क्या होता है जब बनारस जैसी बहुआयामी सभ्यता को पाट कर महज एक ‘डेस्टिनेशन’ में बदल दिया जाता है? जब आस्था ‘कंटेंट’ बन जाती है और भक्ति महज ‘दर्शनार्थियों की तादाद’ में बदल जाती है?
एक कांच के बक्से के अंदर महादेव की छवि किसी नीली रोशनी में तैर रही है. जैसे ही वे समुद्र मंथन का विष पीने के लिए अपना सिर झुकाते हैं, नीले धुएं का एक बादल फुफकारते हुए बाहर निकलता है और हेलीकॉप्टर जैसे ब्लेड तेज़ी से घूमने लगते हैं. यह दृश्य इतना ज़बरदस्त है कि कोई भी इसकी ओर खिंचा चला आता है.
लोग इस रोमांचक अनुभव का मज़ा लेने के लिए लाइन में खड़े हैं. टिकट काउंटर खुला हुआ है. लोग थ्री-डी (त्रिआयामी) वाइज़र लगाए हुए, कैलाश पर्वत और शिव-भजनों के आभासी दृश्यों में पूरी तरह खोए हुए बैठे हैं. वहीं, कुछ लोग हाई-विज़न डिवाइस तेज़ी से पौराणिक कथाओं से जुड़े एनिमेटेड पाठ डाउनलोड कर रहे हैं.
काशी विश्वनाथ कॉम्प्लेक्स में थ्री-डी सेंटर
रात के वक्त दीवारों पर देवताओं की रंग-बिरंगी थ्री-डी तस्वीरें उभरती हैं, जिससे एक अद्भुत और जीवंत अनुभव मिलता है. लाउडस्पीकर पर लगातार बजने वाले भजन जोश भरने वाले नहीं बल्कि मन को शांति देने वाले हैं. यहां ज़्यादातर चीज़ें बिना हाथ लगाए (हैंड्स फ्री) और डिजिटल तरीके से काम करती हैं. इसका नतीजा यह होता है कि यहां एक अनोखा 'वर्चुअल' माहौल बन जाता है. यहां का संदेश 'नरम हिंदुत्व' सा है– यानि आधुनिक धार्मिकता की ऐसी छोटी-छोटी और आसान खुराकें, जिन्हें अपनाना बेहद आसान है.
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर (केवीसी) के भव्य प्लाज़ा में आपका स्वागत है. यह जगह इतनी साफ-सुथरी है कि मानो हाथ लगाए मैली हो.
केवीसी में देवी-देवताओं की लगातार बदलती तस्वीरों और शांत, बार-बार दोहराए जाने वाले श्लोकों के साथ एक मनमोहक वातावरण.
"यह आस्था नहीं, व्यापार है." विनोद पांडे हमें यही कहते हैं. पांडे की दुकान उस बुलडोजर से बाल-बाल बची, जिससे यह सब मुमकिन हुआ है.
शायद वह काफी हद तक गलत भी नहीं हैं. बनारस में कई लोगों ने केवीसी की तुलना मॉल से की है, लेकिन यह पश्चिमी देशों की 'रमणीय स्थल' की अवधारणा से अधिक मेल खाता है, जो पर्यटन, आगंतुकों की संख्या और व्यापार पर आधारित है.
इसे लगातार रखरखाव, नियमित आय और कई अन्य आकर्षणों की आवश्यकता होती है. केवीसी का मुख्य आकर्षण विश्वनाथ मंदिर है. इसके लिए टिकट लेना पड़ता है और भीड़ को नियंत्रित किया जाता है. इस भव्य प्लाजा में फूड कोर्ट, शौचालय, मनोरंजक और लुभावनी चीजें, गैलरी, एक बहुउद्देशीय (मल्टी पर्पज़) हॉल, एक शिशु आहार कक्ष, गीता प्रेस की किताबों की दुकान, शहर का संग्रहालय, मुमुक्षु भवन, तीन बैंक और फिल्म देखने के लिए उपयुक्त, नदी तक जाने वाली जगमगाती सीढ़ियां हैं. साथ ही अन्य कई आकर्षक स्थान भी हैं. दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर की तरह, जहां नौका विहार और आईनॉक्स थिएटर है. यह एक ऐसी जगह है, जहां परिवार के साथ दिन बिताने के साथ-साथ आध्यात्मिक शांति का भी अनुभव किया जा सकता है.
बहुत से ऐसे लोग जिनकी नई मध्यम-वर्गीय सोच यूरोप की गर्मियों की यात्राओं से निखर गई है, अब केवीसी की बेदाग दीवारों के ठीक बाहर की चीजों को नापसंद करते हैं. जैसे कि उड़ती राख, तंग गलियों में एक-दूसरे से कंधे रगड़ती भीड़, लीक होते पाइप, कोनों पर कूड़े के ढेर, दुकानों में ठसाठस भीड़ और जर्जर इमारतें. उनके लिए केवीसी शायद वास्तुकला के रूप में एक राहत की सांस जैसा हो सकता है.
तो फिर, बनारस के दिल में एक विशाल, साफ-सुथरा और आधुनिक प्लाजा बनाना इतना बुरा विचार क्यों है?
इस सवाल का एक जवाब इसके भूगोल में छिपा है.
1980 के दशक के आखिर में गंगा की सफाई की पहल के तहत विश्व बैंक ने बनारस के घाटों के किनारे एक हाईवे बनाने के लिए 90 मिलियन डॉलर का कर्ज देने की पेशकश की थी. मालूम हो कि बनारस दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहरों में से एक है.
शहर के सबसे प्राचीन हिस्से और उसकी ऐतिहासिकता के ठीक बगल से कारों के तेज़ी से गुज़रने की संभावना से घबराकर, नवगठित 'इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज' (इनटाक) के साथ काम कर रहे संरक्षकों और योजनाकारों ने इसके बजाय घाटों को फिर से संवारने का एक प्रोजेक्ट प्रस्तावित किया. उन्होंने एक युवा आर्किटेक्ट को वहां रहने के लिए भी भेजा, ताकि वह समझ सके कि बनारस के मूल निवासी इस प्राचीन, भूलभुलैया जैसे शहर में कैसे रहते हैं. एक ऐसा शहर जिसकी परिस्थितियां (बाहरी लोगों की नज़र में) अराजक और अक्सर खतरनाक हद तक बेकाबू लगती हैं.
कई महीनों के दौरान उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात का पता लगाया. एक ऐसी बात जिसे यहां के नागरिक हमेशा से जानते थे.
असंख्य छोटे-छोटे मंदिरों से सजी तंग गलियों, दुकानों, घरों, शव-यात्राओं, बहते नालों, धुएं, राख, आवारा पशुओं और बिजली के तारों के उलझे जाल के बीच मची अफरा-तफरी के नीचे, एक जटिल और अद्भुत सांस्कृतिक भूगोल छिपा था. यह भूगोल सदियों से वहां बसा हुआ था, जिसे कई विद्वानों ने ‘पवित्र भूगोल’ (सेक्रेड ज्योग्राफी) का नाम दिया था. एक ऐसा शब्द जिससे उस समय बहुत कम लोग परिचित थे.
