सुप्रीम कोर्ट ने गुलफ़िशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम ख़ान को सशर्त ज़मानत दी है. जमानत के लिए कोर्ट ने 12 शर्तें रखी हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 दिल्ली दंगों की ‘साजिश रचने’ के मामले में आरोपी उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इनकार कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों गुलफ़िशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम ख़ान को सशर्त ज़मानत दे दी है. कोर्ट ने जमानत के लिए 12 शर्तें रखी हैं.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं है, इसलिए हरेक की ज़मानत याचिका पर अलग-अलग विचार किया जाना ज़रूरी है. पीठ ने स्पष्ट किया कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में ‘गुणात्मक रूप से अलग स्थिति’ में हैं, इसी आधार पर उनकी ज़मानत याचिकाएं ख़ारिज की गईं.
उमर और शरजील की जमानत याचिका पर रोक
कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के ख़िलाफ़ प्रथम दृष्टया मामला बनता है.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “यह न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि अभियोजन पक्ष की सामग्री से अपीलकर्ताओं उमर ख़ालिद और शरजील इमाम के विरुद्ध प्रथम दृष्टया आरोप स्थापित होते हैं. इन अपीलकर्ताओं के संबंध में वैधानिक सीमा लागू होती है. कार्यवाही के इस चरण पर उन्हें ज़मानत पर रिहा किया जाना उचित नहीं है.”
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम संरक्षित गवाहों की जिरह पूरी होने के बाद या मौजूदा आदेश की तारीख़ से एक वर्ष पूरा होने पर दोबारा ज़मानत के लिए आवेदन कर सकते हैं.
कोर्ट ने यह भी कहा कि गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए जैसे विशेष क़ानूनों के तहत मामलों में भी ट्रायल में अत्यधिक देरी न्यायिक समीक्षा का आधार बन सकती है. पीठ ने कहा कि यूएपीए एक विशेष क़ानून है, जो ज़मानत के लिए अलग मानक तय करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ज़मानत स्वतः ही नकार दी जाए.
कोर्ट ने दो टूक कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) भले ही सामान्य ज़मानत प्रावधानों से अलग हो, लेकिन यह न्यायिक जांच को समाप्त नहीं करती और न ही ज़मानत को डिफ़ॉल्ट रूप से अस्वीकार करने का आदेश देती है.
ये है पूरा मामला
गौरतलब है कि फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध के दौरान दिल्ली में भड़के दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे. दिल्ली पुलिस के मुताबिक, यह मामला एक कथित साजिश से जुड़ा है, जिसमें कई दंगों को अंजाम देने की योजना बनाई गई थी. इस संबंध में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईपीसी और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी.
उमर ख़ालिद को सितंबर, 2020 में गिरफ़्तार किया गया था और तब से वह जेल में हैं. उन पर आपराधिक साज़िश, दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा और यूएपीए के तहत अन्य गंभीर आरोप लगाए गए हैं. शरजील इमाम भी देश के अलग-अलग राज्यों में दर्ज कई मामलों में आरोपी हैं. अन्य मामलों में उन्हें ज़मानत मिल चुकी है, लेकिन इस ‘साजिश’ वाले केस में अब तक राहत नहीं मिली है.
उमर ख़ालिद और अन्य आरोपियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर के ज़मानत से इनकार वाले आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. इस पर शीर्ष अदालत ने 22 सितंबर को दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया था.
ज़मानत याचिकाओं के जवाब में दिल्ली पुलिस ने हलफ़नामा दाख़िल कर दावा किया कि उनके पास ‘पुख्ता दस्तावेज़ी और तकनीकी सबूत’ हैं, जो एक कथित ‘रेजीम चेंज ऑपरेशन’, सांप्रदायिक आधार पर देशव्यापी दंगे भड़काने और ग़ैर-मुसलमानों की हत्या की साज़िश की ओर इशारा करते हैं.
सुनवाई के दौरान आरोपियों ने कोर्ट से कहा कि उन्होंने कभी हिंसा का आह्वान नहीं किया और वे सीएए के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे. वहीं, दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया कि आरोपी उन लोगों से समानता (पैरिटी) का दावा नहीं कर सकते, जिन्हें पहले दिल्ली हाई कोर्ट से ज़मानत मिल चुकी है.
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि दिल्ली दंगे स्वतःस्फूर्त नहीं थे, बल्कि पूरी तरह पूर्व-नियोजित थे और आरोपियों के भाषण समाज को सांप्रदायिक आधार पर बांटने के इरादे से दिए गए थे. पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपियों ने हिंसा के ज़रिए देश में सत्ता परिवर्तन की कोशिश की.
3 दिसंबर को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों से अपने स्थायी पते अदालत में देने को कहा था.
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