दिल्ली की प्रदूषित हवा: समय से पहले जन्मदर में 21 फीसदी की उछाल

यह सिर्फ प्रदूषण की कहानी नहीं है. यह गर्भवतियों और नवजात शिशुओं पर मंडराते उस संकट की कहानी है, जिस पर भारत ने अभी ठीक से शोध भी शुरू नहीं किया है.

चित्रण: मंजुल

13 अक्टूबर 2025 की सुबह मोनी की नींद एक बार फिर बेकाबू खांसी ने तोड़ दी. उसने पानी भी पीया मगर खांसी कम नहीं हुई. 

दक्षिणपुरी की 26 वर्षीय मोनी को जनवरी, 2025 में पता चला था कि वह गर्भवती हैं. दक्षिणी दिल्ली का यह इलाका घनी आबादी, उद्योगों और भारी ट्रैफिक वाला क्षेत्र है. उनके गर्भवती होने से पहले के हफ्तों में इस इलाके में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर 440 से ऊपर दर्ज किया गया था. 

मोनी को दिसंबर और जनवरी के चरम प्रदूषण वाले महीनों में शुरू हुई हल्की जलन और सूखी खांसी गर्भावस्था के पांचवें महीने तक लगातार बनी रही, जिससे हालत और भी गंभीर हो गई. 

उस दिन सुबह उठने के कुछ मिनट बाद ही मोनी को अपनी जांघों के बीच अचानक नमी महसूस हुई. ये प्रसव का संकेत (वाटर ब्रोक) था. हालांकि, डिलीवरी की तारीख अभी एक महीने से भी ज्यादा दूर थी. 

मोनी लगातार खांस रही थीं और सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रही थीं. परिवार उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचा. 

डॉक्टरों को समय से पहले बच्चे की डिलीवरी करानी पड़ी.

नवजात को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी और उसे एक हफ्ते से ज्यादा समय तक नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई यानी एनआईसीयू में रखना पड़ा.

अस्पताल की डिस्चार्ज समरी में ‘जन्म के समय श्वसन संकट’ (सांस लेने में तकलीफ) दर्ज की गई.

न्यूज़लॉन्ड्री टीम की मोनी से मुलाकात एम्स दिल्ली के सेंटर फॉर कम्युनिटी मेडिसिन के डॉ. आशुतोष कोठारी के जरिए हुई. 

यहां शोधकर्ता ऐसे कई मामलों पर नजर रख रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि वायु प्रदूषण का प्रसव और नवजात शिशुओं पर क्या असर पड़ रहा है.

डॉ. कोठारी ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “मोनी की गर्भावस्था समय से पहले जन्म का एक स्पष्ट मामला है, जिसे लंबे समय तक वायु प्रदूषण के कारण हुई श्वसन समस्या से जोड़ा जा सकता है.”

दिल्ली की जहरीली हवा गर्भावस्थाओं को प्रभावित कर रही है और आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं.

इस शहर में मोनी जैसी हज़ारों औरतें हैं पर सरकार का ध्यान उनकी तरफ नहीं है. हमने बीते पांच साल के आंकड़े जुटाए और पाया कि इनमें वो सच छिपा है, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया है. यहां तक कि अब तो मेडिकल जगत भी इसके लिए और कोई वजह नहीं बता पा रहा है. पढ़िए हमारी ये खास खोजी रिपोर्ट, जिसमें वह सब है, जिसे सरकार स्वीकार नहीं करना चाहती.

परिवार कल्याण निदेशालय से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिए प्राप्त महीनेवार जन्म आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि राजधानी में समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या बीते पांच सालों में 51 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है.

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यह संख्या 2021 में 21,134 थी, जो 2025 में बढ़कर 31,963 हो गई.

सिर्फ संख्या ही नहीं, कुल जीवित बच्चों में समय से पहले जन्म लेने वालों की हिस्सेदारी भी बढ़ी है. यह दर 2021 में 9.8 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर 11.9 प्रतिशत हो गई.

इस बढ़ोतरी को केवल जनसंख्या वृद्धि या कुल जन्मों में बढ़ोतरी से नहीं समझाया जा सकता.

पिछले पांच वर्षों में प्रीमैच्योर बर्थ रेट (समय से पहले जन्म दर) अपने शुरुआती स्तर की तुलना में 21.4 प्रतिशत बढ़ी है. यानी पिछले साल दिल्ली में लगभग हर आठ में से एक बच्चा समय से पहले पैदा हुआ.

