बिहार में भू-सर्वेक्षण का विरोध: किसानों को डर है कि उनकी जमीन सरकार के पास चली जाएगी

किसानों का कहना है कि कोसी नदी की धाराएं तेजी से अपना रास्ता बदलती हैं और अभी वे धाराएं उनकी जमीन से होकर बह रही हैं. सर्वेक्षण में उनकी जमीन बिहार सरकार के खाते में चली जाएगी.

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बिहार में भू-सर्वेक्षण का विरोध: किसानों को डर है कि उनकी जमीन सरकार के पास चली जाएगी
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बिहार के जल संसाधन विभाग के बाढ़ प्रबंधन सुधार सहयोग केंद्र, पटना के डिप्टी डायरेक्टर ‘फ्लड एंड सेडिमेंट मैनेजमेंट इन कोसी रिवर’ में लिखते हैं, “यह नदी जिस रूट से गुजरती है, वहां 1456 मिलीमीटर बारिश होती है और इसके उद्गमस्थल में मिट्टी का क्षरण अधिक होता है, जिस वजह से यह नदी अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाती है.”

वह आगे लिखते हैं, “मैदानी इलाकों में गाद के चलते नदी के मार्ग में अवरोध आता है जिससे नदी को वैकल्पिक रास्ता लेना पड़ता है. इससे नदी की धाराएं इधर उधर शिफ्ट हो जाती हैं. इसके अलावा भूकंप, भूस्खलन और नियो-टेक्टोनिक गतिविधियों के चलते भी इसके मार्ग में तब्दीली आती है।”

जीएसआई इन फ्लड हैजार्ड मैपिंग: ए केस स्टडी ऑफ कोसी रिवर बेसिन, इंडिया शोधपत्र में बताया गया है कि पिछले 200 वर्षों में यह नदी अपने मूल मार्ग से 150 किलोमीटर दूर चली गई है. हालांकि पहले तटबंध नहीं थे, तो नदी उन्मुक्त बहती थी.

डॉ दिनेश मिश्र कहते हैं, “60-70 के दशक में नदी के दोनों तरफ तटबंध बनाकर नदी को 10 किलोमीटर के दायरे में कैद कर दिया गया. पहले नदी के साथ जो गाद आता था, वो विस्तृत इलाके में फैलता था, लेकिन अब 10 किलोमीटर के दायरे में ही सिमट जाती है, तो नदी और भी तेजी से मार्ग बदलने लगी है. कोसी तटबंधों के भीतर ही कोसी की बहुत-सी धाराएं बह रही हैं.”

यहां यह भी बता दें कि कोसी के दोनों तटबंधों के बीच लगभग 358302.803 एकड़ लाख जमीन है और दोनो तटबंधों के भीतर करीब दो लाख लोग रहते हैं.

किसानों का विरोध

कोसी तटबंध के भीतर रह रहीं रेशम देवी बताती हैं, “मेरे 2.75 एकड़ जमीन पर नदी बह रही है. सर्वेक्षण नियम के मुताबिक तो मेरी पूरी जमीन ही राज्य सरकार की हो जाएगी, फिर हम जिंदा कैसे रहेंगे. जमीन के नदी में डूब जाने के बावजूद मैं सरकार को जमीन का टैक्स चुका रही हूं क्योंकि आज नहीं तो कल जमीन बाहर आ जाएगी.”

“सरकार सर्वेक्षण नियम बदले और नदी की धारा वाली जमीन का मालिकाना हक किसानों को दे,” रेशम देवी कहती हैं.

रेशम देवी की 2.75 एकड़ जमीन पर नदी बह रही है। उनका कहना है कि सर्वेक्षण में उनकी पूरी जमीन ही राज्य सरकार की हो जाएगी, फिर वह जिंदा कैसे रहेंगी। वे कहती है कि जमीन के नदी में डूब जाने के बावजूद वह सरकार को जमीन का टैक्स चुका रही हैं, क्योंकि आज नहीं तो कल जमीन बाहर आ जाएगी.

रेशम देवी की 2.75 एकड़ जमीन पर नदी बह रही है। उनका कहना है कि सर्वेक्षण में उनकी पूरी जमीन ही राज्य सरकार की हो जाएगी, फिर वह जिंदा कैसे रहेंगी। वे कहती है कि जमीन के नदी में डूब जाने के बावजूद वह सरकार को जमीन का टैक्स चुका रही हैं, क्योंकि आज नहीं तो कल जमीन बाहर आ जाएगी.

