सीजेपी का दावा है कि मनीष भट्ट कभी संस्थापक सदस्यों में नहीं थे. वहीं, गुजराती मीडिया के गलियारे उन्हें ‘ख़बरों में बने रहने का लालसी’ तक की संज्ञा देते हैं.
कई दिनों तक न्यूज़ एजेंसी एएनआई और कई टेलीविजन चैनलों पर एक ही कहानी छाई रही कि कॉकरेच जनता पार्टी (सीजेपी) के भीतर विद्रोह हो गया है. इस कहानी का पूरा आधार एक अकेला व्यक्ति हैं, मनीष ब्रह्मभट्ट, जिन्होंने 3 सितंबर को सीजेपी से अलग होकर एक नया संगठन, सीजेपी (डेमोक्रेटिक) , बनाने का ऐलान किया. मीडिया ने इसे संगठन के भीतर वास्तविक संकट के तौर पर पेश किया, मगर ज्यादातर कवरेज में यह नहीं बताया गया कि आखिर मनीष ब्रह्मभट्ट हैं कौन.
एक घोषणा जो सुर्खी बन गई
3 सितंबर को एएनआई ने ब्रह्मभट्ट के लॉन्च कार्यक्रम का 56 मिनट से लंबा वीडियो अपने यूट्यूब चैनल पर लाइव दिखाया. कुछ ही घंटों में इसके क्लिप डिजिटल और टेलीविजन मीडिया में हर तरफ फैल गए. एएनआई ने खुद 13 मिनट का एक क्लिप काटकर चलाया, जिसका शीर्षक था - 'सीजेपी रेबल मनीष ब्रह्मभट्ट अलेज आप ऑफ फंडिंग कॉकरोच जनता पार्टी एंड दीप्के, अनाउंसेज़ स्प्लिट’
इससे अलग एएनआई ने करीब सवा दो मिनट का वीडियो भी साझा किया. इसमें रिपोर्टर मनीष से बात कर रहे हैं. यहां ब्रह्मभट्ट ने आरोप लगाया कि सीजेपी की कोर कमेटी, आम आदमी पार्टी (आप) के इशारे पर चल रही है और केजरीवाल के कहने पर भाजपा से लड़ रही है.
एएनआई ने इन दावों को बार-बार, हर बार सीजेपी में फूट के सबूत के तौर पर प्रसारित किया. दिलचस्प बात यह है कि इसी एजेंसी ने 20 जुलाई को सीजेपी के संसद मार्च के दौरान छात्रों की पिटाई से जुड़ा एक भी क्लिप या साउंडबाइट अपने एक्स अकाउंट पर नहीं दिखाया था.
सीजेपी का पक्ष
न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में सीजेपी के सौरव दास ने कहा कि एक खास व्यक्ति को उभारकर संगठन में दरार दिखाने की यह कोशिश उसी अभियान की कड़ी है, जिसके तहत दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान मीडिया के एक वर्ग ने संगठन को बदनाम करने की कोशिश की थी.
ब्रह्मभट्ट के संस्थापक सदस्य होने के दावे को दास ने पूरी तरह गलत बताया. उनके मुताबिक, ब्रह्मभट्ट न कभी संस्थापक सदस्य रहे, न कोर कमेटी का हिस्सा और न ही उन्होंने कभी किसी सीजेपी कार्यक्रम में मंच साझा किया.
दास ने बताया कि अगस्त में जब ब्रह्मभट्ट छत्रपति संभाजीनगर में अभिजीत दीप्के के घर आए थे, तभी उनकी और अन्य सदस्यों की उनसे पहली मुलाकात हुई थी. उन्होंने कहा, 'आशुतोष (रांका) और मैंने उनकी बात सुनी लेकिन वहां भी उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया.'
प्राइमटाइम पर बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई कहानी
रिपब्लिक टीवी ने 3 सितंबर को इस मामले को पूरा प्राइमटाइम स्लॉट दिया. एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी ने ब्रह्मभट्ट को सीजेपी का ‘प्रमुख चेहरा और संस्थापक सदस्य’ बताया. अर्णब ने उन्हें 'अंदरूनी सूत्र' बताते कहा कि वह अब सीजेपी के ‘आप’ के साथ संबंधों को लेकर संगठन के खिलाफ खड़े हो गए हैं.
चैनल ने बार-बार सीजेपी के संस्थापकों की तस्वीरें आप नेताओं के साथ दिखाईं. यहां मनीष के दावे को आगे बढ़ाते हुए अर्णब ने सीजेपी को आप की 'बी टीम' करार दिया. और इसी को लेकर कार्यक्रम में मौजूद ‘आप’ प्रवक्ता से सवाल पूछते रहे.
