कई बार रिपोर्टिंग के दौरान कुछ ऐसा घट जाता है कि जो आपकी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं हो सकता. लेकिन फिर ख्याल आता है कि यह बात पाठकों तक पहुंचनी चाहिए.
आपने हाल ही मे न्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित मेरी यह रिपोर्ट पढ़ी होगी. जहां गाजियाबाद स्थित ओपुलेंट मॉल के मैनेजमेंट ने एक मुस्लिम दुकानदार के पहनावे पर आपत्ति जताते हुए उसे दुकान खाली करने के लिए मजबूर कर दिया. मेरी जानकारी के मुताबिक, स्थानीय कोतवाली सिहानी गेट पुलिस ने अभी तक इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की है.
आगे आप जो पढ़ेंगे वह कोई रिपोर्ट नहीं है. दरअसल, कई बार रिपोर्टिंग के दौरान कुछ ऐसा घट जाता है कि जो आपकी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं हो सकता. लेकिन फिर ख्याल आता है कि यह बात पाठकों तक पहुंचनी चाहिए. उसी मकसद से ये वाकया आपके साथ साझा कर रहा हूं. यह मेरी रिपोर्टिंग डायरी का एक हिस्सा है, और साथ ही यह एक बड़ी चिंता की वजह भी है. हमारा पुलिस तंत्र जिससे यह उम्मीद कि जाती है कि वह निष्पक्ष तरीके से काम करेगा, सबके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करेगा और धर्म, जाति की पहचान से ऊपर उठकर जिम्मेदारी का निर्वहन करेगा, वह पुलिस तंत्र किस तरह से एक राजनीतिक सोच का शिकार होकर सड़न की चपेट में है.
तो हुआ यूं कि जब मैंने ऑपुलेंट मॉल वाले मामले पर जानकारी के लिए सिहानी गेट कोतवाली के एसएचओ कुलदीप दीक्षित को फोन किया तो उन्होंने मुझे थाने बुलाया. इसके बाद मैं उनसे मिलने थाने पहुंचा. यहां दीक्षित साहब सवालों का जवाब देने की बजाए मुझ पर ही भड़क गए. न सिर्फ उन्होंने मुझसे बदतमीजी की बल्कि समुदाय विशेष के प्रति अपनी नफरत का मुजाहिरा भी किया.
ये बात 26 मार्च की दोपहर बाद की है. करीब 15 मिनट के इंतजार के बाद मुझे एसएचओ कुलदीप दीक्षित के कमरे या कहिए कार्यालय में प्रवेश मिला. अंदर पहुंचा तो साहब एक कॉन्फ्रेंस कॉल पर व्यस्त थे. कुछ और लोग भी कमरे में मौजूद थे.
उनकी कुर्सी के दाईं तरफ कुछ स्मृति चिन्ह रखे थे, जिनमें ज्यादातर किसी न किसी संगठन द्वारा दिए गए हैं. कुछ बीजेपी नेताओं द्वारा भी दिए गए थे. भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल का फूल इनकी पहचान के लिए काफी था. दीक्षित कभी फोन पर तो कभी सामने बैठे लोगों से बात करते हुए बीच-बीच में मुझसे बात करते हैं.
जब मैंने अपना परिचय देते हुए उनसे बात की शुरुआत की तो वह पूछते हैं, ‘तुम्हारा नाम क्या है?” इसके बाद उन्होंने करीब 5 से 7 बार मेरा नाम पूछा. मैंने हर बार अपना नाम दोहराया- अवधेश.
फिर मैंने उनसे मामले के बारे में पूछा तो वह बोले- "तुम क्या चाहते हो? मुझे पता ही नहीं है कि क्या मैटर है, वो मुझसे पहले का होगा."
तब मैंने ध्यान दिलाते हुए कहा कि इस मामले में 9 मार्च को शिकायत हुई है. जिसे पुलिस कमिश्नर और जिलाधिकारी को भी भेजा गया है.
इस बीच कुछ और लोग कमरे में प्रवेश करते हैं और एसएचओ दीक्षित उनसे बात करने लगते हैं. फिर वह फोन पर किसी के लिए धुरंधर फ़िल्म के टिकटों की व्यवस्था करने लगते हैं.
इसके बाद फिर से मेरा नाम पूछते हैं. मैं अपना नाम दोहराता हूं तो मुझसे कहते हैं, “आपको क्या दिक्कत है?”
मैंने कहा- पत्रकार हूं इस मामले पर रिपोर्ट कर रहा हूं.
उनका अगला सवाल होता है- कहां रहते हो, कहां से आए हो?
मैं बताता हूं- दिल्ली से आया हूं, वहीं रहता हूं.
