26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई अचानक बाढ़ और भूस्खलन के बाद कई भारतीय यात्री लापता हैं. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 320 भारतीयों का अब तक पता नहीं चल पाया है.
26 अगस्त की सुबह नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई तबाही ने एक शांत इलाके को देखते ही देखते मलबे के ढेर में बदल दिया. भूस्खलन और बाढ़ का तेज़ बहाव अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को बहा ले गया. सैंकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि एक हजार से ज्यादा अब भी लापता हैं. पानी का बहाव इतना तेज़ था कि लोगों को संभलने या सुरक्षित जगह पहुंचने तक का मौका नहीं मिला. कुछ घंटे पहले तक सामान्य जिंदगी जी रहा इलाका अचानक तबाही, मलबे और अपनों की तलाश में भटकते लोगों से भर गया.
नेपाल-तिब्बत मार्ग पर आई इस अचानक बाढ़ ने कई परिवारों की जिंदगी बदल दी है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, कम से कम 320 भारतीय अब भी लापता हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में परिवार अपने लापता परिजनों की तलाश में जुटे हैं. कोई हेल्पलाइन पर फोन कर रहा है, तो कोई सोशल मीडिया पर तस्वीरें और जानकारी साझा कर रहा है. कुछ परिवार अपने स्तर पर नेपाल पहुंचकर अस्पतालों और राहत केंद्रों में अपनों को तलाश रहे हैं.
मुंबई के डॉ. जन दिनेश कोटेचा अब भी लापता
महाराष्ट्र के मुंबई से नेपाल गए कई यात्री 26 अगस्त की बाढ़ के बाद से लापता हैं. इनमें मलाड के रहने वाले वरिष्ठ गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जन दिनेश कोटेचा भी शामिल हैं. वह अपने चचेरे भाई रोमा दिलीपभाई इंटवाला के साथ रिचा ग्रुप्स के जरिए नेपाल यात्रा पर गए थे. बाढ़ के बाद से दोनों के बारे में परिवार को कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली है.

डॉ. कोटेचा के चचेरे भाई भाविक तन्ना ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि परिवार की उनसे आखिरी बार 26 अगस्त की सुबह करीब 8:30 बजे बात हुई थी. इसके कुछ ही देर बाद बाढ़ की स्थिति बिगड़ गई और फिर उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया.
भाविक लगातार सोशल मीडिया पर अपडेट तलाश रहे हैं और संबंधित एजेंसियों से संपर्क कर रहे हैं. उनका कहना है कि हर जगह से फिलहाल यही जवाब मिल रहा है कि कोई जानकारी मिलने पर परिवार को सूचित किया जाएगा.
“अभी तक कोई अपडेट नहीं है. हम लगातार उन्हें ढूंढ रहे हैं. जिस भी एजेंसी को फोन करते हैं, वो यही कहते हैं कि कोई जानकारी मिलेगी तो आपको बता दिया जाएगा. मैं सोशल मीडिया पर भी लगातार अपडेट देख रहा हूं.”
डॉ. कोटेचा के भाई विवेक नाथवानी और उनका बेटा भी उनकी तलाश में नेपाल पहुंच चुके हैं. विवेक इस वक्त त्रिशूली में हैं और अस्पतालों में जानकारी जुटा रहे हैं.
भावुक विवेक ने हमसे कहा, “परिवार के लिए बहुत मुश्किल समय है. मैं त्रिशूली पहुंच चुका हूं. मैंने एंबेसी, ट्रैवल एजेंट का ऑफिस और घटना स्थल सब विजिट कर लिया है. अब अस्पताल जा रहा हूं. इस वक्त मैं सिर्फ प्रार्थना कर रहा हूं.”
मुंबई की रहने वाली सोनल की 64 वर्षीय बहन चेतना गुप्ता भी रिचा ट्रैवल्स के साथ मानसरोवर यात्रा पर गई थीं. वह 23 अगस्त को मुंबई से रवाना हुई थीं. परिवार के मुताबिक, 25 अगस्त की सुबह करीब 7 से 7:30 बजे वह चेक पोस्ट के पास कस्टम क्लियरेंस के लिए आगे बढ़ रही थीं.
उनके टूर ग्रुप में 50 से ज्यादा लोग थे. परिवार के मुताबिक, सोनल की अपनी मां से आखिरी बार 25 अगस्त की सुबह करीब 7:30 बजे बात हुई थी. उन्होंने बताया था कि वह कस्टम क्लियरेंस के लिए जा रही हैं. इसके बाद उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया.

