बुलेट-थार के लालच से टॉपर्स की छीना-झपटी तक: बिहार के कोचिंग संस्थानों की जंग

दो प्रतिद्वंद्वी कोचिंग संस्थानों के बीच हुए टकराव ने पटना के बेहद प्रतिस्पर्धी कोचिंग उद्योग और सफलता के बढ़ा-चढ़ाकर किए जाने वाले दावों की संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है.

WrittenBy:उमेश कुमार राय
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एक भवन में स्थित कोचिंग सेंटर की तस्वीर.

पटना के दो बड़े कोचिंग संस्थानों की भिड़ंत ने देशभर की नजर उस कोचिंग संस्कृति पर ला खड़ी की, जहां सफलता के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं और हर साल लाखों छात्र अपने सपनों के साथ पहुंचते हैं. 

पटना के मुसल्लहपुर की सबसे चर्चित जगहों में से एक किसान कोल्ड स्टोरेज लेन, जिसे शहर का कोचिंग हब भी कहा जाता है, उस दिन भी हर रोज़ की तरह सामान्य दिख रही थी. संकरी गलियों में बने घरों के अंदर चल रहे दफ्तर और शहर के सबसे मशहूर कोचिंग संस्थानों के क्लासरूम, दोनों सुर्खियों में बने हुए थे. 

सरकारी नौकरी के सपने देखने वाले उम्मीदवारों की भीड़ कोचिंग के हेल्प डेस्क पर उमड़ पड़ती है. इस भीड़ में टकराते कंधों के बीच छात्र कोर्स की जानकारी, फीस और बैच के समय की पूछताछ करते नजर आते हैं. 

लेन के सिरहाने पर कोचिंग संस्थानों के बड़े-बड़े साइनबोर्ड लटके हुए हैं. सबसे ऊपर खान ग्लोबल स्टडी ग्रुप का बोर्ड है, जिसके संस्थापक फैसल खान हैं, जिन्हें छात्र और देशभर के लोग ‘खान सर’ के नाम से जानते हैं. उसके ठीक नीचे वाली मंजिल पर ज्ञान बिंदू जीएस अकादमी का बोर्ड लगा है, जिसके संचालक रौशन आनंद हैं, और जो यादव समुदाय से आते हैं.

इन साइनबोर्डों को गौर से देखें तो ये सिर्फ कोचिंग संस्थानों के नाम नहीं बताते, बल्कि इनके पीछे छिपी कई कई अधूरी कहानी बया करते हैं. 

एक हफ्ते पहले इसी लेन में इन दो कोचिंग संस्थानों के बीच वर्चस्व की लड़ाई हिंसक झड़प में बदल गई थी. गोलियां चलीं, तोड़फोड़ हुई और कई लोगों की गिरफ्तारी हुई.

2 जून को हुई इस घटना के बाद यूट्यूब पर सबसे अधिक देखे जाने वाले शिक्षकों में शामिल खान सर पुलिस जांच के दायरे में आए. वहीं दूसरे कोचिंग संस्थान के संचालक को जेल भेज दिया गया. इस स्थानीय विवाद ने जल्द ही राष्ट्रीय सुर्खियां बटोर लीं. लेकिन इस संघर्ष के पीछे सिर्फ व्यक्तिगत या संस्थागत टकराव नहीं, बल्कि वह तीखी प्रतिस्पर्धा भी है, जिसमें कोचिंग संस्थान यह साबित करने की होड़ में रहते हैं कि उनके यहां से सबसे अधिक छात्रों ने सरकारी नौकरियों में सफलता हासिल की है.

‘प्रतिस्पर्धा तो यहां हमेशा से रही है, लेकिन ऐसा कुछ पहली बार हुआ’

लेन के दाहिनी ओर खान ग्लोबल स्टडी ग्रुप का फ्रंट ऑफिस है, जहां तीन से चार स्टाफ सदस्य आने वाले छात्रों के सवालों के जवाब देते हैं और उन्हें कोर्स, फीस व बैच से जुड़ी जानकारी देते हैं. वहीं, कुछ ही कदम की दूरी पर ज्ञान बिंदू जीएस अकादमी का दफ्तर है, जहां स्टाफ नए विद्यार्थियों को कोर्स, फीस और दाखिले से जुड़ी जानकारियां दे रहा था.

