कागज़ों पर मई का एक्यूआई भले ही राहत की तस्वीर पेश करता हो, लेकिन हकीकत कहीं अधिक चिंताजनक है. राजधानी की ‘साफ हवा’ की कहानी काफी हद तक आंकड़ों और मौसम की मेहरबानी पर टिकी एक भ्रामक तस्वीर प्रतीत होती है.
इस साल मई महीने में दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 156 दर्ज किया गया, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे बेहतर स्तर है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार यह श्रेणी ‘मध्यम’ (मॉडरेट) वायु गुणवत्ता की है. हालांकि, यूरोपीय मानकों के हिसाब से इसे अब भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाएगा.
लेकिन यह सुधार एक जटिल सच्चाई को छिपाता है. दिल्ली में प्रदूषण पर चर्चा आमतौर पर सर्दियों के दौरान तेज हो जाती है, लेकिन गर्मियों में भी हवा में ऐसे प्रदूषक मौजूद रहते हैं, जो दिखाई नहीं देते, मगर स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालते हैं.
पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मई महीने में पीएम10 का स्तर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) की सीमा से केवल 13 दिनों को छोड़कर हर दिन ज्यादा ही रहा है. वहीं दिल्ली के लगभग आधे वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों पर ओजोन (ओजोन) का स्तर भी सुरक्षित सीमा से ऊपर दर्ज किया गया. सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) का स्तर निर्धारित सीमा के भीतर तो है, लेकिन उसमें लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है.
मई में हवा आखिर प्रदूषित कैसे होती है?
इस साल मई में 27 दिन ऐसे रहे जब एक्यूआई ‘मध्यम’ या ‘संतोषजनक’ श्रेणी में रहा, जबकि बाकी दिनों में इसे ‘अच्छा’ दर्ज किया गया. इसके बावजूद हर गर्मी में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एक अदृश्य प्रदूषण की परत से ढका रहता है, जिसमें पीएम10 और ओजोन प्रमुख भूमिका निभाते हैं.
क्या इसके लिए पराली जलाना, पटाखे या बायोमास जलाना जिम्मेदार हैं?
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के विश्लेषक मनोज कुमार इसके लिए “वाहनों और उद्योगों से होने वाला उत्सर्जन.” को जिम्मेदार मानते हैं. उन्होंने न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में कहा, “आज आपको आसमान साफ और नीला दिखाई दे सकता है, लेकिन हवा अब भी बेहद प्रदूषित है.”
जनवरी, 2016 में आईआईटी कानपुर द्वारा दिल्ली सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, पीएम10 उत्सर्जन में अकेले सड़क की धूल (रोड डस्ट) की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत थी. इसके बाद कंक्रीट बैचिंग प्लांट, औद्योगिक स्रोत (जैसे ताप विद्युत संयंत्र) और वाहनों से होने वाला उत्सर्जन प्रमुख कारण थे. यही औद्योगिक स्रोत कुल एसओ2 उत्सर्जन के 90 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार पाए गए.
गर्मियों में पीएम10, सर्दियों में PM2.5
गर्मियों के दौरान ऊंचा तापमान मिट्टी को सूखा देता है, जिससे बड़ी मात्रा में धूल उड़ती है और पीएम10 का स्तर बढ़ जाता है. पिछले एक दशक से दिल्ली की गर्मियों में इस प्रदूषक का स्तर लगातार ऊंचा बना हुआ है.
मई, 2026 में पीएम10 का सबसे अधिक स्तर महीने के आखिरी दिन 331 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (μg/m³) दर्ज किया गया, जो 24 घंटे की सुरक्षित सीमा 100 μg/m³ से तीन गुना से भी अधिक था.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) पीएम10 के लिए 24 घंटे की सुरक्षित सीमा 45 μg/m³ निर्धारित करता है. इसके मुकाबले दिल्ली में मई, 2026 के दौरान पीएम10 का औसत दैनिक स्तर 172 μg/m³ रहा. यह आंकड़ा सीपीसीबी के डाटा पर आधारित है, जिसे दिल्ली स्थित शोध संस्था एनवायरोकैटलिस्ट ने संकलित किया है.
यानी सर्दियों में भले PM2.5 और धुंध दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता बन जाते हों, लेकिन गर्मियों में धूल, ओजोन और औद्योगिक उत्सर्जन मिलकर ऐसी हवा तैयार करते हैं जो दिखने में साफ होने के बावजूद स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनी रहती है.
