संसद मार्च से अस्पताल तक: “मैं अपने पापा से कहूंगी आप पुलिस की नौकरी छोड़ दीजिए”

वेंटिलेटर पर साक्षी, प्लास्टर में लिपटे विशाल जैसे लगभग 250 युवा और पुलिस वाले संसद मार्च के दौरान आरएमएल में इलाज के लिए पहुंचे. 

अल्फिया (बाएं), विशाल (मध्य) और अमित (दाएं) की तस्वीर.

रात का सन्नाटा फैल चुका था. लेकिन मध्य दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में बेचैनी पसरी हुई थी. कोई अपनी बहन के होश में आने का इंतजार कर रहा था तो कोई प्लास्टर चढ़े पैर और हाथ के साथ दर्द से कराह रहा था. कुछ घंटे पहले संसद मार्च में शामिल हुए ये छात्र अस्पताल के बेड पर पड़े अपनी कहानी सुना रहे थे.

रात के करीब एक बजे होंगे जब आरएमएल अस्पताल की इमरजेंसी बिल्डिंग की पांचवीं मंजिल पर आईसीयू के बाहर खड़े भारत से हमारी मुलाकात हुई. उनके साथ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रमुख अभिजीत दीप्के भी मौजूद थे. दीप्के भारत की बहन साक्षी का हाल जानने अस्पताल पहुंचे थे. दरअसल, साक्षी सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल होने गई थीं. भगदड़ के दौरान वह नीचे गिर गईं. तब से उन्हें होश नहीं आया है. फिलहाल उनकी हालत नाजुक बनी हुई है. 

उनके भाई भारत बताते हैं, "मेरी बहन ने अभी कॉलेज पास किया है और आगे की पढ़ाई कर रही है. अभी सिर्फ 21 साल की है. वह तो बस अपना हक मांगने गई थी. मुझे भरोसा है कि वह ठीक हो जाएगी."

बेहद परेशान भारत आगे बताते हैं, "मैं टैक्सी चलाता हूं. मेरी बहन ने कुछ भी गलत नहीं किया. मुझे पता चला कि उसे सीपीआर भी दिया गया था लेकिन कोई मूवमेंट नहीं हुआ. फिर भी मुझे पूरा भरोसा है कि वह ठीक हो जाएगी."

साक्षी अपनी एक दोस्त के साथ छतरपुर में रहकर पढ़ाई कर रही हैं. नाम नहीं प्रकाशित करने की गुजारिश पर साक्षी की दोस्त ने बताया, "मेरी छोटी बहन, मैं और साक्षी तीनों साथ में इस प्रदर्शन में शामिल होने गए थे. राजीव चौक पर एलआईसी बिल्डिंग के पास पुलिस ने अचानक प्रदर्शनकारियों पर हमला कर दिया. ऐसा लाठीचार्ज हुआ कि वहां भगदड़ मच गई. भगदड़ में साक्षी नीचे दब गई. मेरी छोटी बहन भी वहीं थी. मैं पहले उसे ढूंढ़ने लगी. काफी देर बाद वह मिली. फिर पता चला कि साक्षी को आरएमएल अस्पताल ले जाया गया है. यह करीब 11:30 बजे की बात है. उसे काफी गंभीर चोटें आई हैं."

साक्षी की ही तरह घायल दर्जनों प्रदर्शनकारियों को बीते रोज़ इलाज के लिए यहां भर्ती करवाया गया. 

अस्पताल में भर्ती अल्फिया.

अस्पताल की दूसरी मंजिल पर मरीजों के वार्ड में दूसरे बेड पर मूलतः प्रयागराज की रहने वाली अल्फिया मिलीं. वह दिल्ली के अशोक नगर में रहकर पढ़ाई कर रही हैं. हम जब पहुंचे तो उनके पैर पर पट्टी बंधी थी और पूरा शरीर कांप रहा था. दो-तीन घंटे पहले ही मिले प्रदीप और उनकी एक साथी अल्फिया की मदद कर रहे थे. प्रदीप उनके लिए कंबल का इंतजाम करने की कोशिश कर रहे थे, जबकि युवती अल्फिया के हाथों की मालिश कर रही थीं.  

