पांच राज्यों में चुनाव: डिजिटल प्रचार से फायदा किसका

देश के पांच राज्यों में चुनाव हैं. कोविड महामारी के बीच चुनाव कराना एक चुनौती है. इसके लिए चुनाव आयोग ने पार्टियों से डिजिटल प्रचार करने का अनुरोध किया है. चुनाव में बड़े दलों के सामने छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार इस चुनौती में कैसे खड़े उतर पाएंगे जानिए इस रिपोर्ट में.

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पांच राज्यों में चुनाव: डिजिटल प्रचार से फायदा किसका
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जैसे- जैसे पांचों राज्यों के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे- वैसे राजनीतिक दलों और नेताओं का प्रचार तेज हो गया है. लेकिन इस बार का चुनाव एक अलग अंदाज में होने जा रहा है. दरअसल इस बार हमेशा की तरह बड़ी-बड़ी रैलियां नहीं देखने को मिलेंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव आयोग ने कोरोना के चलते पांचों राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में बड़े पैमाने पर सभाओं और राजनीतिक रैलियों पर रोक लगा दी है. यह रोक फिलहाल 22 जनवरी तक लगाई गई है. ऐसे में कई पार्टियों ने अपनी रणनीतियों में मौलिक बदलाव किए हैं. इसका मतलब इस बार चुनाव का सारा हल्ला-गुल्ला डिजिटल होगा. कुछ पार्टियां जैसे भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इस मौके का फायदा उठा रही हैं. रोजाना नए डिजिटल कैंपेन लॉन्च किए जा रहे हैं. वहीं छोटी पार्टियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

इस बार राजनीतिक पार्टियों के लिए सोशल मीडिया एक बड़ा चुनावी 'टूल' है. राजनीतिक दलों ने आम चुनावों के लिए बड़े पैमाने पर पहुंच बढ़ाने और अपने प्रमुख संदेश देने के लिए बिग डेटा एनालिटिक्स तकनीक का इस्तेमाल किया है. एक सर्वे के अनुसार, 2019 के चुनावों में 15 करोड़ मतदाता जो पहली बार चुनाव में मतदान डालने जा रहे थे उनमें से 30 प्रतिशत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से जुड़े और प्रभावित हुए.

देश में कैंब्रिज एनालिटिका की सहयोगी कंपनी स्ट्रेटेजिक कम्युनिकेशंस लेबोरेट्रीज़ (SCL) के भारत में निदेशक रहे अवनीश राय ने एक टीवी चैनल पर दिए इंटरव्यू में खुलासा किया था कि साल 2012 के यूपी विधानसभा चुनावों में भाजपा ने उनसे संपर्क किया था. उन्होंने बताया था कि भाजपा की डिमांड थी कि बूथ स्तर पर जाति और उम्र के हिसाब से मतदाताओं की जानकारी चाहिए.

आरोप यह भी था कि ग्लोबल साइंस रिसर्च ने अवैध तरीके से 5.62 लाख भारतीय फेसबुक यूजर्स का डेटा जमा किया और इसे कैंब्रिज एनालिटिका के साथ साझा किया. कैंब्रिज एनालिटिका ने इस डेटा का इस्तेमाल, भारत में हो रहे चुनाव को प्रभावित करने के लिए किया था. फर्म की वेबसाइट ने दावा किया था कि उसने 2010 में बिहार चुनावों पर काम किया और अपने "ग्राहक को एक शानदार जीत हासिल करने में मदद की". वह चुनाव जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन ने जीता था.

चुनाव केवल उम्मीदवारों के बीच नहीं होता. यह पार्टियों के बीच एक दूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा भी है. सोशल मीडिया की ताकत बहुत बड़ी है लेकिन बाज़ी बड़े राजनीतिक दल मार ले जाते हैं. डिजिटल चुनाव प्रचार के चलते इस प्रतिस्पर्धा में कितना बदलाव आया है? कौन आगे निकलेगा और कौन इसकी मार झेलेगा? यह जानने से पहले राजनीतिक दलों की सोशल मीडिया रणनीति को समझना पड़ेगा.

