फिल्म लॉन्ड्री: किस्सा ख्वानी बाज़ार में गूंजेंगे दिलीप कुमार और राज कपूर के किस्से

उम्मीद की जानी चाहिए कि खैबर पख्तूनखवा का पुरातत्व और संग्रहालय विभाग जल्दी से जल्दी जर्जर मकानों के मरम्मत और संरक्षण पर ध्यान देगा और उन्हें संग्रहालय बनाने की प्रक्रिया शुरू करेगा.

फिल्म लॉन्ड्री: किस्सा ख्वानी बाज़ार में गूंजेंगे दिलीप कुमार और राज कपूर के किस्से
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आजादी के बाद और आजादी के पहले के अनेक स्टूडियो मालिकों के मृत्यु के पश्चात उनके वारिसों की बेख्याली से सारे स्टूडियो बिक गए. उनके नाम और ठिकाने अब केवल पुरानी पत्र-पत्रिकाओं और कुछ पुस्तकों में मिलते हैं. उल्लेखनीय है कि 1913 से 2021 तक में सक्रिय भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सभी केंद्रों के पुराने स्टूडियो नहीं बचे हैं. मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, लाहौर (विभाजन पूर्व के स्टूडियो) में कार्यरत स्टूडियो का दस्तावेजीकरण भी नहीं हुआ है. वर्तमान भाजपा सरकार को फिल्म इंडस्ट्री से एलर्जी सी है.

2014 की पहले की सरकारों और संस्थानों ने भी उनके संरक्षण और रखरखाव या दस्तावेजीकरण की दिशा में कोई ठोस कार्य नहीं किया था. हर साल देश के विभिन्न शहरों में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल होते हैं, जिनमें करोड़ों रुपए खर्च होते हैं. फिल्मों के हेरिटेज को संभालने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता है. राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय और फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ही थोड़ा-बहुत ठोस उपाय और कोशिश कर रहे हैं. देशभर में फिल्मी दस्तावेजों के दर्जनों निजी संग्राहक हैं जिनकी रूचि पुरानी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के संरक्षण और रखरखाव से ज्यादा उनकी खरीद-बिक्री और मुनाफे पर रहती है. कायदे से भारत सरकार या देश में सक्रिय फिल्मों से संबंधित शोध और अध्ययन संस्थानों को आगे बढ़ कर उन्हें एक साथ खरीद लेना चाहिए. केंद्रीय पुस्तकालय भी यह काम कर सकते हैं. केंद्र और राज्य सरकारें इस मद में विशेष अनुदान की व्यवस्था कर सकती हैं.

सीएसडीएस के अध्येता और इतिहासकार रविकांत इसे पाकिस्तान सरकार की अच्छी पहल मानते हैं. उनके अनुसार, “ऐसी चेतना स्वागत योग्य है कि पूर्वजों की धरोहर को बचा कर रखा जाए. आप देखें कि भौगोलिक-राजनीतिक विभाजन के बावजूद दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संबंधों की निरंतरता बनी रही. सिनेमा से बना संबंध प्रवहमान रहा. हां बीच-बीच में कुछ व्यवधान जरूर आए. मुझे तो लगता है कि भारत में भी ऐसी कोशिश होनी चाहिए. मुंबई में मंटो समेत अनेक फिल्मी हस्तियों के ठिकाने पता किए जा सकते हैं. और कुछ नहीं तो उन्हें ‘मार्क’ किया जा सकता है. दिलीप कुमार और राज कपूर हमारे इसी सांस्कृतिक संबंध के एक सेतु हैं.”

