25-26 जनवरी की दरम्यानी रात, गाजीपुर बॉर्डर का आंखो देखा हाल

गाजीपुर बॉर्डर पर रात भर ट्रैक्टरों का आना जारी था. युवा तेज संगीत पर लगातार नाच रहे थे.

25-26 जनवरी की दरम्यानी रात, गाजीपुर बॉर्डर का आंखो देखा हाल
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जिसे जहां जगह मिली सो गया

आधी रात के बाद भी युवा तो सोते हुए नहीं दिखे लेकिन कुछ बुजुर्गों को जहां जगह मिली वहीं सो गए. गाजीपुर बॉर्डर पर जो भी किसान आंदोलन के समर्थन में पहुंचता है उसके रहने की व्यवस्था हो जाती है. लेकिन 25 जनवरी की रात किसानों की तादात इतनी ज्यादा थी कि सभी टेंट फुल थे. इसलिए कुछ किसानों को जहां तहां सोना पड़ा. ऐसे ही कुछ किसान ट्रॉली के नीचे या फिर खुले आसमान में कुछ कपड़े बिछाकर लेटे हुए मिले. जबकि कुछ खुले में ही आग जलाकर तापते हुए रात गुजारते नज़र आए.

सुलख्खन सिंह, सतनाम सिंह और जगदीश सिंह

सुलख्खन सिंह, सतनाम सिंह और जगदीश सिंह

लखीमपुर खीरी से आए तीन किसानों को भी सोने के लिए टेंट नहीं मिल पायी थी. वे एक ट्राली के नीचे ही कपड़े बिछाकर लेट गए थे. इनका नाम जगदीश सिंह, सतनाम सिंह और सुलख्खन सिंह था. जगदीश सिंह कहते हैं, "हम यहां सोने नहीं आए हैं हम यहां जो जंग चल रही है उसे जीतने आए हैं. कल पता चल जाएगा मोदी सरकार को भी, कल ऐतिहासिक परेड निकलने जा रही है. जिसे देश ही नहीं दुनिया देखेगी."

सुलख्खन सिंह कहते हैं, "यहां लोग आस पास से ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लोग यहां किसानों के समर्थन में पहुंच रहे हैं. जिन लोगों के पास पैसा नहीं है वह चंदा इक्ट्ठा करके यहां पहुंचे हैं. सबको अपना घर पसंद होता है. इतनी सर्दी में आदमी को खटिया रजाई चाहिए. लेकन मोदी ने हमें परेशान कर रखा है. हम सड़क पर लेटे हैं. मोदी से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है बस ये तीनों कृषि कानून वापस हो जाएं तो हम अपने घर चले जाएंगे."

इन्हीं के साथी सतनाम सिंह कहते हैं, "हमने चुनाव में मोदी को ही वोट दिया था. लेकिन अब कभी जिंदगी में भी हम मोदी को वोट नहीं देंगे. हम तो बजुर्ग हो रहे हैं. 60 के आसपास पहुंच गए हैं. अपने बच्चों से भी कह जाएंगे कि कभी मोदी को वोट नहीं देना. हम कह जाएंगे कि अगर तुम्हारा बापू या भाई भी कभी बीजेपी के समर्थन से खड़ा हो जाए तो कभी उसे भी वोट मत देना. इतने बुरे दिन हमने कभी नहीं देखे. इस सरकार ने हमें सड़क पर ला दिया है.ठ

26 जनवरी की रात क्या हुआ

26 जनवरी को दिन में किसानों ने तिरंगे वाली जगह से अलग लाल किले पर अपना झंडा फहरा दिया था. इसके बाद किसान रात 12 बजे तक भी वहीं रहे. हालांकि तब तक भीड़ काफी हल्की हो गई थी. रात के 12 बजे तक किसान लाल किले पर ट्रैक्टरों से स्टंट करते हुए नज़र आए. ट्रैक्टरों की रोशनी में लाल किले पर भी इन युवाओं का डांस जारी था. दिल्ली पुलिस लाल किले की प्राचीर पर जो कुछ हो रहा था उसे निहार रही थी.

