‘ऑपरेशन सिंदूर’ का एक साल: सीमा पर रहे लोगों का एक ही सवाल- कब बनेंगे बंकर?

गोलीबारी के दौरान जिनकी मौत हुई, उनमें से ज्यादातर शहर से बाहर किसी सुरक्षित जगह पर जाने की कोशिश में थे क्योंकि उनके घर में या आसपास बंकर नहीं था.

WrittenBy:अनमोल प्रितम
Date:
सीमापार से गोलीबारी में जान गंवाने वाले विहान का परिवार

पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़े तनाव के दौरान पुंछ ने सबसे ज़्यादा नुकसान झेला. जहां भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वाह-वाही की ख़बरें छाई रहीं, वहीं पुंछ जैसे इलाकों में सीमापार से हुई भारी गोलाबारी को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया. कहा जाता है कि यह 1999 के कारगिल युद्ध के बाद की सबसे भीषण गोलीबारी थी.

पुंछ को सबसे ज्यादा नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि जिले में आम नागरिकों के लिए पर्याप्त बंकर नहीं हैं. गोलीबारी के दौरान जिनकी मौत हुई, उनमें से ज्यादातर शहर से बाहर किसी सुरक्षित जगह पर जाने की कोशिश में थे क्योंकि उनके घर में या आसपास बंकर नहीं था. 

दरअसल, हर बार जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ता है, तो सीमा रेखा के आसपास रहने वाले लोगों को ही इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. लगातार मंडराते इस खतरे के बीच ये लोग लंबे समय से सरकार से एक ही मांग करते रहे हैं- सुरक्षित बंकरों की व्यवस्था ताकि वे और उनके परिवार गोलाबारी के वक्त कहीं तो शरण ले सकें. 

इस जरूरत को स्वीकार करते हुए साल 2018 में केंद्र सरकार ने जम्मू डिविजन में 14,460 बंकर बनाने के लिए 415 करोड़ रुपये आवंटित किए. इनमें दो तरह के बंकर शामिल थे- एक व्यक्तिगत बंकर जो घरों के पास परिवारों के लिए बनाए जाने थे और दूसरा सामुदायिक बंकर, जिन्हें पूरे गांव के लोग साझा तौर पर इस्तेमाल कर सकें. मालूम हो कि सामुदायिक बंकर में करीब 3 दर्जन लोगों के शेल्टर की व्यवस्था होती है. 

इस योजना का कितना हिस्सा जमीन पर उतरा? ये जानने के लिए हमने बीते साल सीमा के पास बसे चार गांवों- पुंछ के मंधार, राजौरी के लाम, पुखरनी और लडोका का दौरा किया. इनमें से किसी भी गांव में आबादी के अनुपात में पर्याप्त संख्या में बंकर नहीं मिले. 

अब ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बीत जाने के बाद जब हमने इन गांवों के सरपंचों से फिर से बात की तो पता चला कि इन गांवों में बंकरों की स्थिति जस की तस है. यहां कोई नया बंकर नहीं बनाया गया है. राजौरी के पुखरनी गांव के सरपंच महमूद ने कहा कि पंचायत में कोई नया बंकर नहीं बना है. गांव में इस वक्त कुल 509 घर हैं लेकिन बंकर केवल 287 ही हैं. उन्हें करीब 200 और बंकरों की जरूरत है. 

पुंछ में बंकरों की मौजूदा स्थिति जानने के लिए हमने एलओसी से सटे तीन और गांवों के सरपंचों से बात की. करमाडा गांव के सरपंच मोहम्मद शरीफ ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनके गांव के लोगों को अस्थायी तौर पर पलायन करना पड़ा था क्योंकि पर्याप्त बंकर नहीं थे. उस वक्त 7-8 घरों को नुकसान हुआ था. 

वह आगे बताते हैं कि बॉर्डर के पास रहने के कारण हर समय डर लगा रहता है और परिवार की चिंता सताती रहती है. इसलिए हमारी सबसे प्राथमिक मांग बंकर की रही है. लेकिन इसके बावजूद गांव में 2019 के बाद से कोई नया बंकर नहीं बना है. उनके मुताबिक, गांव में 500 घर हैं लेकिन केवल 200 घरों के पास बंकर है.