सोनल अब भी उनके व्हाट्सऐप के आखिरी ऑनलाइन स्टेटस पर नजर रखे हुए है. उनके मुताबिक, उनका आखिरी ऑनलाइन स्टेटस 7:58 बजे का दिख रहा है. इसके बाद से उनकी कोई जानकारी नहीं मिली है.
चेतना की तलाश में उनका बेटा, भाई और समधी काठमांडू के लिए रवाना हो चुके हैं. परिवार के सदस्य लगातार अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं और हादसे के बाद वहां पहुंचने वाले लोगों के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं.
सोनल ने अपनी बेचैनी और बेबसी बताते हुए कहा, “हम सबके लिए बहुत कठिन समय है. बहुत बेचैनी है. क्या ही बताऊं कि क्या बीत रही है. हम बहुत व्यथित हैं. एक तरह की बेबसी की स्थिति है. बस फोन घुमा रहे हैं. नेपाल के जितने भी ट्विटर हैंडल हैं, हम उन्हें थोड़ी-थोड़ी देर में देखते रहते हैं. बेटा और भाई अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं कि कौन आया है, कौन आया है. स्थिति बहुत गंभीर है.”
33 वर्षीय अरुषी गुप्ता भी उन यात्रियों में शामिल हैं, जिनके बारे में 26 अगस्त की बाढ़ के बाद से कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है. परिवार के मुताबिक, उनकी आखिरी लोकेशन नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा कस्टम्स ऑफिस के पास की बताई जा रही है. उनसे आखिरी बार उसी दिन सुबह करीब 7:50 बजे बात हुई थी. इसके बाद संपर्क टूट गया.

अरुषी पिछले पांच वर्षों से हैदराबाद में रह रही थीं और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए मुंबई की हिल्स एंड ट्रेल्स और नेपाल की रिचा टूर्स के जरिए बने एक ग्रुप के साथ नेपाल गई थीं. इस ग्रुप के लीडर डॉ. मिलिंद चितले हैं, जो उस समय ग्रुप के साथ मौजूद थे.
नेपाल रवाना होने से पहले अरुषी काठमांडू के होटल शंकर में ठहरी थीं. परिवार को फिलहाल उनकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली है. अब परिवार खुद नेपाल जाकर उनकी तलाश करने की तैयारी कर रहा है.
बेंगलुरु के रहने वाले 67 वर्षीय नेल्लीपल्ली रामकृष्णन कोथंडारमन और उनकी 64 वर्षीय पत्नी रेमा कोडनरामन भी उन यात्रियों में शामिल हैं, जिनसे 26 अगस्त की बाढ़ के बाद से संपर्क नहीं हो पाया है.
दोनों 13 दिन की यात्रा पर नेपाल गए थे और महाराष्ट्र के एक ट्रैवल ग्रुप के साथ यात्रा कर रहे थे. इस ग्रुप में कुल 67 लोग शामिल थे. उनके दामाद हिरशी के मुताबिक, रामकृष्ण और रेमा के साथ कोई अन्य परिवार का सदस्य यात्रा पर नहीं था, हालांकि उनके कुछ दोस्त इसी ग्रुप का हिस्सा थे.
परिवार के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह करीब 8 बजे ग्रुप के कई लोगों की अपने परिवारों से आखिरी बार बात हुई थी. रामकृष्ण का फोन सुबह करीब 8:15 से 8:20 बजे तक पहुंच में था. इसके कुछ ही देर बाद नेपाल में बाढ़ की स्थिति बिगड़ गई.
परिवार के मुताबिक, रामकृष्ण और रेमा उस वक्त सीमा पार करने का इंतजार कर रहे थे. बाढ़ की खबर उसी दिन दोपहर करीब 2 बजे सामने आने के बाद परिवार को पता चला कि जिस इलाके में वे मौजूद थे, वहां हालात बिगड़ चुके हैं.

परिवार ने नेपाल की सेना, विदेश मंत्रालय, कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार की हेल्पलाइन समेत संबंधित अधिकारियों को उनकी जानकारी दे दी है. कई दूतावासों की हेल्पलाइन पर भी उनकी जानकारी साझा की गई है.
हिरशी ने बताया, “हमने सभी संबंधित एजेंसियों को जानकारी दे दी है. लेकिन अब तक परिवार को कोई ठोस जानकारी या सुराग नहीं मिला है.” उनका कहना है कि नेपाल के जिस इलाके में बाढ़ आई है, वहां संचार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित है, जिससे मौके पर मौजूद लोगों से संपर्क करना मुश्किल हो रहा है.”
वह आगे कहती हैं, “हम कई परिवारों के संपर्क में हैं, लेकिन शायद वही जानकारी है. किसी के पास इस खास ग्रुप को लेकर कोई संपर्क या जानकारी नहीं है. सभी दूतावासों की हेल्पलाइन पर हमने जानकारी दे दी है. फिलहाल हम नेपाल सरकार, वहां की रेस्क्यू टीम और सेना पर निर्भर हैं कि वे हमें कोई जानकारी दे सकें क्योंकि बाढ़ के बाद पूरे इलाके में कनेक्टिविटी नहीं है. वहां कोई भी संपर्क में नहीं है और न ही पहुंच में है.”
इन परिवारों के लिए अब हर फोन कॉल, हर सोशल मीडिया अपडेट और अस्पताल से मिलने वाली हर जानकारी उम्मीद की एक नई वजह बन गई है. लेकिन 26 अगस्त की सुबह के बाद से अब तक उन्हें अपने अपनों की कोई पुख्ता खबर नहीं मिली है. राहत और बचाव अभियान के बीच परिवारों की नजर अब सिर्फ एक सूचना पर टिकी है कि उनके अपने कहां हैं.
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