एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया है कि 2 अक्टूबर को जब वह जंतर-मंतर के पास हुए प्रदर्शन की कवरेज कर रही थी तो उस दौरान एसीपी विवेक भगत ने उनके साथ यौन उत्पीड़न और मारपीट की.
5 अक्टूबर की सुबह दिल्ली पुलिस ने करीब 20 लोगों को संसद मार्ग थाने के बाहर से हिरासत में ले लिया. इनमें कुछ पत्रकार और कुछ कंटेंट क्रिएटर भी शामिल थे. हिरासत के बाद पुलिस इन्हें दिल्ली कैंट स्थित कैंप ले गई.
दरअसल, ये लोग पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे. इनका आरोप था कि पुलिस असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (एसीपी) विवेक भगत के खिलाफ प्राथमिकी यानि एफआईआर दर्ज नहीं कर रही है. बताते चलें कि हाल ही में भगत को अतिरिक्त डीसीपी (डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस) के तौर पर पदोन्नत किया गया है. हालांकि, सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, मामले में “पूरी जांच” लंबित रहने तक उन्होंने “अपनी इच्छा से” इस पद से हटने का फैसला किया है.
गौरतलब है कि एक महिला पत्रकार ने आरोप लगाया है कि 2 अक्टूबर को जब वह जंतर-मंतर के पास हुए प्रदर्शन की कवरेज कर रही थी तो उस दौरान भगत ने उनके साथ यौन उत्पीड़न और मारपीट की. हालांकि, पुलिस ने हिरासत में लिए गए 20 लोगों में से 17 के खिलाफ संसद मार्ग थाने में प्राथमिकी दर्ज की है.
शिकायतकर्ता की दोस्त ब्यूटी ने 5 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “पुलिस ने यौन उत्पीड़न और मारपीट की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की, लेकिन हमारे लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी.”
इन 17 प्रदर्शनकारियों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराओं 223(a), 221, 132, 190 (गैरकानूनी जमावड़ा), 191(2) (दंगा) और 3(5) के अलावा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से रोकने वाले कानून की धारा 3 के तहत मामला दर्ज किया गया है.
पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएस) की धारा 163 का उल्लंघन किया, गैरकानूनी जमावड़ा किया और कथित तौर पर पुलिसकर्मियों पर हमला करने के साथ एक बस को नुकसान पहुंचाया.
5 अक्टूबर की रात पटियाला हाउस कोर्ट ने संसद मार्ग प्रदर्शन के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए 17 प्रदर्शनकारियों को जमानत दे दी. इनमें से चार को निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया, जबकि बाकी 13 लोग जरूरी जमानतदार पेश नहीं कर सके, इसलिए उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि दो आरोपियों धर्मेंद्र और समर्थ ने आरोप लगाया कि हिरासत में लिए जाने के बाद संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के अंदर उन्हें पीटा गया. उनके मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट (एमएलसी) में चोटों का जिक्र है.
जमानत आदेश में अदालत ने कहा, “चूंकि आरोपी धर्मेंद्र और समर्थ ने हिरासत में प्रताड़ना के आरोप लगाए हैं, इसलिए इस संबंध में डीसीपी, नई दिल्ली से रिपोर्ट मंगाई जाए.”
अन्य हिरासत में लिए गए लोगों और उनके दोस्तों ने भी आरोप लगाया है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बस के अंदर पीटा.
हिरासत में लिए जाने की घटना
प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाते समय मौके पर मौजूद अनिल ने बताया, “हमने पुलिस अधिकारियों से एफआईआर के बारे में अपडेट मांगने की बात की. करीब सुबह 7 बजे (5 अक्टूबर को) हमने उनसे पूछा और उन्होंने हमें वहीं रोक दिया. इसके बाद हम वहीं बैठ गए. अचानक कुछ महिला पुलिसकर्मी आईं और हमें हिरासत में लेना शुरू कर दिया. उन्होंने कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, लेकिन मुझे नहीं लिया.” बता दें कि अनिल डिजिटल आउटलेट न्यूज़ डिग्गी के साथ भी काम करते हैं.
