रामानंदी अखाड़ा बनाम राम मंदिर ट्रस्ट: मंदिर पर नियंत्रण के संघर्ष की कहानी

अयोध्या के इतिहास में यह पहली बार किसी मंदिर की कमान पूरी तरह से गेरुआधारियों के हाथों में नहीं हैं, इसे लेकर संतों में बेचैनी है.

WrittenBy:श्वेता देसाई
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पृष्ठभूमि में राम मंदिर के साथ दो साधुओं का चित्रण.
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अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर का प्रबंधन साधुओं और महंतों की पारंपरिक व्यवस्था की बजाय केंद्र सरकार द्वारा नामित ट्रस्ट के हाथ में चला गया है. इस बदलाव से पूजा करने के उत्तराधिकार के दावे पर एक अप्रत्याशित लड़ाई शुरू हो गई है. आख़िरकार, अयोध्या के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी भव्य मंदिर की कमान पूरी तरह से गेरुआधारियों के हाथ में नहीं है. 

जहां एक ओर अयोध्या के संत समाज में राम मंदिर को लेकर उत्साह है, वहीं बेचैनी भी है- नई मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा, समारोह का नेतृत्व करने वाले पुजारी, नियुक्ति की प्रक्रिया और राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख संतों को दरकिनार करने को लेकर. श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में शामिल संघ परिवार के सदस्यों और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारियों को इन मामलों पर अधिक शक्तियां प्राप्त हैं. 

मंदिर का प्रबंधन ट्रस्ट को सौंपने का नरेंद्र मोदी सरकार का निर्णय, साल 2019  में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले के अनुरूप है. लेकिन इसपर आपत्तियां भी जताई गई हैं, मुख्य रूप से रामानंदी संप्रदाय के संतों की ओर से, जिनका अस्तित्व अयोध्या से करीब से जुड़ा हुआ है. यह शहर इसके प्रमुख अखाड़ों- निर्वाणी, निर्मोही और दिगंबर का केंद्र है.

हालांकि, केवल रामानंदी अखाड़ों के संत ही निराश नहीं हैं.

शैव परंपरा के शंकराचार्यों ने भी 22 जनवरी के समारोह में शामिल नहीं होने की घोषणा की है. उन्होंने कहा है कि "अधूरे" मंदिर का उद्घाटन करने का ट्रस्ट का फैसला शास्त्रों का उल्लंघन है. उत्तर में स्थित ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ट्रस्ट के महासचिव और वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय को हटाने का आह्वान किया है, क्योंकि "वह रामानंदी नहीं हैं."

लेकिन अस्थायी मंदिर के संरक्षक रहे रामानंदी अखाड़ों के बीच भी इन सवालों पर जमकर बहस हो रही है कि नए मंदिर में पूजा और भोग आदि पर किसका नियंत्रण होना चाहिए. नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले तक यही अखाड़े राम लला की मूर्ति की पूजा के प्रभारी थे. 

यह नई व्यवस्था उस स्थापित परंपरा को विराम दे रही है जिसके तहत रामानंदी अखाड़े हनुमानगढ़ी और राम जन्मभूमि जैसे बड़े मंदिरों के प्रबंधन को नियंत्रित करते थे और भक्तों और संरक्षकों के चढ़ावे को भी एकत्र करते थे. रामानंदी संतों का दावा है कि नए मंदिर के प्रबंधन में उनका प्रभाव कम होने से अयोध्या पर संप्रदाय के अखाड़ों का प्रभुत्व खतरे में पड़ गया है.

निर्वाणी अखाड़े के प्रमुख धरम दास ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, "अयोध्या में हम साधुओं की परंपरा और महंतों की व्यवस्था का पालन करते हैं, किसी ट्रस्ट की नहीं." उन्होंने दावा किया कि शहर में एक भी धार्मिक प्रतिष्ठान ट्रस्ट के कामकाज के पक्ष में नहीं है. 

