बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों में वायु गुणवत्ता सबसे खराब

लॉकडाउन में नाटकीय रूप से वायु प्रदूषण कम होने के बाद अब प्रदूषण दोबारा वापस आ गया है.

बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों में वायु गुणवत्ता सबसे खराब
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गंगा के मैदानी क्षेत्र के शहरों में वायु प्रदूषण को लेकर किये गये-नये अध्ययन में पता चला है कि लॉकडाउन और मॉनसून के चलते वायु प्रदूषण कम करने में जो फायदा मिला था, वो अर्थव्यवस्था के खुलने और कड़ाके की सर्दी के कारण बेकार चला गया. यह खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) एक विश्लेषण में किया है. इस विश्लेषण की प्रमुख बात यह है कि प्रदूषण के स्तर में इजाफे में अलग-अलग पैटर्न और अलग-अलग क्षेत्रों में समानता भी देखी गई है.

हालांकि, ये अपेक्षित था, मगर एनसीआर के बाहर लगे मॉनीटरिंग स्टेशनों से गंगा के मैदानी इलाकों के जो आंकड़े मिले हैं, वे सर्दी में होने वाले प्रदूषण के अलग पैटर्न को दर्शाते हैं. यद्यपि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में सर्दी में प्रदूषण का स्तर अन्य इलाकों के मुकाबले ज्यादा है, लेकिन एनसीआर के मुकाबले अधिक नहीं है. गंगा के मैदानी इलाकों में चिंताजनक रूप से प्रदूषण का स्तर अधिक रहा और लंबी दूरी होने के बावजूद प्रदूषण में समानता दिखी. चारों तरफ से भू-भाग से जुड़े इस हिस्से के लिए ये एक चुनौती है.

ये अध्ययन सीएसई के एयर क्वालिटी ट्रैकर पहल का हिस्सा है. इस पहल की शुरुआत देशभर में वायु गुणवत्ता के बदलते पैटर्न को गहराई से समझने के लिए हुई है. सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं, “ये विश्लेषण साल 2020 में हुई अप्रत्याशित घटना के प्रभाव को सामने लाता है. लॉकडाउन में नाटकीय रूप से वायु प्रदूषण कम होने के बाद अब प्रदूषण दोबारा वापस आ गया है, जो स्थानीय व क्षेत्रीय प्रदूषण को दर्शाता है और साथ ही साथ इसका अलग पैटर्न भी दिख रहा है. प्रदूषण का ताजा हाल वाहनों, कल-कारखानों, पावर प्लांट्स व कूड़ा जलाने से फैलने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए त्वरित क्षेत्रीय सुधारों और कार्रवाई की मांग करता है ताकि क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण कम किया जा सके.”

पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) के स्तर में इजाफा सर्दी का सामान्य व प्रत्याशित ट्रेंड होता है क्योंकि स्थानीय स्त्रोतों जैसे वाहन, उद्योग, कंस्ट्रक्शन और जैव ईंधन से फैलने वाला प्रासंगिक प्रदूषक तत्व सर्दी में मौसमी बदलाव आने के कारण वायुमंडल में जमा हो जाता है. सीएसई के शोधकर्ता अविकल सोमवंशी ने कहा, “इस साल इस मौसम में ये ट्रेंड दो हफ्ते पहले आ गया है. गंगा के मैदानी क्षेत्र और एनसीआर के उत्तरी व दक्षिणी हिस्सों में प्रदूषण के पैटर्न में अंतर साफ नजर आ रहा है. हालांकि, साल 2020 में गर्मी और मॉनसून के महीनों में पीएम 2.5 का स्तर साल 2019 के मुकाबले कम रहा, क्योंकि साल 2020 में गर्मी में देश में लॉकडाउन था. लेकिन, पंजाब व हरियाणा (एनसीआर का उत्तरी हिस्सा) के सभी शहरों में इस सर्दी में पीएम2.5 का स्तर वर्ष 2019 के मुकाबले ज्यादा दर्ज किया गया है.”

सोमवंशी आगे कहते हैं, “मध्य व पूर्व उत्तर प्रदेश और बिहार (एनसीआर का दक्षिणी हिस्सा) के शहरों में सर्दी में प्रदूषण का स्तर अधिक तो दर्ज किया गया, लेकिन वर्ष 2019 के मुकाबले कम रहा. अर्थव्यवस्था के खुलने और मौसमी बदलाव का दोहरा असर सर्दी में प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेवार है, लेकिन प्रदूषण में ये क्षेत्रीय असमानता सूक्ष्म और मजबूत प्रदूषण नियंत्रण रणनीति की मांग करता है. ये क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण रोकने के लिए होने वाली कार्रवाई के भरोसे नहीं रह सकता है. इसके लिए त्वरित कार्रवाई की जरूरत है.

यह विश्लेषण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ऑनलाइन पोर्टल के सेंट्रल कंट्रोल रूम (एयर क्वालिटी मैनेजमेंट) पर उपलब्ध रिअल-टाइम डेटा (15 मिनट औसत) पर आधारित है.

विश्लेषण के लिए 26 शहर अमृतसर, भटिंडा, जालंधर, खन्ना, लुधियाना, मंडीगोविंदगढ़, पटियाला, रूपनगर, चंडीगढ़, अंबाला, फतेहाबाद, हिसार, कैथल, कुरुक्षेत्र, पंचकुला, सिरसा, यमुनानगर, आगरा, कानपुर, मुरादाबाद, वाराणसी, लखनऊ, पटना, गया, मुजफ्फरपुर और हाजीपुर के आंकड़े शामिल किये गये हैं क्योंकि इन शहरों में ही रियल टाइम डेटा उपलब्ध हैं.

