दरअसल, एंकर जिस लहजे से जो-जो सवाल पूछ रहे थे, ऐसा लग रहा था कि मानो यूजीसी ने बिना कोई विचार-विमर्श के अपने मन से नियम बना दिए हैं.
भेदभाव की परिभाषा क्या होगी?
क्या सवर्ण छात्रों के साथ भेदभाव नहीं होता है?
क्या उनको फब्तियां नहीं कसी जाती? ताने नहीं मारे जाते?
और क्या सवर्ण छात्रों के भविष्य को लेकर खतरा है?
क्या सवर्ण छात्रों को आरोपी की तरह देखा जा रहा है?
गलत शिकायत पाए जाने पर सजा का प्रावधान कहां गया?
कमेटी में सवर्ण छात्रों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं किया जा सकता था?
कॉलेज और कैंपस को जातिगत लड़ाई का अखाड़ा क्यों बनाया जा रहा है?
कम से कम 8 हिंदी चैनलों पर प्राइम टाइम में करीब-करीब यही सवाल थे. पूछने के तरीके और कहने में भले फर्क रहा हो लेकिन सबने लगभग यही रट लगाई. घूम फिर कर पूरा मामला तीन अहम सवालों पर अटक गया. एक- क्या सवर्ण भेदभाव के शिकार नहीं होते? दो- झूठी शिकायत का क्या? और तीन- कमेटी में सर्वणों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है?
दरअसल, ये पूरा मामला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए दिशानिर्देशों को लेकर उठा है. ये नए दिशानिर्देश साल 2012 के यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतू) विनियम की जगह लेंगे. पुराने नियमों को ही थोड़ा अपडेट किया गया है. उसमें कुछ नए प्रावधान जोड़े गए हैं और कुछ पुराने हटा दिए गए हैं. इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर लाया गया है. बीते साल फरवरी, 2025 में यूजीसी ने इनका ड्राफ्ट जारी किया था.
यूजीसी के ये नए दिशानिर्देश उच्च शिक्षण संस्थानों में समता लाने के लिए भेदभाव से निपटने का एक तंत्र स्थापित करते हैं. जहां साल 2012 के नियम सिर्फ एक सलाह के तौर पर मौजूद थे, वहीं इस बार नियमों को प्रभावी बनाने के लिए उसमें कार्रवाई के प्रावधान रखे गए हैं. जैसे कि अगर शिक्षण संस्थान अपने परिसर में भेदभाव नहीं रोकते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी. ये कार्रवाई संस्थान की मान्यता रद्द करने तक पहुंच सकती है.
उल्लेखनीय है कि साल 2016 में रोहित वेमुला और उसके बाद साल 2019 में पायल तड़वी ने कैंपस के भीतर जातिगत उत्पीड़न के कारण अपनी जान दे दी थी. इसके बाद 2019 में दोनों के घरवाले ये मामला लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. उन्होंने यूजीसी के 2012 के नियमों को लागू करने की मांग उठाई. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कठोर दिशानिर्देश बनाने को कहा. जिसके बाद यूजीसी अब ये नए और संस्थानों की जवाबदेही तय करने वाले नियम लेकर आया है. फिलहाल इन नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है.
लेकिन हिंदी चैनलों के प्राइम टाइम पर इन समता नियमों के बहाने एंकर जिस लहजे से जो-जो सवाल पूछ रहे थे, ऐसा लग रहा था कि मानो यूजीसी ने बिना कोई विचार-विमर्श के अपने मन से नियम बना दिए हैं.
जैसे कि अंजना ने प्राइट टाइम शो ब्लैक एंड व्हाइट में कहा, “यूजीसी ऐसे नियम बना रहा है जिससे सभी जातियों के छात्रों के बीच भेदभाव दुर्भावना को बढ़ाने वाली सोच पनप सकती है. आज जरूरत यह है कि कमेटियां बने लेकिन उसमें सभी का रिप्रेजेंटेशन हो. अगर अन्य जातियों से हैं तो फिर सामान्य वर्ग का भी रिप्रेजेंटेशन हो और इसी के साथ-साथ अगर दुर्भावना के साथ कोई शिकायत करता है तो उस पर एक्शन की भी बात होनी चाहिए.”