धूल ही नहीं, ओजोन भी है गर्मियों का बड़ा खतरा
दिल्ली की गर्मियों में प्रदूषण की कहानी केवल धूल तक सीमित नहीं है. इसका दूसरा बड़ा कारण ऐसा प्रदूषक वो है जो न दिखाई देता है, न जिसकी कोई गंध होती है, लेकिन जो हमारे सिर के ऊपर हवा में बनता रहता है.
ओजोन: अदृश्य हत्यारा
ओजोन एक द्वितीयक (सेकेंडरी) प्रदूषक है. इसका मतलब है कि यह सीधे किसी स्रोत से उत्सर्जित नहीं होता, बल्कि वातावरण में रासायनिक प्रतिक्रियाओं के जरिए बनता है.
वाहनों के धुएं और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स) जब तेज गर्मी और सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आते हैं, तो उनके बीच रासायनिक प्रतिक्रिया होती है और ओजोन का निर्माण होता है.
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के 45 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से लगभग आधे केंद्रों पर ओजोन के स्तर ने कम से कम एक बार निर्धारित मानकों का उल्लंघन किया.
रिपोर्ट में दिल्ली के पांच प्रमुख ओजोन हॉटस्पॉट की पहचान की गई है. इनमें सबसे अधिक ओजोन स्तर पूसा क्षेत्र में दर्ज किया गया. यहां आठ घंटे की औसत ओजोन सांद्रता 292 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (μg/m³) रही, जो राष्ट्रीय मानक 100 μg/m³ से लगभग तीन गुना अधिक है.
इसके अलावा अन्य प्रमुख हॉटस्पॉट इस प्रकार हैं:
एनएसयूटी जाफरपुर – 229 μg/m³
कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स – 208 μg/m³
दिल्ली विश्वविद्यालय उत्तर परिसर – 207 μg/m³
चांदनी चौक – 178 μg/m³
इन आंकड़ों को और चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि ये निगरानी केंद्र केवल भारी यातायात या औद्योगिक इलाकों तक सीमित नहीं हैं. इनमें कई आवासीय और शैक्षणिक क्षेत्र भी शामिल हैं. यानी ओजोन प्रदूषण केवल फैक्ट्रियों और व्यस्त सड़कों की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह उन इलाकों तक भी पहुंच चुका है, जहां लोग रहते हैं, पढ़ते हैं और रोजमर्रा का जीवन बिताते हैं.
पिछले तीन महीनों के ओजोन स्तर और एक्यूआई के आंकड़ों की तुलना करने पर एक और महत्वपूर्ण संबंध सामने आता है. जिन दिनों एक्यूआई में उछाल आता है, उन दिनों ओजोन का स्तर भी बढ़ने लगता है. इसकी वजह वही परिस्थितियां हैं, जो दोनों प्रदूषकों को बढ़ावा देती हैं यानि अत्यधिक गर्मी, तेज धूप और वाहनों व उद्योगों से निकलने वाला उत्सर्जन.
विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही कुछ दिनों में ओजोन का स्तर निर्धारित सीमा के भीतर दिखाई दे, लेकिन गर्मियों के दौरान यह एक गंभीर प्रदूषक बना रहता है. इसकी अदृश्य मौजूदगी सांस संबंधी बीमारियों, फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है.
यानी दिल्ली की गर्मियों में साफ दिखाई देने वाला आसमान हमेशा स्वच्छ हवा की गारंटी नहीं है. धूल के साथ-साथ ओजोन जैसी अदृश्य गैसें भी शहर की हवा को खतरनाक बनाए रखती हैं.
पर्यावरण विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग, आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर डॉ. अभिषेक चक्रवर्ती का कहना है कि ओजोन अन्य कई प्रदूषकों की तुलना में अधिक खतरनाक हो सकता है.
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में उन्होंने कहा, “ओजोन एक शक्तिशाली ऑक्सीडेंट है. यह श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाता है और गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) के साथ मिलकर संवेदनशील समूहों के लिए अन्य प्रदूषकों की तुलना में अधिक हानिकारक साबित हो सकता है. चूंकि यह रंगहीन और गंधहीन गैस है, इसलिए हमारी इंद्रियां इसकी मौजूदगी को महसूस नहीं कर पातीं.”
विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली की विशाल आबादी, वाहनों और उद्योगों से होने वाला भारी उत्सर्जन, तथा सूर्य के प्रकाश के साथ ओजोन की रासायनिक प्रतिक्रिया, इस समस्या को और गंभीर बना देती है.
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के विश्लेषक मनोज कुमार कहते हैं, “धूप वाले दिनों की संख्या में बढ़ोतरी और प्रदूषणकारी उत्सर्जन में वृद्धि का मेल एक घातक संयोजन है.”
