प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘वेव्स’ के लिए थंबनेल और मेटाडाटा तैयार कराने में 3.87 करोड़ रुपये के खर्च से जुड़ी फाइलों में कई अनियमितताएं सामने आई हैं. दस्तावेजों के मुताबिक, काम की मंजूरी बाद में ली गई, खर्च की रकम में बड़ा अंतर आया और एक गैर-पैनलबद्ध एजेंसी के काम करने पर भी सवाल उठे.
नवंबर, 2024 में भारत के सार्वजनिक प्रसारक प्रसार भारती ने अपना ओटीटी प्लेटफॉर्म 'वेव्स' लॉन्च किया. इस प्लेटफॉर्म के वीडियोज़ के लिए थंबनेल और मेटाडाटा बनाने पर 3.87 करोड़ रुपये खर्च की बात सामने आई है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने इस खर्च से जुड़े दस्तावेज़ों की पड़ताल की और पाया कि कई स्तरों पर नियमों और प्रक्रियाओं को दरकिनार किया गया. दस्तावेज़ों से पता चलता है कि यह काम प्रसार भारती द्वारा मूल रूप से नियुक्त एजेंसी ने नहीं बल्कि किसी और एजेंसी ने किया.
3 अक्टूबर 2024 को प्रसार भारती बोर्ड के आदेश में साफ तौर पर कहा गया था कि मेटाडाटा तैयार करने का काम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ कम्युनिकेशन (सीबीसी) से इम्पैनल्ड (सूचीबद्ध) किसी मल्टीमीडिया एजेंसी से करवाया जाएगा. लेकिन जिस एजेंसी ने असल में यह काम किया, वह सीबीसी से मल्टीमीडिया एजेंसी के तौर पर इम्पैनल्ड ही नहीं थी.
प्रसार भारती ने थंबनेल और मेटाडाटा बनाने के लिए सीबीसी से इम्पैनल्ड पांच मल्टीमीडिया एजेंसियों को 21 एजेंसियों की सूची में से चुना था. इसमें से अंकुर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड का कुल खर्च में करीब 74 प्रतिशत हिस्सा था.
हालांकि, दस्तावेज बताता है कि अंकुर की जगह यह काम विड-यूनिट नाम की एक एजेंसी ने किया है. अक्टूबर, 2024 में इस काम के लिए चुनी गई पांच सीबीसी-इम्पैनल्ड मल्टीमीडिया एजेंसियों में यह शामिल नहीं थी और न ही यह सीबीसी से मल्टीमीडिया एजेंसी के तौर पर इम्पैनल्ड नज़र आती है.
विड यूनिट का नाम काम आवंटित होने के करीब आठ महीने बाद सामने आता है. 8 जून, 2025 की एक फाइल में प्रसार भारती में कॉन्ट्रैक्ट पर जुड़ी और एक्सपर्ट (मीडिया ऑपरेशन्स और क्रिएटिव्स) के रूप में काम कर रही उमा अय्यर रावला द्वारा दी गई एजेंसी-वार जानकारी में ‘विड यूनिट’ का नाम अंकुर मीडिया के नाम के साथ कोष्ठ में लिखती हैं.
जबकि अंकुर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड और विड यूनिट दो अलग-अलग कंपनी है. विड यूनिट, सीबीसी में ऑडियो-वीडियो एजेंसी के तौर पर इम्पैनल है.
मार्च, 2026 में उमा ने अलग-अलग एजेंसी को ईमेल किया. 21 मार्च, 2026 को रावला ने चुनी गई एजेंसियों को ई-मेल भेजकर उनके द्वारा किए गए काम की जानकारी मांगी. पांच में से चार एजेंसियों को ई-मेल भेजे गए. साथ ही अंकुर मीडिया की जगह विड यूनिट को ई-मेल भेजा गया.
इस ई-मेल में रावला ने लिखा, ‘‘यह प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफॉर्म (वेव्स) पर सीएसपी-2024 के तहत अपलोड किए गए कंटेंट के लिए 'चाइल्ड एसेट्स' (मेटाडाटा, थंबनेल, पोस्टर, इन्फोग्राफिक्स आदि) तैयार करने के संदर्भ में आपकी एजेंसी द्वारा किए गए काम से संबंधित है.’’
