‘ऑफिस के मतभेद’: चुनाव आयोग विवाद पर टीवी मीडिया का ‘डैमेज कंट्रोल’

प्राइम टाइम के कई एंकर्स ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को विपक्ष की राजनीति के चश्मे से देखा और दिखाया.

टीवी मीडिया एंकर रुबिका, सुशांत सिन्हा, राहुल शिवशंकर और सीईसी ज्ञानेश कुमार के कटआउट.

बीते दिन इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसके बाद प्राइम टाइम न्यूज में इस रिपोर्ट को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. कुछ एंकर्स ने चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण को प्रमुखता दी, जिसमें कहा गया कि किसी भी फैसले से पहले चर्चा और असहमति की प्रक्रिया होती है और आयोग के फैसले सर्वसहमति से लिए गए हैं. वहीं, कुछ ने इसे विपक्ष के लिए बैठे-बिठाए नरेंद्र मोदी पर हमले का एक और मौका करार दिया. 

आठ हिंदी और अंग्रेजी न्यूज एंकरों के कार्यक्रमों की समीक्षा के दौरान हमने पाया कि करीब चार ने इसी तर्क को आगे बढ़ाया. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में जिस मतभेद की बात की गई है, वह असामान्य नहीं है और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है. 

वहीं एनडीटीवी की पद्मजा जोशी और इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने आयोग से उन सवालों के जवाब मांगे, जो उसके स्पष्टीकरण से साफ नहीं हुए थे. दोनों ने खास तौर पर उस सिस्टम तक पहुंच सीमित किए जाने पर सवाल उठाया, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची तैयार करने में होता है.

आलोचना को विपक्ष की राजनीति से जोड़ना

न्यूज़ 18 के राहुल शिवशंकर ने अपने कार्यक्रम की शुरुआत इस बात से की कि चुनाव आयोग हमेशा से मोदी सरकार के आलोचकों के निशाने पर रहता है और आयोग पर अक्सर बिना पर्याप्त सबूत के आरोप लगाए जाते हैं.

उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस का नाम नहीं लिया और उसे सिर्फ एक 'मुख्यधारा का अखबार' कहा. शिवशंकर ने कहा कि आयोग के भीतर असहमति इस बात का संकेत है कि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई तानाशाह नहीं हैं. उनके मुताबिक, अगर आयोग से कोई गलती होती है तो उस पर सवाल उठाना जवाबदेही का हिस्सा है.

न्यूज़ 18 इंडिया के अमिश देवगन देवगन ने भाजपा के इस तर्क का जिक्र किया कि असहमति 'स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान' है. उन्होंने अपने और सहकर्मियों के बीच होने वाले मतभेद का उदाहरण दिया.

कांग्रेस नेता गुरदीप सप्पल से बातचीत के दौरान उन्होंने पूछा कि आयोग के भीतर मतभेद को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है. इसके बाद उन्होंने खुद ही इसका जवाब देते हुए कहा कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि यह विपक्ष के राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल है.

टाइम्स नाउ नवभारत के सुशांत सिन्हा ने रिपोर्ट को विपक्ष की ओर से नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए बनाए गए 'नए एजेंडे' के तौर पर पेश किया. उन्होंने कहा कि चुनावी हार के लिए विपक्ष पहले ईवीएम हैकिंग और वोट चोरी जैसे आरोप लगाता रहा है और अब चुनाव आयोग एवं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाया जा रहा है.

इसके बाद सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आई 14 आपत्तियों पर बात की. उन्होंने पूछा कि इन आपत्तियों का मतदाता सूची पर आखिर क्या असर पड़ा.

28 अक्टूबर 2025 की पहली आपत्ति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आयोग के नाम से बिना मंजूरी जारी किए गए पत्रों और आदेशों पर सवाल उठाया गया था. सिन्हा ने कहा कि उन्हें इसमें कुछ असामान्य नजर नहीं आता.

अन्य चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की उस शिकायत पर कि उन्हें नए आईटी नियमों और पोर्टल के बारे में मीडिया से जानकारी मिली, सिन्हा ने इसे 'आंतरिक मामला' बताया. वहीं, विवेक जोशी की अधिकारियों के विदेश दौरे को लेकर आपत्ति पर उन्होंने सवाल किया कि इस असहमति को प्रकाशित करने का क्या मतलब है और इसका एसआईआर पर क्या असर है. 

सिन्हा ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में हर आपत्ति के बाद क्या हुआ, यह स्पष्ट नहीं किया गया. हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि रिपोर्ट में आयोग और दोनों चुनाव आयुक्तों से यह पूछा गया था कि आपत्तियों के बाद कोई कार्रवाई हुई या नहीं, लेकिन इस पर जवाब नहीं मिला.

उन्होंने यह भी कहा कि चार लोगों के एक कार्यालय में अगर एक व्यक्ति दूसरे से सवाल करता है तो हर सवाल को 'असहमति' के तौर पर पेश करने से मतभेदों की संख्या बड़ी दिखाई देने लगती है.

उनके मुताबिक, इन 14 आपत्तियों का सार आयोग के 'कामकाज के माहौल' और संभावित 'आंतरिक राजनीति' से जुड़े सवालों तक सीमित है. उन्होंने कहा कि अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है और आयोग में तीन चुनाव आयुक्त इसलिए हैं ताकि उनके बीच चर्चा और असहमति हो सके.

तीन अलग-अलग चैनलों के एंकरों ने आयोग के मतभेदों को समझाने के लिए लगभग एक ही तरह का उदाहरण दिया- ऑफिस के कामकाज का. अमिश देवगन देवगन ने सहकर्मियों के बीच होने वाले मतभेदों की बात की तो सुशांत सिन्हा ने कार्यालय में काम करने वाले लोगों का उदाहरण दिया और नविका कुमार ने दो पत्रकारों के किसी खबर को कवर करने को लेकर अलग राय रखने का उदाहरण दिया.

