवसाय के साथ उसे यूएन में 136 सदस्यों के बहुमत के बिना वीटो पावर कैसे मिल पाएगा?

हालांकि भारत के राजदूत टीएस त्रिमूर्ति का एक बयान इंडिया स्ट्रांगली सपोर्ट फ़िलिस्तीन एंड टू स्टेट साल्यूशन ग़ौरतलब है. ऐसा ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी भी कहा करते थे ‘इज़रायल को फ़िलिस्तीन की ज़मीन वापिस करनी होगी’. चूंकि ट्विटर और फ़ेसबुक उन दिनों नहीं था वरना अटल जी भी घेरे गए होते.

हमें इज़रायल और फ़िलिस्तीन को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि इज़रायल में नई सरकार का गठन होना हैं और इस आतंकी घटना का असर चुनाव पर ज़रूर पड़ेगा जैसे बालाकोट और उरी का भारत में पड़ा था.

भारत के नागरिक पत्रकार और नेता ‘सिंगापुर वेरिएंट’ वायरस पर विदेश नीति और प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाने लगते हैं लेकिन वहीं फ़िलिस्तीनी के साथ खड़े होने में गर्व का अनुभव होता है. यहूदियों पर ज़ुल्म हुए हैं तो मुस्लिमों पर भी हो रहे हैं. अब तो हिंदुओ पर भी लगातार अत्याचार की ख़बरें दुनिया भर के देशों के साथ भारत में भी आने लगी हैं.

इंसानियत को एक ही चश्में से देखने का हुनर जिस दिन दुनिया को आ जाएगा उस दिन ये सारी दुनिया ख़ूबसूरत लगने लगेगी. नहीं तो तालिबानियों द्वारा बुद्ध की प्रतिमा के तोड़फोड़ को भी हम इज़रायली फ़िलिस्तीनी संघर्ष वाले चश्मे के नम्बर से देखने पर सही ठहरा देंगें. अजरबेजान और अरमेनिया के बीच के संघर्ष को आप सही मानने लगेंगे.

फ़िलहाल अगर दुनिया की बेहतरीन सर्जिकल स्ट्राइक वाली फ़िल्में देखने का शौक़ है तो आप इज़राइल की ऑपरेशन थंडरबोल्ट को देख लें वहां फ़िल्म की स्टोरी में तनाव है लेकिन देखने के बाद मन में नहीं होगा. इज़रायल के इरादों को सबूतों के साथ पेश करती है यह फ़िल्म.

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