भड़ास4मीडिया भारत की हिंदी पत्रकारिता का प्रहरी कैसे बना

13 साल पहले, यशवंत सिंह ने अपने न्यूज़रूम से निराशा व्यक्त करने के लिए एक ब्लॉग शुरू किया था. आज भड़ास4मीडिया भारत के क्षेत्रीय पत्रकारों की चुटीली आवाज है.

WrittenBy:आयुष तिवारी
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विज्ञापन, डोनेशन और सहायता

भड़ास पर एक दिन में पांच से दस लेख प्रकाशित होते हैं. इनका लेखन अनिवार्य रूप से बेअदब और अक्सर उपहासपूर्ण होता है. उनमें पत्रकारों की सधी हुई भाषा नहीं होती. अक्सर पर्यावरण आदि पर कविताएं भी छपती हैं. किसी नेता के निजी जीवन पर अनैतिक टिप्पणियों से लेकर नौकरी के विज्ञापन तक होते हैं. भड़ास4मीडिया के यूट्यूब चैनल के लगभग 2 लाख सब्सक्राइबर्स हैं और चैनल वेबसाइट से भी अधिक विविधता लिए हुए है, जिसमें सिंह के गंगा में तैरने से लेकर अपने पसंदीदा पकौड़े पकाने तक के वीडियो हैं.

सिंह के मुताबिक यह सारा कामकाज कम खर्चे में चलता है. “किसी भी समय भड़ास के बैंक खाते में 30,000 रुपए से अधिक नहीं होते हैं. वेबसाइट के तकनीकी रखरखाव और बाकी पत्रकारिता के लिए 10,000 रुपए प्रति माह लगते हैं," उन्होंने बताया.

सिंह का दावा है कि वेबसाइट बड़े पैमाने पर क्राउडफंडिंग पर टिकी हुई है, लेकिन इसका ज्यादातर हिस्सा दो वरिष्ठ पत्रकारों से आता है. "मैं उनके नाम नहीं बता सकता. वह भड़ास के काम में विश्वास करते हैं. यहां तक ​​​​कि मेरा आईफोन और टच लैपटॉप भी उनकी ओर से उपहार में मिला है," सिंह बताते हैं.

एक दशक पहले वेबसाइट चलाने के लिए विज्ञापन से हुई आय पर्याप्त होती थी. दरअसल, भड़ास को इसके पहले साल में ही एक बंगाली एफएम स्टेशन रेडियो मिष्टी से 2,000 रुपए का विज्ञापन मिला था.

लेकिन सिंह वेबसाइट को मिले ऐसे समर्थन के बारे में भी स्पष्ट रूप से बताते हैं जो विवादास्पद हो सकता है. उदाहरण के लिए 2009 में अमर उजाला के एक संपादक ने सिंह को दिवंगत नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान से मिलवाया. पासवान तब यूपीए सरकार में इस्पात मंत्री थे. सिंह याद करते हैं, "उन संपादक ने पासवानजी से कहा कि मैं एक प्रसिद्ध पत्रकार हूं जो एक वेबसाइट चलाता हूं और मुझे पैसे की आवश्यकता है. बैठक के अंत तक पासवान जी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के विज्ञापनों के माध्यम से भड़ास को छह महीने में तीन लाख रुपए देने के लिए तैयार हो गए.”

थोड़ी पत्रकारिता, थोड़ी गपशप

यदि कोई पाठक भड़ास पर इस अपेक्षा से जाता है कि उसे पूरी तरह तथ्यात्मक और सत्यापित ख़बरें मिलेंगी तो वह निराश हो सकता है. कई मायनों में यह वेबसाइट अभी भी एक ब्लॉग के रूप में कार्य करती है. मीडिया संगठनों या पत्रकारों के बारे में छपी ख़बरों में अक्सर संतुलित होने का दिखावा भी नहीं किया जाता और वह एक ही स्रोत पर निर्भर लगती हैं.