अल्फिया ने कहा, "आज मेरे सपने टूटे हैं. कुछ भी कर लूंगी लेकिन वर्दी कभी नहीं पहनूंगी. मैं करीब तीन साल से यूपीएससी की तैयारी कर रही थी. अब मुझे वकील बनना है. मैं चिल्लाती रही कि लाठी मत मारिए लेकिन वो मारते रहे. मेरे सर और पैर पर चोट है. आज खूब लाठी खाई हूं." 

जब हमने अल्फिया से पूछा कि क्या उनके घरवालों को पता है कि वह अस्पताल में भर्ती हैं तो उसने कहा, “हां उन्हें पता है. मैंने उनसे कह दिया है कि अगर मैं मर भी जाऊं तो खुश रहना, दुखी मत होना. मेरा भाई नीट की तैयारी कर रहा है. मुझे भी कुछ बनना था, लेकिन आज मैंने तय कर लिया है कि मुझे गुलामी नहीं करनी. वर्दी वाले सरकार की गुलामी कर रहे हैं. बच्चों को पीट रहे हैं. खाकी वर्दी पहनकर बच्चों को बेवकूफ बना रहे हैं. सरकार जो आदेश दे रही है, उसी का पालन कर रहे हैं. ऐसी नौकरी मुझे नहीं करनी. मेरे सपने आज मर गए. मेरे पापा भी पुलिस में हैं. मैंने आज उन्हें भी कह दिया है कि आप यह नौकरी छोड़ दीजिए."

जब हमने उनकी तस्वीर लेने की इजाज़ मांगी तो अल्फिया ने कहा, "आप तस्वीर लेने से पहले पूछ रहे हैं. हमें इतना मारा गया, किसी ने कुछ नहीं पूछा. उन्होंने हमारी बिना इजाजत के हमारे साथ क्या-क्या किया, किसी ने नहीं पूछा. कम से कम आप तो पूछ रहे हैं. उन्होंने मुझे मां-बहन की गालियां देते हुए मारा है. मैं आज का दिन कभी नहीं भूलूंगी."

विशाल पांडे के पैर में चोट आई है.

हरियाणा के फरीदाबाद के रहने वाले 26 वर्षीय विशाल पांडे भी पुलिस की लाठियों का शिकार हो गए. प्राइवेट नौकरी करने वाले पांडे के पूरे पैर पर प्लास्टर चढ़ाया गया है. वह बताते हैं, "पुलिस ने मेरे पैरों पर बुरी तरह डंडे बरसाए. बहुत मारा. फिर जब मैं बचकर भागा तो बैरिकेडिंग में पैर फंस गया और वहीं गिर गया. उसके बाद पुलिस ने और ज्यादा लाठियां मारी."

पांडे बताते हैं, "जब मुझे सोशल मीडिया से पता चला कि 20 तारीख को संसद मार्च होना है, तभी मैंने तय कर लिया था कि मैं इसमें जरूर शामिल होऊंगा. मैं काफी दिनों से इस दिन का इंतजार कर रहा था. मार्च के दौरान मैं सबसे आगे था, तभी पुलिस ने अचानक लाठीचार्ज कर दिया. घर पर ज्यादा लोगों को नहीं पता है. वरना सब डांटेंगे और यहीं आ जाएंगे. आज जो भी हुआ वह ठीक नहीं हुआ. पुलिस का परिवार नहीं होता है क्या."

35 वर्षीय कल्लू उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर से दो दिन पहले दिल्ली पहुंचे थे. उनका कहना है कि वे बेरोज़गारी और महंगाई से परेशान होकर जंतर-मंतर पर चल रहे धरने में शामिल होने आए. कल्लू का आरोप है कि पुलिस के लाठीचार्ज में उनके दाएं पैर में गंभीर चोट आई है. पुलिस ने उन्हें लाठियों से बुरी तरह पीटा है.

कल्लू का दावा है कि पुलिस ने बुरी तरह लाठियां भांजी

कल्लू आगे बताते हैं, "हम तीन दोस्त ट्रेन से यहां आए थे. अभी किसी का कुछ नहीं पता है कि कौन कहां है. मोबाइल भी चार्ज नहीं है. किसी ने बस अस्पताल पहुंचा दिया है. इलाज करा रहा हूं. मजदूरी करके अपना घर चलाता हूं. हमने पहले बीजेपी को वोट दिया था लेकिन सरकार में बढ़ती महंगाई से परेशान हूं. कोरोना में मेरा ज्यादातर परिवार खत्म हो चुका है. मैं चाहता हूं कि सरकार बदल जाए. मोदी जी पीएम न रहें."