15वीं शताब्दी में जन्मा रामानंदी संप्रदाय भारत और नेपाल में सबसे बड़े वैष्णव तपस्वी संप्रदायों में से एक है. इसमें "द्विज" हिंदू, यानी हिंदू जाति व्यवस्था के पहले तीन वर्णों के साथ ही महिलाओं, पिछड़ी जातियों और यहां तक ​​कि मुस्लिम हरिजन भक्तों को भी स्वीकार किया जाता है. रामानंदी लोगों के संरक्षक देवता भगवान राम हैं और वह अयोध्या को ब्रह्मांड का केंद्र मानते हैं, जहां उन्होंने त्रेता युग में शासन किया था. रामानंदी, शैव और सिख अखाड़ों के साथ मिलकर अखाड़ा परिषद बनाते हैं, जो कुंभ मेलों का आयोजन करता है. 

दरकिनार हुए रामानंदी अखाड़े 

ट्रस्ट के खिलाफ संत अपनी नाराजगी कुछ वर्षों से खुले तौर पर प्रदर्शित कर रहे हैं। भूमि सौदों में भ्रष्टाचार से लेकर जन्मभूमि परिसर से सटे अंगद टीला में कथित तौर पर धोखाधड़ी से जमीन हड़पने तक के आरोप लगाए गए हैं. 

वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र झा ने अपनी पुस्तक ‘अयोध्या: द डार्क नाइट’ में लिखा है कि राम चबूतरे पर निर्मोही अखाड़े का स्वामित्व था. राम चबूतरा 1858 में बाबरी मस्जिद परिसर के अंदर बनाया गया था, जिसे भगवान राम के जन्मस्थान के रूप में जाना जाता था, जब तक निर्वाणी अखाड़े के एक पुजारी अभिराम दास ने 22-23 दिसंबर 1949 की रात में गुप्त रूप से मस्जिद के अंदर राम लला की मूर्ति स्थापित नहीं की थी. 

उस दिन से राम लला की पूजा निर्वाणी अखाड़े के संतों द्वारा की जाने लगी, मुख्य रूप से अभिराम दास के शिष्यों द्वारा. अभिराम दास जन्मभूमि उद्धारक बाबा के रूप में प्रसिद्ध हैं.  अस्थायी मंदिर अब ट्रस्ट के नियंत्रण में आ गया है और इसमें निर्वाणी अखाड़े का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. 

"रामानंदी अखाड़े से जुड़े साधुओं की राम जन्मभूमि आंदोलन के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका रही है. अब जब मंदिर का निर्माण हो रहा है, तो वे हमें ट्रस्ट में जगह न देकर दरकिनार कर रहे हैं. ऐसा लगता है यह जानबूझकर किया जा रहा है,'' जैसा कि निर्वाणी अखाड़े द्वारा प्रबंधित अयोध्या के प्रमुख मंदिर हनुमानगढ़ी के अध्यक्ष तेजपाल दास ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया. 

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तेजपाल दास अपने गुरु पुरूषोत्तम के साथ.

नाराजगी और विश्वासघात

रामानंदी अखाड़े 19वीं सदी से अयोध्या में चल रहे आंदोलन को जीवित रखने के लिए डटे रहे थे और मंदिर निर्माण का श्रेय उन्हें ही मिलता लेकिन पिछली सदी में अपनी स्थापना के बाद से आरएसएस से संबद्ध विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) आंदोलन के केंद्र में आ गई और 2019 के बाद से कमान विहिप के नेतृत्व वाले ट्रस्ट पास चली गई और अखाड़ों ने खुद को अलग-थलग पाया. 

न्यूज़लॉन्ड्री ने अयोध्या स्थित लगभग 10 ऐसे महंतों, शिष्यों और पुजारियों से बात की जिन्होंने कहा कि उनके प्रति संघ परिवार के रवैये में बदलाव के पहले संकेत 2015 में पूर्व वीएचपी अध्यक्ष अशोक सिंघल की मृत्यु और 2017 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के तुरंत बाद दिखने शुरू हो गए थे. इसके बाद साल 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने उन्हें पूरी तरह दरकिनार करने का मार्ग रास्ता साफ कर दिया. 