देश के विभाजन के बाद अनेक प्रतिभाओं ने मजहब की वजह से भारत के मुंबई से लाहौर और लाहौर से मुंबई प्रयाण किया. उन्होंने अपने ठिकाने बदले. दिलीप कुमार और राज कपूर समेत ऐसे सैकड़ों फिल्मी हस्तियों की सूची तैयार की जा सकती है. भारत और पाकिस्तान जाने के पहले मुंबई और लाहौर में उनके ठिकाने रहे होंगे. सभी के पुश्तैनी मकानों और रिहाइश की खोज करना उनका अधिग्रहण करना मुश्किल काम है, लेकिन मुंबई और लाहौर की नगरपालिकाएं इतना तो कर ही सकती हैं कि उनके ठिकानों पर एक शिलापट्टिका (प्लेक) लगवा दें कि अमुक हस्ती यहां इस साल से इस साल तक रही थी. अपने पूर्वजों की स्मृति को सुरक्षित रखना हमारा सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व है. इससे इतिहास जागृत होकर नयी पीढ़ी में संचारित होता है. इंग्लैंड और यूरोप की गलियों में घूमते हुए वहां के रिहायशी इलाकों के मकानों में ऐसी शिलापट्टिकाएं देखी जा सकती हैं. भारत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. उत्तर प्रदेश और बिहार में तो स्मृतियों को धुंधला कर दिया गया है. उनके स्मृति में लगाई गई शीलापट्टिकाएं हटाकर स्थानीय लोगों ने उन स्थानों पर कब्जा कर लिया है. स्थानीय प्रशासन इसके प्रति पूरी तरह से लापरवाह रहता है.

फिलहाल यही उम्मीद की जानी चाहिए कि खैबर पख्तूनखवा का पुरातत्व और संग्रहालय विभाग जल्दी से जल्दी जर्जर मकानों के मरम्मत और संरक्षण पर ध्यान देगा और उन्हें संग्रहालय बनाने की प्रक्रिया शुरू करेगा. यह एक प्रकार से ऐतिहासिक कार्य होगा. फिल्म प्रेमियों और दोनों देशों के सांस्कृतिक परंपराओं के अध्येताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा. पर्यटकों भी यहां पहुंचेंगे. हो सकता है उसके बाद और भारत-पाकिस्तान में स्मृतियों की सुरक्षा और संरक्षण के प्रयास तेज हों.

और अंत में

कुछ समय पहले लाहौर के पत्रकार शिराज हुसैन ने अपने ट्विटर हैंडल पर हसनैन जमाल की सुनाई इरफ़ान शहूद की नज़्म शेयर की थी....

दिलीप कुमार की आखिरी ख्वाहिश...

ले चलो दोस्तों

ले चलो क़िस्सा-ख़्वानी के बाज़ार में

उस मोहल्ले ख़ुदा-दाद की इक शिकस्ता गली के मुक़फ़्फ़ल मकां में

कि मुद्दत से वीरां कुएं की ज़मीं चाटती प्यास को देख कर अपनी तिश्ना-लबी भूल जाऊं

ग़ुटरग़ूं की आवाज़ दड़बों से आती हुई सुन के

कोठे पे जाऊं कबूतर उड़ाऊं

किसी बाग़ से ख़ुश्क मेवों की सौग़ात ले कर सदाएं लगाऊं

ज़बानों के रोग़न को ज़ैतून के ज़ाइक़े से मिलाऊं

जमी सर्दियों में गली के उसी तख़्त पर नर्म किरनों से चेहरे पे सुर्ख़ी सजाऊं

कि यारों की उन टोलियों में नई दास्तानें सुनाऊं

उन्हीं पान-दानों से लाली चुराऊं

मुझे उन पुरानी सी राहों में फिर ले चलो दोस्तो

हां मुझे ले चलो उस बसंती दुलारी मधु की गली में

कि ख़्वाबों की वो रौशनी आज भी मेरी आंखों में आबाद है

मेरे कानों में उस के तरन्नुम की घंटी

सहीफ़ों की सूरत उतारी गई है

सभी को बुलाओ कि नग़्मा-सराई का ये मरहला आख़िरी है

बुलाओ मिरे राज को

आख़िरी शब है

फिर से हसीनों के झुरमुट में बस आख़िरी घूंट पी के

फ़ना घाटियों में

मैं यूं फैल जाऊं कि वापस न आऊं

सुनो दोस्तों

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