लखनऊ-स्थित स्वतंत्र पत्रकार सौरभ शर्मा न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं कि भड़ास में केवल 'आधा सच' ही कहा जाता है. शर्मा कहते हैं, "भड़ास में छपी बहुत सारी ख़बरें बस मीडिया जगत की गपशप होती हैं. किस पत्रकार ने किससे शादी की या कौनसा चैनल किस एंकर पर जाल फेंक रहा है, आदि. ऐसा लगता है कि इसपर बहुत सारी ख़बरें बस यूं ही छाप दी जाती हैं. लेकिन इसकी बहुत सी ख़बरें प्रामाणिक भी होती हैं."

जुलाई 2020 में भड़ास ने एक रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि ईटीवी भारत का न्यूज़रूम लगभग 20 कोविड मामलों के कारण 'कोरोना हॉटस्पॉट' में बदल चुका है. कुछ दिनों बाद, ईटीवी भारत ने वेबसाइट को एक कानूनी नोटिस भेजा जिसमें उन्होंने इस रिपोर्ट को 'झूठा', 'आधारहीन' और 'असत्यापित और अप्रमाणित' कहा. हफ्ते भर बाद भड़ास ने ईटीवी को जवाब भेजा और कहा कि वह अपनी खबर पर कायम है और उसने 'प्रतिष्ठान में काम करने वाले लोगों के साथ' इस जानकारी को 'विधिवत' सत्यापित किया है.

ऐसी ख़बरों की गुणवत्ता के बारे में पूछने पर सिंह कहते हैं कि उन्होंने ख़बरों को क्रॉस-चेक करने की आदत पिछले कुछ वर्षों में ही विकसित की है. वह मजाकिया लहजे में कहते हैं, "मैं अब और अदालत नहीं जाना चाहता, इसलिए अब मैं लोगों की टिप्पणियां मांग लेता हूं. लेकिन मुझे पता है कि अगर मैं 100 कहानियां प्रकाशित करूं तो उनमें से 99 तथ्यात्मक होती हैं."

थानवी सुझाते हैं कि भड़ास में एक न्यूज़रूम सी गुणवत्ता क्यों नहीं आ सकती, वह कहते हैं, "ऐसा लगता है कि संसाधनों की कमी के कारण भड़ास का अपने कंटेंट पर नियंत्रण कम है. इसमें प्रतिष्ठित पत्रकारों और संपादकों की कोई संपादकीय टीम नहीं है. यह केवल यशवंत के प्रयासों से चलता है. इतने संकट के बावजूद यह बचा रहा यही इसकी सफलता है."

शर्मा का मानना ​​है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र में भड़ास को गंभीरता से लिया जाता है. उन्होंने कहा, "यह वेबसाइट उन पत्रकारों की आवाज बन गई है जिनके पास पहले अपनी बात रखने का कोई जरिया नहीं था. उदाहरण के लिए जब पत्रकारों को उनके प्रकाशन या चैनल समय पर भुगतान नहीं करते, तो भड़ास ही इसे रिपोर्ट करने का बीड़ा उठाता है, और परिणामस्वरूप पत्रकारों को उनका वेतन मिल जाता है."

थानवी के अनुसार इस वेबसाइट की सराहना होनी चाहिए कि इसने अधिकांश मुद्दों पर "सांप्रदायिक" नहीं बल्कि "प्रगतिशील" रुख अपनाया. लेकिन बड़ी बात यह है कि भड़ास ने हिंदी मीडिया उद्योग के चरित्र को बदले बिना उसमें मौजूद एक बड़ी कमी को दूर किया है. थानवी कहते हैं, "हिंदी मीडिया की ये समस्या है कि उस पर उसके मालिकों का बहुत मजबूत नियंत्रण है. उस स्तर पर भड़ास कुछ बदल पाने में असफल है. लेकिन इसने निचले स्तर के कर्मचारियों के मुद्दों को सार्वजनिक रूप से उठा कर उन पर गहरा प्रभाव डाला है. यह पत्रकारों का पक्ष लेता है, मालिकों का नहीं."

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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