एक पर पत्रकारों को अदालतों में घसीटने तो दूसरे पर ऑनलाइन बदनामी और ट्रोलिंग का आरोप है.
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ सूची में लगातार दूसरे साल दो भारतीय नाम शामिल हैं. अडाणी ग्रुप और वेबसाइट ऑपइंडिया.
आरएसएफ ने 2 नवंबर को पत्रकारों के खिलाफ अपराधों को खत्म करने के अंतरराष्ट्रीय दिवस से पहले 2026 की सूची जारी की. इसमें कुल 33 नेताओं और संगठनों को शामिल किया गया है. पिछले साल यह संख्या 34 थी.
अडाणी ग्रुप को ‘कानूनी’ श्रेणी में रखा गया है. इस श्रेणी में उन लोगों और संस्थाओं को शामिल किया गया है, जो पत्रकारों को कानूनी मामलों में उलझाकर परेशान करते हैं. इसमें तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन, हांगकांग के मुख्य कार्यकारी जॉन ली का-चिउ और अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (एफसीसी) के प्रमुख ब्रेंडन कार भी शामिल हैं.
वहीं, ऑपइंडिया को ‘सामाजिक’ श्रेणी में रखा गया है. इस श्रेणी में उन लोगों और संस्थाओं को शामिल किया गया है, जो मीडिया की छवि खराब करते हैं और पत्रकारों के प्रति अविश्वास फैलाते हैं. इस सूची में एलन मस्क और अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर मिलेई भी शामिल हैं.
आरएसएफ के मुताबिक, मिलेई ने अप्रैल और मई 2026 के बीच 47 दिनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ 1,674 पोस्ट साझा किए.
अडाणी ग्रुप और ऑपइंडिया पिछले साल भी इसी सूची में और इन्हीं श्रेणियों में शामिल थे. आरएसएफ के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत फिलहाल 180 देशों में 157वें स्थान पर है.
आरएसएफ का कहना है कि ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ की यह सूची उसके सालाना वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का दूसरा पक्ष है. इसमें पांच श्रेणियां बनाई गई हैं. ये हैं- राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक, कानूनी और सामाजिक. सूची 2026 के दौरान पत्रकारिता पर हुए हमलों के आधार पर तैयार की गई है.
आरएसएफ के महानिदेशक थिबो ब्रुटिन ने माना कि यह सूची कुछ हद तक व्यक्तिपरक है. हालांकि, उनका कहना है कि इसमें उन्हीं नेताओं और संगठनों को जगह दी गई है, जिन्होंने मीडिया को निशाना बनाने का स्पष्ट इरादा दिखाया है.
अडाणी ग्रुप पर पत्रकारों को चुप कराने के आरोप
आरएसएफ के मुताबिक, अडाणी ग्रुप और उसकी सहायक कंपनियों ने 2017 से अब तक 15 से ज्यादा पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ करीब 10 कानूनी मामले दर्ज कराए हैं.
आरएसएफ का आरोप है कि ग्रुप नागरिक और आपराधिक मानहानि के मामलों का इस्तेमाल स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने के लिए करता है. संगठन ने इसे पत्रकारों को चुप कराने की एक व्यवस्थित कोशिश बताया है.
इस साल सितंबर में खोजी पत्रकार रवि नायर की गिरफ्तारी भी इस सूची में शामिल है. अडाणी ग्रुप की ओर से दायर आपराधिक मानहानि के मामले में नायर को गिरफ्तार किया गया था. उन्हें करीब एक हफ्ते तक हिरासत में रखा गया. बाद में उन्हें जमानत मिल गई.
हालांकि, ग्रुप से जुड़ी रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर नायर के खिलाफ मानहानि के तीन मामले अभी भी चल रहे हैं. आरएसएफ के मुताबिक, अडाणी ग्रुप और उसकी सहायक कंपनियों की कवरेज को लेकर देशभर के पत्रकारों के खिलाफ 11 दीवानी और आपराधिक मामले लंबित हैं.
ऑपइंडिया पर पत्रकारों को निशाना बनाने का आरोप
आरएसएफ ने हिंदुत्व समर्थक वेबसाइट 'ऑपइंडिया' को स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमले करने वाली वेबसाइट बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपइंडिया भरोसेमंद समाचार संस्थानों को ‘लिबरल मीडिया कार्टेल’ का हिस्सा बताती है. इसके साथ ही, वेबसाइट ऑनलाइन ट्रोल्स के जरिए इस प्रचार को बढ़ावा देती है.
आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को अक्सर विदेशी ताकतों का ‘प्रोपेगेंडा’ फैलाने वाला बताया जाता है. उन्हें ‘सोरोस इकोसिस्टम’ या ‘भारत विरोधी लॉबी’ का हिस्सा भी कहा जाता है.
आरएसएफ ने 2026 में ऑपइंडिया के दर्जनों ऐसे लेखों का जिक्र किया है, जिनमें पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया गया. इनमें से कई लेखों के बाद ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाएं भी हुईं.
इसका एक प्रमुख उदाहरण भारत के बाहर का है. नॉर्वे के अखबार डाग्सविसन की पत्रकार हेले लिंग ने ओस्लो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से पत्रकारों के सवालों का जवाब न देने की आलोचना की थी. इसके बाद मई में ऑपइंडिया ने उनके बारे में एक लेख प्रकाशित किया. इसमें उन्हें ‘चीनी प्रोपेगेंडा एजेंट’ बताया गया और उनके सवालों को ‘पहले से तय एजेंडे वाले सवाल’ कहा गया.
आरएसएफ का कहना है कि इस लेख ने उनके खिलाफ बड़े स्तर पर ऑनलाइन नफरत फैलाने में मदद की. इस अभियान में हिंदू राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट शामिल थे.
सूची से कई नाम बाहर
2026 की सूची से कई नाम हटा दिए गए हैं. इनमें अली खामेनेई, निकोलस मादुरो, विक्टर ऑर्बन और अलेक्जेंडर वुचिच शामिल हैं.
आरएसएफ के मुताबिक, ऑर्बन और वुचिच चुनाव हार गए. संगठन का कहना है कि इससे पता चलता है कि जब नागरिकों को मौका मिलता है, तो वे नागरिक स्वतंत्रताओं पर हमलों के लिए सरकारों को चुनाव में सजा दे सकते हैं.
वहीं, इस साल की सूची में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट तोकायेव को शामिल किया गया है.
मीडिया की आलोचना करना आसान है. लेकिन इसे बेहतर बनाने के लिए क्या किया जा रहा है? स्वतंत्र पत्रकारिता को समर्थन दें और आज ही न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें.
फिलहाल जेल में ही रहेंगे रवि नायर, गुजरात हाईकोर्ट ने अडाणी को जवाब का वक्त दिया