गोलीबारी, भीड़ का आक्रोश और एक अराजक कानून: 4 दिसंबर को नागालैंड में क्या हुआ

नागालैंड में सेना द्वारा 14 नागरिकों की हत्या के बाद पूरे पूर्वोत्तर भारत में जनता का गुस्सा अफस्पा (AFSPA) पर फूट रहा है.

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गोलीबारी, भीड़ का आक्रोश और एक अराजक कानून: 4 दिसंबर को नागालैंड में क्या हुआ
Kartik Kakar
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वर्तमान में, भारत सरकार और अधिकांश नागा उग्रवादी समूहों के बीच संघर्ष विराम है. नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड का इसाक स्वू और थुइंगलेंग मुइवा द्वारा स्थापित गुट, जिसे एनएससीएन (आईएम) के नाम से जाना जाता है, नागा विद्रोहियों का सबसे बड़ा समूह है. इस गुट और भारत सरकार के बीच 1997 से युद्धविराम है.

इसका प्रतिद्वंद्वी गुट है एनएससीएन (के), जिसका नाम इसके संस्थापक एसएस खापलांग के नाम पर रखा गया है. साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में सरकार और एनएससीएन (आईएम) के बीच एक रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने से कुछ समय पहले, एनएससीएन (के) ने भारत सरकार के साथ अपना अलग युद्धविराम निरस्त कर दिया था. इसके बाद एनएससीएन (के) ने मणिपुर में भारतीय सैनिकों पर घात लगाकर हमला किया जिसमें 18 सैनिक मारे गए थे.

उस हमले के लिए निकी सुमी नाम के आतंकवादी कमांडर को जिम्मेदार ठहराया गया था और उसके ऊपर 10 लाख रुपए का इनाम रखा गया. 2017 में खापलांग के निधन के बाद सुमी ने अपना अलग गुट बना लिया.

तीन महीने पहले सितंबर 2021 में गृह मंत्रालय ने घोषणा की कि 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उग्रवाद-मुक्त और समृद्ध उत्तर-पूर्व के दृष्टिकोण को पूरा करने और शांति प्रक्रिया को महत्वपूर्ण प्रोत्साहन देने के लिए, गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में, भारत सरकार ने नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (के)-निकी समूह के साथ संघर्ष विराम का निर्णय लिया'.

2015 के हमले के बाद म्यांमार की सीमा के पार आतंकवादी शिविरों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' की गई थी जिसे 21 पैरा रेजिमेंट ने अंजाम दिया था.

इस गलत तरीके से निर्देशित हमले का निशाना था एनएससीएन (के) का युंग आंग गुट. माना जाता है कि इस गुट का नेता युंग आंग नागालैंड की सीमा से सटे म्यांमार में रहता है.

4 दिसंबर को हुई नागरिक हत्याओं के बाद इस गुट और एनएससीएन (आईएम), जो सरकार के साथ बातचीत कर रहा है, दोनों ने सेना की कार्रवाई के खिलाफ कड़े बयान जारी किए हैं.

पूर्वोत्तर भारत के हर छोटे-बड़े छात्रसंघों ने भी नागरिक हत्याओं और अफस्पा के विरोध में बयान जारी किए हैं. इसी तरह नागा जनजातियों के सभी प्रमुख प्रतिनिधि संगठनों ने हत्याओं की निंदा की है और अफस्पा को निरस्त करने या नागालैंड से हटाने की मांग की है. महिला समूहों की भी यही मांग है. यहां तक कि राजनेताओं में भी अफस्पा के खिलाफ आवाज उठ रही है. मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा ने ट्वीट किया कि 'अफस्पा को निरस्त किया जाना चाहिए'.

इन हत्याओं ने पुरानी बुरी यादें ताजा कर दी हैं. पूरे क्षेत्र का नागरिक समाज, जो हमेशा इस अराजक कानून से नफरत करता था, अब इसे समाप्त होते देखना चाहता है.

इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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