एबीपी न्यूज़ पर चित्रा त्रिपाठी ने एक कदम आगे बढ़ कर कहा, “कमेटी, जिसमें कि एक भी सवर्ण सदस्य नहीं रहेगा. उस कमेटी को आरोपी छात्र के खिलाफ 24 घंटे के भीतर ही कारवाई करनी होगी और अगर इन कैटेगरी (दलित/पिछड़ा) से जुड़ा कोई छात्र झूठी शिकायत भी कर देगा तो उसे सजा नहीं मिलेगी. इसीलिए देश भर में इसका विरोध हो रहा है. क्योंकि, इस नए नियम में पीड़ित और आरोपी की जाति पहले से तय कर दी गई है. पीड़ित हमेशा एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय से होगा जबकि अपराधी हमेशा सवर्ण होगा. यानी यह गाइडलाइंस जन्म के आधार पर ही आरोपी और पीड़ित का ठप्पा लगा देती है.”
न्यूज़18 पर रुबिका लियाकत ने तो सबको समानता दिलाने की जिम्मेदारी ही अपने कंधों पर ले ली. रुबिका ने एक पैनलिस्ट को करीब-करीब हड़काते हुए कहा, “मैं इस बात पर विश्वास करती हूं कि इस देश में किसी भी धर्म, किसी भी जाति का अहित नहीं हो सकता है. लेकिन किसी के अति हित के चक्कर में अगर किसी जाति का अहित हो रहा है तो उसको भी हम ही लोग उठाएंगे. समानता सबके लिए है. यूनिटी इज़ फॉर ऑल. वो किसी एक की जागीर नहीं है.”
इंडिया टीवी के रजत शर्मा भी रुबिका की बात को अपने धमकी भरे शब्दों में कुछ यूं दोहरा रहे थे, “समाज समता मूलक हो. सबको बराबरी का हक मिले. जिनके साथ पहले अन्याय हुआ है, उनका ज्यादा ध्यान रखा जाए. यह सब ठीक है. लेकिन इसके साथ-साथ अब अन्याय के, हैरासमेंट के नए रास्ते ना खुलें. इसका भी ध्यान रखना जरूरी है. वरना आगे जाकर बड़ी प्रॉब्लम होगी.”
कुल मिलाकर हिंदी चैनलों पर यूजीसी के नए दिशानिर्देशों को लेकर एक खास पैटर्न की बहस देखने को मिल रही थी. जहां सब एंकर अपने-अपने शब्दों और तरीके से बस एक ही बात को इतना दोहरा देना चाहते थे कि वो कोई तथ्य की तरह लगने लगे. सवालों की शक्ल में भ्रामक जानकारियों को कुछ यूं आगे बढ़ाया गया कि तथ्य पर किसी का ध्यान ही नहीं था. लेकिन जब चित्रा त्रिपाठी को उदित राज ने ध्यान दिलाया कि नियमों में ये कहीं नहीं लिखा कि सवर्ण समता कमेटी में नहीं होंगे, ये झूठा प्रचार है तो चित्रा ने उन्हें चैलेंज करते हुआ कहा कि ये लिखा हुआ है और वो पढ़कर आई हैं. उल्टा उन्होंने उदित राज पर ही पढ़कर न आने का आरोप लगा दिया. कहा कि ये एक गंभीर मुद्दा है, उदित राज को पढ़कर आना चाहिए था.

