एनजीओ ने मोदी सरकार की कार्रवाई के बाद कहा, 'रिपोर्टों पर पानी फिर गया, हमारे दानदाता डरे हुए हैं'

विदेशी फंड हजारों गैर-सरकारी संगठनों के लिए एक जीवन रेखा है. अब एनजीओ कम कर्मचारियों के साथ काम कर रहे हैं. 

WrittenBy:सुमेधा मित्तल
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एक मंत्री एक सूखे पेड़ से, जिसकी छाल पर एनजीओ लिखा हुआ है, बरसाती बादल, जिसे एफसीआरए लाइसेंस कहा जाता है, छीन लेता है.
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कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) के काम करने की जगह में यह बदलाव मात्र दिखावटी नहीं है. इसके दफ्तर को दिल्ली के कालू सराय में एक इमारत को खाली करने के बाद उसकी तीसरी मंजिल तक सीमित कर दिया गया है.

इस दफ्तर में इस्तेमाल होने वाली कुर्सियां उलटी रखी हुई हैं, इस जगह पर कभी नागरिकों के सूचना के अधिकार की वकालत की जाती थी. एयर कंडीशनरों का ढेर एक कोने में पड़ा हुआ है, जो कभी जेल में बंद लोगों के लिए न्याय की आवाज उठाने वाले एक दूसरे कार्यक्रम की बैठकों के लिए इस्तेमाल होते थे. दफ्तर के कंप्यूटरों को निदेशक वेंकटेश नायक के केबिन में बड़े करीने से नारंगी रंग के रैपर में पैक करके रखा गया है.

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव का दफ्तर 1993 से यहां पर स्थित है. साल 2021 में एनजीओ ने अपने लगभग 60 प्रतिशत स्टाफ में कटौती करते हुए कर्मचारियों की संख्या 35 से घटाकर 16 कर दी. बचे हुए कर्मचारियों से कहा गया कि वे सप्ताह में तीन दिन घर से काम करें ताकि दफ्तर चलाने की लागत को कम किया जा सके.

2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, उसी साल सीएचआरआई ने देश भर में हिरासत में होने वाली मौतों के साथ-साथ कर्नाटक पुलिस में महिलाओं की स्थिति को ट्रैक करने की अपनी योजना से हाथ खड़े कर दिए. 

एनजीओ के निदेशक वेंकटेश नायक ने कहा, "हमारी वित्तीय स्थिति इतनी खराब है कि हम वर्क फ्रॉम होम के दौरान इस्तेमाल होने वाले इंटरनेट के खर्चों का भी भुगतान नहीं सकते."

उन्होंने कहा कि एनजीओ का लगभग 85 प्रतिशत फंड विदेशी स्रोतों के जरिए आता है. 2021 में एनजीओ के खाते में कथित विसंगतियों को लेकर की गई सरकारी कार्रवाई की वजह से मुश्किलों को सामना करना पड़ रहा है. 

लेकिन सीएचआरआई जैसी ही कहानी भारत के कई अन्य एनजीओ की भी है. ये सारे एनजीओ नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से विदेशी फंड पर नियमों में कड़ाई के बाद बीच भंवर में फंस गए हैं. 

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