पटना के 6 एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग स्टेशन, लखनऊ के पांच, गया के दो, मुजफ्फरपुर के दो और बाकी शहरों के एक मॉनीटरिंग स्टेशनों से आंकड़े संग्रह किये गये. ये स्टेशन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कंटीन्यूअस एंबिएंट एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग सिस्टम के तहत स्थापित किये गये हैं. अमृतसर, अंबाला, चंडीगढ़, लखनऊ और पटना के मौसमी आंकड़े मौसम विज्ञान विभाग की तरफ से इन शहरों में एयरपोर्ट पर लगे वेदर स्टेशनों से लिये गये.

अधिकांश शहरों में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर लॉकडाउन के बावजूद कम नहीं हुआ. बड़े शहरों में हालांकि पीएम 2.5 के स्तर में गिरावट आई, लेकिन छोटे शहरों में इसमें उछाल दर्ज किया गया. गंगा के मैदानी क्षेत्रों में साल 2020 में पीएम 2.5 का स्तर साल 2019 के मुकाबले ज्यादा रहा. हरियाणा के फतेहाबाद का प्रदर्शन इस मामले में सबसे बुरा रहा. यहां वर्ष 2019 के मुकाबले पीएम2.5 में 35 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया. फतेहाबाद के अलावा भटिंडा (14 प्रतिशत, आगरा (9 प्रतिशत), खन्ना (7 प्रतिशत), मंडीगोविंदगढ़ (6 प्रतिशत), मुरादाबाद (5.5 प्रतिशत) और कुरुक्षेत्र (1 प्रतिशत) में भी वर्ष 2019 के मुकाबले पीएम 2.5 का स्तर ज्यादा रहा. जालंधर में पीएम2.5 में 1 प्रतिशत से कम बदलाव रहा.

सबसे ज्यादा सुधार सिरसा में दर्ज किया गया. सिरसा में पीएम 2.5 का स्तर 44 प्रतिशत कम रहा. वहीं, वाराणसी में 31 प्रतिशत, गया में 27 प्रतिशत, मुजफ्फरपुर में 15 प्रतिशत और हिसार में 12 प्रतिशत कम रहा. अन्य शहरों में 4-12 प्रतिशत तक का सुधार दर्ज किया गया. संदर्भ के लिए, दिल्ली में वर्ष 2020 में पीएम 2.5 का स्तर वर्ष 2019 के मुकाबले 13 प्रतिशत कम रहा.

पराली जलाने का असर

फतेहाबाद (सबसे बुरा प्रदर्शन) और सिरसा (सबसे बेहतर प्रदर्शन) पड़ोसी राज्य हैं. इनके बीच केवल 40 किलोमीटर की दूरी है. सोमवंशी कहते हैं, “आस-पड़ोस के इन शहरों में प्रदूषण के स्तर में भारी अंतर की वजह मौसम विज्ञान को नहीं माना जा सकता है. इसके पीछे स्थानीय कारण हैं. इन दो शहरो के साथ साथ उत्तरी-पश्चिम के हिसार और जिंद जैसे शहर पराली जलाने से होने वाले श्रृंखलाबद्ध प्रदूषण से प्रभावित हैं. इसका प्रभाव इतना मजबूत है कि यहां नवंबर का मासिक पीएम 2.5 स्तर दिल्ली के बराबर पहुंच सकता है. लेकिन इन शहरों में पराली के धुएं का सीधा पड़ता है, दिल्ली के साथ ऐसा नहीं है. नंवबर का पीएम 2.5 सर्दी के बाकी वक्त में (दिल्ली की तरह) इन शहरों में रुका नहीं रहता.”

सीईएस के विश्लेषण के मुताबिक, पराली जलाने के पैटर्न में किसी भी तरह का बदलाव वार्षिक औसत में नाटकीय रूप से कमी लाता है. जो ट्रेंड दिखा है, उसके पीछे भी संभवत यही वजह हो सकती है. हालांकि असल कारणों की पड़ताल के लिए मौके पर जाकर शोध करने की जरूरत है.

लॉकडाउन के कारण पीएम 2.5 का औसत स्तर इस गर्मी और मॉनसून में कम रहा, लेकिन ये सर्दी में होने वाले इजाफे को रोक नहीं सका. गर्मी और मॉनसून में वर्ष 2019 के मुकाबले साल 2020 में पीएम 2.5 का औसत स्तर कम रहा. इसके पीछे मुख्य रूप से गर्मी में आर्थिक गतिविधियां पूरा तरह ठप होना और कई चरणों में अनलॉकिंग वजह रही. लेकिन अर्थव्यवस्था दोबारा खुली और संयोग से तब खुली जब सर्दी का पदार्पण हुआ. इससे प्रदूषण बढ़ने लगा. पीएम2.5 के स्तर में बढ़ोतरी अक्टूबर से शुरू हो गई. अमृतसर में एक साफ सप्ताह में प्रदूषित सप्ताह के मुकाबले पीएम 2.5 में 10 गुना, अंबाला में 9 गुना, चंडीगढ़ में 6 गुना, लखनऊ में 11 गुना और पटना में 11 गुना बढ़ोतरी हुई. हालांकि दिल्ली के मुकाबले इन शहरों में साप्ताहिक वायु गुणवत्ता में कम गिरावट आई. दिल्ली में साप्ताहिक वायु गुणवत्ता 14 गुना खराब हुई. लेकिन, छोटे शहरों ने इस मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ दिया. भटिंडा में वायु गुणवत्ता 13 गुना, फतेहाबाद में 22 गुना, मुजफ्फरपुर में 19 गुना, सिरसा में 17 गुना, कानपुर में 16 गुना और हिसार तथा कैथल में 15 गुना खराब हुई.