डेगवार गांव के सरपंच परविंदर सिंह कहते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद स्थानीय अधिकारियों से बंकर को लेकर कई बार बात हुई लेकिन हमें अभी तक एक भी बंकर नहीं मिला है.

वह कहते हैं, “हम जंग से नहीं डरते. हमने 1965 में, 1971 में सेना के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी है लेकिन हम चाहते हैं कि कम से कम हमारे बच्चे सुरक्षित रहें. इसीलिए हम गांव में आने वाले सभी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से एक ही मांग रखते हैं कि हमें बंकर दिया जाए.” 

पुंछ के डिप्टी कमिश्नर को लिखा गया पत्र

पुंछ के डिप्टी कमिश्नर को पत्रजानकारी के मुताबिक, डेगवार गांव में कुल 832 घरों में करीब 3800 लोग रहते हैं. उन्होंने अप्रैल 2019 में पुंछ के डिप्टी कमिश्नर को पत्र लिखकर केवल 70 व्यक्तिगत और 6 कम्युनिटी बंकर की मांग की थी ताकि कम से कम गांव की महिलाओं और बच्चों को तो सुरक्षित किया जा सके. हालांकि, मांग अभी तक पूरी नहीं हुई है. 

कस्बा गांव की हालत भी ऐसी ही है. यहां आबादी करीब पांच हजार है और लगभग 900 घर हैं. लेकिन गांव में केवल 12 कम्युनिटी और तीन व्यक्तिगत बंकर हैं जिनमें अधिकतम 300 लोग आ सकते हैं. 

पुंछ शहर में भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद आम लोगों के लिए कोई बंकर नहीं बनाया गया. इस रिपोर्ट के दौरान जितने परिवारों से बात की, उनमें से किसी को बंकर नहीं मिला है. हालांकि, शहर में दो नए बंकर बनाए गए हैं- एक डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में और दूसरा डाक बंगला परिसर में है, जो कि अभी पूरा नहीं बना है. 

मालूम हो कि डाक बंगला परिसर एक विश्राम गृह है, जो आम जनता के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों के लिए भी उपलब्ध होता है. 

कस्बा गांव के सरपंच अहमद जमील कहते हैं, “जो दो नए बंकर बनाए गए हैं वो तो अफसरों के लिए हैं. आम जनता के लिए पूरे पुंछ में एक भी बंकर नहीं बना है.”

बीते नवंबर, 2025 में, राज्यपाल ने भी जानकारी दी थी कि 5,000 से अधिक बंकर बनाने का एक प्रस्ताव मंज़ूरी के लिए भेजा गया है. वहीं, इन बंकरों की स्थिति पर जानकारी के लिए जब हमने जिला उपायुक्त से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने किसी भी तरह की टिप्पणी से इनकार कर दिया. हमने इस सिलिसले में गृह मंत्रालय से भी संपर्क किया है. 

जब सुरक्षित स्थान की टोह में गई जान

भारत- पाकिस्तान संघर्ष में पुंछ के 14 नागरिक मारे गए. जो इस पूरे घटनाक्रम की सबसे भारी और शायद सबसे अनदेखी कीमत थे. उनके घरों में आज भी सन्नाटा गूंजता है. उनके परिवारों के लिए ये एक साल नहीं बीता है. उनका हर दिन, हर रात, उसी एक पल में अटका हुआ है. जहां धमाके की एक आवाज़ आई थी और सब कुछ हमेशा के लिए बदल गया.

लगभग एक साल बीत जाने के बावजूद आफरीन अपने पिता अकरम के दुख से नहीं उबर पायी है और अपनी शादी टाल दी है. रमीज़ ख़ान की आंखें आज भी अपने जुड़वां बच्चों ज़ैन और उर्वा को याद करके भर आती हैं. संजीव भार्गव अपनी इकलौती औलाद विहान को खो देने के सदमे से बाहर नहीं निकले हैं और बार-बार उसकी बनाई ड्राइंग्स देखते रहते हैं. गुरमीत सिंह अभी भी अपना और अपने बेटे का इलाज करवा रहे हैं.

