मुस्लिम-विरोध और हिंसा: वीएचपी की 10 पत्रिकाओं का लेखाजोखा

विश्व हिंदू परिषद 10 पत्रिकाएं प्रकाशित करता है. जानिए इन पत्रिकाओं में क्या लिखा होता है, इनका विज्ञापन मॉडल क्या है और कैसे तथ्यों का फेरबदल किया जाता है.

मुस्लिम-विरोध और हिंसा: वीएचपी की 10 पत्रिकाओं का लेखाजोखा
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क्या है इन पत्रिकाओं का विज्ञापन मॉडल?

हर पत्रिका को विज्ञापन की जरूरत होती है ताकि वे चल सकें. हालांकि वीएचपी कम विज्ञापन लेता है लेकिन इन पत्रिकाओं का विज्ञापन रेट काफी हाई है.

हिंदू विश्व की एक लंबी विज्ञापन लिस्ट है जो 10 हजार से 50 हजार रुपए है.

समरसता सेतु के हर अंक को चलाने के लिए श्री संतराम मंदिर, नडियाद (गुरात) से नियमित पूरे-पन्ने का विज्ञापन मिलता है.

वीएचपी की मराठी पत्रिका हिंदुबोध की भी अपनी विज्ञापन लिस्ट है. इसका एक पूरे पन्ने का रंगीन विज्ञापन डेढ़ लाख में बिकता है.

तोड़-मरोड़कर पेश किये जाते हैं तथ्य

इन पत्रिकाओं में लिखे लेखों का कोई फैक्ट-चेक नहीं किया जाता. हमने पाया कि इतिहास को तोड़-मरोड़कर, उसे मुसलमान-विरोधी दिशा देने की कोशिश की जाती है. ऐसा ही एक लेख, 'तालिबानियों को आदर्श बनाता जिहादी सोच' मोपला विद्रोह पर आधारित है जिसे खुद संपादक विजय शंकर तिवारी ने लिखा है. इस लेख में कहा गया है कि इतिहासकार स्टीफेन फ्रेडरिक डेल ने मोपला को 'जिहाद' बताया है. जबकि हमने पाया स्टीफेन फ्रेडरिक डेल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 1921 मालाबार विद्रोह कतई जिहाद या धर्म के लिए लड़ी लड़ाई नहीं था. वहीं इससे संबंधित 1921 में द हिंदू में एक पत्र छपा था. इसे 1921 के मालाबार विद्रोह के मुख्य किरदार वरिअमकुनाथ कुन्हमेद हाजी ने लिखा था.

उन्होंने पत्र में कहा था, "इस तरह के धर्मांतरण सरकारी पार्टी और रिजर्व पुलिस के लोगों द्वारा खुद को विद्रोहियों के साथ मिलाते हुए किए गए थे. इसके अलावा, कुछ हिंदू भाइयों ने सेना की सहायता करते हुए, निर्दोष लोगों (मोपला) को सेना को सौंप दिया था. इसके बाद ऐसे कुछ हिंदुओं को सेना ने परेशान किया."

इसके अगले लेख में सीएए आंदोलन को तालिबानी सोच बताया गया.

एक लेख, 'भारत में अल्पसंख्यकवाद एक विवेचन' में मुस्लिम महिलाओं की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है. इसमें बार- बार कहा गया कि मुसलमान समुदाय अल्पसंख्यक नहीं हो सकता क्योंकि संविधान में 'अल्पसंख्यक' शब्द परिभाषित नहीं है.

बता दें कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम (1992) के ज़रिए भारत में मई 1993 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एसीएम) की स्थापना की गई. लेकिन इस कानून में 'धार्मिक अल्पसंख्यक' शब्द की परिभाषा नहीं बताई गई थी बल्कि इस अधिनियम के उद्देश्य के लिए कुछ समुदायों को "अल्पसंख्यक" के रूप में अधिसूचित करने का अधिकार कांग्रेस की केंद्र सरकार को दिया गया. अक्टूबर 1993 में पांच धार्मिक समुदायों- मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी को राष्ट्रीय धार्मिक अल्पसंख्यकों के रूप में अधिसूचित किया. 2014 में किये संशोधन में जैनियों की भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों के रूप में पहचान मिली.

हिंदू विश्व पत्रिका के सितंबर अंक का शीर्षक था, 'तालिबान बर्बरता से भागे सिख सांसद, इसीलिए सीएए जरूरी है.' इस अंक में मुस्लिम- विरोधी कई लेख छापे गए. मुसलामानों के लिए 'गुंडा' शब्द तक का प्रयोग किया गया.

ये 10 पत्रिकाएं केवल पन्नों पर लिखे लेख नहीं हैं. ये पत्रिकाएं वीएचपी जैसे उग्र हिंदूवादी संगठनों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाला वो हथियार है जिसके जरिए मुस्लिम- विरोधी सोच का प्रचार- प्रसार खुलेआम किया जाता है.

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