"मनरेगा न होता तो हम अब भी दाने-दाने को मोहताज होते"

सूखे की मार झेलने वाले खेत अब लहलहा रहे हैं.

"मनरेगा न होता तो हम अब भी दाने-दाने को मोहताज होते"
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ग्रामीण लखन अहिरवार के चार एकड़ खेत को अब खेत के पास बनी एक तलैया के बदौलत पानी मिल रहा है. उनके खेत में एक कुआं है जो उन्होंने मनरेगा लागू होने से पहले 2005 में खुदवाया था. उनकी पूरे खेत की सिंचाई इसी कुएं पर टिकी है. 2007 के बाद जब गांव में तलैयों का निर्माण हुआ तो एक तलैया उनके खेत के पास भी बनी, जिससे अक्सर सूख जाने वाले उनके कुएं को पर्याप्त पानी मिलने लगा. मनरेगा से गांव में बनी तलैया थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बनाई गई हैं. एक तलैया भरने पर पानी दूसरी तलैया में चला जाता है. इस तरह बरसात का एक बूंद पानी भी बहकर गांव से बाहर नहीं निकल पाता. जिले में मनरेगा के जल संरचनाओं के निर्माण का कार्य 2005-06 में शुरू हुआ और इस वर्ष कुल 10 संरचनाएं बनीं. तब से लेकर 2020-21 तक 20,864 जल से संबंधित संरचनाएं बनाई गईं. इन कार्यों पर कुल 524.5 करोड़ रुपए व्यय हुए. इन निर्माण कार्यों से 2.57 करोड़ से अधिक मानव दिवस सृजित किए गए.

नादिया गांव में मनरेगा से जल संरक्षण के कार्य 2007-08 में शुरू हो गए थे. शुरुआती वर्ष में कुल 10 काम हुए. इस साल कुल छह नए तालाब बनाए गए और एक पुराने तालाब का जीर्णोद्धार किया गया. 2008-09 में दो तालाब और 6 कुओं का निर्माण हुआ. गांव में मनरेगा से जल संरक्षण व संचयन के कार्य शुरू होने के बाद से अब तक कुल 77 कार्य हुए हैं. अधिकांश काम तालाबों के निर्माण से संबंधित रहे. यही वजह है कि आज गांव में तालाबों का एक जाल-सा बिछ गया है. इन तालाबों ने ही गांव को जल संसाधन से समृद्ध बना दिया है. 2014-15 और 2017-18 को छोड़कर एक भी वर्ष ऐसा नहीं बीता जिसमें मनरेगा से तालाब ने बनवाया गया हो.

गांव में पानी की उपलब्धता के कारण ग्रामीण सोनू यादव जैसे ग्रामीण खेती में प्रयोग करने में सक्षम हो पाए हैं. गांव में पिछले दो साल से वह एक एकड़ के खेत में सहजन की खेती कर रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने सब्जियां भी उगाई हैं. सहजन से उन्हें हर छह माह के अंतराल पर नियमित आय हासिल हो रही है. जून 2019 में सहजन लगाने के छह महीने बाद उन्होंने करीब 3 क्विंटल सहजन 6 हजार रुपए में बेचा. अगले छह महीने बाद 1.5 क्विंटल सहजन बेचा. इस बार भाव ठीक मिलने के कारण उन्हें 10 हजार रुपए हासिल हुए. अगले छह माह बाद फिर उन्होंने करीब 3 क्विंटल सहजन 20 हजार रुपए में बेचा. इस समय सहजन की चौथी खेप तैयार होने वाली है. सोनू को उम्मीद है कि इस बार करीब 3 क्विंटल सहजन आसानी से निकल जाएगा. सोनू अपने खेतों की सिंचाई पास में बने एक तालाब से करते हैं जो मनरेगा के तहत ही बनवाया गया है. उनका कहना है कि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद उनकी आय तीन से चार गुणा तक बढ़ गई है. रूप सिंह बताते हैं कि मनरेगा से बने तालाब आमतौर पर कुछ सालों पर बेकार हो जाते हैं लेकिन गांव का कोई भी तालाब अब तक बेकार नहीं पड़ा है.

नादिया गांव में चेकडैम के निर्माण का भी महत्वपूर्ण काम हुआ है. गांव के कुल 7 चेकडैम में से 5 मनरेगा से बनाए हैं. गांव के दोनों तरफ से होकर गुजरने वाले बरसाती नाले में बने चेकडैम से भी ग्रामीणों को पानी उपलब्ध हुआ है. यह नाला आगे जाकर बारगी नदी में मिल जाता है. जब चेकडैम नहीं बने थे, जब सारा पानी बहकर नदी में पहुंच जाता था, लेकिन अब चेकडैम के माध्यम से रोककर सिंचाई में उपयोग किया जा रहा है. साथ ही भूजल स्तर बढ़ाने में भी यह मददगार साबित हो रहे हैं.

(डाउन टू अर्थ से साभार)

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