माराडोना, फुटबॉल और लातिनी अमेरिकी राजनीति

एरिक हॉब्सबॉम- "लाखों लोगों का कल्पित समुदाय 11 नामित लोगों की टीम के रूप में अधिक वास्तविक प्रतीत होता है."

WrittenBy:प्रकाश के रे
Date:
Article image
  • Share this article on whatsapp

एमीर कुस्तुरिका की फ़िल्म ‘माराडोना’ (2008) के शुरू में ही डिएगो माराडोना कहते हैं कि 1986 के विश्वकप के उस चर्चित मैच में वे और उनके साथी खिलाड़ी चार साल पहले के फ़ाकलैंड युद्ध को लेकर क्रुद्ध थे. फ़िल्म में वे आगे बताते हैं कि उन्होंने प्रिंस चार्ल्स के मुलाक़ात के अनुरोध को इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनके हाथ ख़ून से रंगे हैं. अपनी आत्मकथा में माराडोना लिखते हैं कि भले ही हमारी भावनाएं सनक से भरी लगें, पर उस मैच में हम अपने झंडे, मृतकों और उस युद्ध में बच गए लोगों की रक्षा के लिए खेल रहे थे.

लातिनी अमेरिका के इतिहास में फुटबॉल के महत्व को रेखांकित करने वाली एक अन्य अहम किताब ‘फ़्रॉम फ़्रंटियर्स टू फुटबॉल: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री ऑफ़ लैटिन अमेरिका सिंस 1800’ के लेखक मैथ्यू ब्राउन ने ‘द कंवरसेशन’ में रेखांकित किया है कि उस मैच में माराडोना की भावना तथा अर्जेंटीना की राष्ट्रीय उत्तेजना की वजह को उस युद्ध के साथ अर्जेंटीना के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर ब्रिटेन के असर के इतिहास में भी देखा जाना चाहिए. माराडोना द्वारा हाथ से गोल करने पर इंग्लैंड में अब तक बनी नाराज़गी को ब्राउन ‘साम्राज्य की राख’ से आती प्रतिक्रिया कहा है. उन्होंने लिखा है कि फ़ाकलैंड से हटने से इनकार और उस मैच की हार को मानने से इंकार असल में दो सदियों से लातिनी अमेरिका के साथ अपने साम्राज्यवादी संबंधों से पीछे नहीं हटने के इंग्लैंड के रवैए के ही हिस्से हैं. यह भी दिलचस्प है कि ऐतिहासिक रूप से लातिनी अमेरिका में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ी व यूरोपीय प्रशिक्षण और निवेश का भी बड़ा योगदान रहा है. असल में अमेरिका और यूरोप के साम्राज्यवादी इतिहास और मौजूदा मंसूबों के संदर्भ में ही लातिनी अमेरिका के अनेक फुटबॉल खिलाड़ियों के राजनीतिक और क्रांति समर्थक होने को समझा जा सकता है. इसके साथ उस महादेश में फुटबॉल और राजनीति के व्यापक अंतरसंबंधों के इतिहास को भी देखा जाना चाहिए.

टोनी मैसन ने लातिनी अमेरिका में राजनीति और फ़ुटबॉल के अंतरसंबंधों के बारे में अपनी किताब ‘पैसन ऑफ़ द पीपुल? फुटबॉल इन साउथ अमेरिका’ में लिखा है कि इस महादेश में सैनिक और निर्वाचित राष्ट्राध्यक्षों ने बीसवीं सदी के शुरू से ही इस खेल के साथ अपने को जोड़कर जनता से जुड़ने और उसका भरोसा जीतने की कोशिश की क्योंकि यह खेल बड़ी तेज़ी से एक अहम सांस्कृतिक परिघटना बनता जा रहा था. बीती सदी में विश्व कप समेत विभिन्न आयोजनों पर बड़े ख़र्च के साथ सरकारों ने टीमों में भी निवेश किया तथा खिलाड़ियों के विदेश जाने से रोकने के प्रयास किए.