Credits: उमेश कुमार राय

सुपौल के कोसी क्षेत्र में अमीन के तौर पर तीन दशक तक काम करने वाले स्थानीय निवासी संतराम यादव ने बताया, “कोसी तटबंधों के भीतर रहने वाले किसानों की जमीन का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा नदी में है. सर्वे में 70 प्रतिशत जमीन सरकार की हो जाएगी. यह किसानों के साथ सरासर अन्याय है. नदी के भीतर जो जमीन है, उसका मालिकाना हक किसानों को मिलना चाहिए.”

सुपौल के निर्मली गांव में 261.745 एकड़ जमीन है और 1500 परिवार रहते हैं. “इस गांव के किसान कहते हैं कि सरकारी नियम के अनुसार अगर सर्वेक्षण हुआ, तो मुश्किल से 14 एकड़ जमीन ही किसानों के पास बचेगी. अगर ऐसा हुआ तो भुखमरी की नौबत आ जाएगी क्योंकि ज्यादातर किसान भूमिहीन हो जाएंगे,” सत्यनारायण यादव ने बताया.

सर्वेक्षण नियमों के खिलाफ 25 अप्रैल को कोसी नवनिर्माण मंच की ओर से तटबंध के भीतर रह रहे किसानों को लेकर एक जनसुनवाई की गई, जिसमें दर्जनों किसान शामिल हुए. सभी ने एक स्वर में सर्वेक्षण नियमों का विरोध किया.

कोसी नवनिर्माण मंच, कोसी नदी के तटबंध के भीतर रह रहे किसानों के लिए काम करती है. मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते हैं, “कोसी तटबंध के भीतर के किसानों के साथ अब तक अन्याय ही होता आया है. आजादी के बाद कोसी के दोनों ओर तटबंध बना दिया गया, लेकिन किसानों को कोई मुआवजा नहीं मिला. वे किसी तरह तटबंधों के भीतर जी रहे हैं. तटबंध के भीतर न स्कूल है, न अस्पताल और न सड़क लेकिन किसान किसी तरह हर साल सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क व कृषि टैक्स चुकाते हैं. नये सर्वेक्षण से उनकी जमीन भी चली जाएगी.”

सत्यनारायण यादव के पूर्वजों के पास 27.55 एकड़ जमीन थी, लेकिन अभी उनके पास सिर्फ 11.02 एकड़ जमीन बची हुई है.

सत्यनारायण यादव के पूर्वजों के पास 27.55 एकड़ जमीन थी, लेकिन अभी उनके पास सिर्फ 11.02 एकड़ जमीन बची हुई है.

Credits: उमेश कुमार राय

“नदी की धारा वाले हिस्से को आज सरकार अपने खाते में डाल देगी, लेकिन कल को नदी धारा बदल लेगी, तो पुरानी धारा वाली जमीन का क्या होगा? क्या सरकार नए सिरे से सर्वेक्षण कराकर जमीन किसानों के हवाले करेगी? सरकार अगर नदी की वर्तमान धारा वाले हिस्से को अपने खाते में लेगी, तो उसे एक तकनीक विकसित करनी चाहिए ताकि बाद में वह जमीन निकल आए तो उसका मालिकाना हक किसानों को मिल जाए. अगर सरकार ऐसी कोई व्यवस्था नहीं करती है, तो सर्वेक्षण किसानों के लिए एक नई मुसीबत बन जाएगा,” महेंद्र यादव ने कहा.

वे कहते हैं, “जन सुनवाई में किसानों ने तय किया है कि वे सर्वेक्षण प्रक्रिया में असहयोग करेंगे.”

किसानों की आपत्तियों को देखते हुए सुपौल के अन्य हिस्सों में सर्वेक्षण तो हुआ है, लेकिन कोसी तटबंध के भीतर के हिस्से में सर्वेक्षण को फिलहाल टाल दिया गया है.

सुपौल के बंदोबस्त पदाधिकारी भारत भूषण प्रसाद ने कहा, “किसानों की मांग है कि नदी में जा चुकी सारी जमीन किसानों के नाम हो, लेकिन सर्वेक्षण नियमावली में यह नहीं है, तो हम लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं.”

“किसानों की आपत्तियों को लेकर हमने विभाग को लिखित आवेदन देकर आवश्यक दिशानिर्देश देने को कहा है. जल्द ही विभाग से दिशानिर्देश आ जाएगा, तो हम लोग इससे किसानों को अवगत करा देंगे,” भारत भूषण प्रसाद ने कहा.

(साभार- MONGABAY हिंदी)

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