इस दौरान वे हमसे भी एक नंबर पर कॉल कराते हैं जो कि स्विच ऑफ था.   

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के रहने वाले अमित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए सुबह ही ट्रेन से दिल्ली पहुंचे थे. अमित ने बताया, "संसद के पास पहुंचते ही वहां तैनात पुलिस बल उनकी ओर बढ़ने लगा. इस दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से पीछे हटने को कहा लेकिन प्रदर्शनकारियों ने जवाब दिया कि वे इतनी दूर पीछे हटने के लिए नहीं, बल्कि सरकार को पीछे हटाने के लिए आए हैं. इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, जिससे भीड़ तितर-बितर हो गई. इसी दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया." 

अमित चंदौली से प्रदर्शन में शामिल होने आए थे.

इस पूरी कार्रवाई में उनके दाहिने हाथ का मांस फट गया. घटना के बाद उन्हें शाम करीब 6 बजे अस्पताल लाया गया. तब से वह अस्पताल में ही भर्ती हैं. 

मध्य प्रदेश के ग्वालियर के अभिषेक पिछले एक महीने से प्रदर्शन में शामिल थे. उनका दावा है कि उनके घरवालों को इस बात की जानकारी नहीं है कि प्रदर्शन के दौरान उन्हें चोट लग गई है. वह घरवालों को बिना बताए आंदोलन में शामिल हो रहे थे.  

अभिषेक ने कहा, "अभी मैं अस्पताल के बेड पर लेटा हुआ हूं, लेकिन इस वक्त भी सीजेपी के प्रदर्शन के साथी ही मेरे साथ हैं. लाठीचार्ज में मेरे दोनों पैरों पर चोट लगी है.” 

अस्पताल के दूसरे माले के वार्ड में एक स्टाफ ने बताया कि यहां जो पहले मरीज थे उन्हें कहीं और शिफ्ट कर दिया है. यहां सिर्फ प्रदर्शन में घायल हुए लोगों को ही लाया जा रहा है. इसके अलावा ग्राउंड फ्लोर पर भी काफी लोग भर्ती किए गए. दूसरी बिल्डिंग के सीएमओ हॉल में भी काफी लोग बताए गए. स्टाफ के मुताबिक, प्रदर्शन में घायल हुए करीब 250 से ज्यादा लोग इलाज के लिए आए थे. नाइट शिफ्ट में मौजूद एक डॉक्टर ने भी इस आंकड़े की पुष्टि की. 

अमित एक महीने से प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे.

वहीं एक अन्य सीनियर डॉक्टर ने भी हमें यही जानकारी दी. उन्होंने कहा, “आज कुल 250 लोग यहां आए थे, जिनमें से ज्यादातर लोग थोड़ा फर्स्ट एड लेकर चले गए हैं. इनमें करीब एक दर्जन पुलिसकर्मी भी थे.” 

हम रात के करीब दो बजे तक अस्पताल में मौजूद थे. इस दौरान हमने दर्जनों घायलों से बात की. साथ ही हम अस्पताल में मौजूद थाने में भी गए जहां हमारी हमारी मुलाकात एसएचओ से हुई. जब हमने उसने पूछा कि कितने प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं तो उन्होंने किसी तरह की जानकारी देने से मना कर दिया.  

कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के आह्वान पर देश के अलग-अलग राज्यों से हजारों की संख्या में छात्र और समर्थक दिल्ली पहुंचे थे. मार्च के दौरान संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने कई जगह बैरिकेड लगाकर रोकने की कोशिश की. इस बीच पुलिस और प्रदर्शनकारियों में धक्का-मुक्की, झड़प और लाठीचार्ज की घटनाएं भी सामने आईं. प्रदर्शन के बाद कई प्रदर्शनकारी घायल और कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए, जिनमें से कई का इलाज दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल समेत अन्य अस्पतालों में चल रहा है.

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