सुप्रीम कोर्ट का फैसला: चुनाव आयोग को एसआईआर प्रक्रिया चलाने का पूरा अधिकार

कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग सीमित दायरे में नागरिकता की जांच कर सकता है लेकिन उस पर कोई फैसला नहीं दे सकता. 

सुप्रीम कोर्ट भवन की तस्वीर और चुनाव आयोग का लोगो. पृष्ठभूमि में मतदाता सूचियों की तस्वीर.

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और अन्य राज्यों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता और इसे कराने के लिए चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्ति को बरकरार रखा है. कोर्ट ने कहा कि एसआईआर मनमानी नहीं है और चुनाव आयोग को यह प्रक्रिया चलाने का अधिकार है. यह फैसला उस कानूनी चुनौती को खारिज करते हुए आया, जिसमें इस पूरी प्रक्रिया के संवैधानिक आधार पर सवाल उठाए गए थे. 

मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति (जस्टिस) जॉयमाल्या बागची की पीठ ने बुधवार को उन कई याचिकाओं पर फैसला सुनाया, जो पिछले साल जून में दायर की गई थीं. तब चुनाव आयोग ने पहली बार बिहार में एसआईआर की घोषणा की थी. 

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा, “एसआईआर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाता है. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते. वे मूल रूप से मतदाता सूची की शुचिता, सटीकता और विश्वसनीयता पर आधारित होते हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव है.”

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि केवल इसलिए एसआईआर को अवैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह “नियमित पुनरीक्षण के लिए निर्धारित सामान्य प्रक्रियाओं” से अलग है.

उन्होंने लिखा, “जब कानून खुद किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देता है, बशर्ते उसके कारण दर्ज किए जाएं और प्रक्रिया चुनाव आयोग के विवेक के अनुसार तय की जाए, तब इस अभ्यास को केवल इसलिए अमान्य नहीं कहा जा सकता कि यह नियमित पुनरीक्षण की सामान्य प्रक्रियाओं के हर पहलू का पालन नहीं करता.”

उन्होंने फैसले में आगे कहा, “हमारी सुविचारित राय में, विवादित एसआईआर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और नियमों को प्रतिस्थापित नहीं करता. बल्कि यह अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक दायित्व को धारा 21(3) की स्पष्ट वैधानिक सीमाओं के भीतर प्रभावी बनाता है. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों का अतिक्रमण किया है.”

अदालत ने इस मामले में जनवरी के आखिर से फैसला सुरक्षित रखा हुआ था. जब तक फैसला आया, तब तक चुनाव आयोग बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया पूरी कर चुका था, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और कई अन्य राज्यों में यह प्रक्रिया जारी है. अदालत ने सुनवाई के दौरान इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और कानूनी प्रश्नों पर विचार करते हुए भी पुनरीक्षण को जारी रहने दिया था.

इन याचिकाओं को चुनौती देने वालों में एक व्यापक समूह शामिल था, जिसमें एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव, और कई मौजूदा सांसद जैसे टीएमसी की महुआ मोइत्रा, राजद के मनोज झा, कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल और एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले शामिल थीं.

याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि एसआईआर एक ‘एनआरसी जैसी’ प्रक्रिया है- यानी नागरिकता की जांच करने की एक परोक्ष कवायद, जिसमें पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों को भी अपनी नागरिकता दस्तावेजों के जरिए फिर से साबित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

हालांकि, इस मुद्दे पर अदालत ने एक सावधानीपूर्ण अंतर स्पष्ट किया. अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग “नागरिकता से जुड़ी सीमित चुनावी जांच” कर सकता है, लेकिन वह नागरिकता का अंतिम फैसला नहीं दे सकता. 

फैसले में कहा गया, “विस्तृत विचार के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 के तहत मौजूद वैधानिक आवश्यकता को देखते हुए, चुनाव आयोग मतदाता सूची तैयार करने या संशोधित करने की प्रक्रिया में नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच करने के लिए निस्संदेह सक्षम है. हालांकि, ऐसी जांच केवल मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने तक सीमित उद्देश्य से ही की जा सकती है और यह उस मतदाता के पक्ष में मौजूद अनुमान का सम्मान करते हुए की जानी चाहिए, जिसका नाम पहले से सूची में मौजूद है. इसी सीमित वैधानिक दायरे में आयोग उपलब्ध सामग्री का आकलन करता है और केवल चुनावी उद्देश्यों तक सीमित निर्णय लेता है.”

बुधवार के इस फैसले ने कानूनी विवाद को चुनाव आयोग के पक्ष में समाप्त कर दिया है.

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