नियम बदला, अडाणी छाए: 20 हजार करोड़ की एफसीआई की साइलो योजना में अडाणी समूह का वर्चस्व?

नीति आयोग और डीईए की सलाह पर एफसीआई ने साइलो टेंडर्स से मोनोपॉली की शर्त हटा दी. इसके बाद ये सारे टेंडर अडाणी को मिले. इस योजना का 16,500 करोड़ रुपये से अधिक का हिस्सा अडाणी और लीप इंडिया नामक दो कंपनियों ने हासिल कर लिया.

WrittenBy:आस्था सव्यसाची
Date:
चित्रण: मंजुल

भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) का 20,000 करोड़ रुपये का साइलो (बड़े अनाज भंडार गृह) प्रोग्राम इस मकसद से शुरू किया गया था कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए देश में अनाज भंडारण को आधुनिक बनाया जा सके. लेकिन इसके लिए बनी योजना के हजारों करोड़ के ठेके अब सिर्फ दो कंपनियों के हाथ में सिमट कर रह गए.

एफसीआई की 'हब एंड स्पोक' साइलो प्रोग्राम के दो चरणों में अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड ने 134 में से 110 साइलो के कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर लिए. इनकी कुल कीमत 16,500 करोड़ रुपये से ज्यादा है. कुल 60 लाख मीट्रिक टन अनाज भंडारण क्षमता में से करीब 46.5 लाख मीट्रिक टन इन्हीं दो कंपनियों के साइलो में रखा जाएगा.

सबसे दिलचस्प बात ये है कि शुरुआत में खुद एफसीआई ने एक 'एकाधिकार-विरोधी' (एंटी मोनोपॉली) उपनियम प्रस्तावित किया था, ताकि कोई एक कंपनी सारे प्रोजेक्ट अपने कब्जे में न ले सके. लेकिन 2022 की एक अहम बैठक में नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग ने इस शर्त का विरोध किया. उनका तर्क था कि बाजार को अपने हिसाब से चलने दिया जाना चाहिए. इसके बाद ये नियम हटा दिया गया.

इसके तुरंत बाद, पहले चरण के दूसरे राउंड में अडाणी ने सारे टेंडर जीत लिए. फिर दूसरा चरण आते-आते तस्वीर लगभग साफ हो चुकी थी. भारत के सबसे बड़े आधुनिक अनाज भंडारण प्रोग्राम पर अडाणी और लीप इंडिया की पकड़ बन चुकी थी.

भारत का प्रतिस्पर्धा आयोग यानि सीसीआई, अलग-अलग सेक्टरों में ज़रूरत से ज्यादा बाजार कब्जे और एकाधिकार जैसे व्यवहार पर लगातार चिंता जताता रहा है. लेकिन भंडार-गृह प्रोजेक्ट के मामले में खुद सरकारी विभागों ने ऐसी शर्तें हटाने के लिए दबाव डाला, जो छोटे खिलाड़ियों को कुछ हद तक महफूज़ रख सकती थीं. अडाणी और लीप, दोनों ने जिन ठेकों को जीता, उनमें वो सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनियां थीं. लेकिन अगर एकाधिकार-विरोधी सुरक्षा बनी रहती, तो किन्हीं  एक-दो कंपनियों के पास इतनी बड़ी हिस्सेदारी शायद नहीं जाती.

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