कोचिंग के सबसे बड़े क्लासरूम में जहां आमतौर पर खुद खान सर पढ़ाते रहे हैं, जबकि दूसरे कमरों में शिक्षक स्मार्ट बोर्ड पर अपने-अपने विषयों की कक्षाएं लेते हैं. इसी बीच एक छात्रा ने स्टाफ से अपने क्लासरूम का रास्ता पूछा. दरवाजे के बाहर शिक्षकों की दो कारें खड़ी थीं.

इसी भीड़ के बीच सासाराम से आया 18 वर्षीय एक छात्र थोड़ी निराशा के साथ खड़ा था. उसने खान ग्लोबल स्टडीज का ऑनलाइन कोर्स खरीद रखा था और इस उम्मीद में कोचिंग पहुंचा था कि शायद उसकी मुलाकात खान सर से हो जाए. 

उसने न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में बताया कि वह परीक्षा देने पटना आया था और खान सर से मिलने की उम्मीद से उनके सेंटर आया लेकिन वह तब तक कोचिंग सेंटर नहीं आए थे और वह यही सब बताते हुए क्लासरूम का वीडियो बना रहा था.  

खान ग्लोबल स्टडीज के फ्रंट डेस्क पर मौजूद एक स्टाफ सदस्य ने बताया कि कक्षाएं पहले की तरह चल रही हैं. बस पिछले पांच-छह दिनों से खान सर कोचिंग नहीं आए हैं.

हालांकि, दोनों ही कोचिंग संस्थान यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि पढ़ाई प्रभावित न हो. ज्ञान बिंदू जीएस अकादमी के स्टाफ सदस्य सुरेंद्र कुमार, जो खुद भी सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, वह बताते हैं, "हम तीन सेंटर चलाते हैं और हर सेंटर में कम से कम दस क्लासें होती हैं. सभी क्लासें पहले की तरह चल रही हैं और नए छात्र भी दाखिले के लिए आ रहे हैं."

"कोचिंग के बीच प्रतिस्पर्धा हमेशा से रही है, लेकिन पहली बार मैंने देखा है कि यह हिंसक झड़प और गिरफ्तारियों तक पहुंच गई," यह कहना है मतीउर रहमान खान का, जिन्हें छात्र गुरु रहमान के नाम से जानते हैं.

गुरु रहमान मुसल्लहपुर में पिछले 24 वर्षों से कोचिंग चला रहे हैं. उनका कहना है कि यहां प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार विवाद ने एक अलग और चिंताजनक रूप ले लिया.

वो चिंगारी जिसने ये आग भड़काई

पिछले साल, बिहार के सेंट्रल सेलेक्शन बोर्ड ऑफ कॉन्स्टेबल रिक्रूटमेंट (सीएसबीसी) ने 19,383 कॉन्स्टेबल पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसके लिए करीब 16 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया था.

लिखित परीक्षा के बाद 99,690 उम्मीदवारों को शारीरिक पात्रता परीक्षा के लिए चुना गया था. अंततः 27 मई को जारी अंतिम सूची में 19,383 उम्मीदवारों का चयन हुआ. 

इसके कुछ दिनों बाद खान गलोब्ल स्टीज ने अपना बैनर लगाया, जिसमें ये दावा किया गया कि 12,000 उम्मीदवारों का चयन हुआ है और खान सर उन्हें सम्मानित करेंगे. 

ज्ञान बिंदू के रौशन आनंद ने मुकाबला करते हुए कहा कि उनके 10,000 छात्रों को चुना गया है. इस तरह दोनों के दावों को मिलाकर देखें तो 22,000 छात्र बनते हैं लेकिन असल में भर्ती तो सिर्फ 19,383 छात्रों की है. ऐसे में दोनों की संख्या सही नहीं हो सकती है.