ये लोग उन 14 लोगों में शामिल थे, जो पिछले साल भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित पुंछ ज़िले में हुई पाकिस्तानी गोलीबारी में मारे गए. पीर पंजाल की पहाड़ियों में बसे इस इलाके ने जो तबाही देखी उसके ज़ख़्म आज तक नहीं भरे हैं.

मीडिया ने जब कारी को आंतकी बना दिया

गोलीबारी में 47 वर्षीय क़ारी मोहम्मद इक़बाल की मौत हो गई. वह जामिया ज़िया-उल-उलूम में एक शिक्षक थे और बच्चों को पढ़ाते थे. लेकिन उनकी मौत के टीवी चैनलों ने अलग ही तरह से पेश किया.

भारतीय मीडिया के कई चैनलों ने क़ारी मोहम्मद इक़बाल को ‘आतंकी’ बताया. न्यूज़18 इंडिया और सीएनएन-न्यूज़18 पर चलाए गए कार्यक्रमों में दावा किया गया कि वह लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के कोटली में भारतीय एयर स्ट्राइक में मारे गए. वरिष्ठ पत्रकार किशोर आजवाणी ने उन्हें 'लश्कर कमांडर' बताते हुए कहा कि वह 'आतंक की फैक्ट्रियां' चलाते थे.

ज़ी न्यूज़ ने भी उनकी खून से सनी तस्वीर दिखाकर उन्हें ‘एनआईए का मोस्ट वांटेड आतंकी' बताया और दावा किया कि वह कोटली में छिपा हुआ एक आतंकी कमांडर था. रिपब्लिक टीवी ने भी इसी तरह के दावे प्रसारित किए.

हालांकि, पुंछ पुलिस ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि क़ारी मोहम्मद इक़बाल का आतंकवाद से कोई संबंध नहीं था और वह सीमा पार से हुई गोलीबारी के शिकार हुए थे.

विहान भार्गव: 13 साल की उम्र, चलती कार में मौत

13 साल के विहान भार्गव की मौत तब हुई जब उनका परिवार शहर छोड़कर किसी सुरक्षित जगह पर जा रहा था. उस दिन को याद करते हुए विहान के पिता संजीव भार्गव भावुक हो जाते हैं. उनका गला भर आता है.

वह कहते हैं, "हमने 13 साल में कभी उसको खरोंच भी नहीं लगने दी. उस दिन भी कार में मैंने उसे अपने और बहन के बीच में बैठाया ताकि वह सुरक्षित रहे लेकिन एक धमाका हुआ और चलती कार में एक स्प्लिंटर उसके सिर में आ लगा. मेरा बच्चा एक पल में दुनिया से चला गया."

दरअसल, रात से ही पूरे शहर में गोलीबारी हो रही थी, लेकिन इसके बावजूद पुंछ के लोगों को लगा कि सेना मॉक ड्रिल की तैयारी कर रही है क्योंकि शहर में 7 मई को मॉक ड्रिल की घोषणा हुई थी. संजीव के मुताबिक़, उनका परिवार रातभर सो नहीं पाया क्योंकि इस बार धमाकों की आवाज़ें नियमित तौर पर होने वाली क्रॉस बॉर्डर फ़ायरिंग से अलग थीं. सुबह उन्होंने देखा कि घर के बाहर स्प्लिंटर पड़े हुए हैं. फिर उन्होंने अपने बहनोई गुरमीत सिंह (45) को फ़ोन लगाया और शहर से दूर चलने की बात कही.

11 बजे दोनों परिवार यानी संजीव की पत्नी रश्मी सुधान, बेटा विहान और गुरमीत की पत्नी अंजुबाला और 14 साल का बेटा राजवंश घर से निकले. गुरमीत सिंह कार चला रहे थे और उनके बगल में आगे की सीट पर रश्मी बैठी थीं. पीछे की सीट पर संजीव और अंजुबाला बैठे थे और बीच में दोनों बच्चों को बैठाया था ताकि वे सुरक्षित रहें.