तथ्य ये है कि कमेटी की संरचना कुछ यूं है. समता समिति, उच्च शिक्षण संस्थान के समान अवसर केंद्र के तहत काम करेगी. इस समिति में कुल 10 सदस्य होंगे. संबंधित संस्थान का हेड इसका अध्यक्ष होगा. इसके अलावा तीन प्रोफेसर, एक नॉन टीचिंग स्टाफ यानि कर्मचारी, दो सामाजिक प्रतिनिधि, दो छात्र प्रतिनिधि और समान अवसर केंद्र का समन्वयक इस समिति का पदेन सचिव होगा. शर्त ये है कि समिति में ओबीसी, एससी, एसटी, विकलांग और महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यानि अगर आप अति आदर्श स्थिति में देखें तो 5 नहीं तो 3-4 सदस्य ही आरक्षित वर्ग के होंगे और बाकी सब अनारक्षित या कहिए कि सवर्ण हो सकते हैं.
चित्रा ने अपनी चर्चा को बहस में बदल दिया और वह उदित राज पर काफी निजी हमले करती दिखीं. उनकी भाषा एक एंकर से ज्यादा किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की लग रही थी. खासकर तब जब उन्होंने उदित राज को कहा, “आप लोगों को एक नेता होने के नाते शर्म आनी चाहिए. मिस्टर उदित राज.. ये जाति की लड़ाई लड़ते रहिएगा लेकिन गरीब दलितों का हक मैं आप लोगों को नहीं खाने दूंगी. आप जैसे क्रीमी लेयर के लोग सारा दलितों का वो (हक) हड़प जाते हैं…. और बैठकर यहां पर दलितों की पॉलिटिक्स खेलते हैं. गरीब दलित का कौन लेकर जाता है, सारा का सारा हिस्सा? … इतने बड़े नेता रहे हैं.. बताइए आपने दलितों के लिए क्या किया आपने? और मेरी बात सुनिए. उदित राज को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? उदित राज, जो इतने पैसे वाले नेता हैं, जो अधिकारी रहे हैं, उनको या उनके खानदान को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? उदित राज जी, आपके खानदान के लोग क्यों लेते हैं आरक्षण? उदित राज इतने पैसे वाले हैं, आप लोग गरीब दलितों का आरक्षण लेकर जा रहे हैं.. कोई सवर्ण नहीं छीन रहा है.”
इसके बाद यह बहस यूजीसी के नियमों से हटकर आर्थिक आरक्षण की बहस में बदल गई.
अंजना के शो में भी कमोबेश यही हुआ जब कंचना ने एक मैगजीन को दिए अंजना के एक बयान को पढ़ा. जिसके बाद अंजना इतना तिलमिला गईं कि उन्हें शो से निकाल दिया और भेदभाव से निपटने के नियमों को लेकर हुई ये बहस एक 'भेदभाव' के साथ आगे बढ़ी. उन्होंने कंचना को अपनी बात भी पूरा नहीं करने दिया.
वापस तथ्यों और तर्कों पर लौटते हैं. यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कैंपस में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 2019-20 से लेकर 2023-24 तक ही करीब 118 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली है. जो कि एक चिंताजनक पैटर्न की ओर इशारा है और इसीलिए कड़े नियमों की जरूरत है.
26 जनवरी को आज तक के शो ब्लैक एंड व्हाइट में अंजना ओम कश्यप ने बताया कि देशभर के करोड़ों छात्रों में, खासकर आरक्षित वर्ग के छात्रों को अगर 50 फीसदी भी मान लें तो सिर्फ लगभग 0.18% ने ही भेदभाव की औपचारिक शिकायत दर्ज कराई.


अंजना ने इस असंगत सी तुलना के बाद कहा, “जातिगत भेदभाव बहुत गंभीर समस्या है. इसकी शिकायत पर कड़ी सजा होनी चाहिए अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो. लेकिन शिक्षण संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों की दर इतनी मामूली है कि इसके आधार पर सामान्य वर्ग के छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों को शोषण करने वाला मान लेना यह गलत है. यही वजह है कि समानता लाने वाले यह नए नियम शिक्षण संस्थानों में जातिगत दुर्भावना बदला लेने की टूलकिट बन सकते हैं और इसी वजह से यूजीसी के इन नए नियमों के कारण सामान्य वर्ग का गुस्सा केंद्र सरकार पर फूट रहा है.”