उत्तर व पूर्वी शहरों में प्रदूषण के स्तर में असमानता दिखी. उत्तर के शहरों (दिल्ली-एनसीआर की तरह) में सबसे प्रदूषित सप्ताह नवंबर के पहले दो हफ्तों में रहा जबकि पूर्वी शहरों में सबसे प्रदूषित सप्ताह दिसंबर में रहा. खन्ना, मंडीगोविंदगढ़, पटियाला, रूपनगर, चंडीगढ़, अंबाला, कैथल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, आगरा और मुरादाबाद में सबसे प्रदूषित सप्ताह नवबर, 2020 का आखिरी हफ्ता रहा जो 8 नवंबर को खत्म हुआ. दिल्ली, अमृतसर, भटिंडा, जालंधर, लुधियाना, फतेहाबाद, हिसार, पंचकुला और सिरसा में सबसे प्रदूषित सप्ताह नवंबर 2020 का दूसरा हफ्ता रहा. वहीं, हाजीपुर, पटना और मुजफ्फरपुर में सबसे प्रदूषित सप्ताह दिसंबर 2020 का पहला हफ्ता रहा, जो 6 दिसंबर को खत्म हुआ. इसी तरह कानपुर, वाराणसी और लखनऊ में सबसे प्रदूषित सप्ताह दिसंबर, 2020 के आखिरी हफ्ता रहा, जो 27 दिसंबर को खत्म हुआ. गया का सबसे प्रदूषित सप्ताह नया साल का सप्ताह रहा.

खन्ना, रूपनगर, लुधियाना, और पंचकुला में सबसे साफ सप्ताह मार्च 2020 का आखिरी हफ्ता रहा, जो 29 मार्च को खत्म हुआ. अमृतसर और जालंधर में सबसे साफ सप्ताह अप्रैल के हफ्ते में रहा. पटना में सबसे साफ सप्ताह जून में और आगरा, मुरादाबाद, पटियाला, चंडीगढ़, अंबाला, कैथल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, दिल्ली और हिसार में सबसे साफ सप्ताह जुलाई में दर्ज किया गया. कानपुर, वाराणसी, लखनऊ और मुजफ्फरपुर में सबसे साफ सप्ताह अगस्त, 2020 में दर्ज किया गया जो 23 अगस्त को खत्म हुआ. मंडीगोविंदगढ़ और फतेहाबाद में सबसे साफ सप्ताह अगस्त 2020 के आखिरी हफ्ते में रहा, जो 30 अगस्त को खत्म हुआ. भटिंडा और सिरसा में सबसे साफ सप्ताह सितंबर, 2020 का पहला हफ्ता रहा जो 6 सितंबर को खत्म हुआ. हाजीपुर और गया में सबसे साफ सप्ताह सितंबर, 2020 का आखिरी हफ्ता रहा, जो 27 सितंबर को खत्म हुआ.

उत्तरी शहरों में नवंबर में पीएम 2.5 का औसत स्तर अधिक रहा

नवंबर में पीएम 2.5 का औसत स्तर उत्तरी शहरों में ज्यादा रहा. नवंबर, 2020 गंगा के मैदानी इलाकों के अधिकांश शहरों के लिए प्रदूषित महीना रहा. नवंबर 2019 के मुकाबले नवंबर 2020 में फतेहाबाद में पीएम 2.5 की मात्रा 310 प्रतिशत अधिक, आगरा में 104 प्रतिशत अधिक और कैथल में 57 प्रतिशत अधिक रही. पंजाब और हरियाण के सभी शहरों में नवंबर महीना प्रदूषित महीना रहा सिवाय सिरसा के जो नवंबर में भी 16 प्रतिशत साफ रहा. मध्य व पूर्वी यूपी व बिहार के सभी शहरों में नवम्बर महीना 2-48 प्रतिशत साफ रहा. साथ ही अगस्त 2019 के मुकाबले अगस्त 2020 भी इन सभी शहरों (भटिंडा, मंडागोविंदगढ़, पटियाला और फतेहाबाद को छोड़कर) में साफ रहा.

सर्दी के साथ वायु गुणवत्ता में बढ़ने लगी विषाक्तता

सर्दी आने के साथ ही वायु गुणवत्ता जहरीली होती जाती है और पीएम10 में पीएम 2.5 की मात्रा बढ़ जाती है. पीएम10 में पीएम 2.5 की हिस्सेदारी वायु में विषाक्तता का पैमाना होती है. अगर पीएम10 में पीएम2.5 की मौजूदगी ज्यादा होती है, तो वायु में विषाक्तता बढ़ जाती है क्योंकि ये पीएम 2.5 के सूक्ष्म कण फेफड़े में प्रवेश कर जाते हैं जिससे स्वास्थ्य का जोखिम बढ़ जाता है. दिलचस्प बात है कि लॉकडाउन में जब वायुमंडल में पीएम 10 मात्रा में गिरावट आ गई थी, तो पीएम 2.5 के स्तर में कमी दर्ज की गई थी. लेकिन पीएम 2.5 की मौजूदगी अमृतसर में 33 प्रतिशत, चंडीगढ़ में 39 प्रतिशत और पटना में 38 प्रतिशत दर्ज की गई, जो सामान्य से ज्यादा थी.

सर्दी के आगाज के साथ ही पीएम 10 और पीएम 2.5 दोनों के स्तर में बढ़ोतरी हुई है और साथ ही पीएम 10 में पीएम 2.5 की हिस्सेदारी में भी इजाफा हुआ है. अक्टूबर में पीएम 10 में पीएम 2.5 की मौजूदगी औसतन 40 प्रतिशत दर्ज की गई और नवम्बर में भी अधिक ही रही. अमृतसर में नवंबर में पीएम 10 में पीएम 2.5 की मौजूदगी 55 प्रतिशत, चंडीगढ़ में 48 प्रतिशत और पटना में 53 प्रतिशत रही. पीएम 10 में पीएम 2.5 की अधिक मौजूदगी सामान्य तौर पर दिवाली में रहती है. साल 2020 में दिवाली में अमृतसर में पीएम 2.5 की मौजूदगी 64 प्रतिशत पर, चंडीगढ़ में 69 प्रतिशत पर और पटना में 62 प्रतिशत पर पहुंच गई थी.