विड यूनिट के प्रमुख सौरभ कुमार ने 23 मार्च को इसका जवाब देते हुए लिखा, ‘‘हम इस अपडेट को स्वीकार करते हैं और पुष्टि करते हैं कि हम मेटाडाटा, थंबनेल, पोस्टर, इन्फोग्राफिक्स और अन्य सभी संबंधित सहायक दस्तावेज़ों सहित चाइल्ड एसेट्स का पूरा सेट, सत्यापन प्रक्रिया के लिए एक व्यवस्थित और संरचित प्रारूप में तैयार रखेंगे.’’
विड यूनिट मीडिया प्राइवेट लिमिटेड, मुंबई स्थित एक इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग और डिजिटल कंटेंट एजेंसी है, जिसकी स्थापना 2018 में सौरभ कुमार ने की थी. कंपनी के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, यह 13 भाषाओं में 5,000 से अधिक क्रिएटर्स को ब्रांड्स से जोड़ती है. यह सीबीसी से इम्पैनल्ड तो है लेकिन सिर्फ ऑडियो-विजुअल श्रेणी में, मल्टीमीडिया एजेंसी के तौर पर नहीं.
जब न्यूज़लॉन्ड्री ने सौरभ कुमार से संपर्क किया तो उन्होंने माना कि उन्होंने प्रसार भारती के लिए मेटाडाटा और थंबनेल से जुड़ा काम किया है. लेकिन जब हमने उन्हें पूछा कि दस्तावेज़ों के मुताबिक उनकी एजेंसी को यह काम मिला ही नहीं तो कुमार ने कहा, 'मैं थोड़ी देर में आपसे बात करता हूं.' इसके बाद उन्होंने दोबारा संपर्क नहीं किया. हमने बाद में उन्हें विस्तृत सवालों की एक सूची भी भेजी. जिसका जवाब खबर प्रकशित किए जाने तक नहीं आया.
वहीं, अंकुर मीडिया के प्रमुख अंकुर मल्होत्रा ने शुरुआत में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. जब हमने दोबारा उनसे संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि हम सवाल ई-मेल पर भेज दें. हमने ई-मेल भेजा, लेकिन ख़बर प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला.
ऐसे में एक बुनियादी सवाल उठता है, अगर विड यूनिट को यह काम सौंपा ही नहीं गया था तो उसने 'वेव्स' के लिए चाइल्ड एसेट्स तैयार कैसे किए? और किस आधार पर उसने प्रसार भारती के साथ पत्राचार किया?
प्रसार भारती के वेब ऑपरेशंस से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी एक संभावित वजह बताई कि एजेंसियां अक्सर अपने काम का सब-कॉन्ट्रैक्ट (किसी को सौंप) देती हैं.
अधिकारी ने कहा, 'जब हम किसी एजेंसी को काम देते हैं, तो वे उसे सब-कॉन्ट्रैक्ट कर देती हैं. वे खुद सारा काम नहीं कर सकतीं. हालांकि, यह नियमों के खिलाफ है, लेकिन होता है और यह सब जानते हैं.'
जब यह पूछा गया कि ऐसे मामलों में आधिकारिक पत्राचार कैसे होना चाहिए तो अधिकारी ने कहा कि यह हमेशा उसी एजेंसी के जरिए होना चाहिए, जिसे मूल रूप से काम सौंपा गया था और प्रसार भारती के अधिकारी भी उसी एजेंसी से बात करेंगे.’
मेटाडाटा क्या है और नियम में छूट क्यों दी गई?
आगे बढ़ने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि मेटाडाटा क्या होता है और यह खास व्यवस्था क्यों करनी पड़ी. मेटाडाटा किसी कंटेंट से जुड़ी जानकारी होती है, जैसे उसका शीर्षक, विवरण, शैली (जॉनर), भाषा, अवधि, कलाकार, कीवर्ड्स और रिलीज़ की तारीख. ओटीटी प्लेटफॉर्म पर यह कंटेंट को व्यवस्थित करने में मदद करता है, जिससे यूज़र्स आसानी से समझ पाते हैं कि वह क्या देख रहे हैं.
प्रसार भारती के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आमतौर पर मेटाडाटा और थंबनेल प्रोडक्शन हाउस यानी फिल्में और अन्य कंटेंट बनाने वाले खुद ही उपलब्ध कराते हैं, क्योंकि वे अपने कंटेंट को सबसे बेहतर जानते हैं. लेकिन इस मामले में, कुछ कंटेंट प्रोवाइडर्स, प्रसार भारती द्वारा तय किए गए फॉर्मेट और समय में ये एसेट्स उपलब्ध नहीं करा पाए, जिसके चलते प्रसारक को मानक नियमों में छूट लेनी पड़ी.
