दिन ब दिन की इंटरनेट बहसों और खबरिया चैनलों के रंगमंच पर संक्षिप्त टिप्पणी.
भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि मोदीजी पिछले बारह सालों से प्रेस कॉन्फ्रेंस नाम की बीमारी से पूरी तरह मुक्त हैं. मोदी जी सिर्फ़ उन्हीं चुनिंदा और पालतू सवालों का सामना करते हैं जिनकी स्क्रिप्ट किसी 'रियलिटी शो' की तरह पहले से लिखी, जांची और सेंसर बोर्ड से पास कराई जा चुकी हो. लेकिन मोदी जी की अलौकिक शान में नॉर्वे की एक महिला पत्रकार ने भयंकर गुस्ताखी कर दी.
इसके बाद गजब माहौल हो गया. हिदुस्तान के खबरिया चैनलों पर एक विदेशी पत्रकार को गरियाने के बहाने पत्रकारिता लौट आई. हर दिन स्टूडियो में गड्ढा खोद खोद कर पत्रकारिता की कब्र बनाने वालों ने हेला लेंग को बताया कि पत्रकारिता कैसे होनी चाहिए.
इसके अलावा अगर कुछ चल रहा है तो सौरभ द्विवेदी के मीम्स. पत्रकारिता के बाद एक्टिंग में हाथ आजमा रहे सौरभ द्विवेदी की पहली फिल्म कर्तव्य आई. जमाना दिवाना हो गया. सौरभ की एक्टिंग के चक्कर में बाकी फिल्म लोग भूल ही गए. सौरभ की एक्टिंग अच्छी थी या बुरी, इस पर बहस ज्यादा हो गई, जबकि वह एक बड़ी फिल्म का बहुत छोटा सा हिस्सा है. डूबते जहाज के महज एक पैसेंजर.
साथ में देखिए कहानी ‘कॉकरोचलैंड’ की, जहां बेरोजगार काकरोचों पर उन्माद छाया हुआ है.