देर रात तक यहां ठहरने वाले किसानों का कहना था कि वो सिंघु और टिकरी बॉर्डर से यहां पहुंचे थे. कुछ किसान ऐसे भी थे जो सीधे हरियाणा, पंजाब या उत्तर प्रदेश के किसी गांव से आए थे. इनकी संख्या बहुत कम थी.

अफवाहों का दौर

इस दौरान जब हम लाल किले पर थे तब एक 13 साल का लड़का बिल्ला हमारे पास आया. वह कहता है, "आप अपने फोन से मेरी बात करा दीजिए मुझे अपने पापा से बात करनी है. वह सिंघु बॉर्डर पर हैं."

यहां किसके साथ आए हो इस सवाव के जवाब में वह कहता है, "अपने चाचा और बहुत सारे भाइयों के साथ यहां आया हूं सबके फोन स्विच ऑफ हो गए हैं. प्लीज बात करा दीजिए."

हमने बिल्ला के पिता को फोन लगा दिया तो सबसे पहले उसके शब्द थे, "पापा जी मैं बिल्ला बोल रियां... बैटरी खत्म हो गई है मैं यहां किसी का फोन लेकर कॉल करियां." उसके बाद जो बिल्ला के शब्द थे, पापा जी यहां लाल किले पर तीन लोगों को पुलिस ने गोली मार दी है. हम यहां से निकलने ही वाले हैं. मैं चाचा और भाई के साथ हूं."

बात पूरी होने पर जब हमने बिल्ला से बात की तो उन्होंने कहा कि तीन लोग अंदर मरे पड़े हैं. इतना कहकर बिल्ला चाचा-चाचा आवाज लगाकर भाग गया. हालांकि जब हमने अन्य लोगों से पूछा तो वहां इस तरह की कोई घटना नहीं हुई थी.

इस दौरान हमें कुछ और लोग भी मिले. जो पूछ रहे थे कि क्या अंदर गोली चल गई है. किसान भाई मारे गए हैं. हमने कहा कि ऐसी तो कोई जानकारी नहीं है. तो वह कहते हैं, "हम तो सिंघु बॉर्डर पहुंचने ही वाले थे कि तभी पता चला कि लाल किले पर गोली चल गई है और तीन लोग मारे गए हैं यह सुनकर हम बीच रास्ते से ही वापस आ गए."

लाल किले की लाइट कट कर रात नौ बजे उतारा गया किसानों का झंडा

दिल्ली पुलिस को लगा होगा कि लाइट बंद करने के बाद जो किसान बचे हैं वो चले जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लाइट कट होने पर शोरगुल और ज्यादा हो गया. जो ट्रैक्टर बंद खड़े थे वह भी स्टार्ट कर दिए गए. ताकि रोशनी बनी रहे. इस बीच दिल्ली पुलिस के करीब 20-25 जवान एक साथ लाल किले की प्राचीर से नीचे उतरे. हलचल तेज हो गई थी. पुलिस को देखकर युवा किसानों ने नारे लगाने शुरू कर दिए. कुछ देर तक यह पुलिस नीचे रही. लेकिन एक घंटे बाद और ज्यादा मात्रा में पूरी सुरक्षा के साथ इक्ट्ठे होकर फिर से लाल किले की प्राचीर पर पहुंच गए.

करीब नौ बजे पुलिस ने किसानों के द्वारा लगाए गए झंडों को उतारना शुरू किया. इस दौरान युवकों ने जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. कुछ युवक इस दौरान पुलिस को भद्दी-भद्दी गालियां भी दे रहे थे. जबकि इसी दौरान कुछ उम्रदराज किसान शांति का परिचय भी दे रहे थे.