इमारत के भीतर मौजूद सूत्रों के मुताबिक, विवाद की चिंगारी तब भड़की जब प्रतिद्वंद्वी कोचिंग संस्थान ज्ञान बिंदु जीएस अकादमी के साइनबोर्ड पर चयनित सिपाहियों को सम्मानित करते हुए खान सर का एक बैनर दिखाई दिया.

सूत्रों का दावा है कि इसी घटना ने खान सर के कोचिंग सेंटर पर हमले की शुरुआत की. 

घटना की रात टूटा कोचिंग बोर्ड.

शिकायत के मुताबिक, 2 जून की रात करीब 10 बजे करीब दो दर्जन लोगों के एक समूह ने खान ग्लोबल स्टडीज़ के मुख्य कार्यालय और कोचिंग सेंटर पर पथराव किया. कदमकुआं थाने में दर्ज शिकायत में संस्थान के प्रबंधक कन्हैया कुमार सिंह ने आरोप लगाया कि कक्षाएं समाप्त होने के बाद कोचिंग सेंटर बंद हो चुका था, तभी ज्ञान बिंदू के निदेशक रौशन आनंद के कहने पर अभिषेक और प्रिंस (रौशन आनंद के भाई) 15-20 युवकों के साथ सेंटर के गेट पर पहुंचे.

आरोप है कि उन्होंने सुरक्षा गार्ड को बाहर खींचकर उसके साथ मारपीट की, जिससे उसके सिर में चोट लगी. इसके बाद हमलावरों ने संस्थान के साइनबोर्ड और बैरिकेड्स में तोड़फोड़ की तथा खान सर की तस्वीर को भी क्षतिग्रस्त कर दिया.

शिकायत में सिपाही भर्ती परीक्षा के परिणामों को इस हमले की वजह बताया गया है. संस्थान के प्रबंधक कन्हैया कुमार सिंह ने दावा किया, “मेरे कोचिंग संस्थान से अधिक छात्रों का चयन हुआ था. इसी ईर्ष्या के चलते ज्ञान बिंदू के संचालक रौशन आनंद के इशारे पर इस घटना को अंजाम दिया गया.”

पुलिस ने इस मामले में रौशन आनंद, अभिषेक और प्रिंस को गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी से पहले रौशन आनंद ने इसे एक साजिश करार देते हुए मीडिया से कहा, “खान सर और कोल्ड स्टोरेज के मालिक मिलकर ज्ञान बिंदू को बर्बाद करने की साजिश रच रहे हैं... लेकिन अंततः सच की जीत होगी.” 

बाद में अदालत में रौशन की जमानत याचिका खारिज हो गई.

इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक कोल्ड स्टोरेज के मालिक का फोन बंद था और उनसे संपर्क नहीं हो सका.

वहीं, हमले के दौरान हुई कथित फायरिंग को लेकर एक अलग मामला दर्ज किया गया है. खान सर ने पहले दावा किया था कि हमले के दौरान गोलियां चलाई गईं, लेकिन बाद में वह अपने बयान से पीछे हट गए. घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस एक स्क्रीनशॉट के आधार पर मौके पर पहुंची.

कदमकुआं थाने में दर्ज पुलिस शिकायत के अनुसार, स्थानीय लोगों और खान सर से पूछताछ में पता चला कि गोली चलाने वाले लोग उनके निजी सुरक्षा गार्ड थे. इनमें उत्तर प्रदेश के 38 वर्षीय प्रदीप कुमार और 34 वर्षीय तालेबर सिंह शामिल हैं. पुलिस ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस के मुताबिक, पूछताछ के दौरान दोनों सुरक्षा गार्डों ने दावा किया कि खान सर ने उनसे कहा था, “क्या देख रहे हो? भीड़ पर तुरंत गोली चलाओ, बाकी मैं संभाल लूंगा.”