प्रसार भारती के अपने दस्तावेज़ भी इसकी पुष्टि करते हैं. 3 अक्टूबर, 2024 को हुई प्रसार भारती मैनेजमेंट कमेटी की बैठक के मिनट्स बताते हैं कि अमित कुमार ने सीएसपी-2024 (कंटेंट सोर्सिंग पॉलिसी) की धारा 3.11 और 6.9 के तहत छूट मांगते हुए एक प्रस्ताव रखा था. यह प्रस्ताव सीएसपी-2024 के तहत हासिल किए गए कंटेंट के लिए थंबनेल और मेटाडाटा सहित चाइल्ड एसेट्स जमा करने से जुड़ा था.
यह छूट उन मामलों के लिए मांगी गई थी जहां कंटेंट प्रोवाइडर्स तय समय-सीमा के भीतर वेव्स ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए ज़रूरी फॉर्मेट में ये एसेट्स नहीं दे पा रहे थे, खासकर जब प्लेटफॉर्म का लॉन्च नज़दीक आ रहा था. इससे ज़रूरी चाइल्ड एसेट्स, जिनमें थंबनेल, मेटाडाटा और अन्य सहायक जानकारी शामिल थी, फिल्मों और कार्यक्रमों के साथ सीधे जमा करने की अनुमति मिल गई.
प्रसार भारती के एक कर्मचारी ने बताया कि सामान्य प्रक्रिया के तहत थंबनेल और मेटाडाटा आमतौर पर प्रोडक्शन हाउस या कंटेंट प्रोवाइडर्स खुद ही देते हैं. लेकिन इस मामले में, छूट मिलने के बाद प्रसार भारती को यह एसेट्स अलग से व्यवस्थित करने की अनुमति मिल गई.
2.30 करोड़ से 4.63 करोड़, फिर 3.87 करोड़ रुपये तक का सफर
अब थोड़ा पीछे चलते हैं. 19 जनवरी, 2025 को उमा अय्यर रावला ने एक फाइल आगे बढ़ाकर एक्स-पोस्ट-फैक्टो (कार्योत्तर) मंज़ूरी मांगी. उन्होंने बताया कि 'वेव्स' के लॉन्च को देखते हुए सीबीसी से इम्पैनल्ड मल्टीमीडिया एजेंसियों से चाइल्ड एसेट्स (थंबनेल, पोस्टर, इन्फोग्राफिक्स आदि) बनवाए गए थे. उन्होंने करीब 5,000 टाइटल्स के लिए इसकी लागत अनुमानित 2.30 करोड़ रुपये (जीएसटी को छोड़कर) आंकी.
तीन दिन बाद, 22 जनवरी को तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर जनरल (कंटेंट सोर्सिंग) अमित कुमार ने नोट लिखा- ‘चर्चा के मुताबिक इसे फिर से जमा करें.’
अब यहां अमित कुमार जिस चर्चा की बात करते हैं, उसकी जानकारी हमें नहीं मिली. हालांकि, इसके पांच महीने बाद 8 जून, 2025 को रावला ने खर्च से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी. जिसमें लागत करीब 4 करोड़ यानी लगभग 4.63 करोड़ रुपये (जीएसटी को छोड़कर) आंकी गई. दस्तावेज़ों के मुताबिक, रावला ने एजेंसी-वार काम का ब्योरा भी दिया. यहां अंकुर मीडिया को 20,000 थंबनेल के लिए 2.3 करोड़ रुपये और 7,736 ग्राफिक्स के लिए 1.39 करोड़ रुपये का काम सौंपने की बात सामने आई. जबकि बाकी चार एजेंसियों को दिए गए काम की कुल कीमत करीब 1 करोड़ रुपये बताई गई.
इसके बाद, 9 जून, 2025 को अमित कुमार ने लिखा कि ऑपरेशंस टीम को एजेंसियों द्वारा किए गए काम की मात्रा की दोबारा पुष्टि करनी चाहिए.