दरअसल, समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा उन्हीं मामलों में बढ़ती दिखती है, जिनकी गर्भावस्था की पहली तिमाही दिल्ली के सबसे प्रदूषित महीनों के दौरान गुजरती है.

हर साल बिना किसी अपवाद के अगस्त या सितंबर में प्रीमैच्योर बर्थ के मामले चरम पर पहुंच जाते हैं.

सितंबर, 2021 में 2,424 प्रीमैच्योर जन्म दर्ज किए गए. अगस्त, 2022 में यह संख्या बढ़कर 3,341 हो गई. अगस्त, 2023 में मामूली गिरावट के साथ 2,998 मामले सामने आए, लेकिन इसके बाद संख्या फिर बढ़ी और अगस्त 2024 में 3,081 तथा अगस्त 2025 में 3,318 प्रीमैच्योर जन्म दर्ज किए गए.

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अगस्त या सितंबर में समय से पहले जन्म लेने वाला बच्चा अपनी गर्भावस्था की पहली और सबसे महत्वपूर्ण तिमाही नवंबर, दिसंबर और जनवरी के दौरान बिताता है.

यही वह समय होता है जब प्लेसेंटा बन रहा होता है और शरीर के शुरुआती अंग विकसित हो रहे होते हैं. और यही वह दौर है जब दिल्ली की हवा सबसे ज्यादा जहरीली होती है.

इन महीनों में पीएम 2.5 का स्तर अक्सर 300 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर पहुंच जाता है. दिल्ली का सालाना औसत पीएम 2.5 स्तर नियमित रूप से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को पार कर जाता है.

यह भारत के निर्धारित वार्षिक मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से लगभग ढाई गुना ज्यादा है और विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ की 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वार्षिक सीमा से 20 गुना अधिक.

सबसे अहम बात यह है कि यह पैटर्न पिछले पांचों वर्षों में बिना किसी अपवाद के लगातार दोहराया गया है.

‘गर्भ ठहर रहे हैं, लेकिन बच नहीं रहे’

हालांकि, डॉ. कोठारी कहते हैं कि सिर्फ उन महीनों में ही नहीं जब दिल्ली का प्रदूषण चरम पर होता है, बल्कि बाकी समय भी शहर की हवा डब्ल्यूएचओ द्वारा तय सुरक्षित सीमाओं से कहीं ज्यादा खराब बनी रहती है.

यानी समस्या सिर्फ सर्दियों तक सीमित नहीं है. और यह सिर्फ दिल्ली की समस्या भी नहीं है.

रेनबो चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल्स एंड बर्थराइट बाय रेनबो में कार्यरत स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. उज्जवला ने वाराणसी में 2018 से 2020 के बीच एक अध्ययन किया. इस अध्ययन में सात अलग-अलग प्रदूषण क्षेत्रों में 1,400 गर्भावस्थाओं का विश्लेषण किया गया.

अध्ययन में पाया गया कि वायु प्रदूषक, खासकर सल्फर डाइऑक्साइड, समय से पहले जन्म और गर्भ के भीतर शिशु के विकास रुकने जैसी समस्याओं को प्रभावित करते हैं.

रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि ‘कारण संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं.’

दिल्ली के पिछले पांच वर्षों के आंकड़े इस निष्कर्ष को और मजबूत करते हैं.

दिल्ली की एक अन्य स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञ डॉ. जयश्री सुंदर कहती हैं कि वह अपने क्लिनिक में इस असर को लगातार देख रही हैं.

उन्होंने कहा, “बच्चे के विकास पर प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर गर्भावस्था की पहली दो तिमाहियों में पड़ता है. हाल ही में मैंने दो स्टिलबर्थ केस संभाले- एक 32 हफ्ते में और दूसरा 34 हफ्ते में.”

वह कहती हैं, “दोनों मामलों में किसी और वजह का पता नहीं चला. दोनों महिलाएं पूरी तरह स्वस्थ थीं. एक हफ्ते पहले तक बच्चों की ग्रोथ सामान्य थी. फिर अचानक उन्होंने फोन कर बताया कि उन्हें बच्चे की कोई हलचल महसूस नहीं हो रही. जब हमने जांच की तो पाया कि गर्भ में ही बच्चे की मौत हो चुकी थी.”