अर्णब ने जब पूछा कि अलग पार्टी क्यों बनाई तो ब्रह्मभट्ट का जवाब था, 'हमने खून-पसीने से यह आंदोलन खड़ा किया लेकिन उसने केजरीवाल से सौदा कर लिया और इसे ‘टीम केजरीवाल’ बना दिया. सीजेपी को फंड करता हैं. '

टाइम्स नाउ और उसके सहयोगी चैनल टाइम्स नाउ नवभारत ने भी वही ढर्रा अपनाया. 4 सितंबर को एंकर नविका कुमार ने सीजेपी(डी) को 'विरोधी समूह' बताते हुए ब्रह्मभट्ट के इस दावे पर जोर दिया कि नेतृत्व ने व्यापक टीम से सलाह लिए बगैर 'आप' से तालमेल बिठाया. इसी दौरान नविका ने ब्रह्मभट्ट को सीजेपी का स्वयंसेवक (वॉलंटियर) बताया.
इस कार्यक्रम में ब्रह्मभट्ट ने और तीखे आरोप लगाए. प्रदर्शन खत्म होने के फौरन बाद अभिजीत दीप्के ने अपने घर पर आठ आप-समर्थकों के साथ बंद कमरे में बैठक की. जिसमें एक महिला मित्र और एक रिश्तेदार भी मौजूद थे. सार्वजनिक तौर पर इसे सिर्फ प्रवक्ताओं की बैठक बताया गया जबकि असल में इसका मकसद जल्दबाजी में एक राष्ट्रीय कोर टीम बनाना था. वह भी 'केजरीवाल के एजेंडे के मुताबिक.'
टाइम्स नाउ नवभारत ने इसे 'सीजेपी बनाम सीजेपी(डी)' की जंग की तरह पेश किया, मानो सीजेपी चौतरफा घिरी हुई हो. आज तक भी पीछे नहीं रहा. 4 सितंबर की हेडलाइन में 'सीजेपी में पहली बगावत' की बात कही गई और ब्रह्मभट्ट को 'पूर्व सीजेपी वॉलंटियर ' बताया गया. दैनिक भास्कर जैसे प्रकाशनों ने भी मनीष की प्रेस कॉन्फ्रेंस को प्रकाशित किया.
जो टीवी मीडिया ने नहीं बताया
लगभग हर चैनल का पैटर्न एक जैसा रहा. ब्रह्मभट्ट के आरोपों को सीजेपी में दरार का सबूत मानकर पेश कर दिया गया जबकि खुद आरोप लगाने वाले शख्स और उसकी राजनीतिक सक्रियता की शायद ही कोई पड़ताल हुई.
जबकि उनका सार्वजनिक रिकॉर्ड ढूंढना मुश्किल नहीं. अहमदाबाद एयरपोर्ट से महज पांच किलोमीटर चलते ही किसी ऑटो-रिक्शा पर ब्रह्मभट्ट की तस्वीर दिख जाना आम बात है. शहर में सैकड़ों रिक्शों पर उनका चेहरा छपा है, और इनमें से कुछ संदेश साफ तौर पर सांप्रदायिक रंग लिए हुए हैं. उनकी बाकी गतिविधियां भी भाजपा से नज़दीकी की ओर इशारा करती हैं.
अगस्त, 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद अहमदाबाद के सैंकड़ों ऑटो-रिक्शा पर ब्रह्मभट्ट के नाम से पोस्टर लगे, जिन पर गुजराती में एक नारा लिखा था, जिसका हिंदी अर्थ है- 'नाम पूछकर मारा, नाम पूछकर खरीदेंगे. हर घर बनेगा सनातन.' मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की ऐसी अपीलें संघ परिवार से जुड़े संगठनों में लंबे समय से चलन में रही हैं.
इस अपील पर न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए ब्रह्मभट्ट ने सफाई दी कि उनका इशारा पूरे मुस्लिम समुदाय की तरफ नहीं बल्कि उन 'कट्टरपंथियों की ओर था, जो भारत में रहकर देश के बाहर के हितों की बात करते हैं.'

पिछले साल ब्रह्मभट्ट ने 'सनातन धर्म' का एक लोगो भी बनवाया और अहमदाबाद की चाय की दुकानों से लेकर बड़े उद्योगों तक को इसे 'सच्चे सनातनी' होने की पहचान के तौर पर लगाने के लिए प्रेरित करते रहे. उनके प्रसारित संदेश में दुकानदारों से एक नंबर पर मिस्ड कॉल देने और इसे 'हर सनातनी' तक फॉरवर्ड करने को कहा गया था.