मैसन ने उल्लेख किया है कि यह सच है या फिर कहानी, पर कहा जाता है कि ब्राज़ील के साओ पॉलो के एक नेता और सांतोस क्लब के अध्यक्ष को 1960 में धमकी दी गयी थी कि अगर पेले ने क्लब छोड़ा, तो उसे दोबारा चुनाव लड़ने का इरादा छोड़ देना चाहिए और अपने जीवन के दिन गिनना शुरू कर देना चाहिए. कहा यह भी जाता है कि एक धनिक ने पेले को रखने के लिए सांतोस को बिना ब्याज़ का क़र्ज़ मुहैया कराया था. यह खेल शासकों की ओर से जनता को बहलाने के लिए एक तमाशा भी था और साथ ही देश को एकजुट कर केंद्रीय सत्ता की शक्ति को स्थापित करने का हथियार भी. फुटबॉल के ग्लैमर और पैसे ने भी ग़रीब बस्तियों में इसके लिए आकर्षण पैदा किया. अनेक विद्वानों ने बताया है कि जहां आभिजात्य वर्ग ने इसे संगठित होते श्रमिक आंदोलन के बरक्स एक अवरोध की तरह बढ़ावा दिया, वहीं वंचित समूहों के लिए यह सामाजिक मेलजोल का साधन भी बना. मिश्रित नस्लों की बड़ी आबादी के लिए यह एकता और राष्ट्रवाद का आधार भी बना. अस्सी के दशक के मध्य में तानाशाहियों के पतन के बाद विदेशी क्लबों में जाने से खिलाड़ियों को रोक पाना सरकारों के लिए मुश्किल भी हो गया था.

इस क्रम में यह भी हुआ कि दक्षिण अमेरिका में फुटबॉल संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन गया तथा उसकी एक विशिष्ट क्षेत्रीय शैली बन गयी. इतिहासकार ब्रेंदा एल्सी ने बताया है कि फुटबॉल भले ही ब्रिटेन से शुरू हुआ, लेकिन उसे पूर्णता दक्षिण अमेरिका में मिली. बहरहाल, अगर फुटबॉल के राजनीतिक महत्व की बात करें, तो इसका सीधा संबंध लातिनी अमेरिका के देशों के सघन होते राष्ट्रवाद तथा लातिनी अमेरिकी पहचान से जुड़ता है और इसी वजह से उसमें साम्राज्यवाद को लेकर दुराग्रह है और अपने देशों को प्रतिष्ठित करने की सोच है.

फुटबॉल समेत किसी भी खेल के सिरमौर वैश्विक खिलाड़ियों में पेले का स्थान अप्रतिम है. वे फ़ीफ़ा द्वारा माराडोना के साथ बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माने गए हैं. वे 1995 से 1998 तक ब्राज़ील के खेल मंत्री भी रहे हैं. वे कभी-कभी ब्राज़ील की स्थिति पर संयमित चिंता जताते रहे हैं, लेकिन नस्लभेद को लेकर उनके विचार महत्वपूर्ण हैं. ब्राज़ील उन देशों में है, जहां सबसे आख़िर में, 1888 में, ग़ुलामी प्रथा का अंत हुआ था, लेकिन बीसवीं सदी के मध्य तक नस्ल के आधार पर सामाजिक विभाजन बना रहा था. यह वही समय है, जब यूरोप से फुटबॉल यहां पहुंचा था. उल्लेखनीय है कि लातिनी अमेरिका में सबसे अधिक अश्वेत-लातिनी आबादी यहीं है. यह व्यापक मान्यता है कि 1958 में ब्राज़ील द्वारा विश्व कप में जीत हासिल करने और उसमें पेले की अग्रणी भूमिका ने नस्ली भेदभाव और ग़ुलामी को रोकने में बड़ा योगदान दिया था. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अफ़्रीका की उनकी पहली यात्रा के दौरान लोग उन्हें एक आशा और प्रेरणा के रूप में देख रहे थे कि एक अश्वेत कम नस्ली पूर्वाग्रह वाले देश में इतना कुछ हासिल कर सकता है और एक श्वेत देश में धनी हो सकता है. यह कहानी भी ख़ूब कही-सुनी जाती है कि यह पेले का ही असर था कि नाइजीरिया के गृहयुद्ध के दोनों ख़ेमों ने अपनी लड़ाई दो दिन के लिए इसलिए रोक दी थी कि पेले लागोस में मैच खेल सकें.