लखनऊ में सबसे प्रदूषित दिवाली

लखनऊ की दिवाली सबसे प्रदूषित थी, लेकिन अमृतसर, अंबाला और चंडीगढ़ और पटना साफ थे. दिवाली के दिन लखनऊ के तालकटोरा में पीएम 2.5 का औसत स्तर 434 माइक्रोग्राम/क्यूबिक मीटर रहा, जो साल 2019 में इसी दिन के मुकाबले 237 अधिक रही. साल 2020 में दिवाली की दोपहर से रात तक प्रति घंटा के आधार पर पीएम 2.5 के स्तर में 100 प्रतिशत तक का इजाफा (आतिशबाजी के कारण) दर्ज किया गया था. अमृतसर 7 प्रतिशत साफ, चंडीगढ़ 56 प्रतिशत, अंबाला 57 प्रतिशत और पटना 22 प्रतिशत साफ रहा. साल 2020 में दिवाली भी साल 2019 के मुकाबले देर से नवंबर में आई.

खराब हवाओं के दिन साल 2020 की शुरुआती सर्दी से शुरू

पीएम 2.5 में साप्ताहिक औसत में 24 घंटों के स्तर पर या 60 माइक्रोग्राम/वर्गमीटर इजाफा हुआ. अमृतसर में ये इजाफा 6 अक्टूबर (8 दिन पहले) को, अंबाला में 4 अक्टूबर को (आठ दिन पहले), लखनऊ में 10 सितंबर को (29 दिन पहले) और पटना में 1 अक्टूबर (14 दिन पहले) को दर्ज किया गया. कुल मिलाकर देखें, तो सर्दी का मौसम हर जगह प्रदूषित रहा. नवंबर में चंडीगढ़ तुलनात्मक रूप से साफ रहा. लेकिन साल 2019 के मुकाबले इस साल के बाद में प्रदूषित हवाओं की आमद होने लगी.

पीएम 2.5 की मात्रा के स्तर पर पहुंचने के दिनों की संख्या इस सर्दी में कम रही

अमृतसर में इस सर्दी में स्टैंडर्ड एयर दिनों की संख्या 33 रही, जबकि साल 2019 में 41 ऐसे दिनों की संख्या 41 थी. अंबाला में ये दिन साल 2019 के मुकाबले कम रहे. अंबाला में 11 दिन और लखनऊ तथा पटना में 4-4 दिन रहे. सच बात तो ये है कि लखनऊ में तो अक्टूबर के शुरू से ही एक भी दिन ऐसा नहीं गया, जब पीएम2.5 की मात्रा स्टैंडर्ड पर पहुंची हो. लखनऊ में 19 दिन ऐसे रहे जब वायु गुणवत्ता खराब और बेहद खराब रही. पिछली सर्दी में ऐसे चार दिन ही हुए थे. चंडीगढ़ ने इसे तोड़ा और वहां 18 दिन ऐसे रहे जब पीएम 2.5 की मात्रा स्टैंडर्ड पर पहुंची.

वर्ष 2020 में प्रदूषण में हुआ चक्रीय व कम बड़े उतार-चढ़ाव

पीएम2.5 के स्तर में इस साल दिल्ली-एनसीआर के मुकाबले गंगा के मैदानी शहरों में कम उतार-चढ़ाव देखने को मिला. दिल्ली-एनसीआर में पीएम 2.5 के स्तर में तेजी से उतार-चढ़ाव दिखते हैं. ये नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा मौसम के प्रभाव के चलते हुआ है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में अलग तरह का पैटर्न दिख रहा है. अतः ये इन शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए किये गये खराब उपायों के चलते हो सकता है. लेकिन इसकी वजह जानने के लिए और ज्यादा शोध करने की जरूरत है.

साल 2020 में साफ हवा के बावजूद ज्यादा शहरों में साल 2019 के मुकाबले बढ़ा प्रदूषण

सीएसई ने गंगा के मैदानी क्षेत्रों के इन शहरों के वर्ष 2019 और 2020 के वायु गुणवत्ता के वार्षिक औसत और 24 घंटों में सर्वाधिक स्तर का तुलनात्मक अध्ययन किया. इस अध्ययन में पता चला कि छोटे शहरों में जहां पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर काफी कम था, वहां सर्दी में पीएम 2.5 का स्तर बराबर रहा या दैनिक स्तर पर उच्चस्तर पर पहुंच गया. अन्य शहरों के मुकाबले पंजाब के शहरों में दैनिक स्तर पर स्तर में कम उछाल दर्ज किया गया.

बड़ी कटौती की जरूरत

सर्दियों के मौसम में गंगा के मैदानी क्षेत्रों के शहरों में प्रदूषण के स्तर में इजाफा और इसके अलग अलग पैटर्न तथा वार्षिक बढ़ोतरी को कम करने के लिए देश व क्षेत्रों को क्षेत्रीय स्तर की कार्रवाई करने की जरूरत है ताकि स्थानीय प्रदूषित हवा पर क्षेत्रीय प्रभाव को कम किया जा सके स्थानीय स्तर पर प्रदूषण में कटौती हो सके.

रायचौधरी कहती हैं, “ये तो साफ है कि संबंधित क्षेत्रों को आगे आकर कार्रवाई करनी होगी और प्रदूषण फैलाने वाले सभी प्रमुख सेक्टरों को कार्रवाई के लिए प्रेरित करना होगा. राज्य में पावर प्लांट के मानकों को लागू करें, कोयला और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले अन्य प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का प्रयोग कम करें और उत्सर्जन नियंत्रण में सुधार लाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दें और वाहन प्रतिबंध उपायों को सुधारें तथा शून्य कचरा के लिए कूड़ा प्रबंधन करें और शून्य लैंडफिल नीति अपनाएं.”