पूर्व भाजपा सांसद राम विलास वेदांती, जिनके तेजतर्रार भाषणों और चांदी की तरह चमचमाती दाढ़ी ने उन्हें मंदिर आंदोलन के दौरान सबसे अधिक पहचाने जाने वाले चेहरों में से एक बना दिया था, विश्व हिंदू परिषद पर संतों को अपमानित करने का आरोप लगाते हैं.  

"किसी भी ऐसे व्यक्ति को ट्रस्ट में कोई जगह नहीं दी गई है जिसे जन्मभूमि आंदोलन में बलिदान देने के लिए जाना जाता है. उन्होंने नए चेहरों को अपना लिया है और केवल उन्हीं से सलाह ली जाती है, मंदिर से जुड़ी महत्वपूर्ण बैठकों में उन्हें बुलाया जाता है," वेदांती ने खिन्न स्वर में कहा. 

ऐसा लगता है कि वेदांती के समकालीन लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती और साधवी ऋतंभरा, जो राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी थे, अब उन्हें कोई महत्व नहीं दिया जा रहा है. "उन्होंने (वीएचपी ने) राम जन्मभूमि आंदोलन में शामिल हम सभी लोगों को धोखा दिया है." 

राम जन्मभूमि आंदोलन को आकार देने में विहिप की भूमिका प्रमुख रही है और अदालत में राम लला का प्रतिनिधित्व करने वाले वादियों में भी यह एक प्रमुख नाम  रहा है. 

वेदांती ट्रस्ट के अध्यक्ष बनना चाहते थे और 2003 से 2019 के बीच राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास और यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की उनके पदों पर नियुक्ति का विरोध करने के कारण विवादों में घिर गए थे.  

वेदांती ने कहा, "आंदोलन में भाग लेने के लिए जिन लोगों को कठिनाइयों और कारावास का सामना करना पड़ा, उनमें से मैं सबसे अधिक 25 बार जेल गया." "लेकिन वे ट्रस्ट में ऐसे लोग चाहते हैं जो उनकी हां में हां मिलाएं और चुप रहें."

मूक दर्शक

ट्रस्ट के 15 सदस्यों में से केवल दो रामानंदी अखाड़े से हैं- महंत नृत्य गोपाल दास और निर्मोही अखाड़े के प्रमुख महंत दिनेंद्र दास. हालांकि, आधिकारिक तौर पर नृत्य गोपाल दास अध्यक्ष के रूप में ट्रस्ट के प्रमुख हैं, लेकिन महासचिव चंपत राय का चेहरा हर जगह दिखता है. 

हिंदू पक्ष की ओर से राम मंदिर की कानूनी लड़ाई सफलतापूर्वक लड़ने वाले पूर्व अटॉर्नी जनरल के. परासरन, प्रधानमंत्री कार्यालय के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा, यूपी के मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश के. अवस्थी और अयोध्या के जिला मजिस्ट्रेट और वरिष्ठ नौकरशाह ज्ञानेश कुमार अन्य पदेन सदस्य हैं. संतों का प्रतिनिधित्व स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ, युगपुरुष परमानंद गिरि और स्वामी गोविंद देव गिरि करते हैं. अन्य सदस्यों में अयोध्या के पूर्व राजघराने के सदस्य विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्रा, वीएचपी के अनिल मिश्रा और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और 30 साल पहले अयोध्या में राम मंदिर की आधारशिला रखने वाले पहले दलित सदस्य कामेश्वर चौपाल हैं. 

उधर, संतों के एक वर्ग का आरोप है कि महंत नृत्य गोपाल दास और महंत दिनेंद्र दास मूकदर्शक हैं और समिति में उनका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों शारीरिक रूप से कमजोर हैं और अपना कर्तव्य सही ढंग से निभा पाने में असमर्थ हैं.