ब्राज़ील के ही सोक्रेटीज़ अपने बेबाक़ राजनीतिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं और उनके तेवर माराडोना से मिलते थे. वे अपने करियर के शुरुआत से ही लोकतंत्र बहाली के आंदोलन से जुड़े थे और एक संगठन भी बनाया था. जैसा कि उल्लिखित किया गया है, सैनिक तानाशाही के लिए फुटबॉल का बहुत महत्व था और उसके ख़िलाफ़ बोलना निश्चित ही बड़े साहस का काम था. एक दफ़ा तो सोक्रेटीज़ ने लाखों लोगों की सभा में धमकी दे दी थी कि यदि राष्ट्रपति का सीधा चुनाव करने की मांग सैन्य शासक नहीं मानेंगे, तो इटली में जाकर फ़ुटबॉल खेलेंगे. वे ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लूला की प्रशंसा तो करते ही थे, बचपन से फ़िदेल कास्त्रो, चे गेवारा और बीटल्स बैंड के जॉन लीनन को अपना आदर्श मानते थे. एडवार्डो गलियानो ने जो पेले के बारे में लिखा है, वह बात सोक्रेटीज़ पर भी लागू होती है कि समय के साथ नस्लभेद से ग्रस्त फ़ुटबॉल ने दूसरे मूल के लोगों को रास्ता दिया और स्थिति यह हो गयी कि ब्राज़ील के बेहतरीन खिलाड़ी या तो अश्वेत हैं या फिर मिश्रित नस्ल के. पेले ने सोक्रेटीज़ को 2004 में सौ जीवित बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार किया था, तो कुछ समूहों ने उन्हें इतिहास के सौ बेहतरीन खिलाड़ियों में जगह दी है. अनेक ऐसे फुटबॉलर और एथलीट हैं, जो विभिन्न दलों से संबद्ध हैं या समाज के उत्थान के लिए समाजसेवी के रूप में सक्रिय हैं.

लातिनी अमेरिका में बीते दो-ढाई दशकों में समाजवादी राजनीति के तेज़ उभार में माराडोना ने उसके साथ नाता जोड़कर अपनी छवि का बड़ा विस्तार कर दिया है. कुछ टिप्पणीकार कहते हैं कि समाजवादी राजनीति के लिए माराडोना का नाम प्रचार में सहायक रहा है. लेकिन यह सतही आकलन है. जिस ग़रीबी और वंचना से ये खिलाड़ी उभरकर आए हैं तथा देश-दुनिया को समझाने का प्रयास किया है, उससे उनकी राजनीतिक चेतना बनी है. उन्होंने खिलाड़ियों का संगठन बनाने का प्रयास भी किया था. फ़ीफ़ा द्वारा बोलिविया में ऊंचाई पर मैच कराने पर पाबंदी के ख़िलाफ़ भी उन्होंने आवाज़ उठायी थी. माराडोना कहते थे कि चे के बारे में पढ़ने तथा क्यूबा में चार साल तक रहने से उनकी समझ का विस्तार हुआ है. वे क्यूबा में अपने नशे की लत का उपचार के लिए रहे थे. इस बारे में उन्होंने कहा है कि अर्जेंटीना के अस्पतालों ने उनके लिए दरवाज़ा बंद कर दिया था क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि माराडोना उनके यहां मरे. ऐसे में क्यूबा ने उन्हें अपने यहां बुलाया था. यह भी याद रखना चाहिए कि मुसीबत के दौर में अक्सर फ़िदेल कास्त्रो उन्हें स्वस्थ होने के लिए उत्साहित करते थे. माराडोना की महानता को समझना है, तो लातिनी अमेरिका के इतिहास और वर्तमान में झांकना होगा, जैसे मोहम्मद अली की महानता की पड़ताल करनी है, तो अमेरिकी इतिहास को बांचना होगा.