इसकी नींव पश्चिमी 'कार्टेज़ियन ग्रिड' (मानक ज्यामितीय खाकों) पर नहीं रखी गई थी. इसमें वह प्रचलित 'उत्तर-दक्षिण धुरी' भी नहीं थी, जिस पर आधुनिक वास्तुकारों और योजनाकारों को प्रशिक्षित किया जाता है. फिर भी, यह आश्चर्यजनक भूगोल ‘तार्किक, बोधगम्य और युक्तिसंगत’ था, ऐसा इनटाक प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने वाले योजनाकार और शहरी संरक्षण के दिग्गज ए.जी.के. मेनन कहते हैं. हमें एहसास हुआ कि यह सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार पूरी तरह से नियोजित शहर था, ख़ास तौर से तीर्थयात्रा की परंपरा के अनुसार.
प्रो. राणा पी.बी. सिंह (पूर्व में आईआईटी-बीएचयू) के अनुसार, ज्ञानवापी कुंड इसका 'सक्रम मुंडी' या पवित्र स्थान था, जिससे पांच संकेन्द्रित वलय यानी गोले, बड़े वृत्तों के रूप में बाहर की ओर फैलते थे. राणा, सांस्कृतिक परिदृश्यों के विशेषज्ञ हैं और प्रतिष्ठित 'इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स' (इकॉमॉस) के सदस्य हैं. यह विश्व स्तर पर सांस्कृतिक विरासत स्थलों की रक्षा करती है.
चौथा वृत्त 13वीं शताब्दी का 80 किलोमीटर लंबा 'पंचकोसी यात्रा' का पथ था (नीचे दिया गया नक्शा देखें), जो पूरे भारत में होने वाली बड़ी परिक्रमाओं का एक लघु रूप था. इसमें 108 मंदिर शामिल थे जो पूरे भारत में स्थित परिक्रमा मंदिरों की तरह थे और इस पूरे पथ की परिक्रमा करने में पांच दिन लगते थे. यह परिक्रमा घड़ी की दिशा में की जाती थी, जिसमें शहर को दाईं ओर रखा जाता था.

बनारस का अनोखा पवित्र भूगोल
अमेरिकी विद्वान और मशहूर किताब 'बनारस: सिटी ऑफ़ लाइट' की लेखिका, डायना ए्क ने बनारस को एक ऐसे शहर के तौर पर बताया है, जहां भौतिक जगह और आस्था आपस में जुड़े हुए थे. यहां सड़कों के जाल और चौराहों के बजाय, यहां के तीर्थ स्थल और मंदिर ही शहर की पहचान और नक्शा बन गए थे. गलियों, घाटों, और ऊंचे-नीचे हिस्सों का यह जटिल शहरी ताना-बाना, यहां आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक ब्रह्मांडीय व्यवस्था को दर्शाता था. ये सभी आपस में जुड़े हुए थे. जिससे एक ऐसा अनोखा शहरी ढांचा तैयार हुआ, जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलता. जो सदियों के दौरान धीरे-धीरे परत-दर-परत बनता और आकार लेता गया.
अपनी एक और किताब, 'इंडिया:ए सेक्रेड ज्योग्राफी' में वे लिखती हैं, "काशी के तीर्थ स्थलों को इस तरह देखा जाता है, मानो वे शहर के चारों ओर बड़े से बड़े घेरे बनाते हुए घूम रहे हों, और मिलकर एक विशाल भौगोलिक 'मंडल' का निर्माण कर रहे हों."
काशी के हर पुराने नक्शे में इसे इसी तरह दिखाया गया है. एक गोला, जिसके चारों ओर मंदिर और पवित्र स्थल बने हुए हैं. इसकी तंग गलियों का जाल लोगों की चहल-पहल से भरा रहता है क्योंकि जैसा कि संकट मोचन मंदिर के महंत विशंभर नाथ मिश्र (जो आईआईटी-बीएचयू में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर भी हैं) कहते हैं, “लोग इसकी तुलना वेनिस से करते हैं, लेकिन हमारी विरासत एक ‘जीवित विरासत’ है; यहां लोग रहते हैं- बीस-बीस पीढ़ियों से.”
मंदिरों, पवित्र स्थलों और गलियों का यह आपस में गहराई से जुड़ा हुआ जाल मिलकर एक ऐसा ‘जीवंत परिदृश्य’ (लिविंग लैंडस्केप) बनाता है, जिसे यहां के निवासी और यहां आने वाले लोग हमेशा से समझते आए हैं, और आज भी वे इस जगह को बहुत अच्छी तरह से जानते-पहचानते हैं.
कॉरिडोर विकास का मतलब पवित्र भूगोल को तहस-नहस कर देना
पवित्र भूगोल और प्राचीनता के इस जटिल ताने-बाने में, 2022 की काशी विश्वनाथ पुनर्विकास परियोजना अचानक आ धमकी. जनवरी, 2026 में मणिकर्णिका घाट पर हुए विध्वंस इसी का एक विस्तार मात्र हैं.
ये दोनों ही इस शासन की देशव्यापी 'कॉरिडोर विकास' रणनीति का हिस्सा हैं. यह रणनीति 'आधुनिकीकरण' के कॉरिडोर बनाकर, प्रमुख धार्मिक स्थलों और महत्वपूर्ण जगहों पर लोगों की आवाजाही को अधिकतम करने का सक्रिय प्रयास करती है. धर्म के 'रक्षक' और उदार संरक्षक के रूप में खुद को पेश करते हुए और उपेक्षित पवित्र स्थलों में 'आधुनिकता' लाते हुए इस शासन का उद्देश्य अपनी एक विरासत बनाना है.
दरअसल, 'आधुनिकीकरण' शब्द तो केवल 'कॉरिडोर' के भीतर होने वाली एक कठोर 'अंग-भंग' (काट-छांट) प्रक्रिया के लिए एक छलावा मात्र है; जबकि इसके आसपास के क्षेत्र पूरी तरह से गैर-आधुनिक और मरम्मत से अछूते ही रह जाते हैं. इसके लिए एक अधिक सटीक शब्द 'बुलबुला विकास’ होगा, क्योंकि एक तरफ के चमचमाते और दूसरी तरफ के अछूते हिस्सों के बीच का फासला आज भी उतना ही बड़ा है, जितना पहले था.
इस 'आधुनिकीकरण' अभियान की एक अलिखित और अनिवार्य शर्त है- 'क्लीन स्लेट' यानी कोरे पन्ने की आवश्यकता, जो हर चीज़ के पूर्ण विनाश की मांग करती है. किसी नई चीज के निर्माण के लिए जमीन का एक साफ-सुथरा टुकड़ा सुनिश्चित करने के लिए उस ज़मीन पर मौजूद हर एक चीज़ को ढहा देना अनिवार्य होता है. इसमें संरक्षण के लिए कोई जगह नहीं बचती. पुराने मोहल्लों, पीढ़ियों से बसे हुए घरों, पेड़ों या विरासत को बिल्कुल भी महत्व नहीं दिया जाता.
यह असल में एक 'डेवलपर' वाली मानसिकता है, जो काम कर रही है. यह जमीन को ही एकमात्र और सर्वोच्च कीमत देती है. इसलिए, आर्थिक मुआवज़े को ही पर्याप्त क्षतिपूर्ति मान लिया जाता है. नागरिकों को इस प्रक्रिया को न मानने का कोई अधिकार या विकल्प नहीं दिया जाता.