पुलिस ने उस महिला पत्रकार को भी हिरासत में लिया, जिसने एसीपी भगत पर यौन उत्पीड़न और मारपीट का आरोप लगाया था. हालांकि, उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर में उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया है.
दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन में करीब 20 लोगों को हिरासत में रखा गया था. अनिल और ब्यूटी, जो हिरासत में लिए गए कुछ लोगों के दोस्त हैं, ने बताया कि पुलिस ने कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को बस के अंदर पीटा.
हिरासत में लिए गए लोगों को पुलिस स्टेशन के बगल में स्थित दिल्ली कैंट जनरल अस्पताल ले जाया गया. उनके और उनके दोस्तों के मुताबिक, वहां उनका एमएलसी नहीं किया गया और उन्हें दर्द की दवा के इंजेक्शन दिए गए.
बाद में हिरासत में लिए गए लोगों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्होंने दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन में पांच घंटे से ज्यादा समय तक इंतजार किया. दिल्ली पुलिस ने एसीपी भगत के खिलाफ शिकायत करने वाली महिला पत्रकार को भी कुछ जानकारी दर्ज कराने के लिए बुलाया.
ब्यूटी के मुताबिक, शिकायतकर्ता से बात करने के लिए जो अधिकारी आया था, वह सादे कपड़ों में था. शिकायतकर्ता ने वर्दी नहीं पहने अधिकारी से बात करने से इनकार कर दिया.
इसके बाद पुलिस ने हिरासत में लिए गए लोगों को एमएलसी के लिए बस से राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल ले गई. वहीं शिकायतकर्ता और एक अन्य महिला को अलग वाहन से मंदिर मार्ग अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका एमएलसी किया गया और बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.
बाकी 17 हिरासत में लिए गए लोगों को जमानत की कार्यवाही के लिए पटियाला हाउस कोर्ट ले जाया गया.
अदालत में क्या हुआ?
बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि प्रदर्शन में करीब 50 लोग शामिल थे, लेकिन सिर्फ 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया. बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि कथित घटना से संबंधित कोई सीसीटीवी फुटेज रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया है और आरोपी युवा हैं तथा उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है.
चार महिलाओं- अंशिका गुप्ता, करिश्मा मेहता, संजू और कुंजल को 15 हजार रुपये के निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया.
हिरासत में रह गए 13 आरोपियों में से न्यूज़लॉन्ड्री ने दो के इंस्टाग्राम अकाउंट की पहचान की है. गजेंद्र सिंह समाचार, घटनाओं और प्रदर्शनों से जुड़े वीडियो बनाते हैं और न्यूज़ डिग्गी से भी जुड़े हैं. आईटी नियमों के मुताबिक उनका निजी इंस्टाग्राम अकाउंट प्रतिबंधित है.
अनुज भगत भी समाचार से जुड़े वीडियो बनाते हैं और अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर वायरल वीडियो की व्याख्या करते हैं.
जरूरी जमानतदार पेश नहीं किए जाने के कारण सभी 13 आरोपी न्यायिक हिरासत में रहे.
पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायतें
2 अक्टूबर को नेहा बोरा के जंतर मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान करने के बाद विरोध-प्रदर्शन शुरू हुआ था. इसे कवर करने पहुंची कुछ महिला पत्रकारों ने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न और मारपीट के आरोप लगाए.
दिल्ली पुलिस के जवानों के खिलाफ तीन शिकायतें दर्ज की गई हैं. न्यूज़लॉन्ड्री ने इन तीनों शिकायतों की प्रतियां हासिल की हैं. शिकायतकर्ताओं में न्यूज़ डिग्गी और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से जुड़ी एक स्वतंत्र पत्रकार, एक अन्य स्वतंत्र पत्रकार और सीजेपी की सदस्य एक प्रदर्शनकारी शामिल हैं.
