संसद मार्च में पैलेट गन चली? घायल साहिल समेत चार मामलों ने खड़े किए सवाल

20 जुलाई को ‘संसद मार्च’ के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. पुलिस इनकार कर रही है लेकिन पीड़ित अलग हकीकत बयान कर रहे हैं. 

WrittenBy:अवधेश कुमार
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नजफगढ़ निवासी 22 वर्षीय साहिल लोहचब अपने पांच दोस्तों के साथ कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च में शामिल हुए थे. लेकिन अब वो एम्स के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती हैं. शायद वह हमेशा के लिए अपनी आंख की रोशनी खो बैठें. 

साहिल सुरक्षाबलों द्वारा इस्तेमाल किए पेलेट गन का शिकार हो गए. उनके शरीर पर गंभीर चोट के निशान हैं. एमरजेंसी वार्ड के बाहर उनके माता-पिता, रिश्तेदार और उनके दोस्त उनके ठीक होने का इंतजार कर रहे हैं. परिवार और दोस्तों का दावा है कि उस पर पैलेट गन से वार किया गया है.  

पैलेट गन का शिकार हुए तीन मामले अब तक सामने आ चुके हैं. इनमें जबलपुर के शेख इरशाद मंसूरी शामिल हैं, जिनका इलाज लेडी हार्डिंग अस्पताल में चल रहा है. दूसरा मामला पालिका बाज़ार के पास गोली का शिकार हुए आउटलुक पत्रिका के एक रिपोर्टर का है. वहीं, एक और शख्स की चोटों की तस्वीरें ऑनलाइन शेयर की जा रही हैं. यहां भी पैलेट गन से घायल होने का दावा है. ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर ने भी ये तस्वीरें साझा की हैं. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह शख्स कौन है और क्या कहीं उपचारधीन भी है या नहीं. 

अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने सबसे पहले अपनी रिपोर्ट में पैलेट गन के इस्तेमाल का दावा किया था. हालांकि दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है. पुलिस ने एक्स पर लिखा, “यह दावा पूरी तरह से गलत और गुमराह करने वाला है कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया. दिल्ली पुलिस के पास न तो पैलेट गन हैं और न ही वे चल रहे विरोध-प्रदर्शन में इनका इस्तेमाल कर रहे हैं. जनता से अनुरोध है कि वे किसी भी अपुष्ट या गुमराह करने वाली जानकारी को शेयर न करें.”

द हिंदू की रिपोर्ट में पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोप रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) पर लग रहे हैं. जो कि प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस के साथ मौके पर तैनात थी. 

वहीं, 'द वायर' द्वारा एक वीडियो के विश्लेषण का निष्कर्ष है कि यह कार्रवाई पालिका बाज़ार के पास हुई थी. वीडियो की आवाज़ और दृश्यों के आधार पर दावा किया गया है कि पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ. रिपोर्ट में कहा गया है, “विशेषज्ञों ने 'द वायर' से पुष्टि की है कि 20 जुलाई को आरएएफ कर्मियों के वीडियो और तस्वीरों में जो बंदूकें दिख रही हैं, वे 12-बोर पंप-एक्शन राइफ़ल हैं, जिन्हें आम बोलचाल में पेलेट गन कहा जाता है."

न्यूज़लॉन्ड्री ने इस पूरे मामले पर टिप्पणी के लिए आरएएफ की इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) सीमा धुंडिया से संपर्क किया है. अगर उनकी ओर से कोई जवाब आता है तो उसे इस रिपोर्ट में शामिल कर लिया जाएगा. 

‘भटकते रहे रातभर, पट्टी खुलने पर साफ होगी स्थिति’

साहिल की मां ज्योति लोहचब काफी डरी हुई थी. साहिल दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए की पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट-टाइम नौकरी भी करता है. वह दिल्ली पुलिस में भर्ती होना चाहता था. 

ज्योति बताती हैं, “मेरे तीन बच्चों में सबसे बड़ा साहिल उस दिन प्रदर्शन में शामिल होने जंतर-मंतर गया था. बेटे ने बताया कि जब वह झंडा लहरा रहा था तभी अचानक से उसके चेहरे के पास कुछ फटने जैसी आवाज आई, उसके बाद क्या हुआ उसे नहीं पता. हमें डॉक्टर ने बताया है कि साहिल को छर्रे लगे हैं. लेकिन डॉक्टर हमें इसका न कोई कागज दे रहे हैं और न ही कुछ दिखा रहे हैं. डॉक्टरों ने उसकी सर्जरी की है. एक और सर्जरी करने को कह रहे हैं. शायद उसकी आंख खराब हो गई है. अभी पट्टी बंधी है, जब हटेगी तभी सही पता चलेगा कि हुआ क्या है.” 

21 वर्षीय शिवम रेड्डी भी साहिल के साथ प्रदर्शन में शामिल थे. वह कहते हैं, "हम कुल पांच दोस्त इस प्रदर्शन में शामिल होने आए थे. बढ़ती भीड़ के चलते हम साहिल से थोड़ा पीछे हो गए थे. साहिल के हाथ में तिरंगा था, वह उसे लहराता हुआ सबसे आगे चल रहा था. पुलिस को शायद ऐसा लगा कि यह इन प्रदर्शनकारियों को लीड कर रहा है. करीब 100-150 लोग उसके पीछे थे."