यानी जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है और धूप तेज होती है, वैसे-वैसे वातावरण में ओजोन बनने की प्रक्रिया भी तेज हो जाती है. यही कारण है कि दिल्ली में गर्मियों के दौरान, भले ही आसमान साफ दिखाई दे, लेकिन हवा में मौजूद यह अदृश्य गैस लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है.
ओजोन बनने के लिए जिम्मेदार नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक आखिरकार उन्हीं स्रोतों से आते हैं, जो पूरे साल दिल्ली के प्रदूषण को बढ़ाते हैं यानि कि वाहनों और उद्योगों से होने वाला उत्सर्जन. और यही औद्योगिक स्रोत एक ऐसे तीसरे प्रदूषक के लिए भी जिम्मेदार हैं, जो शायद ही कभी सुर्खियों में आता है.
एसओ2: खामोशी से नुकसान पहुंचाने वाला प्रदूषक
सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) मुख्य रूप से कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से निकलती है. यह सूक्ष्म कणीय प्रदूषण PM2.5 का एक महत्वपूर्ण पूर्ववर्ती (प्रीकर्सर) है.
सीआरईए के अनुसार, दिल्ली में कोयला आधारित बिजलीघरों से पैदा होने वाले कणीय प्रदूषण का 96 प्रतिशत हिस्सा उन द्वितीयक कणों का होता है, जो तब बनते हैं जब एसओ2 सूर्य के प्रकाश और वातावरण की नमी के साथ प्रतिक्रिया करता है.
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़े बताते हैं कि 2024 में भारत का कोई भी शहर निर्धारित एसओ2 मानकों से ऊपर नहीं गया. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि समस्या खत्म हो गई है. गैस का स्तर लगातार बढ़ रहा है.
मई, 2022 में दिल्ली में एसओ2 का औसत स्तर 11 μg/m³ था. मई 2026 तक यह बढ़कर 18 μg/m³ हो गया.
आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर डॉ. अभिषेक चक्रवर्ती कहते हैं, “असल समस्या यह है कि निर्धारित मानक ही बहुत ऊंचे हैं. इसलिए लगभग हर शहर अनुमेय सीमा के भीतर दिखाई देगा.”
भारत में एसओ2 उत्सर्जन के लिए 24 घंटे का मानक 80 मिलीग्राम प्रति नॉर्मल क्यूबिक मीटर (mg/Nm³) है, जबकि यूरोप में यही सीमा 20 mg/Nm³ निर्धारित है.
डॉ. चक्रवर्ती बताते हैं, “एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि सल्फर डाइऑक्साइड अत्यंत प्रतिक्रियाशील गैस है. वातावरण में निकलते ही इसका बड़ा हिस्सा सल्फेट में बदल जाता है, और सल्फेट को एसओ2 मापते समय शामिल नहीं किया जाता.”
यानी निगरानी केंद्रों तक पहुंचने से पहले ही गैस का अधिकांश हिस्सा अपना रासायनिक स्वरूप बदल चुका होता है. ऐसे में मॉनिटरिंग स्टेशन जो मापते हैं, वह मूल उत्सर्जन का केवल एक छोटा हिस्सा होता है.
लाखों जानें बच सकती हैं
आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा 2026 में जर्नल एनपीजे क्लीन एयर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, यदि कोयला आधारित बिजलीघरों से होने वाले एसओ2 उत्सर्जन को नियंत्रित किया जाए, तो भारत में लगभग 1.24 लाख मौतों को रोका जा सकता है.
इसके लिए फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) यूनिट्स को सबसे प्रभावी तकनीक माना जाता है. इन यूनिट्स के जरिए बिजलीघरों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
सभी ताप विद्युत संयंत्रों को 2017 तक एफजीडी यूनिट्स लगाने का निर्देश दिया गया था. लेकिन पर्यावरण मंत्रालय कई बार समयसीमा बढ़ा चुका है. दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के बिजलीघरों के लिए वर्तमान अंतिम तिथि दिसंबर, 2027 निर्धारित की गई है.
दुनिया में कमी, भारत में बढ़ोतरी
वैश्विक स्तर पर एसओ2 उत्सर्जन में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. लेकिन भारत में तस्वीर उलटी है.
आईआईटी दिल्ली के 2026 के एक अध्ययन के अनुसार, देश में एसओ2 उत्सर्जन 2005 के 2.36 हजार किलोटन से बढ़कर 2021 में 5.05 हजार किलोटन तक पहुंच गया. और विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में इसमें कमी की संभावना भी कम है.