'कॉरिडोर विकास' शहर के सबसे बेशकीमती हिस्से को ही मिटाने के लिए चुनता है यानी उसकी उस पहचान को, जो उसे परिभाषित करती है.
मसलन दिल्ली का इंडिया गेट, बनारस का काशी विश्वनाथ, अहमदाबाद का गांधी आश्रम आदि. इसके बाद 'क्लीन स्लेट' का यह सिद्धांत बड़ी ही सुनियोजित ढंग से उस स्थल और उसके रास्तों के इतिहास को, शहर के साथ उसके स्थानीय जुड़ावों को, और उसके आसपास मौजूद इकोलॉजी को पूरी तरह से मिटा देता है. साथ ही, प्रवेश द्वार पर बैरियर लगाकर यह नागरिकों के लिए उस जगह तक पहुंचने के सारे रास्ते भी तत्काल बंद कर देता है.
दिल्ली के 'सेंट्रल विस्टा' में भी इसी 'क्लीन स्लेट' रणनीति के तहत दो हजार पेड़ों को काट दिया गया; शहर के एक प्रमुख सार्वजनिक कला केंद्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया और नागरिकों के लिए आरक्षित 100 एकड़ सार्वजनिक ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया गया. काशी विश्वनाथ के 'पुनर्विकास' में, 5.5 एकड़ में फैले जीवंत, प्राकृतिक बस्तियों को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया, घरों, घाटों, पेड़ों, सदियों से शहर को जोड़ने वाली ऐतिहासिक सड़कों और प्रतिष्ठानों को व्यवस्थित रूप से 'पूरी तरह से नष्ट' कर दिया गया, और ये सब उनकी अमूल्य महत्ता की परवाह किए बिना हुआ.
समय के हिसाब से 'पूरी तरह से नष्ट' किए गए इस काम को देखने से पता चलता है कि शहर की अनूठी भौगोलिक स्थिति को किस प्रकार बेतरतीब ढंग से काटा गया है, सदियों से बने उन अमूल्य स्थानिक संरचनाओं को तोड़ दिया गया है, जो शहर के मंदिरों और पौराणिक कथाओं को इस तरह से जोड़ती, अब उन तक पहुंचना असंभव हो गया है क्योंकि विशाल दीवारें उन्हें अवरुद्ध कर देती हैं.
इसी प्रक्रिया का पालन अयोध्या में भी किया गया, जहां का मुख्य नगर व्यावहारिक रूप से नष्ट कर दिया गया. वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर अब इसी तरह 'आधुनिक' होने वाला अगला स्थान है.
बनारस को बदलाव की ज़रूरत है: हालात अब और बर्दाश्त नहीं किए जा सकते
पत्रकार व्योमेश शुक्ला का तर्क है कि आधुनिकीकरण की तत्काल जरूरत है और बनारस में बड़े बदलाव कोई नई बात नहीं है; इसकी परतों में बसी बस्तियों को देखकर यह साबित हो जाता है.
दैनिक जागरण के एक लेख में वह लिखते हैं, “ज्ञानवापी को पाट देने, यवनों द्वरा विश्वेश्वर के विध्वंस और काशीवासियों के सिमटकर बस जाने; अंग्रेज़ों द्वारा मंदाकिनी- मैदागिन तीर्थ से गोदावरी- गोदौलिया तीर्थ तक सड़क निकाल देने से महाश्मशान और रत्नजटित सोपानोंवाली ज्ञानवापी का स्वरूप ही लुप्त हो गया. स्थापत्य नहीं रहे. उनके ऊपर नए स्थापत्य बन गए.”
लेख में वह आगे लिखते हैं, “बनारस को इतिहास से भी पुराना यों ही नहीं कहा गया है. इस बुज़ुर्ग शहर की पलक एक बार झपकती है कि सौ बरस बीत जाते हैं. जहां आज मणिकर्णिका है, वहां चिरकाल से श्मशान रहा आया, यह कहना उचित नहीं है. उस तीर्थ को महाश्मशान कहना भी ठीक नहीं है. असल में महाश्मशान के ऊपर तो आधुनिक काशी बसी हुई है.”
ज़ाहिर है असली घाव तो ज्ञानवापी में स्थित मंदिर का विध्वंस ही है, जिसकी जगह एक मस्जिद बना दी गई थी. जैसा कि शुक्ला लिखते भी हैं, "आदि विश्वेश्वर के विग्रह के स्थान पर रज़िया सुल्तान की मस्जिद."

वह हाल ही में वहां शामिल हुए एक अंतिम संस्कार के दौरान के भयानक हालात का वर्णन करते हुए कहते हैं, “हमलोग कुछ भींगते हुए पहुंचे थे क्योंकि बूंदाबांदी हो रही थी. परिजनों के कंधों पर पूरब अंग की गायकी के आख़िरी स्तंभ का पार्थिव शरीर भी भींगता हुआ घाट आया था. रात हो चली थी. घाट हमेशा की तरह लोगों और हलचलों से जगर-मगर था, लेकिन वहां पैदल चलना भी दूभर था. गंदगी और फिसलन के आतंक में सारा शोक हवा हो गया और पूरा ध्यान इस कोशिश में लग गया कि माथा न फूट जाय और सही-सलामत हाथ-पैर लेकर घर पहुंच जाऊं. तभी लकड़ी की टाल से लुढ़ककर एक के बाद एक अनेक लकड़ियां एक नौजवान के सिर पर गिरीं और वह अचेत हो गया. कुछ लोग उसकी ओर लपके. भगवान की कृपा से उसे ज़्यादा चोट नहीं आई, लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि कुछ भी अघट घट सकता था. मैंने यह भी अनुभव किया कि उस घाट के बाशिंदे ऐसी दुर्घटनाओं आदि के प्रति विचित्र ढंग से अनुकूलित और तलवार की धार पर चलने के अभ्यस्त हैं.”
क्या कोई इस बात पर बहस भी कर सकता है कि इसमें तुरंत दखल की ज़रूरत नहीं है? मणिकर्णिका के आस-पास के हालात बिल्कुल भी ठीक नहीं हैं.
लेकिन असल में किस चीज में बदलाव की ज़रूरत है?
‘ड्रीम विजन’ आर्किटेक्चर और उसका तयशुदा तरीका
इसके जवाब संरक्षण विशेषज्ञों, इतिहासकारों और विरासत से जुड़े पेशेवरों से आने चाहिए. इसके बजाय ये जवाब उस तयशुदा तरीके से आते हैं जिसे सरकार ने पिछले 12 सालों में बड़े शहरी प्रोजेक्ट्स के लिए तैयार किया है– जैसा कि नए संसद भवन, अयोध्या राम मंदिर, निकोबार बंदरगाह प्रोजेक्ट, काशी विश्वनाथ वगैरह में देखा गया है.
यह तरीका नियमों से ज़्यादा ताकत को तरजीह देता है.
इसलिए यह गुपचुप तरीके से और तेजी से काम करने, मौजूदा नियमों का पालन न करने और संस्थाओं पर दबाव डालने की वकालत करता है. यह संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा करने से बचता है, और विशेषज्ञता का पूरी तरह से विरोधी है; यह संस्थागत या पेशेवर सलाह लेने से साफ इनकार कर देता है.