गंगा के मैदानी क्षेत्र के शहरों में वायु प्रदूषण को लेकर किये गये-नये अध्ययन में पता चला है कि लॉकडाउन और मॉनसून के चलते वायु प्रदूषण कम करने में जो फायदा मिला था, वो अर्थव्यवस्था के खुलने और कड़ाके की सर्दी के कारण बेकार चला गया. यह खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) एक विश्लेषण में किया है. इस विश्लेषण की प्रमुख बात यह है कि प्रदूषण के स्तर में इजाफे में अलग-अलग पैटर्न और अलग-अलग क्षेत्रों में समानता भी देखी गई है.

हालांकि, ये अपेक्षित था, मगर एनसीआर के बाहर लगे मॉनीटरिंग स्टेशनों से गंगा के मैदानी इलाकों के जो आंकड़े मिले हैं, वे सर्दी में होने वाले प्रदूषण के अलग पैटर्न को दर्शाते हैं. यद्यपि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में सर्दी में प्रदूषण का स्तर अन्य इलाकों के मुकाबले ज्यादा है, लेकिन एनसीआर के मुकाबले अधिक नहीं है. गंगा के मैदानी इलाकों में चिंताजनक रूप से प्रदूषण का स्तर अधिक रहा और लंबी दूरी होने के बावजूद प्रदूषण में समानता दिखी. चारों तरफ से भू-भाग से जुड़े इस हिस्से के लिए ये एक चुनौती है.

ये अध्ययन सीएसई के एयर क्वालिटी ट्रैकर पहल का हिस्सा है. इस पहल की शुरुआत देशभर में वायु गुणवत्ता के बदलते पैटर्न को गहराई से समझने के लिए हुई है. सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं, “ये विश्लेषण साल 2020 में हुई अप्रत्याशित घटना के प्रभाव को सामने लाता है. लॉकडाउन में नाटकीय रूप से वायु प्रदूषण कम होने के बाद अब प्रदूषण दोबारा वापस आ गया है, जो स्थानीय व क्षेत्रीय प्रदूषण को दर्शाता है और साथ ही साथ इसका अलग पैटर्न भी दिख रहा है. प्रदूषण का ताजा हाल वाहनों, कल-कारखानों, पावर प्लांट्स व कूड़ा जलाने से फैलने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए त्वरित क्षेत्रीय सुधारों और कार्रवाई की मांग करता है ताकि क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण कम किया जा सके.”

पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) के स्तर में इजाफा सर्दी का सामान्य व प्रत्याशित ट्रेंड होता है क्योंकि स्थानीय स्त्रोतों जैसे वाहन, उद्योग, कंस्ट्रक्शन और जैव ईंधन से फैलने वाला प्रासंगिक प्रदूषक तत्व सर्दी में मौसमी बदलाव आने के कारण वायुमंडल में जमा हो जाता है. सीएसई के शोधकर्ता अविकल सोमवंशी ने कहा, “इस साल इस मौसम में ये ट्रेंड दो हफ्ते पहले आ गया है. गंगा के मैदानी क्षेत्र और एनसीआर के उत्तरी व दक्षिणी हिस्सों में प्रदूषण के पैटर्न में अंतर साफ नजर आ रहा है. हालांकि, साल 2020 में गर्मी और मॉनसून के महीनों में पीएम 2.5 का स्तर साल 2019 के मुकाबले कम रहा, क्योंकि साल 2020 में गर्मी में देश में लॉकडाउन था. लेकिन, पंजाब व हरियाणा (एनसीआर का उत्तरी हिस्सा) के सभी शहरों में इस सर्दी में पीएम2.5 का स्तर वर्ष 2019 के मुकाबले ज्यादा दर्ज किया गया है.”

सोमवंशी आगे कहते हैं, “मध्य व पूर्व उत्तर प्रदेश और बिहार (एनसीआर का दक्षिणी हिस्सा) के शहरों में सर्दी में प्रदूषण का स्तर अधिक तो दर्ज किया गया, लेकिन वर्ष 2019 के मुकाबले कम रहा. अर्थव्यवस्था के खुलने और मौसमी बदलाव का दोहरा असर सर्दी में प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेवार है, लेकिन प्रदूषण में ये क्षेत्रीय असमानता सूक्ष्म और मजबूत प्रदूषण नियंत्रण रणनीति की मांग करता है. ये क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण रोकने के लिए होने वाली कार्रवाई के भरोसे नहीं रह सकता है. इसके लिए त्वरित कार्रवाई की जरूरत है.

यह विश्लेषण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ऑनलाइन पोर्टल के सेंट्रल कंट्रोल रूम (एयर क्वालिटी मैनेजमेंट) पर उपलब्ध रिअल-टाइम डेटा (15 मिनट औसत) पर आधारित है.

विश्लेषण के लिए 26 शहर अमृतसर, भटिंडा, जालंधर, खन्ना, लुधियाना, मंडीगोविंदगढ़, पटियाला, रूपनगर, चंडीगढ़, अंबाला, फतेहाबाद, हिसार, कैथल, कुरुक्षेत्र, पंचकुला, सिरसा, यमुनानगर, आगरा, कानपुर, मुरादाबाद, वाराणसी, लखनऊ, पटना, गया, मुजफ्फरपुर और हाजीपुर के आंकड़े शामिल किये गये हैं क्योंकि इन शहरों में ही रियल टाइम डेटा उपलब्ध हैं.