लाल किले पर किसानों का एक जत्था उपासना में लीन

जब कुछ युवा किसान ट्रैक्टरों से स्टंट और पुलिस को गालियां दे रहे थे तब किसानों का एक जत्था उपासना में लीन था. लाल किले की प्राचीर पर एंट्री करने वाले गेट के सामने बैठकर किसान सतगुरु वाहे गुरु का जाप कर रहे थे. इसी दौरान युवा खालसा की जीत हो का उद्घोष कर रहे थे.

उपासना करते किसान

उपासना करते किसान

गेट के सामने बैठे किसानों के पीछे भारी पुलिस बल तैनात था. कोई गेट में एंट्री न करे इसके लिए किसानों ने अपनी खुद की ही सिक्योरिटी लगाई हुई थी. यानी समझदार किसान नहीं चाहते थे कि कोई भी अब लाल किले के अंदर एंट्री करे.

झंडा उतरने के एक घंटे बाद करीब 10 बजे कुछ पुलिस वाले एक बार फिर नीचे उतर आए. तब तक किसानो की भीड़ और हल्की हो चुकी थी. धीरे धीरे मामला शांत हो गया था. किसान अपने ठिकानों को वापसी कर रहे थे. पुलिस भी यही चाहती थी. लाइट काटने का फायदा भी फायदा पुलिस को मिला.

26 जनवरी की झांकियों में तोड़फोड़

26 जनवरी की परेड में शामिल झांकियों में भी किसानों ने तोड़फोड़ की. तस्वीरे खिंचवाने के साथ-साथ युवा किसान झांकियों के ऊपर चढ़ गए. झांकियों को क्षति पहुंचाने और उनके ऊपर चढ़कर उपद्रव करने का यह काम सब पुलिस वालों के सामने ही हो रहा था. हालांकि कुछ समझदार किसानों ने उन्हें ऐसा करने से रोका भी.

लाठी डंडों के साथ आए इन किसानों ने कोई एक भी झांकी ऐसी नहीं छोड़ी जिसे उन्होंने क्षतिग्रस्त न किया हो. लेकिन सभी किसान ऐसा नहीं कर रहे थे बल्कि युवा किसानों के कुछ झुंड थे जो इन हरकतों को अंजाम दे रहे थे. यह सब देर रात तक जारी रहा.

Also Read : किसान और सबसे लायक बेटे के कारनामें
Also Read : रिपोर्टर की डायरी: 26 जनवरी को जो कुछ हुआ वो ऐतिहासिक था या कलंक?

जिसे जहां जगह मिली सो गया

आधी रात के बाद भी युवा तो सोते हुए नहीं दिखे लेकिन कुछ बुजुर्गों को जहां जगह मिली वहीं सो गए. गाजीपुर बॉर्डर पर जो भी किसान आंदोलन के समर्थन में पहुंचता है उसके रहने की व्यवस्था हो जाती है. लेकिन 25 जनवरी की रात किसानों की तादात इतनी ज्यादा थी कि सभी टेंट फुल थे. इसलिए कुछ किसानों को जहां तहां सोना पड़ा. ऐसे ही कुछ किसान ट्रॉली के नीचे या फिर खुले आसमान में कुछ कपड़े बिछाकर लेटे हुए मिले. जबकि कुछ खुले में ही आग जलाकर तापते हुए रात गुजारते नज़र आए.

सुलख्खन सिंह, सतनाम सिंह और जगदीश सिंह

सुलख्खन सिंह, सतनाम सिंह और जगदीश सिंह

लखीमपुर खीरी से आए तीन किसानों को भी सोने के लिए टेंट नहीं मिल पायी थी. वे एक ट्राली के नीचे ही कपड़े बिछाकर लेट गए थे. इनका नाम जगदीश सिंह, सतनाम सिंह और सुलख्खन सिंह था. जगदीश सिंह कहते हैं, "हम यहां सोने नहीं आए हैं हम यहां जो जंग चल रही है उसे जीतने आए हैं. कल पता चल जाएगा मोदी सरकार को भी, कल ऐतिहासिक परेड निकलने जा रही है. जिसे देश ही नहीं दुनिया देखेगी."