ज़ाहिर है, इस तरीके से जो आर्किटेक्चर तैयार होता है, वह भी ताकत को ही तरजीह देता है.
यह व्यापार-मुखी है, नागरिक-मुखी नहीं; इसे हमेशा बाहर से आने वालों (पर्यटकों, नौकरशाहों, आगंतुकों) के लिए ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाजनक बनाया जाता है, न कि वहां रहने वाले स्थानीय लोगों के लिए. इसे नागरिकों से बैरिकेड लगाकर अलग कर दिया जाता है, जो अब उस जमीन तक नहीं पहुंच सकते जो उनसे छीन ली गई है. यह अपने आस-पास के माहौल से पूरी तरह कटा हुआ एक अलग-थलग हिस्सा बनकर रह जाता है- न तो बनावट के लिहाज से और न ही काम-काज के लिहाज से, इसका अपने आस-पास से कोई लेना-देना होता है.
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और उसके बाद मणिकर्णिका में किए गए कामों में ये सभी बातें साफ तौर पर देखी जा सकती हैं.
आखिर में, इस आर्किटेक्चर और रणनीति को चलाने वाली सबसे बड़ी ताकत कोई पेशेवर सोच नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी का अपना एक बहुत ही निजी ‘ड्रीम विजन’ है. जैसा कि उनके तत्कालीन शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी और काशी विश्वनाथ व सेंट्रल विस्टा, दोनों प्रोजेक्ट्स के आर्किटेक्ट बिमल पटेल ने बार-बार ज़िक्र किया है.
सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में, इस ‘ड्रीम विजन’ के तहत हर एक नौकरशाह को पीएमओ के बिल्कुल करीब रखने की योजना बनाई गई थी जबकि आज का ज़माना डिजिटल काम-काज और ‘घर से काम’ का है. इसके लिए 18 मौजूदा इमारतों को ‘ज़रूरी’ बताकर गिराना पड़ा.
काशी विश्वनाथ प्रोजेक्ट में, इस ‘ड्रीम विजन’ के तहत गंगा नदी से मंदिर तक पहुंचने के लिए एक सीधा रास्ता बनाने की योजना थी– जबकि असल में मंदिर का मुख न तो नदी की तरफ है और न ही उसे कभी इस तरह बनाया गया था कि वहां से सीधे नदी तक पहुंचा जा सके. यह प्लानिंग के लिए एक 'अनिवार्य जरूरत' बन गया, जिसके लिए 300 साल पुराने ग्रंथों में बताई गई 500,000 वर्ग फीट की ऐतिहासिक गलियों, 400 घरों, 143 मंदिरों और दो घाटों - खिड़की और जलसेन- को पूरी तरह से तोड़ना बिल्कुल 'जरूरी' माना गया.
प्रोफेसर सिंह कहते हैं, "सबसे बड़ी गलत बात ये है कि कहीं भी ये नहीं लिखा है कि ये दोनों (मंदिर और नदी) आपस में जुड़े हुए हैं. आप स्नान करके मंदिर जाइए और अपनी विधियां पूरी कीजिए. यह सब सिर्फ़ पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है लेकिन बनारस कभी भी कोई पर्यटन का शहर नहीं रहा!"
अयोध्या में, शहर की बनावट की जटिलता और उसकी पुरानी ऐतिहासिकता से असंतुष्ट होकर, इस 'सपनों की योजना' के तहत 4500 घरों को तोड़ दिया गया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि 13 किलोमीटर लंबा एक विशाल और सीधा 'भव्य' मार्ग 'राम पथ' बनाया जा सके. इसके अलावा 'भव्य' राम मंदिर तक पहुंचने के लिए कई अन्य 'पवित्र' रास्ते भी बनाए गए. इन रास्तों के आस-पास दुकानें, होटल, मनोरंजन के साधन और सामान बेचने की व्यवस्था की गई - यह सब उस पुरानी व्यवस्था के पसंदीदा लक्ष्य को पाने के लिए किया गया: एक "विश्व-स्तरीय शहर" बनाना.
इस ‘सपनों की योजना’ का न तो कोई पेशेवर आधार है, न ही इसमें वास्तुकला की कोई गरिमा है, और न ही इसमें आधुनिक शहरी नियोजन या ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण से जुड़ी कोई विशेषज्ञता है. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के प्रति अपनी गहरी अज्ञानता के चलते - इसमें स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों को समझने की कोशिश भी नहीं की जाती.
फिर भी, इस योजना को हर प्रोजेक्ट पर ज़बरदस्ती थोप दिया जाता है. इसके तहत ऐसे 'अनिवार्य' और 'ज़रूरी' फैसले लिए जाते हैं, जिनका जमीनी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं होता. और फिर भी, इस पर बेहिसाब पैसा खर्च किया जाता है, जिससे शहर का सौंदर्य और उसकी मूल पहचान नष्ट हो जाती है - और इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को ही उठाना पड़ता है. इस तरह की कार्यप्रणाली और 'सपनों की योजना' ने शहरों में जो तबाही मचाई है, असल में वही एक ऐसी 'विरासत' है जो पीछे रह जाएगी. यह उस 'आधुनिकीकरण' की विरासत से बिल्कुल अलग है, जिसे इसके समर्थक असल में पीछे छोड़ना चाहते थे.
नया मणिकर्णिका
इसी तरह, नई मणिकर्णिका परियोजना भी इससे अलग नहीं है. स्थानीय लोगों ने इसे ‘आईएसबीटी’ नाम दिया है- जो दिल्ली के इंटर स्टेट बस टर्मिनल का एक संदर्भ है, जिसकी इससे एक विलक्षण समानता है.
इसके तथाकथित 'जरूरी' कामों के लिए भी 6.5 एकड़ 'साफ़-सुथरी' ज़मीन की ज़रूरत है, जिसके लिए बनारस के इस सबसे कीमती घाट से गलियों, मंदिरों वगैरह को हटाना होगा. इसकी ज़मीन का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल ज्यादा पर्यटकों को लाने के लिए किया जाएगा. जिसमें 3,15,921 वर्ग फीट का नया इलेक्ट्रिक श्मशान होगा, जिसमें कई चिता-स्थल और बाथरूम जैसी मुख्य सुविधाएं होंगी. यह इस्तेमाल करने में आसान और व्यापार-मुखी भी होगा. इसमें ‘लकड़ी के प्लाज़ा’ बनाए जाएंगे, जो उन छोटे लकड़ी बेचने वालों की जगह ले लेंगे जो अभी श्मशान की ओर जाने वाले रास्ते पर लाइन से बैठे रहते हैं.
इसमें एक 'ड्रीम विजन' वाला सीधा रास्ता भी बनाया जाएगा, ताकि मृत लोगों को अपनी अंतिम यात्रा के दौरान बनारस की गलियों से होकर न गुजरना पड़े. इसके लिए 400 दुकानों को पूरी तरह से हटाना, और इस रास्ते के लिए कभी गुलज़ार रहने वाले और पुराने मोहल्ले 'दालमंडी' को मिटाना भी 'जरूरी' माना गया है.