पटना के 6 एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग स्टेशन, लखनऊ के पांच, गया के दो, मुजफ्फरपुर के दो और बाकी शहरों के एक मॉनीटरिंग स्टेशनों से आंकड़े संग्रह किये गये. ये स्टेशन केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कंटीन्यूअस एंबिएंट एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग सिस्टम के तहत स्थापित किये गये हैं. अमृतसर, अंबाला, चंडीगढ़, लखनऊ और पटना के मौसमी आंकड़े मौसम विज्ञान विभाग की तरफ से इन शहरों में एयरपोर्ट पर लगे वेदर स्टेशनों से लिये गये.

अधिकांश शहरों में पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर लॉकडाउन के बावजूद कम नहीं हुआ. बड़े शहरों में हालांकि पीएम 2.5 के स्तर में गिरावट आई, लेकिन छोटे शहरों में इसमें उछाल दर्ज किया गया. गंगा के मैदानी क्षेत्रों में साल 2020 में पीएम 2.5 का स्तर साल 2019 के मुकाबले ज्यादा रहा. हरियाणा के फतेहाबाद का प्रदर्शन इस मामले में सबसे बुरा रहा. यहां वर्ष 2019 के मुकाबले पीएम2.5 में 35 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया. फतेहाबाद के अलावा भटिंडा (14 प्रतिशत, आगरा (9 प्रतिशत), खन्ना (7 प्रतिशत), मंडीगोविंदगढ़ (6 प्रतिशत), मुरादाबाद (5.5 प्रतिशत) और कुरुक्षेत्र (1 प्रतिशत) में भी वर्ष 2019 के मुकाबले पीएम 2.5 का स्तर ज्यादा रहा. जालंधर में पीएम2.5 में 1 प्रतिशत से कम बदलाव रहा.

सबसे ज्यादा सुधार सिरसा में दर्ज किया गया. सिरसा में पीएम 2.5 का स्तर 44 प्रतिशत कम रहा. वहीं, वाराणसी में 31 प्रतिशत, गया में 27 प्रतिशत, मुजफ्फरपुर में 15 प्रतिशत और हिसार में 12 प्रतिशत कम रहा. अन्य शहरों में 4-12 प्रतिशत तक का सुधार दर्ज किया गया. संदर्भ के लिए, दिल्ली में वर्ष 2020 में पीएम 2.5 का स्तर वर्ष 2019 के मुकाबले 13 प्रतिशत कम रहा.

पराली जलाने का असर

फतेहाबाद (सबसे बुरा प्रदर्शन) और सिरसा (सबसे बेहतर प्रदर्शन) पड़ोसी राज्य हैं. इनके बीच केवल 40 किलोमीटर की दूरी है. सोमवंशी कहते हैं, “आस-पड़ोस के इन शहरों में प्रदूषण के स्तर में भारी अंतर की वजह मौसम विज्ञान को नहीं माना जा सकता है. इसके पीछे स्थानीय कारण हैं. इन दो शहरो के साथ साथ उत्तरी-पश्चिम के हिसार और जिंद जैसे शहर पराली जलाने से होने वाले श्रृंखलाबद्ध प्रदूषण से प्रभावित हैं. इसका प्रभाव इतना मजबूत है कि यहां नवंबर का मासिक पीएम 2.5 स्तर दिल्ली के बराबर पहुंच सकता है. लेकिन इन शहरों में पराली के धुएं का सीधा पड़ता है, दिल्ली के साथ ऐसा नहीं है. नंवबर का पीएम 2.5 सर्दी के बाकी वक्त में (दिल्ली की तरह) इन शहरों में रुका नहीं रहता.”

सीईएस के विश्लेषण के मुताबिक, पराली जलाने के पैटर्न में किसी भी तरह का बदलाव वार्षिक औसत में नाटकीय रूप से कमी लाता है. जो ट्रेंड दिखा है, उसके पीछे भी संभवत यही वजह हो सकती है. हालांकि असल कारणों की पड़ताल के लिए मौके पर जाकर शोध करने की जरूरत है.

लॉकडाउन के कारण पीएम 2.5 का औसत स्तर इस गर्मी और मॉनसून में कम रहा, लेकिन ये सर्दी में होने वाले इजाफे को रोक नहीं सका. गर्मी और मॉनसून में वर्ष 2019 के मुकाबले साल 2020 में पीएम 2.5 का औसत स्तर कम रहा. इसके पीछे मुख्य रूप से गर्मी में आर्थिक गतिविधियां पूरा तरह ठप होना और कई चरणों में अनलॉकिंग वजह रही. लेकिन अर्थव्यवस्था दोबारा खुली और संयोग से तब खुली जब सर्दी का पदार्पण हुआ. इससे प्रदूषण बढ़ने लगा. पीएम2.5 के स्तर में बढ़ोतरी अक्टूबर से शुरू हो गई. अमृतसर में एक साफ सप्ताह में प्रदूषित सप्ताह के मुकाबले पीएम 2.5 में 10 गुना, अंबाला में 9 गुना, चंडीगढ़ में 6 गुना, लखनऊ में 11 गुना और पटना में 11 गुना बढ़ोतरी हुई. हालांकि दिल्ली के मुकाबले इन शहरों में साप्ताहिक वायु गुणवत्ता में कम गिरावट आई. दिल्ली में साप्ताहिक वायु गुणवत्ता 14 गुना खराब हुई. लेकिन, छोटे शहरों ने इस मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ दिया. भटिंडा में वायु गुणवत्ता 13 गुना, फतेहाबाद में 22 गुना, मुजफ्फरपुर में 19 गुना, सिरसा में 17 गुना, कानपुर में 16 गुना और हिसार तथा कैथल में 15 गुना खराब हुई.