शिवम का दावा है कि साहिल को टारगेट करके पैलेट गन मारी गई है. उसके बाद वह जख्मी हो गए. प्रदर्शन में शामिल लोग ही उसे उठाकर लेडी हार्डिंग अस्पताल ले गए. 

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पूरा घटनाक्रम बताते हुए शिवम कहते हैं, “शाम के चार बजे से कल रात के चार बजे तक हम उसके इलाज के लिए इधर-उधर भागते रहे. सबसे पहले लेडी हार्डिंग अस्पताल गए थे. फर्स्ट एड देने के बाद वहां से सफदरजंग रेफर कर दिया क्योंकि खून काफी बह रहा था. जब हम सफदरजंग पहुंचे तो करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार करते रहे. इसके बाद एम्स लेकर आए. यहां भी ट्रॉमा सेंटर में इंतजार करते रहे. फिर एम्स के आरपी-आई सेंटर भेज दिया गया. जहां सुबह चार बजे पहली बार उसकी आंख में दवा की एक बूंद गई. उसकी सीधी आंख से कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था.”

शिवम ने आगे कहा, "आज उसका ठीक से इलाज शुरू हुआ है. आंख का ऑपरेशन किया गया है. पैलेट गन के पार्टिकल्स उसकी आंख से निकाले गए हैं. डॉक्टरों ने एक और सर्जरी के लिए बोला है. डॉक्टरों ने बताया है कि एक प्रतिशत चांस हैं कि उसकी आंख की रोशनी वापस आ जाए. हालांकि, हमें अभी तक कोई कागज नहीं दिखाया है. उसकी एमएलसी तक हमें नहीं दी गई है." 

साहिल के एक और दोस्त अर्जुन 20 जुलाई को याद करते हुए काफी भावुक हो जाते हैं. वह पूछते हैं, “हमारे पेपर लीक हो रहे हैं. तो सरकार हमारे ही साथ ऐसा क्यों कर रही है? ऐसी बर्बरता करने की क्या जरूरत थी?”

क्या वाकई पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ है? 

पैलेट गन के इस्तेमाल की पुष्टि के लिए हमने एम्स और लेडी हार्डिंग के डॉक्टरों से बात करने की कोशिश की. एम्स से कोई आधिकारिक जानकारी हासिल नहीं हुई. 

लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की डॉयरेक्टर डॉक्टर (प्रोफेसर) पूर्णिमा बरुआ ने भी किसी प्रकार की जानकारी देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि वह इस बारे में पहले ही एएनआई और डीडी न्यूज़ को बता चुकी हैं, अब दोहराना नहीं चाहती. 

इसके अलावा हमने अस्पताल के कई डॉक्टरों और स्टाफ से भी बात की. साथ ही वो रजिस्टर भी देखे हैं, जिन्हें सिर्फ प्रदर्शन में शामिल हुए घायलों के नामों से भरा गया है. हैरानी की बात है कि इन रजिस्टरों में घायल इरशाद का नाम नहीं था. इरशाद मंसूरी भी छर्रे लगने से घायल हुए थे.  

इरशाद के एक दोस्त ने नाम नहीं छापने की गुजारिश पर बताया कि यहां जेपी नड्डा आए थे, तब से बहुत सख्ती बरती जा रही है. अब इरशाद से मिलने के लिए एक स्पेशल कार्ड बनाया गया है. जिसके पास वह होगा वही उससे मिल सकता है. यहां उसके कोई परिजन भी नहीं है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने इरशाद से मुलाकात की थी. 

पैलेट गन लंबे समय से विवादित रहा है. इससे निकलने वाले छोटे-छोटे धातु के छर्रे त्वचा और आंखों को भेद सकते हैं. इसके इस्तेमाल को लेकर हालिया मामला 2024 के किसान आंदोलन के दौरान पंजाब-हरियाणा सीमा पर खनौरी और शंभू बॉर्डर का है. उस समय पुलिस ने पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया था, जबकि किसान नेताओं ने आरोप लगाया था कि कई प्रदर्शनकारी इससे घायल हुए.

इससे पहले 2023 में मणिपुर में जातीय हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल ने व्यापक आक्रोश पैदा किया था. वहीं, 2016 में जम्मू-कश्मीर में जारी अशांति के दौर में पेलेट गन के कारण बड़ी संख्या में लोग आंशिक या पूरी तरह दृष्टिहीन हो गए थे.

संसद में 2018 में दिए गए एक लिखित जवाब में केंद्र सरकार ने बताया था कि 2016 और 2017 के दौरान जम्मू-कश्मीर में पेलेट गन के इस्तेमाल से 17 प्रदर्शनकारियों या अन्य लोगों की मौत हुई थी. हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए सरकार ने इससे जुड़ी विस्तृत जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया था.

पेलेट गन को लेकर भारत में लंबे समय से विवाद रहा है. इस हथियार के इस्तेमाल, इसके प्रभाव और इससे जुड़े कानूनी व मानवाधिकार संबंधी सवालों को समझने के लिए यह हमारी यह रिपोर्ट पढ़िए.

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