‘मगर क्यों भाई?’ प्रोफेसर सिंह पूछते हैं. “मणिकर्णिका का फायदा उठाकर, क्या तुम कुछ भी कर सकते हो? फिर क्या डेमोक्रेसी? यह तो बनारस का 'मास्टर' है. इसका क्या फायदा?”
'ड्रीम विजन' ब्रांड के रोल मॉडल के तौर पर केवीसी
केवीसी को 'ड्रीम विज़न' ब्रांड के असली मॉडल के तौर पर देखें तो यह सवाल उठता है– क्या 'ड्रीम विज़न' वास्तुकला सच में काम करती है? बनारस में, इसका जवाब और भी कई सवालों पर निर्भर करता है. यह किसके लिए बनाया गया है? यह किस तरह की धार्मिक प्रथा को बढ़ावा देता है? यह वास्तुकला, भावना और आध्यात्मिकता के लिहाज़ से बनारस में कैसे फिट बैठता है?
केवीसी को एक भव्य जगह के तौर पर डिज़ाइन किया गया है– वेटिकन या मक्का जैसी कोई जगह, जहां बड़ी संख्या में लोग एक विशाल प्लाजा में पवित्र श्रद्धा के साथ इकट्ठा होते हैं; इसके लिए समय के स्लॉट तय होते हैं, टिकट लगते हैं और भीड़ को काबू करने के लिए बैरियर लगाए जाते हैं. इसकी वास्तुकला की जो चीज़ें इसे 'आधुनिक' बनाती हैं, उनमें खंभों वाली कतारें, भव्य प्रवेश-द्वार, नदी से ऊपर की ओर जाती सीढ़ियों का पिरामिड और एक शानदार खुलापन शामिल है; लेकिन इन चीज़ों का उस 'गलियों के शहर' से कोई मेल नहीं है, जहां इसे बनाया गया है. एक ऐसा शहर जहां जगह बहुत कम है, सीमित है और हर जगह का सोच-समझकर इस्तेमाल किया जाता है.
विश्वनाथ मंदिर, जहां बनारस वासी लोग पहले काम, स्कूल या खेल के लिए जाते समय दर्शन के लिए जाया करते थे, अब बकिंघम पैलेस की तरह दीवारों से घेरकर गलियों से अलग कर दिया गया है और प्रवेश द्वार सुरक्षाकर्मियों से घिरे हैं.
अंदर जाने के लिए टिकट के लिए लाइन में लगना पड़ता है, एक घंटे या उससे अधिक समय तक कतार में खड़े रहना पड़ता है, फिर धीरे-धीरे अंदर जाने का रास्ता बनता है. यह रास्ता तंग बाड़ों से बना है, जो आंगन में टेढ़े-मेढ़े तरीके से फैले हैं और किसी भी तरह के विचलन की अनुमति नहीं देते. दर्शन के लिए रास्ता सिर्फ आधा सेकंड का होता है, जिसके बाद एक सुरक्षाकर्मी आपको बाड़ों के पार धकेल कर बाहर निकाल देता है.

ठीक इसी तरह, भगवान के साथ एक निजी रिश्ता अब एक औपचारिक रिश्ते में बदल गया है, जिसके लिए इजाज़त की जरूरत पड़ती है.
स्थानीय लोगों ने इस नई व्यवस्था का विरोध किया, जिसने उन्हें अपने ही शहर में परदेसी बना दिया. इस वजह से उनके लिए एक अजीब सी दोहरी स्थिति पैदा हो गई. अब उनके पास आईडी कार्ड हैं, जो उनकी स्थानीयता की पुष्टि करते हैं, और जिनकी मदद से वे बिना किसी कतार में लगे, किसी भी समय मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं. फिर भी, उनके दर्शन का समय उतना ही संक्षिप्त है. उस जगह पर उनका अधिकार अब बस एक कार्ड पर लगी मुहर बनकर रह गया है.
काशी विश्वनाथ मंदिर और उस परिसर में फैले कुछ अन्य छोटे, लेकिन उतने ही प्राचीन मंदिर- जिन्हें तोड़-फोड़ से बचा लिया गया था- अब मौसम की मार झेल रहे हैं और उन पर समय के गुज़रने के निशान साफ दिखाई देते हैं. फिर भी ऐसा महसूस होता है कि वे उस जमीन का हिस्सा नहीं हैं, जिस पर वे खड़े हैं. मंदिर का पूरा इलाका अब ताजे बिछाए गए, बेदाग सफेद संगमरमर से ढका हुआ है. इस संगमरमर का मंदिर के ठीक बाहर मौजूद शहर की मीलों तक फैली पत्थर-जड़ी गलियों से, या उन गलियों से उठने वाले अन्य मंदिरों से, कोई भी सार्थक जुड़ाव नहीं है. अपने आस-पास के माहौल से अपनी ऐतिहासिक पहचान खोकर, ये मंदिर अब बिल्कुल अलग-थलग और बेमेल दिखाई देते हैं.
महंत विशंभर नाथ मिश्र के मढ़ी पर कहे गए शब्दों को भूलना मुश्किल है. 'काशी का कॉन्सेप्ट ही नहीं समझे! कंकर कंकर में है शंकर. उनके लिए पत्थर हो सकता है, पर हमारे लिए पूजनीय है. इसका मूल्य तभी माना जाता है जब यह अपनी जगह पर होता है. यदि आप इसे संग्रहालय में रखते हैं, तो यह एक शोपीस है.'
पढ़िए- महादेव के शहर में बुलडोजर के निशान
बनारस के बाकी हिस्सों से इसका विरोधाभास बहुत भयावह है. एक हिस्सा जैविक, प्रामाणिक, जीवंत और वास्तविक है, जो सदियों से परत दर परत उभरा है, और मनुष्य और ईश्वर के छोटे-छोटे व्यक्तिगत संबंध पर आधारित है. प्रवेश निःशुल्क है. बनारस का निवासी ही अपने नगर का केंद्र बिंदु है.
दूसरा हिस्सा एक झटपट बनने वाले नूडल्स जैसा है, जो विनाश के बाद थोपा गया है, अपने आकार और शक्ति से हावी है, अपने पड़ोस से ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है, मानो बाहर की अराजकता से शर्मिंदा हो, और इंसान और भगवान के बीच टिकट से प्रवेश और समय-सीमा जैसी शर्तें लगाता है. बाहरी व्यक्ति ही– पर्यटक, आगंतुक, टिकट खरीदार– इस पूरे परिदृश्य का केंद्र बिंदु है.
"काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की योजना गुजराती लोगों ने बनाई, इसे गुजराती लोगों ने ही लागू किया और इसमें रहने वाले सभी लोग गुजराती हैं," महंत मिश्र ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि सत्ता का समीकरण पूरी तरह से स्थानीय निवासियों के हाथों से निकल गया है.
एक नाज़ुक इको-सिस्टम का समाधान
इसके बजाय क्या होना चाहिए था? इसका समाधान क्या हो सकता था? यह अजनबी आर्किटेक्चर, हरियाली का खत्म होना, जगह की बनावट का बिगड़ना और भौतिक अलगाव क्यों मायने रखता है?