ऐसा ही तर्क और तुलना का गणित 27 जनवरी को रुबिका के शो में दक्षिणपंथी अजीत भारती ने रखा. उन्होंने कहा, “कॉलेज कैंपसेस का इनका यूजीसी का अपना डाटा है जिसमें प्रताड़ित छात्रों की संख्या पूरे साल भर में 378 है और संस्थानों की संख्या मुझे लगता है कि प्राइवेट और ये मिला दीजिएगा तो लगभग 5 हजार के ऊपर होगा. कॉलेज जोड़ लेंगे तो 30 हजार या ऐसे ही कुछ हो जाएगा. 3 करोड़ छात्र-छात्राएं पढ़ रहे हैं. उसमें से 378 प्रताड़ित हो रहा है. कितना परसेंटेज है? 0.004% आता है. आपने उसको आधार बना करके आपने जो है कानून बना दिया। तो मांग कहां थी?”
अजीत के इस कुतर्क का जवाब आनंद रंगनाथन ने दिया, उन्होंने कहा, “कल को आप ये नहीं कह सकते कि भाई सिर्फ दो मर्डर हुए हैं. आप नया लॉ क्यों ला रहे हैं? कोई भी लॉ इज बेस्ड ऑन इनजस्टिस दैट इज हैपनिंग. तो कल को अगर केस में 1% भी बढ़ोतरी हो 100% नहीं. अगर बढ़ोतरी ना भी हो लेकिन अगर इनजस्टिस हो रहा है उसके अगेंस्ट लॉ आना चाहिए लेकिन वो लॉ अनजस्ट नहीं होना चाहिए.”
आनंद ने कहा कि ये कानून गलत है. इस दौरान आनंद भी चूक गए. दरअसल, ये नए दिशानिर्देश हैं, कोई कानून नहीं हैं. चैनलों पर साफ दिखा कि बहस का एक आधार ये भी रहा कि झूठी शिकायत पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं. और चैनल के एंकर भी एक काल्पनिक धारणा को सच मानकर सवाल करते दिखे. जैसे अंजना ने एक पैनलिस्ट से पूछा, “मान लीजिए मैं ही आपके खिलाफ कोई गलत आरोप लगा दूं. और आपको रिड्रेसल का कोई मौका नहीं मिले, बाद में मैं गलत साबित हो भी जाती हूं. जब तक आप पर केस चलेगा आपका तो करियर खत्म.”
गौरतलब है कि ये दिशानिर्देश हैं. ये कोई कानून नहीं है. इसीलिए इनमें किसी भी पक्ष को दंडित करने ताकत शामिल नहीं है.
जेएनयू के प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा इस बारे में ज्यादा रोशनी डालते हैं. आज तक पर चर्चा के दौरान वह कहते हैं, “अब इसको हम सब लोग कैसे देख रहे हैं जैसे दंडात्मक कोई कानून बना दिया गया है. ये दंड के लिए नहीं है. ये आपस में जो हमारे पूर्वाग्रह हैं, उन पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए है. ..उसके उद्देश्य को आप पढ़ेंगे तो उसमें लिखा हुआ है कि हम आपस में सद्भाव विकसित करें. नफरत विकसित ना करें. जैसा सारी बहसों में हो रहा है, लग रहा है कि एक दूसरे के खिलाफ हम नफरत विकसित कर रहे हैं. हमको सद्भाव विकसित करना है.”
इन नियमों के उद्देश्य में भी यही लिखा है कि धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान और दिव्यांगता के आधार पर विभिन्न वर्गों के बीच भेदभाव को मिटाना और पूर्ण समता और समावेश को बढ़ाना.
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के इन नए दिशानिर्देशों पर रोक लगा दी है.
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