गोरखपुर के गांवों में फैली महामारी, घरों में ही मर रहे बड़ी संख्या में लोग

बासूडीहा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ताला लगा हुआ है. गांव के लोगों ने बताया कि यहां न तो डॉक्टर आते हैं न ही कोई दवा मिलती है. यहां कई लोगों की मौत हाल के दिनों में हुई है.

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ठंडे बस्ते में पड़ी सरकारी योजना

उषा सिंह के पास आयुष्मान भारत कार्ड है लेकिन उन्होंने आज तक इस्तेमाल नहीं किया है. इस योजना में शामिल सभी अस्पताल उनके गांव से बहुत दूर हैं. "कोई भी तकलीफ होती है तो गांव के सभी लोग प्राइवेट क्लिनिक जाकर दवा लेते हैं. हर बार के 500 रुपए लग जाते हैं. फिर दवाई का खर्चा अलग से. गरीब आदमी कहां से इतना लेकर आएगा. यहां बगल में स्वास्थ्य केंद्र है मगर उसका होना न होना बराबर है," उषा कहती हैं. गांव के लोगों की शिकायत है कि बासूडीहा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं आते जिसके कारण उन्हें गांव से चार किलोमीटर दूर प्राइवेट क्लिनिक पर जाना पड़ता है.

उषा के पडोसी राजीव के पास भी आयुष्मान भारत पीएम-जय कार्ड है. उनकी पत्नी का भी था जिनकी कोरोना के चलते मृत्यु हो गई. राजीव कहते हैं, "इस कार्ड का इस्तेमाल तब करेंगे जब गांव में एम्बुलेंस होगी, डॉक्टर होगा. ये कार्ड हमारी पत्नी के लिए उपयोगी नहीं साबित हुआ तो हमें भी इसकी ज़रूरत नहीं है."

आयुष्मान भारत कार्ड के साथ उषा सिंह

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत 2018 में की गई थी. इस योजना के तहत आर्थिक और सामाजिक रूप से तंग व्यक्ति इस योजना में नामित अस्पतालों में पांच लाख रूपए तक का इलाज मुफ़्त करा सकता है. लेकिन ऐसे अस्पतालों से गांव की दूरी के चलते ग्रामीण उत्तर प्रदेश में रहने वाले इस योजना का कोई लाभ नहीं उठा पा रहे.

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