स्वच्छ गंगा निधि: कहां तक पहुंची बात

स्वच्छ गंगा निधि एक ट्रस्ट द्वारा संचालित होती है. नियमों के मुताबिक साल में दो बार ट्रस्ट की मीटिंग होनी चाहिए, लेकिन आठ सालों में सिर्फ चार मीटिंग हुईं.

WrittenBy:बसंत कुमार
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इस मीटिंग में स्वच्छ गंगा निधि से प्राप्त राशि के खर्च पर कोई चर्चा नहीं हुई. जबकि तब तक निधि में लगभग 54 करोड़ रुपए जमा हो चुके थे. 2015 की इस मीटिंग में देश के बाहर सीजीएफ की सहायक निधियों को खुलवाने की बात की गई, लेकिन करीब छह साल बाद भी ऐसा नहीं हो पाया.

जल शक्ति मंत्रालय के अधिकारी इस बारे में कहते हैं, ‘‘हमें दूसरे देशों में भी ट्रस्ट बनाना है. हम लगातार कोशिश कर रहे हैं. वहां के नियम अपने यहां के नियमों से अलग हैं. ट्रस्ट में सदस्य कौन होगा, इसको लेकर जद्दोजहद चल रही है. ब्रिटिश एम्बेसी के साथ पत्राचार भी हुआ, लेकिन हम अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं.’’

ट्रस्टियों की तीसरी मीटिंग 2019 में हुई. इसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मौजूद रहीं. इसके ‘मिनट्स ऑफ़ मीटिंग’ के मुताबिक इस निधि को आम लोगों से नहीं मिल रहे सहयोग पर निर्मला सीतारमण ने चिंता जाहिर की.

उनके हवाले से लिखा गया, ‘‘प्राप्त दान में से लगभग 94% कॉर्पोरेट्स से आया है. प्रधानमंत्री द्वारा किए गए दान को छोड़कर तो व्यक्तिगत दाताओं द्वारा दिया गया योगदान, कुल प्राप्त दान का केवल 2.08% है. इसमें हमें सुधार करना होगा. गंगा की सफाई की जिम्मेदारी केवल उन राज्यों की नहीं समझनी चाहिए जहां से यह होकर गुजरती है.’’

बता दें कि 2018-19 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12.88 करोड़ रुपए गंगा स्वच्छ निधि में दिए थे. प्रधानमंत्री के अलावा भाजपा नेता विपुल गोयल ने भी इस निधि में दान किया है. साल 2018 में पीआईबी ने प्रेस रिलीज जारी कर बताया कि हरियाणा के तत्कालीन मंत्री विपुल गोयल ने निधि में 1 करोड़ 51 लाख रूपए की मदद की है. जिस पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने गोयल के इस नेक कार्य की सराहना करते हुए उसे दूसरों के लिए अनुकरणीय बताया.

हालांकि गोयल पर अरावली रेंज जमीन कब्जाने का आरोप है. न्यूज़लॉन्ड्री ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि जब गोयल प्रदेश में मंत्री थे, तब अरावली के प्रतिबंधित क्षेत्र में फार्म हाउस बनवा रहे थे. जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तोड़ दिया गया.

इस मीटिंग में निर्मला सीतारमण ने सुझाव दिया कि दक्षिण भारत के राज्यों द्वारा इस निधि में योगदान जुटाने की संभावना है. इसके अलावा वित्त मंत्री ने एनआरआई और दूसरे लोगों से कैसे योगदान लिया जाए इसका सुझाव भी दिया.

इस मीटिंग में भी ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के देशों में रह रहे भारतीयों से मदद लेने के लिए चैरिटी खोलने पर चर्चा हुई. ऐसा करने से बाहर रहने वाले लोगों को दान देते समय टैक्स की बचत हो सकती है. हालांकि जैसा कि जल शक्ति मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि अभी तक इस संदर्भ में कुछ नहीं हुआ है.

इस बैठक में कुछ योजनाओं पर काम करने का फैसला भी हुआ. इसी में हर की पौड़ी कॉप्लेक्स के डेवलपमेंट पर काम करने का फैसला लिया गया. इसके लिए 34 करोड़ बजट तय हुआ था जिसे भारत सरकार की ही एक कंपनी ने सीएसआर के तौर पर दिया है.

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के कार्यकारी निदेशक (वित्त) भास्कर दासगुप्ता ने भी अपने जवाब में विदेश में रहने वाले भारतीयों से ज्यादा सहयोग न मिलने का कारण वहां टैक्स में छूट नहीं मिलने को बताया. उन्होंने कहा कि जिन देशों में भारतीय मूल के नागरिक बड़ी संख्या में है वहां विकल्प तलाशे जा रहे हैं. फण्ड में भारतीय नागरिकों के दान पर हमने उनके उत्तर का पहले उल्लेख किया जिसमें उन्होंने बताया कि 8,000 लोगों में अपना सहयोग दिया है.

गंगा को लेकर सरकार की गंभीरता

गंगा नदी की सफाई को लेकर सरकार थोड़े-थोड़े दिनों के अंतराल पर एक नई योजना लेकर आती रही है. मीडिया रिपोर्ट्स में कुछ दिन पहले ही पीएम मोदी की महत्वाकांक्षी योजना “अर्ध गंगा मॉडल” का जिक्र किया.

इसके इतर जब भी लोकसभा या राज्यसभा में गंगा की सफाई को लेकर सवाल किया गया तो सरकार का रटा रटाया जवाब होता है, नदी की सफाई सतत प्रक्रिया है. 2 दिसंबर को नमामि गंगे योजना को लेकर दिए गए एक जवाब में जल शक्ति राज्य मंत्री विशेश्वर टुडू ने बताया कि नमामि गंगे योजना के अंतर्गत अब तक 30,458 करोड़ की अनुमािनत लागत के साथ कुल 353 परियोजनाओं को स्वीकृत किया गया है, जिसमें से 178 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं.

एक तरफ जहां केंद्र सरकार लोकसभा में हर सवाल के जवाब में नमामि गंगे योजना पर खर्च राशि की जानकारी देती है, लेकिन उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट को नमामि गंगे के तहत खर्च किए गए बजट की जानकारी सरकार नहीं दे रही है. इस पर कोर्ट ने भी नाराजगी जाहिर की है और कई प्रोजेक्ट्स को आंखों में धूल झोंकने वाला करार दिया है.

केंद्र सरकार एक तरफ करोड़ों रुपए खर्च कर गंगा को साफ करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर 30 जनवरी 2021 को उत्तर प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को बताया कि गंगा नदी का पानी पीने लायक नहीं है. 2020 के दिसंबर में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि हरिद्वार की विश्व प्रसिद्ध हर की पौड़ी पर गंगाजल पीने के लायक नहीं है. आज भी गंगा में बिना किसी उपचार के 60 फीसदी सीवेज की निकासी जारी है.

गंगा नदी को लेकर भारत सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा परिषद की बीते छह सालों में केवल एक बैठक हुई है, जबकि नियमानुसार इसे हर साल में एक बार होना चाहिए था.

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