सबसे पहली बात तो यह है कि उस चौंकाने वाली अनदेखी पर ध्यान दिया जाए, जिसकी वजह से इतनी बड़ी गड़बड़ी पैदा हुई है. बनारस को नियमित फंडिंग मिलनी चाहिए, जिससे उसके सीवेज, कूड़े-कचरे और बिजली के तारों को ठीक किया जा सके; और उसकी शानदार पुरानी इमारतों की नियमित मरम्मत हो सके. उसे संरक्षण की ऐसी विशेषज्ञता की ज़रूरत है, जो उन गलियों को साफ-सुथरा कर सके, जो इस शहर की पहचान और खासियत की असली कुंजी हैं.
उसे घाटों से दूर, विकास के दूसरे तरीकों की ज़रूरत है. उसे पर्यटकों के प्रबंधन का ऐसा तरीका चाहिए, जो उसकी प्राचीनता को बचाए रखे, दाह-संस्कार की जगहों को आधुनिक बनाकर ज्यादा टिकाऊ बनाए और उसकी नाज़ुक, कमज़ोर भौगोलिक बनावट को भारी संख्या में आने वाले पर्यटकों से होने वाले विनाशकारी नुकसान से बचाए.
तो कोई भी- खासकर बनारस के रहने वाले- उन मुद्दों पर कोई विवाद नहीं कर रहे हैं, जो उठाए गए हैं; न ही वे यह तर्क दे रहे हैं कि शुक्ला द्वारा बताई गई गंभीर स्थिति में बदलाव की ज़रूरत नहीं है. सवाल बिल्कुल सही हैं.
लेकिन उनके जवाब बेहद बेतुके हैं.
"सफाई कीजिए, न कि ढांचागत बदलाव. ये तो नहीं होना चाहिए कि मढ़ी, मूर्ती और गली का ही सफाया हो जाए," अंबरीश चतुर्वेदी कहते हैं, जो बनारस के ही रहने वाले हैं और बनारसी ब्रोकेड का कारोबार करते हैं. "हमें बताया क्योटो की तरह होगा, पर क्योटो में ज्यों का त्यों नहीं होता. अगर पत्थर की दीवारों के बीच कोई पेड़ उग भी आता है, तो उसे भी वहीं रहने दिया जाता है, वे उसे बिल्कुल नहीं छेड़ते," प्रोफेसर सिंह कहते हैं.
'कॉरिडोर डेवलपमेंट' बाकी सभी चीज़ों पर भारी पड़ जाता है. शुक्ला के बेहद जरूरी सवालों के जवाब के तौर पर सिर्फ सुधार, बेहतर व्यवस्था और संरक्षण पर ज़ोर देने के बजाय, अब हर उस चीज़ को पूरी तरह से मिटाकर नया बनाने का चलन चल पड़ा है, जो देखने में बदसूरत या बेकार लगती है, या जिसे दोबारा ठीक करने या संवारने लायक नहीं समझा जाता. जमीन की कीमत का आकलन सिर्फ एक ही नजरिए से करने की वजह से अधिकारी, विरासत या संरक्षण के उन विशेषज्ञों की मदद लेने से कतराते हैं, जो इस शानदार शहर की धरोहरों को दोबारा जिंदा कर सकते हैं.
इसका एक उदाहरण दिल्ली की 'सुंदर नर्सरी' है- जिसे दशकों तक एक आम नर्सरी की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा; जहां उसके पुराने स्मारकों की कोई परवाह नहीं की गई, उसके रास्ते झाड़ियों से भर गए, और पौधों की अंतहीन क्यारियों जो गिने-चुने खरीदारों के लिए थीं, जो वहां पौधे खरीदने आते थे. इस सबके बीच उसकी असली क्षमता किसी की नजर में ही नहीं आई. ज़मीन की कीमत इतनी ज्यादा थी कि सैद्धांतिक तौर पर उसे बुलडोजर से ढहाकर, वहां कोई मॉल बनाया जा सकता था या फिर ज़मीन के टुकड़ों के तौर पर उसे बिल्डरों को बेचा जा सकता था.
इसके बजाय सरकार ने 'आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर' (एकेटीसी) को अपना सहयोग दिया ताकि वह अपनी विशेषज्ञता के साथ आगे आकर इस जगह की ऐसी देखभाल कर सके, जिससे इसे आज के इस शानदार शहरी धरोहर में बदल दिया है. इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने वाले संरक्षण आर्किटेक्ट रतीश नंदा ने यहां एक नया संग्रहालय, रेस्तरां और एक सभागार भी बनवाया. इस पूरे प्रोजेक्ट का सबसे अनमोल रत्न यहां का विशाल हरा-भरा पार्क है, जो मुगल शैली के औपचारिक बाग़ों से प्रेरित है. इसकी मास्टर-प्लानिंग जाने-माने लैंडस्केप वास्तुकार, स्वर्गीय प्रोफ़ेसर मोहम्मद शाहीर ने की थी. इस पार्क में 15 ऐतिहासिक स्मारक और एक जीर्णोद्धार की गई झील भी मौजूद है. 'आर्किटेक्चरल डाइजेस्ट' द्वारा ‘एक बेहतरीन नव सार्वजनिक स्थल’ के रूप में सराहे गए इस स्थान पर आज पर्यटक और स्थानीय निवासी, दोनों ही बड़ी संख्या में आते हैं.
बनारस की सबसे बड़ी शक्ति या यूं कहें कि इसके आकर्षण का 'ब्रह्मास्त्र' यहां की जीवंत गलियां हैं. इन गलियों के हर कोने में मंदिरों की घंटियों की गूंज, फिल्मी गानों की धुनें, राजनीति पर चर्चा, प्रेम-प्रसंग, गपशप, व्यापारिक हलचल, अंतिम यात्राएं, बारातें, सब्जी बेचने वालों की आवाज़ें, घरों की चहल-पहल और इनके अलावा भी जीवन के हर रंग की झलक देखने और सुनने को मिलती है.
किसी भी पुनर्निर्माण के लिए उन्हें बस उस संवेदनशीलता और सम्मान की ज़रूरत थी, जिसके वे हकदार थे. इसके बजाय, उन्हें जिस तरह की घृणा और शर्मिंदगी मिली, उससे यह साफ हो गया कि वे बचाने लायक नहीं थे, वे एक संपत्ति नहीं बल्कि एक बोझ थे.
आर्किटेक्ट पटेल से केवीसी के लिए गलियों और मंदिरों को गिराए जाने की आलोचना के बारे में सवाल किया गया. ये गलियां और मंदिर ही बरसों में बनकर तैयार हुए बनारस के खास चरित्र की पहचान थे. उन्होंने मंदिरों को तोड़े जाने की बात से इनकार किया और अपना नज़रिया साफ करते हुए कहा कि केवीसी कॉम्प्लेक्स के लिए बनारस की सांस्कृतिक पहचान यानि गलियों को हटाना किसी भी तरह से नुकसानदायक नहीं था.
‘हां मैम, इस बारे में आप बिल्कुल सही कह रही हैं.’ उन्होंने 'द प्रिंट' को दिए एक इंटरव्यू में कहा.