भाजपा

चुनाव लड़ रही सभी पार्टियों में देखा जाए तो सोशल मीडिया खेल में सबसे ताकतवर पार्टी भाजपा को माना जाता है. भाजपा की हर राज्य के हर जिले में सोशल मीडिया इकाई है जो काफी सक्रिय है. हर बूथ पर भी आईटी टीम का गठन किया गया है. सभी टीमों की नियमित बैठकें होती हैं. इंडिया टुडे मैगजीन के अनुसार कुल 1918 मंडलों की जिम्मेदारी के लिए 11000 पदाधिकारी नियुक्त किए गए हैं.

सूचना और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर को भाजपा ने सभी पांचों चुनावी राज्यों में पार्टी के सोशल मीडिया अभियान को तैयार करने का काम सौंपा है.

हर विधानसभा क्षेत्र के लिए दो टीमें- आईटी और सोशल मीडिया बनाई गई हैं. 15,000 से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप हैं. साथ ही कू एप, सिग्नल और टेलीग्राम पर भी सक्रियता को बढ़ाया गया है. सोशल मीडिया की रेस में आगे होने के कारण भाजपा के पास ढांचा तैयार था, बस उसका विस्तार बूथ स्तर तक किया गया है.

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के शेखूपुर विधानसभा के भाजपा के विधानसभा संयोजक कमलजीत बोरानी न्यूज़लॉन्ड्री से कहते है, "हमने 2014 में ही सोशल मीडिया की ताकत को समझ लिया था. उसी साल हमने अपने ट्विटर और फेसबुक का इस्तेमाल कर के 165 सीटों पर बढ़त बनाई थी. हम तब से ही सोशल मीडिया पर अपनी योजनाओं का प्रचार-प्रसार करते आ रहे हैं."

हर विधानसभा में, स्थानीय विधानसभा संचालन समिति का गठन हुआ है. समिति में एक कार्यकर्ता को सोशल मीडिया का दायित्व दिया गया है साथ ही एक कार्यकर्ता को आईटी (टेक्नोलॉजी) देखने के लिए नियुक्त किया गया है. ये लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में पार्टी द्वारा जारी गाइडलाइन्स के अनुसार सोशल मीडिया का काम संभाल रहे हैं. साथ ही समय-समय पर पार्टी की बैठक होती है जिसमें भविष्य के लिए सोशल मीडिया रणनीति बनाई जाती है.

कमलजीत बताते हैं, "उत्तर प्रदेश में करीब 389 गांव हैं. सभी गांवों को मिलाकर 400 से ज्यादा बूथ हैं. हर बूथ पर पार्टी ने अपने आईटी कार्यकर्ता बनाए हैं. हमारी बूथ-स्तर की टीमें ट्विटर पर इतनी एक्टिव नहीं हैं लेकिन उस पर काम हो रहा है. ट्रेनिंग दी जा रही है."

वह आगे कहते हैं, "पार्टी के पास पहले से ही आईटी टीमें हैं, सेट-अप भी है. इसलिए हमें सोशल मीडिया विस्तार में इतनी ज़्यादा मेहनत नहीं लगी. इसका फायदा अब हमें चुनाव में मिल रहा है. हमारे कार्यकर्ता ही अपनी वीडियो बनाकर ग्रुप पर या सोशल मीडिया पर डाल देते हैं. उसे सभी कार्यकर्ता शेयर करते हैं."

कांग्रेस

कांग्रेस ने खासकर यूपी चुनाव के लिए तैयारी डेढ़ साल पहले से शुरू कर दी थी. कांग्रेस के पास करीब 1500 लोगों की सोशल मीडिया टीम है. पार्टी रोज़ाना दो से तीन करोड़ लोगों तक अपनी प्रचार सामग्री, सोशल मीडिया के जरिए पहुंचाने की कोशिश कर रही है. इसके लिए मुख्यतः व्हाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक का सहारा लिया जा रहा है.

कांग्रेस सोशल मीडिया टीम के सदस्य अभय जवाहर बताते हैं, “कांग्रेस के पास 75 हज़ार से अधिक व्हाट्सएप ग्रुप हैं. हर वार्ड और ग्राम सभा कार्यकर्ता को अपना ग्रुप चलाने का भार सौंपा गया है. एक सेंट्रल टीम है जो हर राज्य में काम कर रही है. यह टीम कार्यकर्ताओं को सामग्री पहुंचाती है जो उसे आगे आम जनता के बीच फॉरवर्ड करते हैं.”