अगले 10 मिनट में गाड़ी शहर से क़रीब छह किलोमीटर दूर थी, तभी गाड़ी से थोड़ी दूर पर एक धमाका हुआ और उसके स्प्लिंटर गाड़ी के अंदर घुस गए. गुरमीत सिंह का दांया पैर बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया, उनकी पत्नी के कंधे पर चोट आई. एक स्प्लिंटर विहान के सिर को चीरते हुए निकल गया और एक राजवंश के दाहिने हाथ और सिर में लगा. इस दौरान विहान की मां भी बुरी तरह घायल हो गईं. वो अभी भी दाहिने कान 70 प्रतिशत नहीं सुन सकती.

विहान की मौके पर ही मौत हो गई. उस घटना को याद करते हुए संजीव कहते हैं, "काश मैं उन दस मिनट को अपनी ज़िंदगी से मिटा सकता. उस दिन के बाद से न मुझसे खाया जाता है और न किसी से बात की जाती है. मैं बस अपने बेटे को याद करता रहता हूं और रोता रहता हूं. मैं हर दिन यही सोचता हूं कि आख़िर मुझे मौत कब आएगी."

घायल गुरमीत सिंह और उनके बेटे को पहले पुंछ ज़िला अस्पताल ले जाया गया, जहां से उन्हें रेफर कर जीएमसी जम्मू भेजा गया. फिर उसी रात जम्मू से भी रेफर करके अमृतसर के एक निजी अस्पताल भेजा गया, जहां उनका क़रीब 3 महीने इलाज चला. वह अभी भी अपने पैरों के सहारे चल नहीं सकते. उनके पैरों की कुल 4 सर्जरी हो चुकी हैं. उनका बेटा अभी भी अपना दाहिना हाथ नहीं उठा पाता और उसकी भी तीन सर्जरी हो चुकी हैं, जबकि सिर में दो छर्रे अभी भी मौजूद हैं.

गुरमीत सिंह बताते हैं कि पिछले एक साल में लगभग 45 लाख रुपये ख़र्च हो चुके हैं, लेकिन सरकार की तरफ़ से अब तक केवल पांच लाख रुपये मुआवज़े और 5 लाख रुपये फ़िक्स डिपोज़िट के रूप में मिले हैं.

विहान के परिवार को सरकार की तरफ़ से 16 लाख रुपये का मुआवज़ा और उनकी माता को शिक्षा विभाग में नौकरी दी गई लेकिन संजीव इससे खुश नहीं हैं:

वह कहते हैं, "ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च करने से पहले सरकार को अपने नागरिकों को सुरक्षित करना चाहिए था. कम से कम हमें यह सूचना दी जाती कि जंग जैसे हालात होने वाले हैं तो हम ख़ुद को बचा लेते. लेकिन सरकार ने रात में ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च कर दिया और बदले में पाकिस्तान ने पुंछ के मासूम लोगों की जान ले ली.”

वह कहते हैं, "दुनिया की कोई भी दौलत मेरे बेटे को वापस नहीं ला सकती. मुझे न नौकरी चाहिए, न पैसा. मैं चाहता हूं कि पुंछ में मरने वाले लोगों के नाम पर एक सिविलियन युद्ध मेमोरियल बनाया जाए. मेरा एक ही बच्चा था, मैं पैसे और नौकरी का क्या करूंगा? किसके लिए करूंगा?"

वह चाहते हैं कि नागरिकों के लिए अलग से स्मारक बने ताकि आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद रखें. हालांकि, पुंछ में बने अजोत वॉर मेमोरियल में एक बोर्ड लगाया गया है जिसमें मरने वाले नागरिकों के नाम लिखे हैं, लेकिन भार्गव इससे संतुष्ट नहीं हैं.