‘बात को बढ़ा-चढ़ाकर देखा जा रहा है?’

टाइम्स नाउ नवभारत पर रुबिका लियाकत ने 14 आपत्तियों को 'पूरी तस्वीर का सिर्फ आधा हिस्सा' बताया. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में आयोग ने करीब 40 फैसले लिए और सभी फैसले सर्वसहमति से हुए.

उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ऐसा कौन-सा फैसला था, जिसे किसी एक व्यक्ति ने लिया और बाकी दो आयुक्त उससे असहमत थे. उनका तर्क था कि अगर दो आयुक्त किसी फैसले के खिलाफ होते तो वह फैसला लागू ही नहीं हो सकता था.

टाइम्स नाउ पर नविका कुमार ने पूछा किया कि क्या आयोग के भीतर असहमति 'वोट चोरी' के आरोप को साबित करती है या राजनीतिक आरोप सबूतों से आगे निकल गए हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि एसआईआर की ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर किए गए 13 करोड़ नामों का मतलब यह नहीं है कि ये सभी नाम अंतिम रूप से हटा दिए गए हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी जिक्र किया जिसमें आयोग के एसआईआर कराने के अधिकार को बरकरार रखा गया था.

नविका कुमार ने पूछा कि क्या सामान्य चर्चा और बहस के बाद सहमति बनने की प्रक्रिया को 'तिल का ताड़' बनाया जा रहा है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अभी तक सार्वजनिक रूप से अपनी बात नहीं रखी है.

बाद के एक कार्यक्रम में उन्होंने भाजपा के प्रवक्ता से यह सवाल भी पूछा कि रिपोर्ट सामने आने के बाद आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की और आयोग की बैठक चार महीने से क्यों नहीं हुई.

आयोग और ज्ञानेश कुमार से सवाल

एनडीटीवी पर पद्मजा जोशी ने चुनाव आयोग के सर्वसम्मति वाले दावे पर सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि जब कम से कम दो चुनाव आयुक्तों ने रिकॉर्ड पर अपनी असहमति दर्ज कराई है तो फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया कैसे कहा जा सकता है.

उन्होंने मतदाता सूची तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर पर सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि क्या इसकी पहुंच को केंद्रीकृत किया गया है और चुनावी रजिस्ट्रेशन अधिकारियों की इस सिस्टम तक पहुंच सीमित क्यों की गई.

उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या ऐसी परिस्थितियों में मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर भरोसा किया जा सकता है.

इंडिया टीवी पर रजत शर्मा ने ज्ञानेश कुमार पर सीधे सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के जवाब यह स्पष्ट नहीं करते कि आयोग के डाटा का नियंत्रण कुछ अधिकारियों को देने से पहले ज्ञानेश कुमार ने किससे सलाह ली थी, मतदाता सूची वाले सिस्टम की पहुंच सीमित क्यों की गई और फॉर्म 6 में बदलावों पर किससे सलाह ली गई.

आयोग के फैसलों को सामूहिक रूप से लिए जाने के दावे पर उन्होंने सवाल किया कि अगर फैसले वास्तव में मिलकर लिए गए थे तो दूसरे चुनाव आयुक्तों ने उनके खिलाफ शिकायत क्यों की.

उन्होंने इस पर भी सवाल उठाया कि क्या यह चिंता की बात नहीं है कि आयोग के दूसरे आयुक्तों को आयोग की गतिविधियों के बारे में मीडिया के जरिए जानकारी मिली.

हालांकि, रजत शर्मा के कार्यक्रम की शुरुआत भी इस टिप्पणी से हुई कि विपक्षी नेताओं को इस रिपोर्ट के जरिए सरकार और चुनाव आयोग को घेरने का एक नया मुद्दा मिल गया है.

इसी तरह एबीपी न्यूज़ पर चित्रा त्रिपाठी ने माना कि चुनाव आयोग में असहमति का इतिहास रहा है. उन्होंने 2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की असहमति का उदाहरण दिया, जिसके बाद संबंधित फैसले बहुमत के आधार पर लिए गए थे.

उन्होंने कहा कि मतभेद होना एक बात है, लेकिन बिना सर्वसम्मति या बहुमत के फैसलों को लागू करना अलग बात है. उनके मुताबिक, हालिया रिपोर्ट सिर्फ चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि एसआईआर के तहत 13 करोड़ नामों को हटाने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करती है.

इस तरह प्राइम टाइम पर ज्यादातर मुख्यधारा के टीवी चैनलों ने इस मुद्दे को चुनाव आयोग के भीतर कार्यस्थल पर होने वाली सामान्य असहमति के संदर्भ में देखा. जबकि यह रिपोर्ट इशारा करती है कि ये मामला सिर्फ असहमति का नहीं बल्कि मनमाने फैसले लेने और संवैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी करने का भी है. 

मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है. इसमें एक ऐसे भारत की तस्वीर है- जहां खेत हैं, नदियां हैं, हरियाली है और एक मातृभूमि का सपना है. लेकिन आज जब हम उसी भारत के बीच खड़े होकर देखते हैं, तो सवाल उठता है- क्या वह तस्वीर अब भी वैसी ही है? हमारा नया प्रोजेक्ट इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश है. हम उन जगहों तक जा रहे हैं, जिनका ज़िक्र ‘वंदे मातरम्’ में है, और देख रहे हैं कि वक्त के साथ वहां का भारत कितना बदला है. यह एक गीत को समझने से ज्यादा, उस देश को समझने की कोशिश है जिसे हम अपना घर कहते हैं. 

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