झारखंड: वन अधिकार कानून के तहत आदिवासियों को दावों के मुताबिक नहीं मिल रही जमीन

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में 60 हजार व्यक्तिगत व दो हजार सामुदायिक पट्टों को वितरण हुआ है, जबकि 49 हजार दावा पत्र विभाग के पास लंबित हैं.

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झारखंड: वन अधिकार कानून के तहत आदिवासियों को दावों के मुताबिक नहीं मिल रही जमीन
मोहम्मद असग़र खान
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कटौती के पीछे की मंशा क्या है?

जमीन की कटौती दूसरे राज्यों में भी हो रही है. वन-अधिकार कानून से जुड़े स्वतंत्र शोधकर्ता तुषार दास कहते हैं, “कटौती की शिकायत कॉमन है. राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी यही हो रहा है. पट्टेदार को दावे से बहुत कम जमीन दी जाती है और ये काम गैर-कानूनी ढंग किया जा रहा है. इस तरह की कटौती को सुप्रीम कोर्ट ने भी गलत बताया. यही नहीं, 2019 में कोर्ट में आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने भी माना 19 लाख रिजेक्शन गलत थे. कटौती करने और रिजेक्शन को रिव्यू करने का अधिकार ग्रामसभा को है. ग्रामसभा के बिना सुनवाई के जिला या अनुमंडल स्तर पर अधिकारी अपनी मर्जी से रिजेक्शन नहीं कर सकते हैं.”

कटौती क्यों की जा रही हैं इस बारे तुषार दास दो प्रमुख वजह बताते हैं, “कटौती और रिजेक्शन दरअसल वन विभाग की आपत्ति के बाद हो रहा है. इनकी मानसिकता है कि जो सामुदायिक वन भूमि है, वो ग्रामसभा के पास नहीं जाना चाहिए. कैम्पा प्लांटेशन का जो बड़ा प्रोजेक्ट चला रहा है, उसके लिए फॉरेस्ट विभाग इसी जमीन को टारगेट करना चाहता है, जिसपर लोगों का अधिकार बनता है. दूसरा कारण कॉरपोरेट घरानों को जमीन देने के लिए सभी राज्यों में लैंड बैंक बनाए जा रहे हैं. झारखंड में तो बहुत सारी सामुदायिक वन भूमि कम्युनिटी फॉरेस्ट लैंड को पहले ही गलत ढंग से लैंड बैंक में शामिल किया जा चुका है.”

झारखंड में कितनी बड़ी आबादी है वनों पर आश्रित?

झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक (जेजेबीए) प्रो संजय बसु मल्लिक का मानना है कि अधिकांश पट्टाधारकों की जमीन में कटौती की गई है. इनके अनुसार जिन लोगों को वन पट्टा मिला है उसमें बहुत ज्यादा गलतियां की गई हैं. बसु के मुताबिक पिछली सरकार की जो नीयत थी उसी ढर्रे पर मौजूदा सरकार भी चल रही है. राज्य की एक करोड़ से अधिक आबादी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से वनों पर आश्रित हैं. लेकिन पट्टाधारक की संख्या महज नाम के लिए हैं.

2011 की जनगणना पर आधारित झारखंड वन अधिकार मंच और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) की संयुक्त सर्वे रिपोर्ट 2019 के मुताबिक राज्य में 32,112 गांव हैं. इनमें से 14,850 जंगल वाले गांव हैं और इसका क्षेत्रफल 73,96,873.1 हेक्टेयर है. परिवारों की संख्या 46,86,235 और और आबादी 2,53,64,129 है. इसमें एसटी और एससी क्रमशः 75,66,842 व 30,98,330 हैं. इन क्षेत्रों में सामुदायिक एवं निजी 18,82,429.02 हेक्टेयर वन भूमि पर दावों की संभाव्यता है.

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की वेबसाइट पर 24.02.2022 तक अपडेट आंकड़ों के मुताबिक झारखंड सरकार को एक लाख सात हजार व्यक्तिगत पट्टा दावा प्राप्त हुआ है. पर सरकार ने 60 हजार पट्टों का ही वितरण किया है. यानी 47 हजार मामले लंबित हैं. वहीं सामुदायिक पट्टे का दावा मात्र चार हजार ही प्राप्त हुआ है, जिनमें दो हजार ही सामुदायिक पट्टे का वितरण हुआ है. वहीं 1.53 लाख एकड़ निजी और 1.04 लाख एकड़ सामुदायिक वन भूमि पर पट्टा मिला है. हालांकि सरकार के पास ये आंकड़ा नहीं है कि कितनी जमीन पर दावा किया गया है.

बसु कहते हैं, “सामाजिक संगठनों के विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए सरकार ने पिछले साल दिसंबर में एक बैठक बुलाई. इसमें राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार के अपर मुख्य सचिव एल ख्यांग्ते ने वन व कल्याण विभाग के अधिकारियों को एफआरए को जस-का-तस लागू करने और लंबित वन पट्टे का निष्पादन कर अगले साल के मार्च तक पट्टा देने का निर्देश दिया. अब आप देखिए मार्च बीत गया और अप्रैल भी खत्म होने वाला है. लेकिन लंबित मामले जस के तस हैं.”

इस पूरे मसले पर झारखंड में संबंधित विभाग के मंत्री और सचिव से भी बात करने की कोशिश की गई. उनका जवाब आने पर खबर को अपडेट किया जाएगा.

(साभार- MONGABAY हिंदी)

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