डॉ. सुंदर के मुताबिक, दोनों बच्चों का गर्भधारण नवंबर-दिसंबर यानी प्रदूषण वाले महीनों में हुआ था.

उन्होंने कहा, “डॉक्टर होने के नाते हमें वायु प्रदूषण के अलावा कोई और कारण नजर नहीं आता. दो हफ्ते पहले तक बच्चों की ग्रोथ 17वें-18वें परसेंटाइल पर थी, ब्लड सर्कुलेशन सामान्य था, कोई रिस्क फैक्टर नहीं था, मां को न हाई ब्लड प्रेशर था और न डायबिटीज. फिर भी गर्भ नहीं बच पाए. और हमारे पास इसकी कोई दूसरी व्याख्या नहीं है.”

डॉ. सुंदर का कहना है कि वह गर्भपात और गर्भावस्था के दौरान अचानक भारी ब्लीडिंग के मामलों में भी बढ़ोतरी देख रही हैं.

उनके मुताबिक, दिल्ली की हवा में बढ़ते पीएम 2.5 और सल्फर डाइऑक्साइड इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं.

प्लेसेंटा पर असर को लेकर उन्होंने कहा, “पीएम 2.5 बेहद सूक्ष्म कण होते हैं. ये रक्त वाहिकाओं को पार कर प्लेसेंटा तक पहुंच सकते हैं. इससे बच्चे की ग्रोथ रुक जाती है  यानी बच्चा अपेक्षित रूप से छोटा रह जाता है.”

न्यूज़लॉन्ड्री ने दिल्ली के ज्यादा प्रदूषित इलाकों में ऐसे मामलों की पड़ताल की.

31 वर्षीय पूनम दक्षिणपुरी में घरेलू कामगार हैं. उनके पति सफाई कर्मचारी का काम करते हैं.

जनवरी से मार्च 2026 के बीच, गर्भावस्था की पहली तिमाही में पूनम को सांस लेने में दिक्कत और घुटन महसूस होने लगी.

स्मॉग की वजह से उनकी आंखों में जलन होती थी, सिरदर्द और चक्कर आते थे. यहां तक कि सीढ़ियां चढ़ना भी मुश्किल हो गया था.

डॉ. कोठारी और पूनम के मुताबिक, पूनम को दिल की बीमारी है, जिसका पता उनकी पहली गर्भावस्था के दौरान चला था.

उनका पहला बच्चा जन्म के समय कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था और उसे सीपीआर (हृत्फुफ्फुसीय पुनर्जीवन) देकर दोबारा सांस दिलानी पड़ी थी.

दूसरा बच्चा 28 हफ्तों से पहले ही पैदा हो गया. यह एक गंभीर प्रीमैच्योर बर्थ का मामला था और बच्चे को एनआईसीयू में भर्ती करना पड़ा.

डॉक्टरों का मानना है कि पीएम 2.5 और पीएम10 जैसे प्रदूषण कणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से दोनों गर्भावस्थाओं में जटिलताएं बढ़ सकती हैं. 

कम आय वाले परिवारों के लिए यह संकट सिर्फ बच्चे के जन्म पर खत्म नहीं होता.

समय से पहले जन्म लेने पर जीवित रहने की कीमत

अक्सर, समय से पहले जन्मे बच्चों को सांस लेने में तकलीफ होती है, क्योंकि उनके फेफड़े पूरी विकसित नहीं हो पाते हैं. उनके लीवर भी ठीक तरह से विकसित नहीं होते जिस वजह से पीलिया जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं, जैसा कि पूनम के बच्चे के साथ हुआ. कई बच्चों को इंट्रावेनस ट्यूब्स यानी नसों में डाली जाने वाली नली के जरिए खाना खिलाना पड़ता है क्योंकि वे दूध भी नहीं निगल पाते. 

अगर समय पर इलाज न मिले तो समय से पहले जन्म लेना बच्चे में बीमारियों का कारण बन सकता है, जैसे - दिमाग में खून का बहना, आंतों में गंभीर इन्फेक्शन, आंखों के पिछले हिस्से को नुकसान, जिससे अंधापन हो सकता है, इसके अलावा सेरेब्रल पाल्सी यानी दिमागी लकवा, मिर्गी और कई मामलों में मौत भी हो सकती है. 

