यह सिर्फ प्रदूषण की कहानी नहीं है. यह गर्भवतियों और नवजात शिशुओं पर मंडराते उस संकट की कहानी है, जिस पर भारत ने अभी ठीक से शोध भी शुरू नहीं किया है.
13 अक्टूबर 2025 की सुबह मोनी की नींद एक बार फिर बेकाबू खांसी ने तोड़ दी. उसने पानी भी पीया मगर खांसी कम नहीं हुई.
दक्षिणपुरी की 26 वर्षीय मोनी को जनवरी, 2025 में पता चला था कि वह गर्भवती हैं. दक्षिणी दिल्ली का यह इलाका घनी आबादी, उद्योगों और भारी ट्रैफिक वाला क्षेत्र है. उनके गर्भवती होने से पहले के हफ्तों में इस इलाके में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर 440 से ऊपर दर्ज किया गया था.
मोनी को दिसंबर और जनवरी के चरम प्रदूषण वाले महीनों में शुरू हुई हल्की जलन और सूखी खांसी गर्भावस्था के पांचवें महीने तक लगातार बनी रही, जिससे हालत और भी गंभीर हो गई.
उस दिन सुबह उठने के कुछ मिनट बाद ही मोनी को अपनी जांघों के बीच अचानक नमी महसूस हुई. ये प्रसव का संकेत (वाटर ब्रोक) था. हालांकि, डिलीवरी की तारीख अभी एक महीने से भी ज्यादा दूर थी.
मोनी लगातार खांस रही थीं और सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रही थीं. परिवार उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचा.
डॉक्टरों को समय से पहले बच्चे की डिलीवरी करानी पड़ी.
नवजात को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी और उसे एक हफ्ते से ज्यादा समय तक नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई यानी एनआईसीयू में रखना पड़ा.
अस्पताल की डिस्चार्ज समरी में ‘जन्म के समय श्वसन संकट’ (सांस लेने में तकलीफ) दर्ज की गई.
न्यूज़लॉन्ड्री टीम की मोनी से मुलाकात एम्स दिल्ली के सेंटर फॉर कम्युनिटी मेडिसिन के डॉ. आशुतोष कोठारी के जरिए हुई.
यहां शोधकर्ता ऐसे कई मामलों पर नजर रख रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि वायु प्रदूषण का प्रसव और नवजात शिशुओं पर क्या असर पड़ रहा है.
डॉ. कोठारी ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “मोनी की गर्भावस्था समय से पहले जन्म का एक स्पष्ट मामला है, जिसे लंबे समय तक वायु प्रदूषण के कारण हुई श्वसन समस्या से जोड़ा जा सकता है.”
दिल्ली की जहरीली हवा गर्भावस्थाओं को प्रभावित कर रही है और आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं.
इस शहर में मोनी जैसी हज़ारों औरतें हैं पर सरकार का ध्यान उनकी तरफ नहीं है. हमने बीते पांच साल के आंकड़े जुटाए और पाया कि इनमें वो सच छिपा है, जिसे नजरअंदाज कर दिया गया है. यहां तक कि अब तो मेडिकल जगत भी इसके लिए और कोई वजह नहीं बता पा रहा है. पढ़िए हमारी ये खास खोजी रिपोर्ट, जिसमें वह सब है, जिसे सरकार स्वीकार नहीं करना चाहती.
परिवार कल्याण निदेशालय से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिए प्राप्त महीनेवार जन्म आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि राजधानी में समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या बीते पांच सालों में 51 प्रतिशत से अधिक बढ़ गई है.

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