यूपी कांग्रेस ने एक साल पहले 'सोशल मीडिया वारियर्स' के नाम से टीम की शुरुआत की थी. अभय बताते हैं कि इसके लिए 12 हज़ार लोगों की सोशल मीडिया टीम के लिए इंटरव्यू किया गया था. इसके अलावा कांग्रेस के पास 3000 पदाधिकारी हैं. हर महीने विधानसभा क्षेत्र में सोशल मीडिया कार्यकताओं की वर्कशॉप कराई जाती है. कांग्रेस ने हाल ही में 'डिजिटल मैराथन' की शुरुआत की है. एक लिंक के ज़रिए, महिलाओं के लिए तैयार घोषणा पत्र सभी को भेजा जा रहा है. जो इसे सबसे अधिक फॉरवर्ड करेगा और जिसके रेफरल से सबसे अधिक लोग पार्टी से जुड़ेंगे, उनका लकी ड्रा से नाम निकाला जाएगा और सम्मानित किया जाएगा.

आम आदमी पार्टी

हर वार्ड में व्हाट्सएप ग्रुप बने हुए हैं. हर ग्रुप में 150 से 200 कार्यकर्ता और समर्थकों को जोड़ा गया है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी का पुराना और व्यवस्थित संगठन है. वही चुनाव से जुड़े डिजिटल प्रचार की गतिविधियों की निगरानी करता है. हर राज्य में भी अपनी सोशल मीडिया टीम होती है जिसकी मदद दिल्ली में मौजूद सेंट्रल टीम करती है. कार्यकर्ताओं को व्हाट्सएप ब्रॉडकास्ट लिस्ट बनाने के लिए कहा गया है. पेड प्रमोशन का भी सहारा लिया जाता है. टीम का फोकस केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली के लिए किए गए कार्यों का प्रचार करना है.

विजय फुलारा दिल्ली में, आम आदमी पार्टी का सोशल मीडिया का काम देखते हैं. उन्होंने बताया, "हमारा फोकस ट्विटर पर रहता है. एक सेंट्रल टीम रहती है जो हैशटैग चुनती है. उसे ट्रेंड कराया जाता है. अभी भी #AAPkaCM ट्रेंड कर रहा है. फेसबुक पर पहुँच कम हो गई है लेकिन हमारे सभी वॉलिंटियर अपने व्यक्तिगत अकाउंट्स से कमान संभाल रहे हैं. इसके अलावा कोविड नियमों के दायरे में रहकर हमारे वॉलिंटियर छोटी-छोटी मीटिंग भी कर रहे हैं."

सभी प्रेस कांफ्रेंस फेसबुक पर लाइव चलाई जाती हैं. राज्य की टीम अपना प्रचार सामग्री खुद बनाती है जिसमें सोशल मीडिया की केंद्रीय टीम मदद करती है. साथ ही केंद्रीय टीम भी सामग्री तैयार करके राज्य की टीमों को भेजती है, जो उसे आगे बढ़ाते हैं. दिल्ली में नियुक्त केंद्रीय टीम में राज्य प्रभारी और राज्य संगठन इंचार्ज होते हैं. व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब के प्रमुख होते हैं. प्रचार सामग्री लेखक और ग्राफिक डिजाइनर रहते हैं. हर टीम की वर्चुअल ट्रेनिंग होती है.

बहुजन समाज पार्टी (बसपा)

बसपा के कार्यकर्ताओं का मानना है कि भले ही सोशल मीडिया की जंग में वो देर से उतरे हैं लेकिन उन्होंने इसे अच्छे से संभाला है. बसपा की 'डिजिटल फोर्स' रात- दिन सोशल मीडिया गेम में अपने को बेहतर बनाने में लगी है. अलग-अलग जगहों पर स्क्रीन लगाई गई है. सभी कार्यकर्ताओं को अपनी तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की छूट है.