पहली शिकायतकर्ता न्यूज़ डिग्गी से भी जुड़ी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. अपनी शिकायत में उन्होंने कहा है कि वह केरल हाउस के पास रिपोर्टिंग कर रही थीं. जब उन्होंने पुलिस से पूछा कि नेहा को महिला पुलिसकर्मी की बजाय एक पुरुष पुलिस अधिकारी हिरासत में क्यों ले रहा है, तब पुलिस अधिकारी विवेक भगत ने कथित तौर पर उनका यौन उत्पीड़न और मारपीट की.
शिकायत के मुताबिक, उन्होंने इसका विरोध किया, लेकिन भगत ने इसे खारिज कर दिया. इसके बाद कुछ महिला पुलिसकर्मी आईं और उन्हें घेर लिया.
दूसरी शिकायतकर्ता एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. उन्होंने अशोका रोड पर प्रदर्शन की कवरेज के दौरान यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है.
उन्होंने अपनी शिकायत में आरोप लगाया, “मैं योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को हिरासत में लिए जाने की रिकॉर्डिंग कर रही थी, तभी मुझे अपनी पीठ पर किसी के छूने का एहसास हुआ.”
उन्होंने कहा कि जब वह मुड़ीं तो एक पुलिस अधिकारी “बहुत करीब” खड़ा था. शिकायत के मुताबिक, जब उन्होंने अधिकारी से इस बारे में सवाल किया तो उसने कथित तौर पर उनके आरोप को खारिज कर दिया.
तीसरी शिकायतकर्ता एक गृहिणी और सीजेपी की सदस्य हैं. उन्होंने भी एक पुलिस अधिकारी पर यौन उत्पीड़न और मारपीट का आरोप लगाया है.
उन्होंने कहा, “मैं 3 अक्टूबर को अशोका रोड पर थी, जब पुलिस ने सभी को बेरहमी से हिरासत में लिया. मुझे पीछे से मारा गया. मुझे नहीं पता कि वह कोहनी थी या कुछ और. जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो एक पुरुष पुलिस अधिकारी था. मैंने उससे कहा, ‘आपको शर्म नहीं आ रही है?’ इसके बाद पुलिस अधिकारी ने मुझे धक्का दिया. मैंने सीजेपी ग्रुप को घटना के बारे में बताया और शिकायत दर्ज की.”
अपनी शिकायत में उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी पुलिस अधिकारी नेमप्लेट नहीं पहने था, लेकिन उन्होंने दावा किया कि वह उसके चेहरे से उसे पहचान सकती हैं.
दिल्ली पुलिस का जवाब
दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया. इसमें महिला प्रदर्शनकारियों के साथ शारीरिक मारपीट के आरोपों को “निराधार और भ्रामक” तथा “तथ्यात्मक रूप से गलत” बताया गया.
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की कवरेज करने वाले पत्रकारों के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए हैं. इनमें कहा गया है कि पत्रकारों को वैध पहचान पत्र साथ रखना चाहिए और उसे हर समय दिखाई देने की स्थिति में रखना चाहिए. उन्हें पुलिस की कार्रवाई में बाधा नहीं डालनी चाहिए और रिकॉर्डिंग करते समय उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए.
न्यूज़लॉन्ड्री ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले और हिरासत में लिए गए लोगों के साथ कथित मारपीट के आरोपों पर अपडेट लेने के लिए नई दिल्ली के डीसीपी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
न्यूज़लॉन्ड्री ने यौन उत्पीड़न और मारपीट की शिकायत की स्थिति जानने के लिए दिल्ली क्राइम ब्रांच से भी संपर्क किया, लेकिन वहां से भी कोई जवाब नहीं मिला. अगर कोई जवाब आता है तो उसे इस रिपोर्ट में जरूर शामिल किया जाएगा.
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