यह कमाल ही है कि मौत की ओर ले जाती तबाही से माराडोना ने अपने को वापस हासिल किया था. यह उनके साहस और तेवर का ही परिचायक है कि वे फ़ीफ़ा को सीधे माफ़िया गिरोह कह सकते थे तथा प्रबंधक के रूप में अपनी टीम में वापसी आकर सकते थे. एमीर कुस्तुरिका की फ़िल्म में वे अफ़सोस से कहते हैं कि अगर वे नशे की चपेट में नहीं आते, तो फुटबॉल की दुनिया में वे किस ऊंचाई पर जाते. मनुष्य के रूप में यही कमी-बेसी तो माराडोना को महान बनाती है और पॉपुलर और पॉलिटिकल कल्चर में एक और अध्याय जोड़ती है… महानतम मोहम्मद अली की तरह…

subscription-appeal-image

Support Independent Media

The media must be free and fair, uninfluenced by corporate or state interests. That's why you, the public, need to pay to keep news free.

Contribute
Also see
article imageविराट कोहली की खेल भावना में छिपे सबक
article imageखेल-खेल में बड़े खेल के शिकार हुए पांंड्या और राहुल
article imageविराट कोहली की खेल भावना में छिपे सबक
article imageखेल-खेल में बड़े खेल के शिकार हुए पांंड्या और राहुल

एमीर कुस्तुरिका की फ़िल्म ‘माराडोना’ (2008) के शुरू में ही डिएगो माराडोना कहते हैं कि 1986 के विश्वकप के उस चर्चित मैच में वे और उनके साथी खिलाड़ी चार साल पहले के फ़ाकलैंड युद्ध को लेकर क्रुद्ध थे. फ़िल्म में वे आगे बताते हैं कि उन्होंने प्रिंस चार्ल्स के मुलाक़ात के अनुरोध को इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनके हाथ ख़ून से रंगे हैं. अपनी आत्मकथा में माराडोना लिखते हैं कि भले ही हमारी भावनाएं सनक से भरी लगें, पर उस मैच में हम अपने झंडे, मृतकों और उस युद्ध में बच गए लोगों की रक्षा के लिए खेल रहे थे.

लातिनी अमेरिका के इतिहास में फुटबॉल के महत्व को रेखांकित करने वाली एक अन्य अहम किताब ‘फ़्रॉम फ़्रंटियर्स टू फुटबॉल: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री ऑफ़ लैटिन अमेरिका सिंस 1800’ के लेखक मैथ्यू ब्राउन ने ‘द कंवरसेशन’ में रेखांकित किया है कि उस मैच में माराडोना की भावना तथा अर्जेंटीना की राष्ट्रीय उत्तेजना की वजह को उस युद्ध के साथ अर्जेंटीना के आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर ब्रिटेन के असर के इतिहास में भी देखा जाना चाहिए. माराडोना द्वारा हाथ से गोल करने पर इंग्लैंड में अब तक बनी नाराज़गी को ब्राउन ‘साम्राज्य की राख’ से आती प्रतिक्रिया कहा है. उन्होंने लिखा है कि फ़ाकलैंड से हटने से इनकार और उस मैच की हार को मानने से इंकार असल में दो सदियों से लातिनी अमेरिका के साथ अपने साम्राज्यवादी संबंधों से पीछे नहीं हटने के इंग्लैंड के रवैए के ही हिस्से हैं. यह भी दिलचस्प है कि ऐतिहासिक रूप से लातिनी अमेरिका में फ़ुटबॉल को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ी व यूरोपीय प्रशिक्षण और निवेश का भी बड़ा योगदान रहा है. असल में अमेरिका और यूरोप के साम्राज्यवादी इतिहास और मौजूदा मंसूबों के संदर्भ में ही लातिनी अमेरिका के अनेक फुटबॉल खिलाड़ियों के राजनीतिक और क्रांति समर्थक होने को समझा जा सकता है. इसके साथ उस महादेश में फुटबॉल और राजनीति के व्यापक अंतरसंबंधों के इतिहास को भी देखा जाना चाहिए.