जो प्रत्याशी कोविड के कारण घर से नहीं निकलना चाहते वे ज़ूम कॉल का सहारा ले रहे हैं. पार्टी के एक कार्यकर्ता ने हमें बताया, "चुनौतियां थीं, लेकिन हम पिछले छह महीनों से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मजबूत बना रहे हैं. हमें छह महीने ही हुए हैं लेकिन हमारी पहुँच और इंगेजमेंट बहुत ज्यादा है. हम नियमित ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड करवा रहे हैं. उदाहरण के लिए पार्टी के प्रयासों से सतीश चंद्र मिश्रा के फेसबुक पर पहुंच 40 लाख तक बढ़ी है. बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा, फेसबुक लाइव के जरिए मतदाताओं को जोड़ रहे हैं. यह दर्शाता है कि हमने डिजिटल प्रचार की इस चुनौती को जीत लिया है."

सभी उम्मीदवार और कार्यकर्ता अपने खर्च पर डिजिटल प्रचार कर रहे हैं. सभी नेताओं के फेसबुक और ट्विटर कहते सत्यापित या वेरीफाई होने की प्रक्रिया में हैं.

अपना दल

अपना दल के कार्यकर्ता ज़ूम, फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. हर विधानसभा के लिए 12-15 व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए हैं जिनमे क्षेत्र के निवासियों को जोड़ा जाता है. क्योंकि इन पार्टियों के पास बड़ी टीमें नहीं हैं, पार्टी के पदाधिकारी ही प्रचार सामग्री कार्यकर्ताओं को भेजते हैं जो आगे आम जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं.

अपना दल के हर विधान सभा क्षेत्र में 400 से 500 कार्यकर्ता काम करते हैं. पार्टी के एक कार्यकर्ता ने हमें बताया, "पहले जनता के बीच जाकर हम अपनी बात रखते थे. छोटी पार्टियां ज़मीनी प्रचार ही करती आ रही हैं. अब हम वैसा नहीं कर पा रहे हैं. हमारी टीम के लिए तकनीक सीखना एक चुनौती थी. ग्रामीण लोगों को ट्विटर की जानकारी नहीं होती. हम उस पर इतने एक्टिव नहीं हैं."

अपना दल इतनी बड़ी पार्टी नहीं है इसलिए सोशल मीडिया के लिए अलग से फंड नहीं होता है. कार्यकर्ता आगे बताते हैं, "हमारे नेता संजीव सिंह चुनाव लड़ने जा रहे हैं. उनकी गाड़ियों का खर्चा होता है. डिजिटल प्रचार के चलते गाड़ियों की आवश्यकता इतनी नहीं है. इसलिए उनका जो पैसा पेट्रोल पर लगता था उसी से हम सोशल मीडिया चला रहे हैं. बड़ी पार्टियों के पास पेड वर्कर होते हैं. हमारे पास ऐसी कोई सुविधा नहीं होती."

समाजवादी पार्टी (एसपी)

समाजवादी पार्टी ने किसी भी तरह की सोशल मीडिया प्लानिंग नहीं की है. उनका मानना है कि उनके कार्यकर्ता जमीन पर लोगों से जुड़े हैं और डोर-टू-डोर कैंपेनिंग कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता ताहिर बताते हैं, “पार्टी की प्रेस कांफ्रेंस और बड़े नेताओं के भाषण ऑनलाइन चलाए जाते हैं जिसे हर कार्यकर्ता अपने व्यक्तिगत स्तर पर शेयर करता है. इसके अलावा पार्टी ने किसी विशेष टीम का गठन नहीं किया है.”

निर्दलीय उम्मीदवार

चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में केवल राजनीतिक दल के नेता ही शामिल नहीं होते. उनके साथ निर्दलीय उम्मीदवार भी चुनाव में दावेदारी पेश करते हैं. लेकिन पैसों और संसाधनों की कमी के कारण ये उम्मीदवार बड़ी पार्टियों की तुलना में अधिक खर्चा नहीं कर पाते. ज्यादातर निर्दलीय उम्मीदवारों का मानना है कि उनके पास कार्यकर्ताओं की बड़ी टीमें नहीं होती. उनका पूरा प्रचार डोर-टू- डोर कैंपेनिंग या रैलियों पर निर्भर करता है.