ज़ैन और उर्वा फ़ातिमा 

दो जुड़वा भाई बहन ज़ैन और उर्वा फ़ातिमा की मौत तब हुई जब उनका परिवार गोलीबारी से बचने के लिए शहर छोड़ रहा था. वे घर से थोड़ी दूर निकले ही थे कि अचानक एक गोला उनके पास आकर गिरा, जिसकी चपेट में पूरा परिवार आ गया. धमाका इतना तेज़ था कि ज़ैन और उर्वा की मौके पर ही मौत हो गई जबकि उनके पिता रमीज़ गंभीर रूप से घायल हो गए.

रमीज़ को लीवर, पसलियों और पीठ में गंभीर चोटें आईं. भारी ख़ून बहने के कारण उन्हें कई यूनिट ख़ून चढ़ाना पड़ा. एक तरफ़ रमीज़ ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे और दूसरी तरफ़ उनकी पत्नी अरुशा, पति को बताए बिना बच्चों को उनके पैतृक गांव चंदक में दफ़ना रही थीं. इस घटना के क़रीब तीन हफ़्ते बाद तक रमीज़ को नहीं पता था कि उनके दोनों बच्चे अब इस दुनिया में नहीं रहे.

अरुशा की बहन मरियम ने बताया, "यह अरुशा के जीवन का सबसे कठिन फ़ैसला था. उसे डर था कि कहीं बच्चों की मौत का सदमा उससे उसका पति भी न छीन ले."

उस दिन से लेकर आज तक रमीज़ को किसी ने हंसते नहीं देखा. हर वक़्त चेहरे पर एक गहरी उदासी रहती है और वह किसी से बात नहीं करते. मरियम बताती हैं, "रमीज़ अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते थे, इसीलिए गांव छोड़कर परिवार के साथ पुंछ शहर में रहते थे, लेकिन 7 मई के बाद से उन्होंने शहर की तरफ़ नहीं देखा और अब गांव में ही रहते हैं."

मरियम ख़ातून इस गोलीबारी में मरने वालों में सबसे कम उम्र (6 साल) की थी. 7 मई की सुबह वह अपने परिवार के साथ घर में बैठी थी जब एक गोला उसके घर के पास गिरा, जिसमें वह और उसकी बड़ी बहन इरम (8 साल) गंभीर रूप से घायल हो गईं. मरियम की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि इरम के सिर के पीछे गंभीर चोटें आईं.

कई महीनों के इलाज के बाद इरम घर वापस आई, लेकिन अभी भी उसकी हालत ठीक नहीं है. उनके पिता जावेद इक़बाल ने बताया, "वह बहुत जल्दी चीज़ें भूल जाती है. हम दुआ करते हैं कि किसी तरह यह सलामत हो जाए."

वह आगे बताते हैं, "एक तो हमें इस बात का अंदेशा नहीं था कि पाकिस्तान की तरफ़ से इतना बड़ा हमला होगा. दूसरा, हमारे घर में कोई बंकर नहीं है, जहां हम छिप सकते थे. हमारे पास मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं था."

सरकार की तरफ़ से परिवार को 16 लाख रुपये मुआवज़ा और जावेद को पशुपालन विभाग में नौकरी दी गई है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता अभी भी बंकर का न होना है. 

जैसा कि उन्होंने कहा, "सबसे ऊपर सुरक्षा होती है. उस वक़्त बहुत सारे अधिकारी और नेता आए और बंकर बनाने का वादा करके गए, लेकिन अभी तक बंकर नहीं बना."

अमरीक सिंह: परिवार को बचाया, ख़ुद चले गए

अमरीक सिंह पुंछ के ही गुरुद्वारे में रागी थे. उस दिन वह गुरुद्वारे से लौट रहे थे. शहर की हालत देखकर सबको चेताते हुए और सुरक्षित जगह जाने को कहते हुए वह अपने घर आए. घर आकर उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को बेसमेंट में छुपने को कहा. वह पूरे परिवार को सुरक्षित बेसमेंट में पहुंचा चुके थे लेकिन बेसमेंट गंदा था, इसलिए झाड़ू लेने ऊपर आए. तभी एक गोला उनके घर के बाहर गिरा और दरवाज़े को चीरते हुए उनके शरीर को छलनी कर गया.