समय से पहले जन्मे बच्चे को जिंदा रखना और उसकी देखभाल करना काफी महंगा भी होता है. खास तौर से, निजी अस्पतालों में एनआईसीयू का खर्च लाखों रुपये में पहुंच जाता है. सरकारी अस्पतालों में एनआईसीयू बेड की कमी और बढ़ती भीड़ के कारण गरीब परिवारों को भी निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है. दिहाड़ी मज़दूर और ग़रीब परिवार अपने बच्चे का इलाज कराने के लिए मज़दूरी गंवा देते हैं और कर्ज में डूब जाते हैं. 

प्रदूषण कैसे गर्भ में पल रहे बच्चे को नुकसान पहुंचाता है?

दिल्ली की स्त्री रोग विशेषज्ञ और आईवीएफ विशेषज्ञ, डॉ अर्चना धवन बजाज एक ऐसे ही पैटर्न के बारे में बताती हैं, जिसे उन्होंने कई बार देखा है. 

वह कहती हैं, “मैंने ऐसे कई मामले देखे हैं, जहां पूरी गर्भावस्था में सब कुछ सही चल रहा होता है- नॉर्मल ब्लड प्रेशर, नॉर्मल शुगर, बच्चे के विकास के सभी संकेत सही होते हैं.  उसके बाद ऐसी बुरी सर्दियां आती हैं, जब हवा की गुणवत्ता बहुत खराब हो जाती है. उसी समय मैंने यह भी देखा है कि सब सही होने के बाद भी दूसरी या तीसरी तिमाही में बच्चे का विकास होना रुक जाता है. इसकी और कोई वजह नहीं मिलती सिवाय इसके कि ये प्रदूषण के समय में हुआ.”

वह बताती हैं कि प्रदूषण कैसे गर्भावस्था को कैसे प्रभावित करता है, “पीएम 2.5 और पीएम 10 सबसे पहले मां के फेफड़ों पर असर करता है. फिर, ये नाल के जरिए गर्भ में पल रहे बच्चे तक पहुंचता है. जब ये एक बार बच्चे के खून में मिल जाता है, ये जगह घेरने लगता है, जिस वजह से बच्चे और मां के बीच ऑक्सीजन और पोषण का आदान प्रदान कम होने लगता है. इसके अलावा, ये प्रदूषक शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव को बढ़ाता है.” 

अंत में, डॉक्टर कहती हैं, “नुकसान चार तरह से होता है- सूजन, ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस, ऑक्सीजन की कमी और पोषण की कमी.” 

डॉक्टर बजाज आगे बताती हैं, “मौजूदा सबूतों के अनुसार, प्रदूषण के कारण पहली तिमाही में बच्चे के दिल से जुड़ी बीमारियां और न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट हो सकते हैं. न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट का मतलब है- दिमाग या रीढ़ की हड्डी में होने वाली बनावटी कमी. हमें पता है कि गर्भ धारण से पहले और पहली तिमाही में फोलिक एसिड लेने से इसका खतरा कम होने लगता है. लेकिन अब शोधकर्ताओं ने पाया है कि वायु प्रदूषण सुरक्षा में भी रुकावट डाल रहा है.”

वह कहती हैं, “तीन मुख्य प्रदूषक- पीएम, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड शरीर में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति को घटा रहे हैं, जिससे शरीर में फोलिक एसिड को सोखने की क्षमता कम होने लगती है. इसका मतलब है कि अगर कोई महिला ठीक से फोलिक एसिड ले रही हो लेकिन अगर वो प्रदूषित हवा में सांस ले रही हो तो उसके बच्चे को न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट खतरा हो सकता है.” 

इसके परिणाम के बारे में डॉक्टर बजाज बताती हैं, “प्रदूषण से होने वाली सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और ऑक्सीजन की कमी का असर सिर्फ जन्म तक सीमित नहीं होता. लम्बे समय में, इससे बच्चों में कम आईक्यू, व्यवहार से जुड़ी समस्या और ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर हो सकते हैं. इनमें से कोई भी बात 100 प्रतिशत सही नहीं है लेकिन संकेत ज़रूर मिलते हैं. इसके अलावा इसका संबंध मृत बच्चे के जन्म और गर्भपात की बढ़ती दर से भी देखा गया है.”