दिल्ली का अधिकांश हिस्सा लगातार गर्मी के दबाव (हीट स्ट्रेस) का सामना कर रहा है. बढ़ती गर्मी का मतलब है एयर कंडीशनर और कूलिंग की बढ़ती मांग, जिसके कारण बिजली की खपत बढ़ती है. भारत की बिजली का बड़ा हिस्सा अब भी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से आता है, जिससे एसओ2 उत्सर्जन और बढ़ने की आशंका बनी रहती है.
गर्मी और प्रदूषण का खतरनाक मेल
जब अत्यधिक गर्मी, ओजोन और एसओ2 से बनने वाले द्वितीयक प्रदूषक एक साथ मौजूद होते हैं तो यह संवेदनशील आबादी यानि बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए दोहरी मार साबित होती है.
इस वर्ष मौसम की परिस्थितियां भी चिंता बढ़ाने वाली हैं. भारत अल नीनो (El Niño) चक्र के प्रभाव में है, जिसके कारण गर्मियां अधिक तीखी और मानसून अपेक्षाकृत कमजोर रहने की आशंका है. कमजोर मानसून का मतलब यह भी है कि वातावरण में जमा प्रदूषकों को साफ करने की प्राकृतिक प्रक्रिया कम प्रभावी होगी और सर्दियों से पहले प्रदूषण का बोझ बना रहेगा.
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी परिस्थितियां ओजोन और अन्य द्वितीयक प्रदूषकों के निर्माण के लिए आदर्श मानी जाती हैं.
समाधान क्या है?
सीआरईए के विश्लेषक मनोज कुमार सवाल उठाते हैं, “आप क्या करना चाहेंगे? कुछ सौ उद्योगों को नियंत्रित करना या दिल्ली के लाखों वाहनों को?”
उनका मानना है कि नीति निर्माताओं को पहले उन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए जहां अपेक्षाकृत कम प्रयास में बड़ा असर हासिल किया जा सकता है.
वे उद्योगों पर सख्त नियमन की वकालत करते हैं, लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि निजी वाहनों पर प्रतिबंध लगाने या कड़े नियम लागू करने से पहले लोगों को व्यवहारिक विकल्प उपलब्ध कराना जरूरी है.
दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या 80 लाख से अधिक है. शहरी विकास मंत्रालय की 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में लगभग 60 प्रतिशत यात्राएं 4 किलोमीटर से कम दूरी की होती हैं, जबकि 80 प्रतिशत यात्राएं 6 किलोमीटर से कम दूरी की होती हैं. इससे संकेत मिलता है कि शहर की बड़ी आबादी अपने आसपास के इलाकों में ही आवागमन करती है.
फिर भी, इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (आईसीसीटी) के 2025 के एक कार्यपत्र के अनुसार, दिल्ली के 31 प्रतिशत भूभाग में रहने वाले लोग सार्वजनिक परिवहन तक पहुंचने के लिए 500 मीटर से अधिक दूरी तय करने को मजबूर हैं यानि प्रदूषण कम करने की बहस केवल वाहनों की संख्या घटाने की नहीं, बल्कि ऐसे शहर के निर्माण की भी है, जहां लोग आसानी से सार्वजनिक परिवहन, पैदल मार्ग और वैकल्पिक परिवहन साधनों का उपयोग कर सकें.
आंखों से ओझल, तो क्या चिंता से भी बाहर?
विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण की समस्या का समाधान सीधा और आसान नहीं है.
आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर डॉ. अभिषेक चक्रवर्ती कहते हैं, “आप विकसित देशों की वायु गुणवत्ता और नियामक व्यवस्थाओं की तुलना सीधे भारत जैसे विकासशील देशों से नहीं कर सकते. भारत में प्रदूषण के स्रोत, उसकी प्रकृति और मौसम संबंधी परिस्थितियां पश्चिमी देशों या यहां तक कि चीन से भी अलग हैं. यदि हम बिना सोचे-समझे पश्चिमी देशों के नियमों की नकल करेंगे, तो इससे सामाजिक और आर्थिक स्तर पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं, जबकि वायु गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार शायद न हो.”
दिल्ली स्थित शोध संस्था एनवायरोकैटलिस्ट के प्रमुख विश्लेषक सुनील दहिया का भी मानना है कि भारत की भौगोलिक परिस्थितियां यूरोप से अलग हैं.
वे कहते हैं, “उच्च तापमान, ढीली मिट्टी और अन्य भौगोलिक कारणों की वजह से भारत में धूल की समस्या यूरोप की तुलना में कहीं अधिक है. ऐसे में भले ही भारत तुरंत PM2.5 के लिए यूरोप के वार्षिक मानक 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक न पहुंच सके, लेकिन हमें उस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए.”
