योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये के निवेश के लिए कई एमओयू पर हस्ताक्षर किए. इनमें कुछ समझौते ऐसी कंपनियों के साथ हुए जिनका कोई स्पष्ट कॉरपोरेट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, उनके प्रमोटर्स की साख भी संदेहास्पद है.
फ़रवरी, 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन किया. इस दौरान कई कंपनियों और संस्थाओं ने राज्य में बड़े निवेश करने का वादा किया.
एक भारतीय कारोबारी समूह ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश में सेमिकंडक्टर, डिस्प्ले फैब और चिप बनाने की परियोजनाओं पर 1.65 लाख करोड़ रुपये निवेश करेगा.
इसी समिट में एक दूसरी कंपनी ने गाज़ियाबाद और गौतम बुद्ध नगर में 18 हजार करोड़ रुपये के निवेश के लिए सरकार के साथ एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए.
एक कॉलेज ने भी 40 हजार करोड़ रुपये के निवेश का वादा किया, जबकि एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ने 1,400 करोड़ रुपये निवेश करने की बात कही.
ऐसे ही हजारों निवेश प्रस्तावों को जोड़कर योगी आदित्यनाथ सरकार ने दावा किया कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में कुल 33.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश के समझौते हुए हैं. सरकार का दावा है कि यही निवेश उत्तर प्रदेश को 2030 तक एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में अहम भूमिका निभाएगा.
लेकिन जब इन बड़े-बड़े निवेश के दावों के पीछे मौजूद कंपनियों और संस्थाओं की पड़ताल की गई तो उनकी पृष्ठभूमि को लेकर कई सवाल सामने आए.
करीब 1.65 लाख करोड़ रुपये के एमओयू पर हस्ताक्षर करने वाले आरजी स्ट्रैटेजीज़ ग्रुप का भारत सरकार के कॉर्पोरेट मंत्रालय की वेबसाइट पर कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिलता.
यह समूह उस परिवार से जुड़ा है, जो 2बी एजुकेट (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड का संचालन करता है. यही कंपनी 18 हजार करोड़ रुपये के निवेश का वादा करने वालों में शामिल थी. लेकिन इस कंपनी ने अब तक एक भी बैलेंस शीट दाखिल नहीं की है और इसके निदेशक की मानें तो कंपनी को बंद किया जा रहा है.
इसी तरह, 40 हजार करोड़ रुपये निवेश का दावा करने वाले शैक्षणिक संस्थान में लगभग 600 छात्र हैं और उसकी वित्तीय स्थिति भी बेहद सीमित है. वहीं 1400 करोड़ रुपये के निवेश का एमओयू करने वाले एनजीओ के बारे में ठोस जानकारी जुटाना भी मुश्किल साबित हुआ. इस संस्था से जुड़े एक व्यक्ति का दावा है कि इसके निदेशक पर कई लोगों का पैसा बकाया है.
न्यूज़लॉन्ड्री की जांच में ऐसे ही कई असाधारण और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रचारित दर्जनों निवेश समझौतों में कुछ इसी तरह की मिसाल दिखती है.
गौरतलब है कि इसी साल उत्तर प्रदेश सरकार के साथ 25 हजार करोड़ रुपये के पुक एआई समझौते के रद्द होने के बाद यह सवाल उठा था कि निवेशकों की साख और पात्रता की जांच आखिर किस तरह की जाती है.
न्यूज़लॉन्ड्री की यह पड़ताल बताती है कि मामला किसी एक स्टार्टअप तक सीमित नहीं है. यह जांच इस बड़े सवाल को सामने लाती है कि इन निवेशक सम्मेलनों (इन्वेस्टर्स समिट) में होने वाले ये एमओयू आखिर वास्तविक निवेश लाने में कितने प्रभावी हैं? या फिर इनका उद्देश्य सिर्फ़ बड़े निवेश के दावों के ज़रिए सुर्खियां बटोरना भर है?
यह कहानी वादों और ज़मीनी हकीकत के बीच मौजूद उस बड़े अंतर को भी उजागर करती है, जिस पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं.

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