हालांकि, डॉक्टर बजाज कारण और सह-संबंध (को-रिलेशन) के बीच फर्क करने को लेकर सावधानी बरतती हैं. वह कहती हैं, “मृत बच्चे का जन्म या समय से पहले जन्म होने का कारण हमेशा वायु प्रदूषण को नहीं माना जा सकता. हम इस नतीजे पर तभी पहुंचते हैं जब बाकी कारण नज़र नहीं आते. इसके कई कारण हो सकते हैं और सभी चीज़ें मिलकर काम करती हैं. वायु प्रदूषण को एकमात्र कारण न कहकर सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है, क्योंकि किसी चीज को पूरी तरह साबित करने के लिए यह दिखाना होगा कि एक खास प्रदूषक पर्याप्त मात्रा में कोई खास नतीजा पैदा कर सकता है और अभी इस तरह का कोई सबूत मौजूद नहीं है. इस पर और रिसर्च करने की जरूरत है.”

भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा समय से पहले जन्म वाला देश है - लेकिन रिसर्च बहुत कम 

समय से पहले बच्चों के जन्म के मामले में भारत का दुनिया में पहला स्थान है. 2023 में द लांसेट द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में जितने भी बच्चे समय से पहले पैदा हुए उनमें से 23 प्रतिशत से ज्यादा अकेले भारत में थे. 

कुछ देश इस मामले में बेहतर कर रहे हैं. 

2010 में इस सूची में भारत के बाद चीन दूसरे नंबर पर था. एक दशक बाद भी भारत इसमें पहले स्थान पर बना रहा. हालांकि, 2020 तक चीन चौथे स्थान पर पहुंच गया और पाकिस्तान और नाइजीरिया उससे आगे निकल गए. 

पिछले कुछ सालों में चीन ने इस संकट पर शोध किया. वैज्ञानिकों ने कई शहरों में वायु प्रदूषण और इसके प्रभाव पर शोध किया. जिनके नतीजे एक समान मिले. भारत में इस स्तर पर ऐसा कोई शोध नहीं हुआ. 

2025 में एक समीक्षा प्रकाशित हुई. जिसमें चीन में 2011 से 2023 के बीच हुए कई शोधों को एक साथ देखा गया और यह पाया गया कि जो महिलाएं प्रदूषित हवा में सांस लेती हैं, उनमें गर्भपात होने, बच्चे के समय से पहले जन्म लेने, बच्चे का वजन कम होने और बच्चे में जन्म से कोई शारीरिक कमी होने का खतरा ज्यादा होता है. 

अलग अलग शहरों के अध्ययन भी चौंकाने वाले थे. गुआंगडोंग प्रांत में यह पाया गया कि पीएम 2.5 और पीएम 10 में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ने से समय से पहले जन्म का खतरा बढ़ जाता है और यही वो समय है जिसकी तरफ दिल्ली के आंकड़ें भी इशारा करते हैं. गर्भावस्था से पहले और आखिरी दिनों में, सल्फर ऑक्साइड और ओजोन का असर भी देखा गया है. जिसकी वजह से जन्म के समय बच्चे का वजन कम होने का खतरा रहता है. 

हुबेई प्रांत के शियान और जिंगझोउ शहरों में 16,035 मामलों के एक अध्ययन में पीएम 2.5, पीएम 10, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के संपर्क और समय से पहले जन्म के बीच गहरा संबंध देखा गया है. खासतौर पर जिंगझोउ में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का असर बेहद चिंताजनक था. हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बढ़ने से समय से पहले जन्म का खतरा 21.1 प्रतिशत तक बढ़ गया. इसके अलावा औद्योगिक शहर शूझोउ में भी ऐसे नतीजे मिले. सभी वायु प्रदूषक समय से पहले जन्म के खतरे को बढ़ा देते हैं. 12 से 29 हफ्ते यानि दूसरी और तीसरी तिमाही को सबसे संवेदनशील अवधि माना जाता है. 

भारत में, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि मृत्यु दर और वायु प्रदूषण के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है.

2024 में राज्यसभा में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने कहा था, “कोई पुख्ता डाटा नहीं है जिससे जिससे वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों का सीधा संबंध स्थापित किया जा सके.” 

न्यूज़लॉन्ड्री ने दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय को प्रश्न भेजे हैं, अगर कोई जवाब मिलता है, तो इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

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