टोनी मैसन ने लातिनी अमेरिका में राजनीति और फ़ुटबॉल के अंतरसंबंधों के बारे में अपनी किताब ‘पैसन ऑफ़ द पीपुल? फुटबॉल इन साउथ अमेरिका’ में लिखा है कि इस महादेश में सैनिक और निर्वाचित राष्ट्राध्यक्षों ने बीसवीं सदी के शुरू से ही इस खेल के साथ अपने को जोड़कर जनता से जुड़ने और उसका भरोसा जीतने की कोशिश की क्योंकि यह खेल बड़ी तेज़ी से एक अहम सांस्कृतिक परिघटना बनता जा रहा था. बीती सदी में विश्व कप समेत विभिन्न आयोजनों पर बड़े ख़र्च के साथ सरकारों ने टीमों में भी निवेश किया तथा खिलाड़ियों के विदेश जाने से रोकने के प्रयास किए.

मैसन ने उल्लेख किया है कि यह सच है या फिर कहानी, पर कहा जाता है कि ब्राज़ील के साओ पॉलो के एक नेता और सांतोस क्लब के अध्यक्ष को 1960 में धमकी दी गयी थी कि अगर पेले ने क्लब छोड़ा, तो उसे दोबारा चुनाव लड़ने का इरादा छोड़ देना चाहिए और अपने जीवन के दिन गिनना शुरू कर देना चाहिए. कहा यह भी जाता है कि एक धनिक ने पेले को रखने के लिए सांतोस को बिना ब्याज़ का क़र्ज़ मुहैया कराया था. यह खेल शासकों की ओर से जनता को बहलाने के लिए एक तमाशा भी था और साथ ही देश को एकजुट कर केंद्रीय सत्ता की शक्ति को स्थापित करने का हथियार भी. फुटबॉल के ग्लैमर और पैसे ने भी ग़रीब बस्तियों में इसके लिए आकर्षण पैदा किया. अनेक विद्वानों ने बताया है कि जहां आभिजात्य वर्ग ने इसे संगठित होते श्रमिक आंदोलन के बरक्स एक अवरोध की तरह बढ़ावा दिया, वहीं वंचित समूहों के लिए यह सामाजिक मेलजोल का साधन भी बना. मिश्रित नस्लों की बड़ी आबादी के लिए यह एकता और राष्ट्रवाद का आधार भी बना. अस्सी के दशक के मध्य में तानाशाहियों के पतन के बाद विदेशी क्लबों में जाने से खिलाड़ियों को रोक पाना सरकारों के लिए मुश्किल भी हो गया था.

इस क्रम में यह भी हुआ कि दक्षिण अमेरिका में फुटबॉल संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन गया तथा उसकी एक विशिष्ट क्षेत्रीय शैली बन गयी. इतिहासकार ब्रेंदा एल्सी ने बताया है कि फुटबॉल भले ही ब्रिटेन से शुरू हुआ, लेकिन उसे पूर्णता दक्षिण अमेरिका में मिली. बहरहाल, अगर फुटबॉल के राजनीतिक महत्व की बात करें, तो इसका सीधा संबंध लातिनी अमेरिका के देशों के सघन होते राष्ट्रवाद तथा लातिनी अमेरिकी पहचान से जुड़ता है और इसी वजह से उसमें साम्राज्यवाद को लेकर दुराग्रह है और अपने देशों को प्रतिष्ठित करने की सोच है.