उत्तर व पूर्वी शहरों में प्रदूषण के स्तर में असमानता दिखी. उत्तर के शहरों (दिल्ली-एनसीआर की तरह) में सबसे प्रदूषित सप्ताह नवंबर के पहले दो हफ्तों में रहा जबकि पूर्वी शहरों में सबसे प्रदूषित सप्ताह दिसंबर में रहा. खन्ना, मंडीगोविंदगढ़, पटियाला, रूपनगर, चंडीगढ़, अंबाला, कैथल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, आगरा और मुरादाबाद में सबसे प्रदूषित सप्ताह नवबर, 2020 का आखिरी हफ्ता रहा जो 8 नवंबर को खत्म हुआ. दिल्ली, अमृतसर, भटिंडा, जालंधर, लुधियाना, फतेहाबाद, हिसार, पंचकुला और सिरसा में सबसे प्रदूषित सप्ताह नवंबर 2020 का दूसरा हफ्ता रहा. वहीं, हाजीपुर, पटना और मुजफ्फरपुर में सबसे प्रदूषित सप्ताह दिसंबर 2020 का पहला हफ्ता रहा, जो 6 दिसंबर को खत्म हुआ. इसी तरह कानपुर, वाराणसी और लखनऊ में सबसे प्रदूषित सप्ताह दिसंबर, 2020 के आखिरी हफ्ता रहा, जो 27 दिसंबर को खत्म हुआ. गया का सबसे प्रदूषित सप्ताह नया साल का सप्ताह रहा.

खन्ना, रूपनगर, लुधियाना, और पंचकुला में सबसे साफ सप्ताह मार्च 2020 का आखिरी हफ्ता रहा, जो 29 मार्च को खत्म हुआ. अमृतसर और जालंधर में सबसे साफ सप्ताह अप्रैल के हफ्ते में रहा. पटना में सबसे साफ सप्ताह जून में और आगरा, मुरादाबाद, पटियाला, चंडीगढ़, अंबाला, कैथल, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, दिल्ली और हिसार में सबसे साफ सप्ताह जुलाई में दर्ज किया गया. कानपुर, वाराणसी, लखनऊ और मुजफ्फरपुर में सबसे साफ सप्ताह अगस्त, 2020 में दर्ज किया गया जो 23 अगस्त को खत्म हुआ. मंडीगोविंदगढ़ और फतेहाबाद में सबसे साफ सप्ताह अगस्त 2020 के आखिरी हफ्ते में रहा, जो 30 अगस्त को खत्म हुआ. भटिंडा और सिरसा में सबसे साफ सप्ताह सितंबर, 2020 का पहला हफ्ता रहा जो 6 सितंबर को खत्म हुआ. हाजीपुर और गया में सबसे साफ सप्ताह सितंबर, 2020 का आखिरी हफ्ता रहा, जो 27 सितंबर को खत्म हुआ.

उत्तरी शहरों में नवंबर में पीएम 2.5 का औसत स्तर अधिक रहा

नवंबर में पीएम 2.5 का औसत स्तर उत्तरी शहरों में ज्यादा रहा. नवंबर, 2020 गंगा के मैदानी इलाकों के अधिकांश शहरों के लिए प्रदूषित महीना रहा. नवंबर 2019 के मुकाबले नवंबर 2020 में फतेहाबाद में पीएम 2.5 की मात्रा 310 प्रतिशत अधिक, आगरा में 104 प्रतिशत अधिक और कैथल में 57 प्रतिशत अधिक रही. पंजाब और हरियाण के सभी शहरों में नवंबर महीना प्रदूषित महीना रहा सिवाय सिरसा के जो नवंबर में भी 16 प्रतिशत साफ रहा. मध्य व पूर्वी यूपी व बिहार के सभी शहरों में नवम्बर महीना 2-48 प्रतिशत साफ रहा. साथ ही अगस्त 2019 के मुकाबले अगस्त 2020 भी इन सभी शहरों (भटिंडा, मंडागोविंदगढ़, पटियाला और फतेहाबाद को छोड़कर) में साफ रहा.

सर्दी के साथ वायु गुणवत्ता में बढ़ने लगी विषाक्तता

सर्दी आने के साथ ही वायु गुणवत्ता जहरीली होती जाती है और पीएम10 में पीएम 2.5 की मात्रा बढ़ जाती है. पीएम10 में पीएम 2.5 की हिस्सेदारी वायु में विषाक्तता का पैमाना होती है. अगर पीएम10 में पीएम2.5 की मौजूदगी ज्यादा होती है, तो वायु में विषाक्तता बढ़ जाती है क्योंकि ये पीएम 2.5 के सूक्ष्म कण फेफड़े में प्रवेश कर जाते हैं जिससे स्वास्थ्य का जोखिम बढ़ जाता है. दिलचस्प बात है कि लॉकडाउन में जब वायुमंडल में पीएम 10 मात्रा में गिरावट आ गई थी, तो पीएम 2.5 के स्तर में कमी दर्ज की गई थी. लेकिन पीएम 2.5 की मौजूदगी अमृतसर में 33 प्रतिशत, चंडीगढ़ में 39 प्रतिशत और पटना में 38 प्रतिशत दर्ज की गई, जो सामान्य से ज्यादा थी.

सर्दी के आगाज के साथ ही पीएम 10 और पीएम 2.5 दोनों के स्तर में बढ़ोतरी हुई है और साथ ही पीएम 10 में पीएम 2.5 की हिस्सेदारी में भी इजाफा हुआ है. अक्टूबर में पीएम 10 में पीएम 2.5 की मौजूदगी औसतन 40 प्रतिशत दर्ज की गई और नवम्बर में भी अधिक ही रही. अमृतसर में नवंबर में पीएम 10 में पीएम 2.5 की मौजूदगी 55 प्रतिशत, चंडीगढ़ में 48 प्रतिशत और पटना में 53 प्रतिशत रही. पीएम 10 में पीएम 2.5 की अधिक मौजूदगी सामान्य तौर पर दिवाली में रहती है. साल 2020 में दिवाली में अमृतसर में पीएम 2.5 की मौजूदगी 64 प्रतिशत पर, चंडीगढ़ में 69 प्रतिशत पर और पटना में 62 प्रतिशत पर पहुंच गई थी.