सुलख्खन सिंह कहते हैं, "यहां लोग आस पास से ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लोग यहां किसानों के समर्थन में पहुंच रहे हैं. जिन लोगों के पास पैसा नहीं है वह चंदा इक्ट्ठा करके यहां पहुंचे हैं. सबको अपना घर पसंद होता है. इतनी सर्दी में आदमी को खटिया रजाई चाहिए. लेकन मोदी ने हमें परेशान कर रखा है. हम सड़क पर लेटे हैं. मोदी से हमारी कोई दुश्मनी नहीं है बस ये तीनों कृषि कानून वापस हो जाएं तो हम अपने घर चले जाएंगे."

इन्हीं के साथी सतनाम सिंह कहते हैं, "हमने चुनाव में मोदी को ही वोट दिया था. लेकिन अब कभी जिंदगी में भी हम मोदी को वोट नहीं देंगे. हम तो बजुर्ग हो रहे हैं. 60 के आसपास पहुंच गए हैं. अपने बच्चों से भी कह जाएंगे कि कभी मोदी को वोट नहीं देना. हम कह जाएंगे कि अगर तुम्हारा बापू या भाई भी कभी बीजेपी के समर्थन से खड़ा हो जाए तो कभी उसे भी वोट मत देना. इतने बुरे दिन हमने कभी नहीं देखे. इस सरकार ने हमें सड़क पर ला दिया है.ठ

26 जनवरी की रात क्या हुआ

26 जनवरी को दिन में किसानों ने तिरंगे वाली जगह से अलग लाल किले पर अपना झंडा फहरा दिया था. इसके बाद किसान रात 12 बजे तक भी वहीं रहे. हालांकि तब तक भीड़ काफी हल्की हो गई थी. रात के 12 बजे तक किसान लाल किले पर ट्रैक्टरों से स्टंट करते हुए नज़र आए. ट्रैक्टरों की रोशनी में लाल किले पर भी इन युवाओं का डांस जारी था. दिल्ली पुलिस लाल किले की प्राचीर पर जो कुछ हो रहा था उसे निहार रही थी.

देर रात तक यहां ठहरने वाले किसानों का कहना था कि वो सिंघु और टिकरी बॉर्डर से यहां पहुंचे थे. कुछ किसान ऐसे भी थे जो सीधे हरियाणा, पंजाब या उत्तर प्रदेश के किसी गांव से आए थे. इनकी संख्या बहुत कम थी.

अफवाहों का दौर

इस दौरान जब हम लाल किले पर थे तब एक 13 साल का लड़का बिल्ला हमारे पास आया. वह कहता है, "आप अपने फोन से मेरी बात करा दीजिए मुझे अपने पापा से बात करनी है. वह सिंघु बॉर्डर पर हैं."

यहां किसके साथ आए हो इस सवाव के जवाब में वह कहता है, "अपने चाचा और बहुत सारे भाइयों के साथ यहां आया हूं सबके फोन स्विच ऑफ हो गए हैं. प्लीज बात करा दीजिए."

हमने बिल्ला के पिता को फोन लगा दिया तो सबसे पहले उसके शब्द थे, "पापा जी मैं बिल्ला बोल रियां... बैटरी खत्म हो गई है मैं यहां किसी का फोन लेकर कॉल करियां." उसके बाद जो बिल्ला के शब्द थे, पापा जी यहां लाल किले पर तीन लोगों को पुलिस ने गोली मार दी है. हम यहां से निकलने ही वाले हैं. मैं चाचा और भाई के साथ हूं."

बात पूरी होने पर जब हमने बिल्ला से बात की तो उन्होंने कहा कि तीन लोग अंदर मरे पड़े हैं. इतना कहकर बिल्ला चाचा-चाचा आवाज लगाकर भाग गया. हालांकि जब हमने अन्य लोगों से पूछा तो वहां इस तरह की कोई घटना नहीं हुई थी.