दोनों के बयानों के आधार पर पुलिस ने खान सर के खिलाफ शस्त्र अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है. हालांकि, स्थानीय अदालत ने उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान कर दिया है. मामले की अगली सुनवाई 20 जून को निर्धारित है.

खान सर के वकील अरविंद महुआर ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा, “अदालत ने केस डायरी और खान सर के खिलाफ यदि कोई पुराने मामले हैं, तो उनका विवरण पेश करने को कहा है.”

पटना में कोचिंग उद्योग का उत्थान, पतन और पुनरुत्थान

मुसल्लहपुर पुराने पटना का एक इलाका है. इसका नाम अरबी शब्द मुसल्ला से निकला है, जिसका अर्थ है- ‘प्रार्थना करने का स्थान’. कहा जाता है कि आसपास व्यापार करने आने वाले मुस्लिम व्यापारी यहां नमाज अदा करते थे, इसी वजह से इस इलाके का नाम मुसल्लहपुर पड़ा.

जब पटना विश्वविद्यालय और उससे जुड़े कॉलेज अस्तित्व में आए, तो मुसल्लहपुर और उसके आसपास के इलाके सस्ते आवास की तलाश में आने वाले छात्रों से भरने लगे. छात्रों की बढ़ती संख्या के साथ यहां कोचिंग संस्थान भी खुलने लगे. हालांकि उस समय पढ़ाने का तरीका आज से काफी अलग था.

साल 1994 से क्रॉनिकल अकादमी चलाने वाले 60 वर्षीय कुमार विजय बताते हैं, “यह इलाका सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले और ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को आकर्षित करता था, क्योंकि यहां रहना बेहद सस्ता था. चूंकि बड़ी संख्या में अभ्यर्थी यहां रह रहे थे, इसलिए शिक्षकों ने यहीं कोचिंग संस्थान शुरू किए. लेकिन आज की तरह एक शिक्षक सभी विषय नहीं पढ़ाता था. उस समय एक शिक्षक सिर्फ एक विषय पढ़ाता था और वह उसी विषय के लिए बेहद प्रसिद्ध होता था.”

एक समय ऐसा भी था, जब मुसल्लहपुर और उसके आसपास का क्षेत्र दिल्ली के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा तैयारी केंद्र माना जाता था. बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी यह देश के प्रमुख केंद्रों में शामिल था.

कुमार विजय कहते हैं, “बिहार के हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों का यूपीएससी में चयनित कुल उम्मीदवारों में 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा होता था. लेकिन वर्ष 2013 में सिविल सेवा अभिक्षमता परीक्षा (सीसैट) लागू होने के बाद हिंदी माध्यम और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा. इसका सीधा असर पटना के यूपीएससी कोचिंग संस्थानों पर पड़ा और बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने दिल्ली का रुख करना शुरू कर दिया.”

हालांकि, यूपीएससी कोचिंग का यह पतन पहला झटका नहीं था. इससे पहले वर्ष 2002 में बैंकिंग कोचिंग उद्योग को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा, जब केंद्र सरकार ने बिहार के बैंकिंग सेवा भर्ती बोर्ड (बीएसआरबी) समेत देशभर के सभी बैंकिंग सेवा भर्ती बोर्डों को समाप्त कर दिया.

चूंकि, बिहार के अधिकांश अभ्यर्थियों की निगाह किसी भी तरह की सरकारी नौकरी पर टिकी रहती है, इसलिए बैंकिंग और यूपीएससी कोचिंग के कमजोर पड़ने के बाद कम वेतन वाली राज्य स्तरीय सरकारी नौकरियों की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों ने तेजी से जगह बना ली. हालांकि, उस समय आज जैसी ‘फैन कल्चर’ की स्थिति नहीं थी और न ही कोचिंग संस्थान परिणाम खरीदने या सफलता के आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने जैसे तरीकों का सहारा लेते थे.