लखनऊ में सबसे प्रदूषित दिवाली

लखनऊ की दिवाली सबसे प्रदूषित थी, लेकिन अमृतसर, अंबाला और चंडीगढ़ और पटना साफ थे. दिवाली के दिन लखनऊ के तालकटोरा में पीएम 2.5 का औसत स्तर 434 माइक्रोग्राम/क्यूबिक मीटर रहा, जो साल 2019 में इसी दिन के मुकाबले 237 अधिक रही. साल 2020 में दिवाली की दोपहर से रात तक प्रति घंटा के आधार पर पीएम 2.5 के स्तर में 100 प्रतिशत तक का इजाफा (आतिशबाजी के कारण) दर्ज किया गया था. अमृतसर 7 प्रतिशत साफ, चंडीगढ़ 56 प्रतिशत, अंबाला 57 प्रतिशत और पटना 22 प्रतिशत साफ रहा. साल 2020 में दिवाली भी साल 2019 के मुकाबले देर से नवंबर में आई.

खराब हवाओं के दिन साल 2020 की शुरुआती सर्दी से शुरू

पीएम 2.5 में साप्ताहिक औसत में 24 घंटों के स्तर पर या 60 माइक्रोग्राम/वर्गमीटर इजाफा हुआ. अमृतसर में ये इजाफा 6 अक्टूबर (8 दिन पहले) को, अंबाला में 4 अक्टूबर को (आठ दिन पहले), लखनऊ में 10 सितंबर को (29 दिन पहले) और पटना में 1 अक्टूबर (14 दिन पहले) को दर्ज किया गया. कुल मिलाकर देखें, तो सर्दी का मौसम हर जगह प्रदूषित रहा. नवंबर में चंडीगढ़ तुलनात्मक रूप से साफ रहा. लेकिन साल 2019 के मुकाबले इस साल के बाद में प्रदूषित हवाओं की आमद होने लगी.

पीएम 2.5 की मात्रा के स्तर पर पहुंचने के दिनों की संख्या इस सर्दी में कम रही

अमृतसर में इस सर्दी में स्टैंडर्ड एयर दिनों की संख्या 33 रही, जबकि साल 2019 में 41 ऐसे दिनों की संख्या 41 थी. अंबाला में ये दिन साल 2019 के मुकाबले कम रहे. अंबाला में 11 दिन और लखनऊ तथा पटना में 4-4 दिन रहे. सच बात तो ये है कि लखनऊ में तो अक्टूबर के शुरू से ही एक भी दिन ऐसा नहीं गया, जब पीएम2.5 की मात्रा स्टैंडर्ड पर पहुंची हो. लखनऊ में 19 दिन ऐसे रहे जब वायु गुणवत्ता खराब और बेहद खराब रही. पिछली सर्दी में ऐसे चार दिन ही हुए थे. चंडीगढ़ ने इसे तोड़ा और वहां 18 दिन ऐसे रहे जब पीएम 2.5 की मात्रा स्टैंडर्ड पर पहुंची.

वर्ष 2020 में प्रदूषण में हुआ चक्रीय व कम बड़े उतार-चढ़ाव

पीएम2.5 के स्तर में इस साल दिल्ली-एनसीआर के मुकाबले गंगा के मैदानी शहरों में कम उतार-चढ़ाव देखने को मिला. दिल्ली-एनसीआर में पीएम 2.5 के स्तर में तेजी से उतार-चढ़ाव दिखते हैं. ये नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा मौसम के प्रभाव के चलते हुआ है क्योंकि दिल्ली-एनसीआर में अलग तरह का पैटर्न दिख रहा है. अतः ये इन शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए किये गये खराब उपायों के चलते हो सकता है. लेकिन इसकी वजह जानने के लिए और ज्यादा शोध करने की जरूरत है.

साल 2020 में साफ हवा के बावजूद ज्यादा शहरों में साल 2019 के मुकाबले बढ़ा प्रदूषण

सीएसई ने गंगा के मैदानी क्षेत्रों के इन शहरों के वर्ष 2019 और 2020 के वायु गुणवत्ता के वार्षिक औसत और 24 घंटों में सर्वाधिक स्तर का तुलनात्मक अध्ययन किया. इस अध्ययन में पता चला कि छोटे शहरों में जहां पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर काफी कम था, वहां सर्दी में पीएम 2.5 का स्तर बराबर रहा या दैनिक स्तर पर उच्चस्तर पर पहुंच गया. अन्य शहरों के मुकाबले पंजाब के शहरों में दैनिक स्तर पर स्तर में कम उछाल दर्ज किया गया.

बड़ी कटौती की जरूरत

सर्दियों के मौसम में गंगा के मैदानी क्षेत्रों के शहरों में प्रदूषण के स्तर में इजाफा और इसके अलग अलग पैटर्न तथा वार्षिक बढ़ोतरी को कम करने के लिए देश व क्षेत्रों को क्षेत्रीय स्तर की कार्रवाई करने की जरूरत है ताकि स्थानीय प्रदूषित हवा पर क्षेत्रीय प्रभाव को कम किया जा सके स्थानीय स्तर पर प्रदूषण में कटौती हो सके.

रायचौधरी कहती हैं, “ये तो साफ है कि संबंधित क्षेत्रों को आगे आकर कार्रवाई करनी होगी और प्रदूषण फैलाने वाले सभी प्रमुख सेक्टरों को कार्रवाई के लिए प्रेरित करना होगा. राज्य में पावर प्लांट के मानकों को लागू करें, कोयला और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले अन्य प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का प्रयोग कम करें और उत्सर्जन नियंत्रण में सुधार लाएं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा दें और वाहन प्रतिबंध उपायों को सुधारें तथा शून्य कचरा के लिए कूड़ा प्रबंधन करें और शून्य लैंडफिल नीति अपनाएं.”

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