मणिराम छावनी मंदिर के प्रमुख 86 वर्षीय महंत नृत्य गोपाल दास का नाम पहली सूची से गायब था, लेकिन उनके शिष्यों के विरोध के बाद उन्हें समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. सूत्रों ने कहा कि वह ज्यादातर दिन अपने आश्रम में बिताते हैं और दिल्ली में ट्रस्ट की बैठकों में शामिल नहीं होते हैं. 

फ़ोन द्वारा उनसे संपर्क करने के प्रयासों को उनके सहायक कमलनयन दास ने विफल कर दिया, उन्होंने महंत जी के साथ साक्षात्कार के लिए समय देने से भी मना कर दिया. 

कमलनयन दास उन संतों में से हैं जिन्होंने पहलवानों के विरोध के बीच विवादास्पद भाजपा सांसद बृजभूषण सिंह को अपना समर्थन दिया था. वहीं, करीब तीन दशकों तक जन्मभूमि मालिकाना हक मामले में निर्मोही अखाड़े का प्रतिनिधित्व करने वाले महंत राम दास ने दावा किया कि वह ट्रस्ट का सदस्य बनना चाहते थे लेकिन महंत दिनेंद्र दास ने इस पद के लिए अपना नाम आगे कर दिया. 

"वह अब निर्मोही अखाड़े के एकमात्र प्रतिनिधि हैं लेकिन ट्रस्ट के कामकाज में उनका कोई दखल नहीं है," राम दास ने दावा किया. 

दिनेंद्र दास ने इस तरह के आरोपों का खंडन किया और कहा कि ट्रस्ट के साथ उनका कोई टकराव नहीं है. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "हम ट्रस्ट के कामकाज से सहमत हैं." 

हनुमानगढ़ी मंदिर के अध्यक्ष तेजपाल दास ने दावा किया कि ट्रस्ट के गठन के बाद रामानंदी अखाड़ों के महंतों और संतों को नए मंदिर के कार्यों से दूर रखने की संघ परिवार की कोशिशें स्पष्ट हो गईं.  

उदाहरण के लिए, अगस्त 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नए मंदिर के भूमि पूजन समारोह में रामानंदी अखाड़े के किसी महंत को आमंत्रित नहीं किया गया था. उन्होंने आरोप लगाया, "अगर हमें रामलला के दर्शन के लिए अस्थायी मंदिर में जाना है, तो हमें आम भक्तों की तरह ही बैरियर पार करने होते हैं, लेकिन संघ का कोई भी नवागंतुक बिना किसी अनुमति के अंदर जा सकता है."

तेजपाल दास ने कहा कि वह 22 जनवरी को उद्घाटन समारोह में शामिल नहीं होंगे क्योंकि ट्रस्ट ने उनके "गुरुजी" पुरुषोत्तम दास महाराज- जो निर्वाणी अखाड़े के सबसे पुराने संत और अभिराम दास के गुरु भाई हैं- को आमंत्रित नहीं किया है.

हालांकि, लगभग 800 साधुओं और महंतों वाले निर्वाणी अखाड़े ने आधिकारिक तौर पर समारोह का बहिष्कार नहीं किया है. 

इस बीच, ट्रस्ट के सदस्य और विहिप के मीडिया समन्वयक शरद शर्मा ने कहा कि ट्रस्ट ने समारोह के लिए देश भर से 4,500 से अधिक संतों, पुजारियों और धार्मिक नेताओं को आमंत्रित किया है. "हम हर किसी को सम्मिलित नहीं कर सकते. अन्य लोग समारोह को अपने घर से आराम से देख सकते हैं."  

पूजा का अधिकार और नई प्रतिमा

कई संतों ने कहा कि नए मंदिर में भगवान राम की प्रतिमा की पूजा करने का अधिकार मुख्य रूप से रामानंदी अखाड़ों का है. 