इसके फिर सात महीने बाद, 24 फरवरी, 2026 को रावला ने एजेंसियों द्वारा किए गए काम का ब्योरा देते हुए लागत 3.87 करोड़ रुपये बताई. लेकिन उसी नोट में आगे उन्होंने संबंधित एजेंसियों को कुल 4.63 करोड़ रुपये (जीएसटी को छोड़कर) का भुगतान करने की मंज़ूरी मांगी. जो कि मूल रूप से बिना घटाई गई रकम थी.
रावला के नोट के बाद, पीबी सेंट्रल आर्काइव्स के एडवाइज़र (ओटीटी हेड) आदित्य चतुर्वेदी ने प्रस्ताव को वित्तीय मंज़ूरी के लिए अनुशंसित कर दिया.
इसके बाद यह मामला विभिन्न अधिकारियों की नोटिंग्स के साथ आगे बढ़ता रहा. लेकिन 5 मार्च, 2026 को मामले ने नया मोड़ लिया, जब पीबी सेंट्रल आर्काइव्स में एग्ज़िक्यूटिव (फाइनेंस एंड अकाउंट्स) (ओटीटी) प्रतिष्ठा सिंह ने कई गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने बताया कि शुरुआत में खर्च 4.63 करोड़ रुपये बताया गया था लेकिन दोबारा जांच में यह घटकर 3.87 करोड़ रुपये रह गया. इस तरह 75.11 लाख रुपये का अंतर सामने आया. इसकी वजह अंकुर मीडिया को सौंपे गए काम की मात्रा में बदलाव था. लेकिन फाइल में अब भी मूल रकम यानी 4.63 करोड़ रुपये के लिए ही मंज़ूरी मांगी जा रही है.
बाद की फाइल नोटिंग्स में यह भी सामने आया कि अधिकारियों को यह जांचना ज़रूरी था कि क्या प्रसार भारती मैनेजमेंट कमेटी ने इस काम को मंज़ूरी दी थी, क्या वर्क ऑर्डर और एंगेजमेंट दस्तावेज़ जारी किए गए थे, और क्या सीबीसी का रेट कार्ड लागू होता था.
11 मार्च, 2026 को रावला ने फाइल को अधिक विस्तृत स्पष्टीकरण के साथ इसे दोबारा जमा किया और रकम में अंतर की वजह ‘टाइपोग्राफिकल एरर’ बताई.
नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर, प्रसार भारती के एक वरिष्ठ अधिकारी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, 'चूंकि काम पहले ही किया जा चुका था, तो संबंधित अधिकारियों के पास उसकी मात्रा और लागत का पूरा ब्योरा होना चाहिए था. ऐसे में किसी एजेंसी के काम में 75 लाख रुपये का अंतर होना भी गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करता है.'
वेरिफिकेशन कमेटी में भी वही अधिकारी
प्रसार भारती ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाने का फैसला किया. इस कमेटी को एजेंसियों द्वारा तैयार किए गए मेटाडाटा, थंबनेल और अन्य विज़ुअल एसेट्स की मात्रा और गुणवत्ता की जांच करने की ज़िम्मेदारी दी गई. लेकिन यह कमेटी खुद ही सवालों के घेरे में आ गई.
इस कमेटी में मोनिका गुलाटी, उमा रावला और प्रांजल मिश्रा को शामिल किया गया, और रावला को इसका कन्वीनर बनाया गया. प्रसार भारती के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, 'यह हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का मामला है, क्योंकि रावला खुद शुरू से इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा रही हैं और उन्होंने ही एक्स-पोस्ट-फैक्टो मंज़ूरी के लिए फाइल भी आगे बढ़ाई थी.'
21 अप्रैल को कमेटी की एक बैठक तय की गई थी. इस कमेटी को हर एजेंसी द्वारा किए गए काम की मात्रा और देय राशि का ब्योरा देते हुए एक रिपोर्ट तैयार करनी थी. इसके बाद ही इंटीग्रेटेड फाइनेंस डिवीज़न (आईएफडी) से वित्तीय सहमति, एक्स-पोस्ट-फैक्टो मंज़ूरी, और उसके बाद भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ पाती.
न्यूज़लॉन्ड्री को मिली जानकारी के मुताबिक, कमेटी की बैठक हो चुकी है, और एजेंसियों से काम से जुड़े दस्तावेज़ मांगे गए हैं. हालांकि, अब तक भुगतान नहीं किया गया है.
वर्क ऑर्डर कहां है?