अखिलेश अवस्थी ने 2017 का विधान सभा चुनाव, उन्नाव सदर से लड़ा था. इस बार भी वह निर्दलीय उम्मीदवार की तरह चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं. अखिलेश अवस्थी कहते हैं, "चुनाव में सभी को जीत-हार से मतलब होता है. संघर्ष करने वाले लोग बहुत कम बचे हैं. डिजिटल प्रचार निर्दलीय उम्मीदवारों और छोटी पार्टियों के लिए संकट का विषय है. गांव में लोगों के पास नेट की सुविधा नहीं है या अभी भी वे इतने साक्षर नहीं हुए हैं कि मोबाइल पर सब कर लें. घर में बच्चों को तो मोबाइल चलाना आता है लेकिन घर में बड़े- बुज़ुर्गों को इसका ज्ञान नहीं है. वर्तमान में डिजिटल प्रचार सब तक पहुंचने का माध्यम नहीं है."

बता दें लोकसभा में सरकार ने बताया था कि दूरसंचार सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, अनुमानित 5.97 लाख गांवों में से 25,067 में सेलुलर या इंटरनेट सेवाएं नहीं थीं. ऐसे में डिजिटल प्रचार के इस युग में, ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं तक पहुंचना एक चुनौती हो सकती है.

डिजिटल प्रचार पर चुनाव आयोग के निर्देश

गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करते हुए, मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने सभी उम्मीदवारों को डिजिटल प्रचार करने के लिए प्रोत्साहित किया था. चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए चुनावों के संशोधित दिशानिर्देशों में, नुक्कड़ (सड़क के किनारे) सभाओं या सार्वजनिक सड़कों, चौराहे और कोनों पर होने वाली सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है.

आदर्श आचार संहिता, जो चुनावी उद्देश्यों के लिए कुछ प्रकार के भाषण और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगाती है, लागू रहेगी. उम्मीदवारों को मीडिया प्रमाणन और निगरानी समितियों से मंजूरी के लिए आवेदन करना होगा, जो आमतौर पर विज्ञापनों के लिए पूर्व-प्रमाणन देती हैं.

साथ ही चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा 28 लाख रुपए से बढ़ाकर 40 लाख रुपए कर दी है. प्रेस कांफ्रेंस में सुशील चंद्रा ने कहा कि इसका एक कारण महामारी के दौरान डिजिटल प्रचार पर बढ़ा हुआ खर्च है. आयोग ने राजनीतिक दलों को आदर्श आचार संहिता के प्रावधानों और कोविड के व्यापक दिशानिर्देशों का पालन करने का निर्देश दिया है. हालांकि राजनीतिक दल, 300 लोगों की सीमा के साथ किसी भवन के अंदर बैठक या हॉल की 50 फीसदी क्षमता के साथ बैठक कर सकते हैं. लेकिन राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों का पालन करना ज़रूरी है.

चुनाव आयोग ने इन चुनावों के दौरान दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को आवंटित प्रसारण समय को बढ़ाने का भी फैसला किया है.

चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में आगामी चुनावों में डिजिटल प्रचार पर खर्च किए गए धन की जानकारी प्रस्तुत करने के लिए उम्मीदवारों के चुनावी खर्च रिटर्न में एक नया कॉलम जोड़ा है. उम्मीदवार पिछले चुनावों में भी डिजिटल प्रचार पर खर्च किए गए पैसे का जिक्र करते थे लेकिन यह पहली बार है कि इस तरह के खर्च के विवरण को "कैप्चर" करने के लिए एक समर्पित कॉलम बनाया गया है.

डिजिटल चुनाव प्रचार पर क्या कहता है कानून?

हर साल बड़े राजनीतिक दल सोशल मीडिया और विज्ञापनों पर होने वाला अपना खर्च बढ़ाते जा रहे हैं. एक फैक्टचेकिंग कंपनी के अनुसार, 2019-20 के दौरान गैर-चुनाव प्रचार पर लगभग 15 करोड़ रुपए के खर्च के साथ कांग्रेस शीर्ष पर रही और इसमें से अकेले सोशल मीडिया पर चार करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए. इसी साल समाजवादी पार्टी ने गैर चुनावी प्रचार पर 55.43 लाख रुपए खर्च किए थे.