चार साल पहले, दिनेंद्र दास ने ट्रस्ट से मांग की थी कि नए मंदिर में पूजा का अधिकार निर्मोही अखाड़े को दिया जाए क्योंकि 1950 तक जन्मभूमि मंदिर, यानी राम चबूतरा पर उसका स्वामित्व था. 

लेकिन निर्वाणी अखाड़े के संत भी खुद को इसका असली दावेदार मानते हैं. अभिराम दास के शिष्य धरम दास ने याद करते हुए कहा, "हमने (निर्वाणी अखाड़े ने) दोनों बार मूर्ति स्थापित की, पहले 1949 में बाबा अभिराम दास द्वारा और बाद में 1992 में मस्जिद ध्वस्त होने के बाद."

मार्च 1992 में अदालत के एक आदेश द्वारा अभिराम दास के एक अन्य शिष्य सत्येन्द्र दास को अस्थायी मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था, जब विहिप के मंदिर आंदोलन के विरोधी रहे महंत लाल दास को पद से अप्रत्याशित रूप से हटा दिया गया था. 6 दिसंबर 1992 को सत्येन्द्र दास और उनके सहायकों ने मस्जिद के अंदर से राम लला और लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और शालिग्राम की मूर्तियों को सुरक्षित रूप से बाहर निकाल लिया था क्योंकि कारसेवक इन्हें तोड़ रहे थे. 

"हमने कुछ कुछ बांस और कपड़े के पर्दों की व्यवस्था करके एक पंडाल बनाया और उसी शाम पूजा शुरू कर दी," सत्येन्द्र दास ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया. 

इस कदम से सुप्रीम कोर्ट को विवश होकर केंद्र सरकार को विध्वंस स्थल की यथास्थिति बनाए रखने, मूर्तियों को न हटाने और पूजा पहले की तरह जारी रखने का आदेश देना पड़ा.  इससे विहिप के नेतृत्व वाले राम जन्मभूमि न्यास को मूर्तियों की पूजा जारी रखने और एक अस्थायी मंदिर में भक्तों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने की भी अनुमति मिल गई.

यह सब अंतिम फैसले में यह सिद्ध करने के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ कि हिंदू वादियों का संपत्ति पर निरंतर और निर्बाध कब्जा रहा है और वह मूर्ति की पूजा करते रहे हैं. 

लेकिन जिस मूर्ति को पहली बार दिसंबर 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर गुप्त रूप से स्थापित किया गया था और जिसके नाम पर वीएचपी ने 1989 से अदालती मुकदमा लड़ा था, अब उसे ही बदला जा रहा है. 

ट्रस्ट ने दर्शन के लिए एक नई मूर्ति चुनी है, जो ऊंची है और "दिखने में अधिक आकर्षक" है. हालांकि यह कदम संतों के एक वर्ग को पसंद नहीं आया, जिन्होंने कहा कि पिछली मूर्ति जिसकी लगातार पूजा की जाती रही है, उसे मंदिर का मुख्य देवता होना चाहिए। 

"मंदिर भगवान का स्थान है. यह मूर्तियां प्रदर्शित करने की जगह नहीं है. आप वर्तमान में विराजमान देवता को नहीं बदल सकते," तेजपाल दास ने कहा. 

तेजपाल दास ने कहा कि हिंदू आस्था में आमतौर पर देवताओं के प्रतिनिधि के रूप में उपयोग की जाने वाली सुपारी को भी एक बार पूजा करने के बाद किसी अन्य मूर्ति से नहीं बदला जा सकता है, भले ही वह सोने से बनी हो. 

हालांकि, ट्रस्ट के सदस्यों का कहना है कि दोनों मूर्तियों को गर्भगृह में रखा जाएगा.

पुजारी का उत्तराधिकार

मंदिर के भावी मुख्य पुजारी के उत्तराधिकार की प्रक्रिया ने भी अखाड़े के संतों को नाराज़ कर दिया है. 

