पाञ्चजन्य की स्टोरी में इंफोसिस को लेकर ऐसा क्या लिखा, जिस पर हो रहा है बवाल

इस अंक के छपने के बाद से सोशल मीडिया और अन्य जगहों पर लोग आरएसएस को घेर रहे हैं.

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कम बोली लगाकर क्यों सरकारी ठेके लेती है इंफोसिस

रिपोर्ट में लेखक ने इंफोसिस पर बिना किसी सबूत के गंभीर आरोप लगाए हैं. जैसे कि कोई कंपनी इतनी कम बोली लगाकर महत्वपूर्ण सरकारी ठेके क्यों ले रही है? कंपनी ने आयकर पोर्टल और जीएसटी पोर्टल बनाकर लोगों का विश्वास सरकार के कामकाज से कम किया है. कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई देशविरोधी शक्ति इंफोसिस के जरिए भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुंचाने में जुटी है?

रिपोर्ट में आगे इंफोसिस पर देशविरोधी फंडिग का आरोप लगाया गया है. कहा गया है कि कंपनी पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर देश के खिलाफ काम करने वाले लोगों के समर्थन की बात सामने आ चुकी है. लेखक आगे इसमें ऑल्ट न्यूज, द वायर और अन्य मीडिया संस्थानों की फंडिग के तौर पर कंपनी को देशविरोधी कदमों से जोड़ते हैं.

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आयकर रिटर्न पोर्टल में गड़बड़ियों पर विपक्षी नेताओं द्वारा कुछ नहीं बोलने पर लेखक सवाल पूछते हुए लिखते हैं, कहीं कांग्रेस के इशारे पर कुछ निजी कंपनियां अव्यवस्था पैदा करने की फिराक में तो नहीं हैं? साथ ही कहा गया है कि कंपनी के मालिकों में से एक नंदन नीलेकणी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं. वहीं संस्था पर एनआर नारायण मूर्ति के सरकार के प्रति विचार किसी से छिपे नहीं हैं. कंपनी ने अपने बड़े पदों पर एक विचारधारा से जुड़े लोगों को बैठा रखा है. मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़ी कोई कंपनी यदि भारत सरकार के महत्वपूर्ण ठेके लेती है तो कहीं उसमें चीन और आईएसआई के प्रभाव की कोई भूमिका तो नहीं?

लेखक ने कंपनी के दो लोगों का जिक्र किया है लेकिन कंपनी के ही एक अन्य डायरेक्टर मोहनदास पई जो बीजेपी समर्थक हैं, उनके राजनीतिक गठजोड़ के बारे में नहीं बताया गया है.

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रिपोर्ट के आखिर में डाटा चोरी का शक जताया गया है. बताया गया है कि अमेरिकी उद्योगपति जार्ज सोरोस और गूगल ने मिलकर एक फंड बनाया था जिसके बाद आधार कार्ड बनाने से जुड़ी एक कंपनी को खरीदकर बंद कर दिया गया, जिसपर आरोप था कि आधार डाटा चोरी के लिए कंपनी खरीदी गई थी. जीएसटी से जुड़े डाटा के लीक होने का आरोप भी लगता रहा है, तो इसमें कोई आश्यर्च नहीं होना चाहिए कि इंफोसिस आयकरदाताओं की सूचनाओं के साथ ऐसा करे.

इंफोसिस पर रिपोर्ट लिखने वाले लेखक चंद्र प्रकाश के ट्विटर बायो के मुताबिक वह कई मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं. वह टीवी टुडे, एनडीटीवी, जी न्यूज और कई अन्य मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.

चंद्र प्रकाश के टाइमलाइन पर इंफोसिस की खबर को भी शेयर किया गया है. उन्होंने खबर के वायरल होने के बाद 5 सिंतबर की शाम को एक ट्वीट किया, “सोचिए अगर “अंबानी अडानी” ने इनकम टैक्स की वेबसाइट बनाई होती तो क्या होता?”

क्या पाञ्चजन्य नहीं हैं संघ का मुखपत्र

पाञ्चजन्य की इस रिपोर्ट के बाद मचे विवाद के बीच आरएसएस ने पाञ्चजन्य से कन्नी काट ली. पत्रिका की वेबसाइट के मुताबिक उनके पहले एडिटर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे. बता दें कि यह पत्रिका समय-समय पर सरकार और आरएसएस के पक्ष में खबरें करती हैं.

यह पहली बार नहीं है जब आरएसएस ने पाञ्चजन्य से किनारा कर लिया हो. पाञ्चजन्य ने साल 2015 में दादरी में गोमांस खाने के नाम पर इखलाक की हत्या का समर्थन करने वाला लेख प्रकाशित किया था. जिस पर विवाद बढ़ने के बाद संघ के तत्कालीन प्रवक्ता मनमोहन वैघ ने पाञ्चजन्य को आरएसएस का मुखपत्र मानने से इंकार कर दिया था.

बीजेपी और आरएसएस के प्रिय मुद्दों में से एक लव-जिहाद पर पत्रिका ने एक अंक पिछले साल सिंतबर में प्रकाशित किया था. न्यूज़लॉन्ड्री ने अपनी पड़ताल में पाया कि लव जिहाद को लेकर की गई कवर स्टोरी में पत्रिका ने झूठ, गलत सूचनाओं और कपोल कल्पनाओं से भरी हुई कहानी बताई थी.

साल 2021 के अप्रैल में पत्रिका ने तीन कृषि कानूनों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान को गलत साबित करने के उद्देश्य से भी एक अंक प्रकाशित किया था. जिसमें कृषि कानूनों से किसानों को हुए फायदों के बारे में बताया गया था. लेकिन जब न्यूज़लॉन्ड्री ने इस खबर की पड़ताल की तो पाया कि पत्रिका ने अलग-अलग वेबसाइट और मीडिया संस्थानों से कॉपी पेस्ट कर यह स्टोरी की थी.

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