पीबी सेंट्रल आर्काइव्स, नई दिल्ली की एग्ज़िक्यूटिव (फाइनेंस एंड अकाउंट्स) प्रतिष्ठा सिंह ने फाइल में एक और गंभीर सवाल उठाया था: क्या एजेंसियों को काम सौंपने के लिए कोई वर्क ऑर्डर जारी किए गए थे?
उपलब्ध दस्तावेज़ों के मुताबिक, एजेंसियों से काम लिया गया, दरें तय की गईं, और ओटीटी प्लेटफॉर्म लॉन्च भी कर दिया गया लेकिन किसी भी वर्क ऑर्डर या औपचारिक कॉन्ट्रैक्ट जारी होने का कोई रिकॉर्ड नहीं है.
यह पूरा मामला 28 सितंबर, 2024 से शुरू होता है.
28 सितंबर को, उस समय के डिप्टी डायरेक्टर जनरल आदित्य चतुर्वेदी ने सीबीसी से इम्पैनल्ड एजेंसियों के साथ एक ऑनलाइन बैठक बुलाई. इस बैठक के लिए 21 एजेंसियों को आमंत्रित किया गया था. इनमें से पांच- डिग्री 360 सॉल्यूशंस, अंकुर मीडिया, पंचतत्व एडवरटाइज़िंग, ग्लोबल मीडिया, और डॉट कम्युनिकेशंस, ने इसमें रुचि दिखाई.
दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 3 अक्टूबर को हुई प्रसार भारती मैनेजमेंट कमेटी की 226वीं बैठक में, दूरदर्शन के डायरेक्टर (कंटेंट सोर्सिंग) अमित कुमार ने मेटाडाटा तैयार करने के लिए किसी सीबीसी-इम्पैनल्ड एजेंसी को शामिल करने की मंज़ूरी मांगते हुए एक एजेंडा पेश किया.
मैनेजमेंट कमेटी ने सीबीसी-इम्पैनल्ड एजेंसियों द्वारा ‘चाइल्ड एसेट्स' तैयार करने को मंज़ूरी दी. इसने यह भी निर्देश दिया कि टाइटल्स की कुल संख्या तय की जाए और एक 'सनसेट क्लॉज़' शामिल किया जाए; इस क्लॉज़ के तहत, एक तय अवधि के बाद कंटेंट प्रोवाइडर को खुद ये एसेट्स उपलब्ध कराने होंगे.
सीबीसी से रेट कार्ड और एजेंसियों की सूची हासिल करने की प्रक्रिया 9 अक्टूबर को शुरू हुई. लेकिन दस्तावेज़ बताते हैं कि इससे पहले ही एजेंसियों के साथ बैठकें हो चुकी थीं, काम की दरें तय हो चुकी थीं, और एजेंसियों से काम लिया भी जाने लगा था.
तय की गई दरें इस प्रकार थीं. मेटाडाटा, थंबनेल और प्रोमो के लिए प्रति टाइटल 3,500 रुपये प्लस जीएसटी; एपिसोडिक सिनॉप्सिस, थंबनेल और इन्फोग्राफिक्स के लिए प्रति टाइटल 1,800 रुपये; और विभिन्न भाषाओं में इन्फोग्राफिक्स और थंबनेल के लिए प्रति टाइटल 1,100 रुपये.
इसके बावजूद, कोई वर्क ऑर्डर जारी नहीं किया गया. 'वेव्स' को 20 नवंबर, 2024 को लॉन्च कर दिया गया. लेकिन भुगतान की प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो पाई है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने प्रसार भारती के सीईओ गौरव द्विवेदी और 'वेव्स' के प्रमुख आदित्य चतुर्वेदी से पूछा कि एजेंसियों को काम सौंपने से पहले सभी ज़रूरी मंज़ूरियां क्यों नहीं ली गईं, खर्च में इतना बड़ा अंतर कैसे आया, विड यूनिट किस आधार पर काम कर रही थी और अब तक वर्क ऑर्डर क्यों जारी नहीं किया गया.
न्यूज़लॉन्ड्री ने रावला से भी जवाब मांगा. उन्होंने कहा कि वे कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर काम करती हैं और सिर्फ वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन करती हैं, और यह भी जोड़ा कि निर्णय लेने में उनकी कोई भूमिका नहीं होती. वहीं, इस रिपोर्ट को प्रकाशित किए जाने तक प्रसार भारती के अधिकारियों की ओर से कोई जवाब नहीं मिला था.
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