फुटबॉल समेत किसी भी खेल के सिरमौर वैश्विक खिलाड़ियों में पेले का स्थान अप्रतिम है. वे फ़ीफ़ा द्वारा माराडोना के साथ बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माने गए हैं. वे 1995 से 1998 तक ब्राज़ील के खेल मंत्री भी रहे हैं. वे कभी-कभी ब्राज़ील की स्थिति पर संयमित चिंता जताते रहे हैं, लेकिन नस्लभेद को लेकर उनके विचार महत्वपूर्ण हैं. ब्राज़ील उन देशों में है, जहां सबसे आख़िर में, 1888 में, ग़ुलामी प्रथा का अंत हुआ था, लेकिन बीसवीं सदी के मध्य तक नस्ल के आधार पर सामाजिक विभाजन बना रहा था. यह वही समय है, जब यूरोप से फुटबॉल यहां पहुंचा था. उल्लेखनीय है कि लातिनी अमेरिका में सबसे अधिक अश्वेत-लातिनी आबादी यहीं है. यह व्यापक मान्यता है कि 1958 में ब्राज़ील द्वारा विश्व कप में जीत हासिल करने और उसमें पेले की अग्रणी भूमिका ने नस्ली भेदभाव और ग़ुलामी को रोकने में बड़ा योगदान दिया था. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अफ़्रीका की उनकी पहली यात्रा के दौरान लोग उन्हें एक आशा और प्रेरणा के रूप में देख रहे थे कि एक अश्वेत कम नस्ली पूर्वाग्रह वाले देश में इतना कुछ हासिल कर सकता है और एक श्वेत देश में धनी हो सकता है. यह कहानी भी ख़ूब कही-सुनी जाती है कि यह पेले का ही असर था कि नाइजीरिया के गृहयुद्ध के दोनों ख़ेमों ने अपनी लड़ाई दो दिन के लिए इसलिए रोक दी थी कि पेले लागोस में मैच खेल सकें.

ब्राज़ील के ही सोक्रेटीज़ अपने बेबाक़ राजनीतिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं और उनके तेवर माराडोना से मिलते थे. वे अपने करियर के शुरुआत से ही लोकतंत्र बहाली के आंदोलन से जुड़े थे और एक संगठन भी बनाया था. जैसा कि उल्लिखित किया गया है, सैनिक तानाशाही के लिए फुटबॉल का बहुत महत्व था और उसके ख़िलाफ़ बोलना निश्चित ही बड़े साहस का काम था. एक दफ़ा तो सोक्रेटीज़ ने लाखों लोगों की सभा में धमकी दे दी थी कि यदि राष्ट्रपति का सीधा चुनाव करने की मांग सैन्य शासक नहीं मानेंगे, तो इटली में जाकर फ़ुटबॉल खेलेंगे. वे ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लूला की प्रशंसा तो करते ही थे, बचपन से फ़िदेल कास्त्रो, चे गेवारा और बीटल्स बैंड के जॉन लीनन को अपना आदर्श मानते थे. एडवार्डो गलियानो ने जो पेले के बारे में लिखा है, वह बात सोक्रेटीज़ पर भी लागू होती है कि समय के साथ नस्लभेद से ग्रस्त फ़ुटबॉल ने दूसरे मूल के लोगों को रास्ता दिया और स्थिति यह हो गयी कि ब्राज़ील के बेहतरीन खिलाड़ी या तो अश्वेत हैं या फिर मिश्रित नस्ल के. पेले ने सोक्रेटीज़ को 2004 में सौ जीवित बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार किया था, तो कुछ समूहों ने उन्हें इतिहास के सौ बेहतरीन खिलाड़ियों में जगह दी है. अनेक ऐसे फुटबॉलर और एथलीट हैं, जो विभिन्न दलों से संबद्ध हैं या समाज के उत्थान के लिए समाजसेवी के रूप में सक्रिय हैं.