आपत्तिजनक सामग्री का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से उत्पन्न होता है. हालांकि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 (Representation of the People Act, 1951 ) में सोशल मीडिया को शामिल करने के लिए किसी भी संशोधन के अभाव में, आयोग ने इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) के परामर्श से आम चुनाव 2019 से पहले एक 'स्वैच्छिक आचार संहिता' जारी की थी. यह कोड यह सुनिश्चित करने के लिए था कि चुनाव आयोग, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चुनावी कानूनों के किसी भी उल्लंघन को निर्बाध रूप से सूचित कर सकता है और प्लेटफार्मों को यह सुनिश्चित करना था कि सभी सोशल मीडिया राजनीतिक विज्ञापन, मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमिटी (एमसीएमसी) द्वारा पूर्व-प्रमाणित थे.

इसके अलावा सोशल मीडिया पर फेक न्यूज/अपमानजनक सामग्री के प्रसार को प्रतिबंधित करने वाला कोई विशिष्ट कानून नहीं है. फर्जी खबरों/अपमानजनक अभियानों का प्रसार अक्सर पार्टियों के कार्यकर्ताओं या राजनेताओं से जुड़े व्यक्तियों द्वारा किया जाता है जो इससे लाभान्वित होते हैं.

साल 2019 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बढ़ते राजनीतिक विज्ञापनों के बीच, चुनाव आयोग ने चुनाव के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा खर्च पर करीबी नज़र रखने के निर्देश दिए थे.

18 अप्रैल को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य चुनाव अधिकारियों को भेजे गए एक संदेश में, चुनाव आयोग ने कहा कि गूगल, फेसबुक और ट्विटर से विज्ञापन पारदर्शिता रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए.

चुनावों की घोषणा से पहले ही, फरवरी में ही, फेसबुक ने भारत में 10 करोड़ रुपये से अधिक के 51,000 से अधिक राजनीतिक विज्ञापन चलाए थे और गूगल ने 3.6 करोड़ रुपये में 800 विज्ञापनों की घोषणा की थी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2019 से 24 अगस्त 2020 के बीच बीजेपी ने 18 महीनों में फेसबुक पर सबसे ज़्यादा विज्ञापन दिए थे. इसके लिए पार्टी ने 4.61 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए. वहीं कांग्रेस पार्टी ने 1.84 करोड़ रुपये खर्च किए. ये विज्ञापन सामाजिक मुद्दों, चुनाव और राजनीति श्रेणी से जुड़े थे.

ट्रैकर के अनुसार, प्रमुख दस सबसे अधिक विज्ञापन पर खर्च करने वालों में चार अन्य विज्ञापनदाता ऐसे थे जिनके तार बीजेपी से जुड़े थे.

इन चार और बीजेपी को मिलाकर विज्ञापन पर कुल 10.17 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो इस श्रेणी के शीर्ष दस के कुल विज्ञापन (15.81 करोड़ रुपये) का लगभग 64 प्रतिशत है. यह अवधि 2019 लोकसभा चुनावों की है. जिसमें भाजपा ने भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की. दस में आम आदमी पार्टी भी शामिल है. आप ने फेसबुक पर विज्ञापन के लिए 69 लाख रुपये खर्च किए थे.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

एडीआर के संस्थापक और आईआईएम (अहमदाबाद) में प्रॉफेसर रहे जगदीप चोकर मानते हैं कि कोविड दिशानिर्देशों का पालन करना और डिजिटल प्रचार दो अलग बाते हैं.

जगदीप कहते हैं, "चुनाव में सोशल डिस्टैन्सिंग का पालन करना और चुनाव में डिजिटल प्रचार करना दो अलग बाते हैं. मैं हमेशा से विशाल रैलियां और रोड शो के खिलाफ हूं. चुनाव का मतलब यह नहीं होता कि मेला लगाया जाए या उसका ढिंढोरा पीटा जाए. चुनाव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए जहां उम्मीदवार डोर-टू- डोर जाकर जनता से मिले. उसके लिए पार्टियों को 50 लोगों की क्या ज़रूरत है? डोर-टू- डोर प्रचार के दौरान भी उम्मीदवार के साथ एक झुंड निकलता है. ये सब वैसे भी गलत है. अगर डिजिटल प्रचार का हिस्सा अलग कर दें, तो इस चुनाव में रैलियों पर पाबंदी लगा दी गई जो एक अच्छा विचार है."