"हर चीज का अपना एक 'चरित्र' होता है- यहां तक कि एक झुग्गी-बस्ती का भी अपना एक 'चरित्र' होता है! ... यहां सीवेज का पानी बेरोकटोक बह रहा था, मंदिरों के ऊपर अतिक्रमण था, पुरानी ऐतिहासिक इमारतों के ऊपर अतिक्रमण था, इमारतों की दीवारों से सीवेज का पानी रिस रहा था- इन सब चीजों का भी अपना एक 'चरित्र' है- ठीक है?"
उन्होंने व्यंग्य भरे लहजे में अपनी बात खत्म करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि इस पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह से बदलने के लिए, इमारतों और शहरी बनावट की एक नई और आधुनिक शैली तैयार करना बेहद ज़रूरी था.
‘आधुनिकता’ पर बहस: इसकी परिभाषा क्या है और यह किस पर आधारित है?
इसके जवाब कहीं ज़्यादा गहरे हैं. यहां असल बहस वास्तुकला पर नहीं बल्कि आधुनिकता पर है. इसे कौन परिभाषित करता है और इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि इसे क्या परिभाषित करता है?
‘कॉरिडोर प्लेबुक’ आधुनिकता को एक ऐसे स्वीकृत पश्चिमी मॉडल के तौर पर परिभाषित करती है, जिसमें खुली जगह, साफ-सुथरापन, व्यवस्था और ढांचा हो और जो भीड़ भाड़ (अराजकता) से अलग हो. इस अराजकता को परंपरा, गंदगी और अव्यवस्था से जोड़ा जाता है- ऐसी चीजें जिन्हें बाहर ही रखा जाना चाहिए और जिन्हें सुधारने की कोई कोशिश नहीं की जाती. केवीसी की चिकनी, आधुनिक, गुलाबी बलुआ पत्थर से बनी ऊंची दीवारें, मौसम की मार झेल चुकी पुरानी इमारतों के बाहरी हिस्सों, टूटती-फूटती नक्काशी, प्राचीन अवशेषों और वहां चौबीसों घंटे होने वाले दाह-संस्कारों से जुड़ी भीड़ को पूरी तरह से अलग कर देती हैं.
फिर भी, असल में यह ठीक वही औपनिवेशिक नज़रिया है, जिसने ब्रिटिश शासन के समय से ही भारत को परिभाषित किया है. जैसा कि ब्रिटिश लोगों ने परिभाषित किया था- एक ‘व्हाइट टाउन’ (सफेद शहर) था, जो चौड़ा और खुला-खुला था; और दूसरा ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) था, जो भीड़-भाड़ वाला और गंदा था.
समस्या यह है कि इस औपनिवेशिक नजरिए से देखने वाले लोग आज ब्रिटिश नहीं बल्कि खुद भारतीय हैं.
अंदरूनी औपनिवेशिक नज़र
सरकारी पक्ष भारतीय सभ्यता की महान महिमा, उसकी प्राचीनता और गणित से लेकर खगोल विज्ञान, संगीत और चिकित्सा तक की उसकी उपलब्धियों के बारे में बड़े ज़ोर-शोर से बातें कर सकता है. फिर भी, इतिहास की जो उपेक्षा यहां इतनी साफ़ दिखाई देती है, उसके महत्व को जिस तरह से नज़रअंदाज़ किया जाता है, वह एक गहरे छिपे हुए शर्म को उजागर करता है. कॉरिडोर विकास असल में यही है- अपने सबसे बुनियादी और कच्चे रूप में- शर्म पर आधारित एक 'आधुनिकता', जिसका मुख्य मकसद मिटाना और/या बदला लेना है.
भूगोल के प्रति पक्की अज्ञानता, विशेषज्ञता को पूरी तरह से नकारना, एक भी पेड़, घर, मोहल्ले या सांस्कृतिक परिदृश्य को बचाने से साफ़ इनकार, और इतिहास के प्रति इस शर्म-आधारित 'आधुनिकता' के समर्थकों की बेसुरी प्रतिक्रिया- ये सभी इस बात के सबूत हैं.
व्योमेश शुक्ला के उस बिना पूछे गए फिर भी बेहद अहम सवाल पर वापस आते हैं: अगर एक नष्ट हुए मंदिर का मूल घाव 'विरासत' या 'संरक्षण' के तौर पर 'स्वीकार्य' है तो आज की दुनिया के साथ ज़्यादा तालमेल बिठाने वाले एक 'आधुनिक' कॉरिडोर के लिए कुछ गलियों और घरों को नष्ट करने में क्या गलत है?
जैसा कि प्रो. राणा पी.बी. सिंह लिखते हैं, "बनारस शहर में कोई भी ऐसा बड़ा धार्मिक स्थल नहीं है जो 17वीं सदी में औरंगज़ेब के समय से पहले का हो," क्योंकि उसने उन सभी को नष्ट कर दिया था. इसमें शहर के सबसे बड़े मंदिर भी शामिल थे और उन मंदिरों की जगहों को बाद में मस्जिदें बनाकर हिंदुओं के लिए हमेशा के लिए बंद कर दिया गया. ज्ञानवापी मस्जिद बेशक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.”
इसका जवाब 'आधुनिकता' की सही समझ में छिपा है.
एक आधुनिक राष्ट्र में इसका मतलब यह नहीं है कि इन जगहों को अपमान और शर्म की जगहों के तौर पर देखा जाए. जैसा कि उपनिवेशवादियों/आक्रमणकारियों का इरादा था. बल्कि इतनी परिपक्वता से देखा जाए कि यह समझा जा सके कि पुराने समय की ये तोड़-फोड़ और लूट-पाट, पुराने इतिहास और मध्यकालीन नफ़रतों को समझने के लिए गवाह और कड़ियां हैं. एक आधुनिक राष्ट्र में ऐसा करने और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास होना चाहिए.
मध्यकालीन सामंतों और सरदारों की तरह इन्हें मिटा देना ठीक वैसी ही चाल है जैसी तालिबान ने तब चली थी, जब उसने बामियान बुद्धों को नष्ट कर दिया था. उन्हें यह कहने में बहुत शर्म आती थी कि मुसलमान बनने से पहले वे कभी बौद्ध हुआ करते थे.
ए.जी.के. मेनन कहते हैं, "आधुनिकता हमारे पास पश्चिम की तरह विकसित होकर नहीं आई. औद्योगिक क्रांति के बाद उनका विकास स्वाभाविक रूप से हुआ. हमने अपने औपनिवेशिक मालिकों से निर्णायक रूप से नाता तोड़ लिया. उन्होंने अपना ध्यान हमारे पर्यावरण से हटाकर अपने पर्यावरण पर केंद्रित कर लिया. हमने उसी को अपना पैमाना बना लिया और अपनी सोच में उसे ही बसा लिया.”
वे आगे कहते हैं, “केवीसी और आईएसबीटी मणिकर्णिका श्मशान घाट जैसी परियोजनाएं उसी टूटी हुई कड़ी का नतीजा हैं. यह वह औपनिवेशिक नुकसान है, जिसे हम सभी ने झेला है.”
शहरीकरण के उस आयातित सिद्धांत को थोपना, जो पश्चिम के अपने अनुभवों से उपजा है, भारत की विशाल विविधता, असमानता और यहां की अपनी बहुस्तरीय, सभ्यतागत जीवनशैली के संदर्भ में असफलता को न्योता देना है. फिर भी, पश्चिमी प्रतिमानों पर प्रशिक्षित भारतीय वास्तुकार इन महत्वपूर्ण अंतरों को या तो नज़रअंदाज़ कर देते हैं या उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं.
