अजीत सिंह: कंप्यूटर मैन के किसान नेता बनने की जटिल कहानी

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह की मौत.

अजीत सिंह: कंप्यूटर मैन के किसान नेता बनने की जटिल कहानी
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मैंने एक बार अजीत सिंह के एक कार्यकर्ता से पूछा कि आपने अब तक कितनी बार दल बदल दिया है तो उस समर्थक का जवाब था कि उसने कभी दलबदल नहीं किया. वह तो हमेशा से अजीत सिंह के साथ रहा है. दलबदल तो अजीत सिंह करते रहे हैं.

अजीत सिंह की कोशिश चरण सिंह के नाम के दिये को जलाए रखने की भी थी. उन्होंने चौधरी चरण सिंह के लोदी रोड स्थित स्थित सरकारी आवास को स्मारक में तब्दील करने के लिए समर्थकों को एकजुट करने की कोशिश लेकिन उन्हें ले-देकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित हवाई अड्डे का नाम चौधरी चरण सिंह करवाने में कामयाबी मिली.

किसानों के लिए एक बड़ी कामयाबी उन्होंने तब हासिल की जब उन्होंने चीनी मिलों के खुलने के नियमों में परिवर्तन किया और पश्चिम उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों की संख्या तेजी से बढ़ गई. वे सड़कों पर भी उतरने की कोशिश करते रहे लेकिन उन्हें मुश्किलें महसूस होती थी. 2014 के चुनाव में हार के बाद गाजीपुर बॉर्डर पर उन्हें आंदोलन करने के दौरान मूर्छा आ गई थी. पुलिस की ज्यादतियों का उन्हें पहली बार सामना करना पड़ा था.

चौधरी अजीत सिंह पूरे दौरान राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी और राजनीतिक संपत्ति के वारिस बनने के बीच फंसे रहे. भारतीय राजनीति की यह एक त्रासदी है कि उस नस्ल ने अजीत सिंह को न तो कंप्यूटर मैन का कद हासिल होने दिया और ना ही भारत के किसानों का नेता बनने दिया.

देश के किसान नेता, पूर्व प्रधानमंत्री का एकलौता बेटा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के दावेदार से पश्चिम उत्तर प्रदेश, वहां से एक सीट और वहां से शून्य तक सिमटता चला गया.

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