वह डिजिटल प्रचार के बारे में बताते हैं, "जहां तक डिजिटल प्रचार की बात रही, अगर आप इंटरनेट की रीच का डाटा देखें तो यह सुविधा देश में मुश्किल से 50 प्रतिशत लोगों को ही उपलब्ध है. कोविड लॉकडाउन के दौरान सामने आया कि गांव और शहरों में अब भी लोगों के पास टेक्निकल साधन नहीं हैं. डिजिटल प्रचार केवल जनता को भटकाने के तरीके हैं. मेरा मानना है कि डिजिटल प्रचार मतदाताओं को जागरूक करने में कोई भूमिका नहीं निभा रहा."

कोविड के दिशानिर्देशों को पालन करने और सड़कों पर भीड़ जमा न हो इसके लिए डिजिटल प्रचार एक अच्छी पहल है लेकिन लोकतंत्र में लोगों को वोट डालने के लिए एक जागरूक निर्णय लेना पड़ता है.

कोविड के दिशानिर्देशों को पालन करने और सड़कों पर भीड़ जमा न हो इसके लिए डिजिटल प्रचार एक अच्छी पहल है लेकिन लोकतंत्र में लोगों को वोट डालने के लिए एक जागरूक निर्णय लेना पड़ता है. अक्टूबर 2013 में के एन गोविंदाचार्य की तरफ से विराग गुप्ता के प्रतिवेदन पर चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया की गाइडलाइंस बनाई थी.

वकील विराग गुप्ता कहते हैं, " उम्मीदवारों और पार्टियों का घोषणापत्र और चुनावी प्रचार के मुद्दे मतदाताओं तक पहुंचना जरूरी है. डिजिटल चुनाव प्रचार छोटी पार्टियां के कानूनी अधिकारों पर चोट है. डिजिटल चुनाव के लिए भारी भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए वह उन पार्टियों के पास नहीं है और वह रातों- रात नहीं बन सकता है. इस लिहाज से यह एक 'लेवल प्लेइंग फील्ड' यानि बराबरी का मुकाबला नहीं है. जो बड़े महारथी हैं, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, ज्यादा पैसा खर्च करते हैं, वे छोटी पार्टियों को धाराशायी कर देते हैं."

वह आगे कहते हैं, "चुनाव के दौरान कितनी गाड़ियों का इस्तेमाल हुआ, टीवी- अखबारों में कितने विज्ञापन दिए, किस प्रिंटर से कितने प्रिंटआउट निकाले,चाय, समोसे आदि परंपरागत खर्चों का ब्योरा उम्मीदवारों को देना होता था. लेकिन पिछले 10 सालों में बड़ी पार्टियों ने, सोशल मीडिया और आईटी का सामानान्तर तंत्र बना लिया है. चुनाव आयोग ने आईटी सेल का रजिस्ट्रेशन का कोई सिस्टम नहीं बनाया. चुनाव आयोग ने डिजिटल प्रचार में हो रहे खरबों रूपए के काले धन के खर्च की मॉनिटरिंग का सिस्टम भी नहीं बनाया है."

विराग गुप्ता सुझाव देते हैं कि टीवी और प्रिंट माध्यम की तरह डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी भारत के कानून के दायरे में लाना चाहिए. इसकी शुरुआत अक्टूबर 2013 में हुई थी. लेकिन उन नियमों को तिलांजलि देकर बड़ी टेक कंपनियों को स्वैच्छिक कोड बनाने की इजाजत दे दी गई जो अनैतिक और गैर कानूनी होने के साथ, भेदभावपूर्ण भी है.

चुनाव प्रचार डिजिटल हो जाने से एक तरफ बड़ी पार्टियों को खास फर्क नहीं पड़ा है. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके पास पहले से ही व्यवस्थित सोशल मीडिया और आईटी टीमें हैं. साथ ही समय-समय पर उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग भी दी है, उनके पास ढांचा और आईटी सेल चलाने के लिए जगह भी है. लेकिन छोटी पार्टियों के लिए यह रास्ता थोड़ा कठिन है. जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए ऑनलाइन प्रचार चुनौतीपूर्ण है.

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