फिर दीक्षित कहते हैं- तो आपको क्या दिक्कत आ रही है? पूरा नाम बताओ अपना? मैं फिर अपना पूरा नाम बताता हूं- अवधेश कुमार. यहां मुझे अहसास हुआ कि शायद वह पूरे नाम के बहाने मेरी जाति का पता लगाना चाहते हैं. जो कि आगे यकीन में बदल गया.
इसके बाद वह कहते हैं- दिक्कत क्या है तुमको? तुम्हारा क्या लिंक है उनसे?
“मुझे कोई दिक्कत नहीं है, मैं एक पत्रकार हूं. इस पर रिपोर्ट कर रहा हूं. सिर्फ जानने आया हूं कि क्या यह मामला आपके संज्ञान में है. आपकी नजर में पूरा मामला क्या है और आप क्या कुछ कार्रवाई कर रहे हैं?” मैंने पूछा.
मेरे जवाब के बाद एसएचओ साहब तुनक जाते हैं और कहते हैं, “तुमको पता है, वहां वो बहुत सारे टोपी वालों को बुलाता था. वहां का माहौल खराब हो रहा था. आप क्या, स्टोरी बनाना चाह रहे हो इस पर? उनके फेवर में बनाना चाह रहे हो? यहां पाकिस्तान बनाना चाहते हो? उनका सहयोग करना चाहते हो? तुम्हें इतनी खुजली क्यों हो रही है? मुझे लगता है, तुम्हें ज्यादा खुजली हो रही है?”
दीक्षित लगातार बोले जा रहे थे. मैंने उन्हें टोकते हुए कहा कि ये आप कैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं? ऐसी बातें क्यों बोल रहे हैं?
इस पर वह कहते हैं, “अरे, मैं सही बोल रहा हूं. आप कौन होते हो? आप न्यूसेंस (परेशानी खड़ी) कर रहे हो. चाहते क्या हो? लड़ाई झगड़ा चाहते हो? दंगा भड़काना चाहते हो? किस गैंग के लिए काम कर रहे हो?”
मैंने फिर उन्हें बताया मैं एक पत्रकार हूं. मेरा सारा काम ऑनलाइन उपलब्ध है. वह चाहें तो आसानी से चेक कर सकते हैं.
इस पर वह भड़क जाते हैं और चिल्लाते हुए साथी पुलिसवालों से कहते हैं, “इसका आई कार्ड चेक करो?”
आईकार्ड के बाद वह आधार कार्ड मांगते हैं और धमकाने के लहजे में कहते हैं कि दिल्ली में रहते हो तो उधर ही रहो. तुम्हें उस दिन भी खुजली हो रही थी फोन पर.
मैंने फिर अपनी बात दोहराई कि मैं एक पत्रकार हूं और बस अपना काम कर रहा हूं.
वह आगे सवाल करते हैं, “आपका मालिक कौन है? संपादक कौन है?” मैंने उन्हें दोनों का नाम बताया.
इसके बाद वह फिर से अपनी मुस्लिम विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करना शुरू करते हैं. दीक्षित कहते हैं, "वहां (मॉल में) इतने मुल्ले इकट्ठे हो रहे थे, वहां का माहौल खराब हो रहा था."
इसके बाद वह मुझे बताते हैं कि कैसे एक अंतरधार्मिक जोड़े में मुस्लिम शख्स को उन्होंने परेशान किया.
इस दौरान वह मुस्लिम समुदाय को काफी बुरा भला कहते हैं और गालियां देते रहते हैं. इस बीच वह कहते हैं, ”मैं कट्टर हिंदू हूं.”
जब मैं टोकता हूं तो वह कहते हैं, “ऐसा है अवधेश भाई.... ये बताओ कि किस जाति के हो?” मेरे जवाब के बाद वह फिर से अपनी डींगे हांकने लगते हैं और मुझे उपदेश के लहजे में कहते हैं, “...तुम हिंदुस्तान की बात करो, ये कोई और देश थोड़ी है. हिंदुस्तान देश है. इन्हें (मुस्लिमों को) अगर मौका मिल जाए तो ये पूरा देश खराब कर देंगे. मुझे आपकी बात बुरी लगी इसलिए मैं हाइपर हो गया था.”
आखिर में वह मुझे देश के लिए काम करना का उपदेश देते हैं.
और इस तरह मैं पुलिस से प्रतिक्रिया लेने पहुंचा रिपोर्टर, एक पुलिसवाले की धर्मांधता और कट्टरता का शिकार होता हूं. साथ ही पुलिस के उस चेहरे को भी करीब से देखने का मौका मिलता है, जिसके बार में अक्सर रिपोर्टिंग करता हूं.
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