कुमार विजय कहते हैं, “उस दौर में भी इलाके में कुछ बेहद अच्छे शिक्षक मौजूद थे.”

फिर कोविड-19 महामारी ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया. कक्षाएं ऑनलाइन होने लगीं और पारंपरिक कोचिंग संचालकों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई. कुमार विजय बताते हैं, “पुराने शिक्षक ऑनलाइन पढ़ाने में सहज नहीं थे, इसलिए उन्हें अपने कोचिंग संस्थान बंद करने पड़े. उनकी जगह उन लोगों ने ले ली, जो ऑनलाइन कक्षाओं और यूट्यूब की लोकप्रियता की ताकत को समझते थे.” खान सर भी इन्हीं में से एक थे.

खान सर को महामारी के दौरान भारत-नेपाल सीमा विवाद पर बनाए गए एक वीडियो से यूट्यूब पर व्यापक पहचान मिली. पिछले वर्ष इसी संवाददाता को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि वह अपने गांव में एक स्मार्ट बोर्ड लेकर गए और वहीं से यूट्यूब पर पढ़ाई से जुड़े वीडियो अपलोड करने शुरू किए. आज उनके यूट्यूब चैनल ‘खान ग्लोबल स्टडीज़’ के 61 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं.

रौशन आनंद ने वर्ष 2017 में कोचिंग की शुरुआत की थी. उनके यूट्यूब चैनल ‘ज्ञान बिंदू जीएस अकादमी’ के 11 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं. वहीं, पटना में गंगा किनारे हजारों अभ्यर्थियों के लिए मॉक टेस्ट आयोजित कर चर्चा में रहने वाले शिक्षक एसके झा के यूट्यूब चैनल के 18 लाख सब्सक्राइबर हैं.

पटना में संचालित कोचिंग संस्थानों की कोई आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमान है कि इनकी संख्या 2,000 से अधिक है. इनमें से अधिकांश मुसल्लहपुर, नया टोला, भीखना पहाड़ी और आसपास के इलाकों में केंद्रित हैं. ये संस्थान मुख्य रूप से कम वेतन वाली सरकारी नौकरियों, जैसे रेलवे और बिहार पुलिस में सिपाही भर्ती परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं.

जब हजारों अभ्यर्थियों को आकर्षित करने के लिए इतने सारे कोचिंग संस्थान एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रहे हों तो मुकाबला बेहद तीखा होना स्वाभाविक है. इसके लिए सबसे लोकप्रिय तरीका यह बन गया है कि कोचिंग संस्थान जोर-शोर से यह घोषणा करें कि उनके यहां पढ़ने वाले सैकड़ों या हजारों छात्रों ने अमुक परीक्षा पास की है और फिर उनके सम्मान में सार्वजनिक सम्मान समारोह आयोजित करें.

बिहार पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा में 12,000 अभ्यर्थियों के चयन का खान सर का दावा भी इसी रणनीति का हिस्सा था. अब यह प्रतिस्पर्धा केवल चयनित छात्रों की संख्या बताने तक सीमित नहीं रह गई है. कई संस्थान सफल अभ्यर्थियों को नकद पुरस्कार से लेकर मोटरसाइकिल और कार तक देने लगे हैं.

‘बुलेट भी देंगे, थार भी और डबल स्टार भी’

वर्ष 2024 में रौशन आनंद ने बिहार पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा में शीर्ष 20 स्थान हासिल करने वाले कुछ अभ्यर्थियों को बुलेट मोटरसाइकिलें भेंट कीं. उन्होंने यह भी घोषणा की कि यदि उनके संस्थान का कोई छात्र प्रथम स्थान प्राप्त करता है तो उसे थार एसयूवी दी जाएगी.