संतों ने कहा कि रामानंदी परंपरा के तहत भगवान राम की पूजा कराने वाले पुजारियों को विरक्त, वैरागी- ब्रह्मचारी और पारिवारिक बंधनों से रहित- होना चाहिए और अयोध्या के अखाड़ों में कम से कम 12 साल का प्रशिक्षण होना चाहिए. यह संप्रदाय अपने मुख्य मंदिरों के पुजारियों को चुनने की बेहद गोपनीय प्रक्रिया अपनाता है जिसे बाहरी लोगों के सामने कभी उजागर नहीं किया जाता है. 

तेजपाल दास ने कहा कि यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पुजारी एक वैष्णव वैरागी हो, जो तुलसी कंठी (तुलसी के डंठल से बनी माला) पहने हुए हो और हनुमानगढ़ी मंदिर से जुड़ा हो जैसा कि पिछले सात दशकों से परंपरा रही है. "हम मंदिर पर ट्रस्ट के स्वामित्व को तब तक स्वीकार कर सकते हैं जब तक हमारी परंपरा के पुजारियों को मूर्ति की पूजा करने की पूर्ण स्वतंत्रता और अधिकार रहे."   

लेकिन ट्रस्ट ने नई मूर्ति के अभिषेक समारोह के लिए वैदिक विद्वान पंडित लक्ष्मीकांत मथुरानाथ दीक्षित को चुना है, जो विवाहित हैं और प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में रहते हैं. ट्रस्ट देश भर से नए पुजारियों की भी भर्ती कर रहा है जिन्हें रामानंदी अनुष्ठानों में प्रशिक्षित किया जाएगा. 

धर्म दास ने इस प्रक्रिया को “दिखावा” बताते हुए कहा कि भविष्य के प्रधान पुजारियों को सरकारी कर्मचारियों की तरह काम पर नहीं रखा जा सकता है. "पुजारियों को रामानंदी गुरु-शिष्य परंपरा से आना चाहिए जहां शिष्य समर्पण के द्वारा पूजा, सेवा और धार्मिक अनुष्ठान के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है, इसे छह महीने के प्रशिक्षण के माध्यम से नहीं सिखाया जा सकता है." 

दूसरी ओर, सत्येन्द्र दास ने कहा कि रामानंदी अखाड़े की रीति-रिवाजों के अनुसार, मौजूदा मुख्य पुजारी द्वारा नामित एक शिष्य को नया प्रमुख होना चाहिए, लेकिन यह परंपरा अब उनके साथ समाप्त हो जाएगी. हालांकि, उन्होंने कहा कि वह नए राम मंदिर के लिए अपनी पसंद पर जोर नहीं देंगे, क्योंकि "ट्रस्ट जैसा उचित समझेगा वैसा ही करेगा."

रामानंदी संप्रदाय के महंत और श्री राम सेवाविधि विधान समिति के सदस्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने कहा कि उत्तराधिकार की इस प्रथा का पालन केवल तभी किया जाता था जब मंदिर का प्रबंधन संतों द्वारा किया जाता था. "आज मंदिर का विकास ट्रस्ट के अधीन है और यह उसी के उपनियमों के आधार पर कार्य कर रहा है, इसी आधार पर भविष्य के पुजारियों की नियुक्ति की जाएगी. यह किसी मठ की तरह काम नहीं कर सकता."

रामानंदी संप्रदाय के एक स्वतंत्र अनुयायी शरण ने दावा किया कि ट्रस्ट असंतुष्ट संतों की शिकायतों से अवगत है, लेकिन उन्होंने रामानंदी परंपरा के उल्लंघन के दावों का खंडन कियाय "आपत्ति जातने वाले धार्मिक विद्वान नहीं हैं. विध्वंस के लिए हथियार, कुदाल और लाठियां उठाने वालों से हम यह राय नहीं ले सकते कि कौन सी पूजा विधि अपनाई जाए. जब देश भर के विद्वान पंडित और भक्त रामलला की सेवा के बारे में पूछेंगे, तो क्या हमें यह कहना चाहिए कि यह अखाड़ों के अनुसार किया जा रहा है?" 