इस अभियान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि सोच यह थी कि जब दुकानें यह प्रतीक चिपकाएंगी, तो 'सनातन विचारधारा वाले' ग्राहक उन कारोबारियों से खरीदारी को प्रोत्साहित होंगे, जो उनकी नजर में सामाजिक-धार्मिक कार्यों में योगदान करते हैं.
यह सब करने की फंडिंग कहां से आती है? इस सवाल पर मनीष कहते है, ‘‘मैं खुद कारोबारी हूं. और दोस्त भी इन गतिविधियों में आर्थिक मदद करते हैं.’’

2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद ब्रह्मभट्ट ने एक पोस्टर छपवाया था, जिसमें लोगों से पीएम मोदी को समर्पित 30 सेकंड की रील बनाने की अपील की गई थी. जिसके आखिरी में ‘आई लव मोदी जी’ कहना था. इसको लेकर मनीष ने कहा, 'जब केंद्र सरकार ने 370 हटाया, तब मैंने मोदी जी के समर्थन में रील बनाने का अभियान चलाया था क्योंकि वह राष्ट्रहित का मामला था.'
इसके अलावा उन्होंने ‘बाबा बागेश्वर’ के नाम से मशहूर धीरेंद्र शास्त्री की तस्वीर वाले पोस्टर भी लगाए हैं. जिनमें भारत को 'हिंदू राष्ट्र' बनाने की मांग की गई थी. मालूम हो कि मनीष बाबा से मई, 2023 में मिले थे.
ब्रह्मभट्ट बार-बार कहते हैं कि उन्होंने कभी भाजपा की औपचारिक सदस्यता नहीं ली भले ही उनके अभियानों का रुख अक्सर पार्टी की राजनीति से मेल खाता रहा हो. वे यह भी दावा करते हैं कि संघ या उससे जुड़े किसी संगठन से उनका कोई नाता नहीं रहा. हालांकि, उनके सोशल मीडिया पर एक तस्वीर मौजूद है, जिसमें वह भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री सी.आर. पाटिल के साथ विमान में बैठे नजर आते हैं.

एक विविध सक्रियता का इतिहास
ब्रह्मभट्ट की सक्रियता का दायरा काफी विविध रहा है - भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर किसान प्रदर्शन तक, और चुनाव लड़ने तक.
2018 में उन्होंने गुजरात में भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाने के लिए एक समूह बनाया. उनका दावा है कि आंदोलन शुरू होने के अगले ही दिन गुजरात पुलिस ने उनके और समर्थकों के खिलाफ सरकारी दीवारें खराब करने के आरोप में सात एफआईआर दर्ज कर दीं, जिन्हें बाद में उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती देकर रद्द करवाया. वह 2011 के दिल्ली में अन्ना आंदोलन से मशहूर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का भी हिस्सा रहे, 2020 में दिल्ली के किसान आंदोलन में शामिल हुए और 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पालनपुर सीट से निर्दलीय लड़े. जहां उनकी जमानत राशि जब्त हो गई.
2022 के चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हलफनामे के अनुसार, उस वक्त उनके खिलाफ चोट पहुंचाने, आपराधिक धमकी और समूहों के बीच वैमनस्य फैलाने जैसी धाराओं में चार आपराधिक मामले लंबित थे. ब्रह्मभट्ट इन्हें 'राजनीति से प्रेरित' बताते हैं और कहते हैं कि इनमें से कुछ बाद में खारिज हो चुके हैं.
गुजराती मीडिया में उन्हें 'सुर्खियों की लालसा’ में रहने वाला इंसान कहा जाता है. न्यूज़लॉन्ड्री से बात करने वाले अहमदाबाद के कई पत्रकारों में से एक ने बताया कि हाल तक ब्रह्मभट्ट खुद को मोदी का कट्टर समर्थक बताते थे लेकिन अब सीजेपी में शामिल होकर उसे भीतर से तोड़ने में जुटे हैं.
अपनी राजनीति को समझाते हुए ब्रह्मभट्ट कहते हैं, 'मैं न किसी के खिलाफ हूं, न किसी के पक्ष में. मैं मुद्दों की बात करता हूं.' भाजपा और हिंदुत्व की तरफ अपने झुकाव के सवाल पर उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तारीफ में एक कविता लिखी थी. यह कविता उन्होंने गांधी के उस दौरे के बाद लिखी थी, जब वह पैलेट गन से घायल साहिल लोचब के मामले में एफआईआर दर्ज कराने पुलिस थाने पहुंचे थे.
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