सम्मान समारोह में रौशन आनंद ने कहा था, “कुछ लोग कहते हैं कि वे बुलेट या थार नहीं देंगे, बल्कि डबल स्टार (पुलिस का पद) देंगे. मेरा कहना है कि हम बुलेट भी देंगे, थार भी देंगे और डबल स्टार भी देंगे.”

दूसरी ओर, खान सर ने 12,000 चयनित सिपाहियों को अपने संस्थान में आमंत्रित किया, उन्हें पुलिस की वर्दियां और मेडल वितरित किए तथा उनके लिए भोज का आयोजन भी किया.

इस प्रतिस्पर्धा का एक और कम चर्चित पहलू भी है. आरोप है कि कई कोचिंग संस्थान ऐसे सफल अभ्यर्थियों को भी अपने संस्थान का छात्र बताने की कोशिश करते हैं, जिन्होंने वास्तव में कहीं और पढ़ाई की होती है.

हाल ही में रेलवे में लोको पायलट पद पर चयनित एक अभ्यर्थी ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि परिणाम आने के बाद एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान ने अपने एक छात्र के जरिए उससे संपर्क किया था.

अभ्यर्थी ने कहा, “मुझसे कहा गया कि शिक्षक मुझे नकद पुरस्कार देंगे और सम्मानित भी करेंगे. लेकिन मैंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकि मैंने उस संस्थान में पढ़ाई ही नहीं की थी.”

दो महीने पहले, जब बिहार के अभिषेक पटेल ने फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर परीक्षा में शीर्ष स्थान हासिल किया, तब खान सर और रौशन आनंद दोनों ने उन्हें अपना छात्र बताया था.

बिहार पुलिस भर्ती परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले शिक्षक गुरु रहमान मानते हैं कि विवाद की जड़ यहीं है. उनका आरोप है, “परिणामों की खरीद-फरोख्त ही इस संघर्ष की मुख्य वजह है. मेरा कभी किसी कोचिंग संस्थान से ऐसा विवाद नहीं हुआ, लेकिन इन दोनों के बीच यह प्रतिद्वंद्विता कई वर्षों से चल रही थी.”

एक अन्य कोचिंग संस्थान चलाने वाले दीपक कुमार ऐसे प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग करते हैं. उनका कहना है, “नौकरी के अभ्यर्थियों को आकर्षित करने के लिए कोचिंग संस्थान अक्सर फर्जी आंकड़े पेश करते हैं. यह बंद होना चाहिए. शिक्षकों का काम सिर्फ पढ़ाना है और उन्हें उसी तक सीमित रहना चाहिए.”

फिलहाल, दोनों चर्चित शिक्षकों के कानूनी मामलों में उलझे होने के बावजूद अभ्यर्थियों का आना-जाना जारी है. सरकारी नौकरी की उम्मीद में हजारों छात्र अब भी मुसल्लहपुर की कोचिंग गलियों में भटक रहे हैं.

खान सर के यहां पढ़ने वाले एक बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) अभ्यर्थी को उम्मीद है कि यह विवाद जल्द समाप्त हो जाएगा. वह कहते हैं, “दोनों शिक्षक पढ़ाने में अच्छे हैं और मुझे नहीं लगता कि वे खुद इस तरह के विवाद में पड़ना नहीं चाहेंगे. मुझे लगता है कि उनके चमचे ही माहौल खराब कर रहे हैं. हम चाहते हैं कि वे न लड़ें, क्योंकि इसका असर हम जैसे अभ्यर्थियों पर पड़ता है.”

वहीं, ज्ञान बिंदू जीएस अकादमी में पढ़ने वाली नेहा भारती के लिए इस विवाद का असर पहले ही दिखाई देने लगा है. रौशन आनंद के जेल जाने के बाद उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई है. वह कहती हैं, “रौशन सर सामान्य अध्ययन की कक्षाएं लेते थे, जो अब बंद हो गई हैं. दोनों अच्छे शिक्षक हैं और उनकी लड़ाई का असर अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है.”

लेखक पटना के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित ख़बर को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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