उन्होंने कहा कि, हजारों देशवासियों की तरह अखाड़ों ने भी जन्मभूमि आंदोलन में लड़ाई लड़ी, लेकिन वे "राम लला के मालिक नहीं हैं, वह (लला) सभी के हैं." 

चंपत राय ने न्यूज़लॉन्ड्री के फोन कॉल का जवाब नहीं दिया. उन्होंने अमर उजाला को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि चूंकि यह राम मंदिर है, इसलिए पूजा के लिए रामानंद परंपरा का पालन किया जाएगा. 

अयोध्या में रामानंदी अखाड़े के वर्चस्व का अंत?

ऐतिहासिक रूप से, आक्रामक नागा संन्यासियों को बल प्रयोग द्वारा धार्मिक और वैचारिक लड़ाई लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था. 

रामानंदी संप्रदाय ने भी 18वीं शताब्दी की शुरुआत में अयोध्या में अपना वर्चस्व उनके प्रतिद्वंद्वी शैव परंपरा के दशनामी संप्रदाय को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने के साथ ही स्थापित किया था.

लेकिन अब, असहमतियों के बावजूद, बहुत से लोग ट्रस्ट के साथ संघर्ष करने को तैयार नहीं हैं- कुछ को प्रतिशोध का डर है और कुछ आश्रमों आदि के रूप में प्राप्त सरकारी सहायता के छिन जाने का खतरा महसूस करते हैं.

अयोध्या का बहुसंख्यक साधु समाज इस बात से खुश है कि आखिरकार लंबे समय से प्रतीक्षित राम मंदिर का निर्माण हो रहा है और वह 22 जनवरी को होने वाले प्रतिष्ठा समारोह से पहले कोई विरोध या विवाद पैदा नहीं करना चाहता है जिससे इस उत्सव पर असर पड़े.  

लेकिन धरम दास हार मानने वालों में से नहीं हैं. बाबरी विध्वंस मामले में एक आरोपी के रूप में नामित, धरम दास ने लंबी लड़ाई लड़ी है. हनुमानगढ़ी में अपने आवास पर, बाबरी मामले से संबंधित पुराने दस्तावेजों और अदालती याचिकाओं की फाइलों के बीच बैठकर वह कहते हैं, "रणनीति होना महत्वपूर्ण है."

ट्रस्ट के गठन के बाद से उन्होंने "राजनैतिक एजेंडा" चलाने और मंदिर के लिए लड़ने वालों को “उचित मान्यता नहीं देने” के लिए ट्रस्ट के खिलाफ गृह मंत्रालय को कानूनी नोटिस जारी किया है. उन्होंने ट्रस्ट के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई है.  

"हम नागाओं ने राम जन्मभूमि पर कब्ज़ा इसे अन्य पक्षों को सौंपने के लिए नहीं किया था.  क्या तब विहिप अयोध्या में थी? नहीं, इसका जन्म भी नहीं हुआ था। हम ही हैं जिन्होंने इसे खड़ा किया है," धरम दास ने कहा। 

मंदिर को वास्तविकता बनाने के लिए भाजपा और संघ को श्रेय देते हुए दास ने कहा कि अयोध्या के संत खुश हैं कि "वे वह कर रहे हैं जो हम इतने वर्षों में हासिल नहीं कर सके.

लेकिन अगर वे (ट्रस्ट) गलती करते हैं, तो हम उन्हें जवाबदेह ठहराएंगे...अतीत में हमने जमीन पर कब्ज़ा पाने के लिए मुसलमानों के साथ लड़ाई लड़ी थी. अब हमें यह देखना है कि यह हमारी परंपरा के अनुसार सुचारू रूप से कार्य करें."

यह रिपोर्ट अयोध्या 2.0 पर हमारे एनएल सेना प्रोजेक्ट का हिस्सा है. सेना प्रोजेक्ट में योगदान देने के लिए यहां क्लिक करें.

- इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

अनुवादक-  उत्कर्ष मिश्रा 

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