उनकी बेटी जपनीत कौर के मुताबिक़, “जब अमरीक सिंह घायल हुए तो उन्होंने काफ़ी देर तक एंबुलेंस का इंतज़ार किया. जब एंबुलेंस आई तो एक छोटी एंबुलेंस में दो लोगों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई.”

सरकार की तरफ़ से परिवार को 16 लाख रुपये मुआवज़ा और उनकी पत्नी जसमीत कौर को कृषि विभाग में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी दी गई है.  

अमरीक सिंह का परिवार

अमरीक सिंह की पत्नी कहती हैं, "उनके जाने के बाद परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. एक औरत होकर मुझे अब मर्द और औरत दोनों का काम करना होता है, नौकरी भी करनी है और घर भी चलाना है. ऊपर से तीन बच्चे पढ़ने वाले हैं. ऐसे में मात्र 24 हज़ार की नौकरी में कहां गुज़ारा होगा? छोटी बेटी जम्मू में रहती है, जहां रहने का ख़र्चा ही 15 हज़ार है. बड़ी बेटी सूरनकोट में है, उसका एक साल का ख़र्चा ढाई लाख है. इस छोटी-सी नौकरी से क्या होगा?"

अमरीक सिंह को याद करते हुए उनकी पत्नी कहती हैं, "परिवार में वह थे तो अलग ही रौनक थी. आज क़रीब एक साल होने को है, लेकिन हमारे परिवार ने ख़ुशी का एक पल भी नहीं देखा. कोई नौकरी, कोई पैसा, क्या वह उन्हें वापस ला सकता है?"

वह बताती हैं कि कैसे अब भी उन्हें अपनी सुरक्षा का डर सताता है. कहीं से कोई अफ़वाह भी उड़ती है कि जंग होने वाली है, तो उनकी रूह कांप जाती है. वह कहती हैं, “काश सरकार हमें बंकर दे दे, कम से कम अपनी जान तो बचा सकेंगे."

जपनीत कौर कहती हैं, "पहलगाम हमले का बदला लेने के लिए हमने ऑपरेशन सिंदूर चलाया तो फिर पुंछ का बदला लेने के लिए अब क्या करेंगे? क्या सरकार के पास ऐसा कोई ऑपरेशन है, जिससे मेरे पापा वापस आ सकते हैं? नहीं ना, तो फिर इस जंग से फ़ायदा किसको है?"

इसी तरह, मोहम्मद अकरम एक दिहाड़ी मज़दूर थे. 6 मई की शाम वह अपनी बेटी आफ़रीन की शादी की तारीख़ तय करके घर लौटे थे लेकिन अगले ही दिन उनके घर के बाहर धमाका हुआ. जिसमें उनकी मौत हो गई और आफ़रीन भी बुरी तरह झुलस गई. अकरम की पत्नी फ़रीदा बताती हैं कि उन्होंने बेटी की शादी टाल दी है क्योंकि आफ़रीन अभी भी पिता की मौत के सदमे से बाहर नहीं आई है. 

फरीदा का घर पुंछ के सुखा कट्टा इलाके में है. उनके घर में भी बंकर नही है. वह भी चाहती हैं कि सरकार उनके लिए बंकर बनाए . 

ये सही है कि पुंछ में प्रभावित परिवारों को आर्थिक मदद मिली है. कुछ को सरकारी नौकरी भी दी गई. लेकिन हर परिवार का एक ही लगभग सवाल है- बंकर कब बनेंगे? 

एक साल बाद भी पुंछ के ये ज़ख्म हरे हैं. दुनिया आगे बढ़ गई, लेकिन यहां समय अभी भी उसी 7 मई की रात में अटका हुआ है.

Also see
article imageऑपरेशन सिंदूर और भारत-पाक संघर्ष की धुंध के बीच सच की तलाश 
article imageपुंछ: ‘जो सोशल मीडिया पर जंग लड़ रहे हैं, एक बार बॉर्डर पर आकर लड़ें’

Comments

We take comments from subscribers only!  Subscribe now to post comments! 
Already a subscriber?  Login


You may also like