उनका सुझाव है कि भारत में चरणबद्ध और क्षेत्र-विशिष्ट वायु गुणवत्ता मानक लागू किए जाएं. यानी देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग लक्ष्य तय किए जाएं.
उदाहरण के तौर पर, दिल्ली-एनसीआर के लिए अगले पांच वर्षों में PM2.5 का 24 घंटे का मानक 35 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और वार्षिक मानक 25 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर निर्धारित किया जा सकता है.
प्रतिक्रिया नहीं, रोकथाम की जरूरत
सुनील दहिया का कहना है कि वर्तमान नीतियां मुख्य रूप से प्रतिक्रिया आधारित हैं.
“ग्रैप और एनकैप जैसी व्यवस्थाएं तब सक्रिय होती हैं जब वायु गुणवत्ता पहले ही खराब हो चुकी होती है. हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि हवा की गुणवत्ता बिगड़े ही नहीं.”
यह अंतर जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.
ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान) तभी लागू होता है जब प्रदूषण एक निश्चित सीमा पार कर जाता है. लेकिन तब तक लोगों के फेफड़ों और स्वास्थ्य पर असर शुरू हो चुका होता है.
इसीलिए विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे देश के लिए एक जैसी नीति लागू करने के बजाय ऐसे गतिशील और क्षेत्र-विशिष्ट मॉडल विकसित किए जाने चाहिए जो स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम, प्रदूषण के स्रोतों और आबादी की संवेदनशीलता को ध्यान में रखें.
डॉ. चक्रवर्ती कहते हैं, “GRAP और ऑड-ईवन जैसी योजनाओं के पीछे मंशा अच्छी है, लेकिन इनकी रूपरेखा और क्रियान्वयन वैज्ञानिक दृष्टि से पर्याप्त मजबूत नहीं हैं. यदि हम अपनी नियामक संस्थाओं को मजबूत नहीं कर पाए, तो निकट भविष्य में स्वच्छ हवा की उम्मीद करना मुश्किल होगा.”
निगरानी की भी अपनी सीमाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार केवल नए नियम बनाने से नहीं आएगा. इसके लिए वायु गुणवत्ता निगरानी नेटवर्क को भी अधिक वैज्ञानिक बनाना होगा.
इसमें बेहतर स्थानों पर मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित करना, प्रदूषण मानकों को अद्यतन करना और उद्योगों तक प्रभावी निगरानी एवं प्रवर्तन पहुंचाना शामिल है.
साल, 2026 में दिल्ली सरकार ने छह नए वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन स्थापित किए. लेकिन इन सभी को हरित क्षेत्रों में लगाया गया, यानी ऐसे स्थानों पर जहां इमारतें कम हैं और वनस्पति का घनत्व अधिक है.
जब इस बारे में एक वायु प्रदूषण विशेषज्ञ से सवाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब में एक सवाल ही खड़ा कर दिया.
उन्होंने कहा, “अगर मैं तमिलनाडु के किसी दूरदराज गांव में एक मॉनिटरिंग स्टेशन लगा दूं और वहां देश की सबसे साफ हवा दर्ज हो, तो क्या आप यह मान लेंगे कि आपके आसपास की हवा भी साफ है?”
यह सवाल दिल्ली की वायु गुणवत्ता निगरानी व्यवस्था की एक बुनियादी चुनौती की ओर इशारा करता है. यदि निगरानी केंद्र ऐसे स्थानों पर लगाए जाएं जहां प्रदूषण अपेक्षाकृत कम हो, तो आंकड़े बेहतर दिख सकते हैं, लेकिन वे जरूरी नहीं कि शहर के अधिकांश लोगों द्वारा सांस ली जा रही वास्तविक हवा की तस्वीर पेश करें.
दिल्ली की हवा की कहानी केवल एक्यूआई के आंकड़ों की नहीं है. यह उन अदृश्य प्रदूषकों की भी कहानी है, जो साफ आसमान के पीछे छिपे रहते हैं. धूल, ओजोन और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषक यह याद दिलाते हैं कि प्रदूषण केवल सर्दियों की समस्या नहीं है. गर्मियों में भी खतरा मौजूद रहता है, बस उसका चेहरा बदल जाता है.
न्यूज़लॉन्ड्री के साथ इंटर्नशिप कर रहे साथियों द्वारा यह रिपोर्ट साफ हवा की मांग को लेकर चलाई जा रही हमारी मुहिम हवा का हक़ का हिस्सा है. यदि आप भी इस मुहिम से जुड़ना चाहते हैं, तो यहां क्लिक करके इसे समर्थन दे सकते हैं. इस मुहिम में जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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