‘ब्रांड ड्रीम विज़न’ भी इन्हीं प्रतिमानों की दुहाई देता है और ‘गंदगी’ तथा ‘अराजकता’ के प्रति घृणा का भाव रखता है. इसीलिए- यहां भी वही विशुद्ध पश्चिमी ज़ोर दिखाई देता है. सीधी रेखाओं पर ज़ोर, और पश्चिमी वास्तुशिल्प के प्रतीकों- जैसे विट्रुवियन गुंबद, विशाल चौक (प्लाज़ा), भव्य मार्ग (एवेन्यू), नदी तक सीधी पहुंच आदि का उपयोग.
इस कॉरिडोर का डिज़ाइन तैयार करने वाली वास्तुशिल्प फर्म एचसीपी ने इन प्रतीकों का इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि वे बनारस की पारंपरिक, बहुस्तरीय, वृत्ताकार और मंदिरों के आधार पर बुनी गई भौगोलिक संरचना को समझ ही नहीं पाए. उन्होंने इसे एक ‘बिना योजना वाली अराजकता’ मानकर खारिज कर दिया, जिसे बचाने लायक ही नहीं समझा गया.
वे यह देख ही नहीं पाए कि छोटे-बड़े मंदिर आपस में किस तरह जुड़े हुए थे- जिसमें विश्वनाथ मंदिर और उससे जुड़ी ‘विश्वनाथ गली’ भी शामिल है और किस तरह ये सभी मिलकर तीर्थयात्रियों के लिए एक तार्किक और सुसंगत मार्ग का निर्माण करते थे. साथ ही ये तीर्थयात्री ही तो इस शहर के अस्तित्व का मूल आधार हैं. या फिर, वे यह भी नहीं देख पाए कि घाटों के समानांतर चलने वाली क्षैतिज गलियां जब ऊर्ध्वाधर गलियों से मिलती हैं, तो हर कुछ मिनट में गंगा नदी के दर्शन कराती हैं. मगर अब कॉरिडोर की विशाल दीवारों और दरवाज़ों वाली प्रवेश-व्यवस्था ने उन दृश्यों को बेरहमी से अवरुद्ध कर दिया है. उन्होंने काशी के प्राचीन तीर्थ-मानचित्रों की उस वृत्ताकार गति को ही तोड़ दिया है. आज काशी की ‘यात्रा’ अपनी उस पुरानी परंपरा के अनुरूप पूरी हो ही नहीं सकती क्योंकि किसी ने भी इस बात की परवाह ही नहीं की कि उस परंपरा की ज़रूरतों का ध्यान रखा जाए.
जैसा कि प्रोफ़ेसर सिंह कहते हैं. “यह तो पूरी तरह से ‘प्लॉटेड’ (योजनाबद्ध) है भाई! इस कॉरिडोर के कारण दोनों ही तरफ से रास्ते बंद हो गए हैं. हमारी यात्रा खंडित हो गई है. आप चाहें तो वैसे ही घूम-फिर लें लेकिन असल ‘यात्रा’ तो अब खंडित हो चुकी है!.”
वहीं, मेनन कहते हैं, “हमारे वास्तुकारों को पता ही नहीं है कि भारतीय शहरों के साथ किस तरह का बर्ताव किया जाए. औपनिवेशिक शासन ने हमें ‘आधुनिक बनाम पारंपरिक’ की एक द्वंद्वात्मक सोच में फंसा दिया है. अगर कोई चीज़ ‘पारंपरिक’ है तो उसे नष्ट ही कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उसे बचाने का कोई औचित्य ही नहीं है. हम पहले से ही उसी सोच के साथ प्रशिक्षित हैं."
लेकिन क्या होगा अगर भारत में व्यवस्था, पश्चिमी सोच के समरूपता और ज्यामिति में न होकर बल्कि उसकी अपनी ही एक अद्भुत सोच में निहित हो? एक ऐसी सोच जो उसके 'अराजकता' और विविधता को भी अपने में समेट लेती है? फिल्म निर्देशक और पारखी नजर के धनी शेखर कपूर ने एक बार भारत को एक ऐसी जगह बताया था जो तथाकथित "अराजकता" में ही फलती-फूलती है; या जिसे एचसीपी "अव्यवस्थित" कहता है.
लेकिन पश्चिमी नज़रिए से आधुनिकता की जो अवधारणा पेश की जाती है, उसमें 'कॉरिडोर डेवलपमेंट' को एक ऐसे 'साधन' के तौर पर दिखाया जाता है, जिससे इस 'अराजकता' से छुटकारा पाया जा सके. इसके तहत उन जगहों को जहां नालियों का गंदा पानी बहता रहता है या ऐतिहासिक इमारतें ढह रही होती हैं, उन्हें बिना उनकी सांस्कृतिक या ऐतिहासिक पवित्रता को पहचाने या उनका सम्मान किए या उन्हें आधुनिक समय के लिए संरक्षित करने की कोशिश किए बिना ही बदलने का प्रस्ताव रखा जाता है.
इस बांझ और नक़ली पश्चिमी 'आधुनिकता' का कोई बौद्धिक आधार नहीं है. इसलिए यह भारत के अपने अनूठे डेटा सेट और जटिल मुद्दों के आधार पर भारतीय शहरी आधुनिकता को परिभाषित नहीं कर सकती. एक वृत्त में एक वर्ग की तरह यह एक बेचैन और दुखी शहर पर केवल एक नक़ली, बेमेल पश्चिमी ढांचा ही थोप सकती है.
आज़ादी के 79 साल बीत चुके हैं. हम अब गुलाम नहीं हैं लेकिन हिंदुत्व परियोजना अभी भी उसी गुलामी के मॉडल में फंसी हुई है, जिसे बाकी सब लोग पीछे छोड़ चुके हैं. यह हमें बार-बार याद दिलाती रहती है कि हम गुलाम हैं, जिन्हें 'आधुनिक' कॉरिडोर विकास के ज़रिए 'आज़ाद' किया जा रहा है.
यह समझे बिना कि कॉरिडोर विकास अपने आप में उस असली औपनिवेशिक बीमारी का प्रतीक है, जो हमारे भीतर बहुत गहराई तक दबी हुई है. हमें यह पता भी नहीं चलता कि हम उसी से पीड़ित हैं.
गर्व और शर्मिंदगी के मिले-जुले भाव के साथ, हम इसकी 'आधुनिकता' का जश्न मनाते हैं. यह समझे बिना कि हम जिस दौर में जी रहे हैं, वह कितनी बेतुकी और विरोधाभासी मानसिक स्थिति से भरा हुआ है.
मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
काशीवासियों ने प्रधानमंत्री को चुनाव जिता कर दिल्ली भेजा है लेकिन क्या उन आम बनारसवासियों की आवाज़ दिल्ली तक पहुंच रही है? अगर आप धरोहर, आस्था और जवाबदेही की परवाह करते हैं तो हमारी इस सीरीज को सपोर्ट करिए.
महादेव के शहर में बुलडोजर के निशान
सेंट्रल विस्टा नया भारत है? असलियत में हम पुराने भारत की ओर लौट रहे हैं