सवा तीन महीने लंबी बाढ़ का मुकाबला दो वक्त की खिचड़ी से

कहानी पश्चिमी चंपारण जिले के दो पंचायतों की जहां 26 जून से ही लगातार बाढ़ का पानी है.

WrittenBy:पुष्यमित्र
Date:
तीन माह से यातायात का एक मात्र जरिया ऐसी नावें हैं, जिन पर असुरक्षित तरीके से सफर करने को मजबूर हैं हजारों लोग.

37 साल की कलावती देवी अपने घर के सामने बनी ऊंची नींव पर बैठी घास के लंबे पत्तों को तराश रही हैं. उनके पीछे एक चौकी पर उनके तीन बच्चे लुढ़के हुए हैं, थोड़े और पीछे तीन बकरियां और उनके दो बच्चे हैं. ऊपर प्लास्टिक के बोरों को जोड़कर बना एक तिरपाल जैसा कुछ टंगा है. पिछले दस दिनों से यह उनका, उनके चार बच्चों और पांच बकरियों का आशियाना है. क्योंकि उनके गांव मंगलपुर में भीषण बाढ़ आई हुई है. 

कलावती के पति रोजगार के सिलसिले में बाहर रहते हैं, इसलिए संकट के इस पूरे अंतराल में उन्होंने अपने चार बच्चों और पांच बकरियों को अकेले संभाला है. सबके लिए भोजन का इंतजाम भी किया है. 

कैसे किया? इस सवाल पर कलावती कहती हैं, “घर में चार चौकियां थीं, चारों को इस जगह ले आए. नीचे ईंट रख दिये तो चौकियां ऊंची हो गई. उसी चौंकी पर सबको बिठाकर रखते थे. एक कोने में चूल्हा रखकर खाना भी पकाते थे. जैसे-तैसे संभाल लिये. जब सब हमारे ही भरोसे है तो हमीं को संभालना होगा न?” वे इशारे से बताती हैं कि चौंकी की बैठने वाली जगह से सिर्फ दस इंच नीचे तक पानी पहुंच गया था.  

“पानी और बढ़ जाता तो क्या करते? कोई बचाने नहीं आया?”

“ऊंह, कौन आता है बचाने गरीब लोगों को. जिनको पैसा था वे दू हजार-तीन हजार देकर नाव मंगवाये और अपने पलिवार (परिवार) को बाहर निकाले, अपने घर जोगने के लिए रह गये. हमारे पास पैसा था?”


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