लातिनी अमेरिका में बीते दो-ढाई दशकों में समाजवादी राजनीति के तेज़ उभार में माराडोना ने उसके साथ नाता जोड़कर अपनी छवि का बड़ा विस्तार कर दिया है. कुछ टिप्पणीकार कहते हैं कि समाजवादी राजनीति के लिए माराडोना का नाम प्रचार में सहायक रहा है. लेकिन यह सतही आकलन है. जिस ग़रीबी और वंचना से ये खिलाड़ी उभरकर आए हैं तथा देश-दुनिया को समझाने का प्रयास किया है, उससे उनकी राजनीतिक चेतना बनी है. उन्होंने खिलाड़ियों का संगठन बनाने का प्रयास भी किया था. फ़ीफ़ा द्वारा बोलिविया में ऊंचाई पर मैच कराने पर पाबंदी के ख़िलाफ़ भी उन्होंने आवाज़ उठायी थी. माराडोना कहते थे कि चे के बारे में पढ़ने तथा क्यूबा में चार साल तक रहने से उनकी समझ का विस्तार हुआ है. वे क्यूबा में अपने नशे की लत का उपचार के लिए रहे थे. इस बारे में उन्होंने कहा है कि अर्जेंटीना के अस्पतालों ने उनके लिए दरवाज़ा बंद कर दिया था क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि माराडोना उनके यहां मरे. ऐसे में क्यूबा ने उन्हें अपने यहां बुलाया था. यह भी याद रखना चाहिए कि मुसीबत के दौर में अक्सर फ़िदेल कास्त्रो उन्हें स्वस्थ होने के लिए उत्साहित करते थे. माराडोना की महानता को समझना है, तो लातिनी अमेरिका के इतिहास और वर्तमान में झांकना होगा, जैसे मोहम्मद अली की महानता की पड़ताल करनी है, तो अमेरिकी इतिहास को बांचना होगा.

यह कमाल ही है कि मौत की ओर ले जाती तबाही से माराडोना ने अपने को वापस हासिल किया था. यह उनके साहस और तेवर का ही परिचायक है कि वे फ़ीफ़ा को सीधे माफ़िया गिरोह कह सकते थे तथा प्रबंधक के रूप में अपनी टीम में वापसी आकर सकते थे. एमीर कुस्तुरिका की फ़िल्म में वे अफ़सोस से कहते हैं कि अगर वे नशे की चपेट में नहीं आते, तो फुटबॉल की दुनिया में वे किस ऊंचाई पर जाते. मनुष्य के रूप में यही कमी-बेसी तो माराडोना को महान बनाती है और पॉपुलर और पॉलिटिकल कल्चर में एक और अध्याय जोड़ती है… महानतम मोहम्मद अली की तरह…

Also see
article imageविराट कोहली की खेल भावना में छिपे सबक
article imageखेल-खेल में बड़े खेल के शिकार हुए पांंड्या और राहुल
article imageविराट कोहली की खेल भावना में छिपे सबक
article imageखेल-खेल में बड़े खेल के शिकार हुए पांंड्या और राहुल
subscription-appeal-image

Power NL-TNM Election Fund

General elections are around the corner, and Newslaundry and The News Minute have ambitious plans together to focus on the issues that really matter to the voter. From political funding to battleground states, media coverage to 10 years of Modi, choose a project you would like to support and power our journalism.

Ground reportage is central to public interest journalism. Only readers like you can make it possible. Will you?

Support now

You may also like