इस दौरान हमें कुछ और लोग भी मिले. जो पूछ रहे थे कि क्या अंदर गोली चल गई है. किसान भाई मारे गए हैं. हमने कहा कि ऐसी तो कोई जानकारी नहीं है. तो वह कहते हैं, "हम तो सिंघु बॉर्डर पहुंचने ही वाले थे कि तभी पता चला कि लाल किले पर गोली चल गई है और तीन लोग मारे गए हैं यह सुनकर हम बीच रास्ते से ही वापस आ गए."

लाल किले की लाइट कट कर रात नौ बजे उतारा गया किसानों का झंडा

दिल्ली पुलिस को लगा होगा कि लाइट बंद करने के बाद जो किसान बचे हैं वो चले जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लाइट कट होने पर शोरगुल और ज्यादा हो गया. जो ट्रैक्टर बंद खड़े थे वह भी स्टार्ट कर दिए गए. ताकि रोशनी बनी रहे. इस बीच दिल्ली पुलिस के करीब 20-25 जवान एक साथ लाल किले की प्राचीर से नीचे उतरे. हलचल तेज हो गई थी. पुलिस को देखकर युवा किसानों ने नारे लगाने शुरू कर दिए. कुछ देर तक यह पुलिस नीचे रही. लेकिन एक घंटे बाद और ज्यादा मात्रा में पूरी सुरक्षा के साथ इक्ट्ठे होकर फिर से लाल किले की प्राचीर पर पहुंच गए.

करीब नौ बजे पुलिस ने किसानों के द्वारा लगाए गए झंडों को उतारना शुरू किया. इस दौरान युवकों ने जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. कुछ युवक इस दौरान पुलिस को भद्दी-भद्दी गालियां भी दे रहे थे. जबकि इसी दौरान कुछ उम्रदराज किसान शांति का परिचय भी दे रहे थे.

लाल किले पर किसानों का एक जत्था उपासना में लीन

जब कुछ युवा किसान ट्रैक्टरों से स्टंट और पुलिस को गालियां दे रहे थे तब किसानों का एक जत्था उपासना में लीन था. लाल किले की प्राचीर पर एंट्री करने वाले गेट के सामने बैठकर किसान सतगुरु वाहे गुरु का जाप कर रहे थे. इसी दौरान युवा खालसा की जीत हो का उद्घोष कर रहे थे.

उपासना करते किसान

उपासना करते किसान

गेट के सामने बैठे किसानों के पीछे भारी पुलिस बल तैनात था. कोई गेट में एंट्री न करे इसके लिए किसानों ने अपनी खुद की ही सिक्योरिटी लगाई हुई थी. यानी समझदार किसान नहीं चाहते थे कि कोई भी अब लाल किले के अंदर एंट्री करे.

झंडा उतरने के एक घंटे बाद करीब 10 बजे कुछ पुलिस वाले एक बार फिर नीचे उतर आए. तब तक किसानो की भीड़ और हल्की हो चुकी थी. धीरे धीरे मामला शांत हो गया था. किसान अपने ठिकानों को वापसी कर रहे थे. पुलिस भी यही चाहती थी. लाइट काटने का फायदा भी फायदा पुलिस को मिला.

26 जनवरी की झांकियों में तोड़फोड़

26 जनवरी की परेड में शामिल झांकियों में भी किसानों ने तोड़फोड़ की. तस्वीरे खिंचवाने के साथ-साथ युवा किसान झांकियों के ऊपर चढ़ गए. झांकियों को क्षति पहुंचाने और उनके ऊपर चढ़कर उपद्रव करने का यह काम सब पुलिस वालों के सामने ही हो रहा था. हालांकि कुछ समझदार किसानों ने उन्हें ऐसा करने से रोका भी.

लाठी डंडों के साथ आए इन किसानों ने कोई एक भी झांकी ऐसी नहीं छोड़ी जिसे उन्होंने क्षतिग्रस्त न किया हो. लेकिन सभी किसान ऐसा नहीं कर रहे थे बल्कि युवा किसानों के कुछ झुंड थे जो इन हरकतों को अंजाम दे रहे थे. यह सब देर रात तक जारी रहा.

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