आईएंडबी मंत्रालय की चिट्ठी, टेलीविज़न मीडिया का बेअंदाज रवैया और विदेशी खबरों की चोरी का जाल

भारतीय मीडिया में विदेशी खबरों का प्रसारण धड़ल्ले से, बिना किसी जवाबदेही के होता आ रहा है, इसमें सूचनाओं की चोरी का मसला आम है.

WrittenBy:अनिल चमड़िया
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भारतीय मीडिया में विदेश की खबरों के स्रोत

भारत में विदेश की खबरें समाचार एजेंसी से मीडिया कंपनियों को मिलती हैं. भारतीय कानूनों के अनुसार विदेश की खबरों के वितरण की जिम्मेदारी अंग्रेजी की भारतीय न्यूज़ एजेंसी यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) और हिंदी की यूनीवार्ता और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) एवं हिंदी में भाषा को दी गई है.

इन समाचार एजेंसियों के संवाददाता गिने चुने मसलन चीन, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों में तैनात है. ज्यादातर ये एजेंसियां अमेरिका की समाचार एजेंसी एपी , फ्रांस की एएफपी और ब्रिटेन की रॉयटर्स की खबरों को भारत में मीडिया कंपनियों को बेचती हैं. रॉयटर्स और रूस की समाचार एजेंसी तास की खबरें यूएनआई को दी जाती हैं जहां से भारत की मीडिया कंपनियों तक पहुंचती हैं.

यूएनआई के ग्राहक बेहद कम हैं और इन दिनों तो इसकी हालात जर्जर कर दी गई है. पीटीआई को अमेरिकी एजेंसी एपी अपनी सामग्री बेचती है और वह भारत की मीडिया कंपनियों को भेजती है. यहां मसला यह है कि विदेशी एजेंसियां सीधे भारतीय मीडिया कंपनियों को सामग्री सप्लाई नहीं कर सकती हैं. लेकिन इस कारोबार में लगे मीडिया संस्थानों ने कई तरह के अवैध रास्ते निकाल लिए हैं.

ताकतवर देशों की समाचार एजेंसियां दुनिया भर के कमजोर देशों में अपना प्रभावशाली दखल रखती हैं. भारत में पहले समाचार एजेंसियां लोकतंत्र और संविधान को ध्यान में रखकर विकसित की गई थीं. अब एजेंसियों का चरित्र बदल दिया गया है और कई निजी कंपनियां भी इस कारोबार में शामिल हो गई हैं.

अगर कहा जाए तो भारतीय मीडिया में विदेशी खबरों से जुड़ी जो सामग्री प्रसारित व प्रकाशित होती है उसका बहुत बड़ा हिस्सा फर्जीवाड़े से हासिल किया जाता है. भारतीय मीडिया में विदेश की खबरों का फर्जीवाड़ा ऐतहासिक है लेकिन सरकार ने कभी भी इस संबंध में कोई प्रभावकारी हस्तक्षेप नहीं किया है. यहां तक कि एक भी ऐसा अध्ययन नहीं है जिससे यह पता चले कि फर्जीवाड़ा किस स्तर का है और उसका देश के अंदरूनी राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक असर किस तरह का होता है.

हिंदी मीडिया में विदेशी खबरों का खेल

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध से संबंधित जिस तरह की सामग्री प्रसारित की है वे ज्यादातर हिंदी समाचार चैनलों के हैं. मंत्रालय ने केवल तीन दिनों तक प्रसारित कुछेक सामग्री का उदाहरण दिया है. ऐसा क्यों किया, यह जानना मुश्किल है. हमने मंत्रालय में कई अधिकारियों से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की लेकिन सभी अधिकारी एक दूसरे को बॉल पास करते रहे. दो महीने के बाद अचानक से यूक्रेन और रूस की सामग्री के पीछे क्या कहानी है और क्या इससे मीडिया कंपनियों में विदेशी खबरों से खेलने का खेल रुकेगा, यह भरोसे से कोई नहीं कह सकता.

दिल्ली के जहांगीरपुरी एवं देश के विभिन्न हिस्सों में रामनवमी के आसपास सांप्रदायिक तनाव का जिस तरह से विस्तार हुआ उसमें हिंदी समाचार चैनलों की बड़ी भूमिका देखी गई. भड़काऊ, मनगढंत, भ्रामक, झूठी, सनसनीखेज समाग्री के प्रसारण की बाढ़ दिखी. क्या सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली सामग्री पर लगाम लगाने के लिए रूस और यूक्रेन के उदाहरणों का इस्तेमाल भर किया गया है?

हिंदी मीडिया विदेशी खबरों का इस्तेमाल बिना किसी जवाबदेही और मनमाने तरीके से करता है. हिंदी मीडिया विदेशी खबरों की सबसे ज्यादा चोरी करता है. वह मुख्यत: देश यानी घरेलू स्तर पर असर डालने के लिए विदेश से जुड़ी सामग्री का इस्तेमाल करता है और किसी भी तरह की जवाबदेही से मुक्त महसूस करता है.

ऊपर संपादक समर सेन के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए इस्लामिक देशों और खासतौर से पड़ोसी देशों से जुड़ी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. पाकिस्तान और बांग्लादेश से जुड़ी सामग्री तो सांप्रदायिक नज़रिए से खासतौर से इस्तेमाल की जाती है. इसके ढेरों उदाहरण हैं.

इसका दूसरा इस्तेमाल राष्ट्रवाद की उत्तेजना पैदा करने के लिए किया जाता है. अश्लीलता को बेचने के लिए तो धड़ल्ले से विदेशों से जुड़ी तस्वीरों व सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है.

इस तरह एक पूरी सूची तैयार की जा सकती है कि हिंदी मीडिया घरेलू स्तर पर लोगों को तरह-तरह से प्रभावित करने के लिए किस तरह से विदेशों से जुड़ी सामग्री का इस्तेमाल करता है. नेपाल का उदाहरण हाल ही में देखने को मिला था जब हिंदी मीडिया के संवाददाताओं को वहां से लोगों ने खदेड़ दिया था. अभिनेत्री मनीषा कोइराला ने जब नेपाल के हित में एक बयान दे दिया था तो वह भारत विरोधी और चीन समर्थक करार दे दी गई थीं.

विदेशी सामग्री को लेकर हिंदी मीडिया कभी कठपुलती तो कभी मदारी की तरह का व्यवहार करते दिखती है.

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