'अडाणी समूह' द्वारा खुलेआम स्टॉक में हेरफेर और सेबी के आंख मूंद लेने के नए सबूत

अडाणी समूह में परोक्ष रूप से निवेश करने वाले नासिर अली शाबान अहली और चांग चुंग-लिंग के अडाणी परिवार से क़रीबी रिश्ते और भारतीय प्रतिभूति कानूनों क़ानूनों के उल्लंघन के सबूत. 

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आधुनिक भारत के इतिहास में यह सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला बन गया है. हवाई अड्डों से लेकर टेलीविजन नेटवर्क तक हर चीज में रुचि रखने वाले विशाल अडाणी समूह के ऊपर खुलेआम स्टॉक मार्केट में गड़बड़ी और हेरफेर का आरोप है.

न्यूयॉर्क स्थित एक शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद इसी साल जनवरी में अडाणी समूह के स्टॉक में भारी गिरावट आई थी. उसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और भारत के सुप्रीम कोर्ट को इसकी जांच का आदेश देना पड़ा. लेकिन अदालत द्वारा गठित की गई विशेषज्ञों की समिति इस घोटाले की तह तक पहुंचने में असमर्थ रही. 

इसके गंभीर राजनीतिक निहितार्थ हैं. अडाणी ग्रुप की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नज़दीकियां एक खुला सत्य है और देश की अनगिनत विकास परियोजनाओं में भी इस समूह की केंद्रीय भूमिका है.

समस्त आरोपों का निचोड़ यह था कि अडाणी ग्रुप के कुछ प्रमुख ‘सार्वजनिक’ निवेशक वास्तव में अडाणी के अंदरूनी लोग थे और यह भारत के प्रतिभूति और विनिमय कानूनों का उल्लंघन था. हालांकि, विशेषज्ञ समिति ने जिन भी एजेंसियों से उन निवेशकों की पहचान करने की कोशिश की वह असफल रहे क्योंकि वे निवेशक गोपनीय ऑफशोर (विदेशों में स्थित शेल कंपनियों) इकाइयों के जटिल जाल में छिपे हुए थे.

ओसीसीआरपी द्वारा हासिल किए गए ताज़ा दस्तावेज़ इस मामले पर और ज्यादा प्रकाश डालते हैं. इन दस्तावेज़ों में कई टैक्स फाइल्स, बैंक रिकॉर्ड और अडाणी ग्रुप के आंतरिक ईमेल शामिल हैं.

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

● भारत के शेयर बाजार नियामक (सेबी) और उच्च स्तरीय विशेषज्ञों की समिति यह साबित नहीं कर पाई कि स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध अडाणी समूह के निवेशक कुछ विदेशी मालिक असल में इसके अपने लोग हैं. 

● इसी साल जनवरी में सामने आए आरोपों ने अडाणी समूह को हिलाकर रख दिया था. ये आरोप अमेरिका की शॉर्ट सेलिंग फर्म हिंडनबर्ग रीसर्च की जांच में सामने आए थे. लेकिन ऑफशोर इकाइयों की जटिल गोपनीयता के चलते इस लेनदेन का पता लगाना मुश्किल था. एक रिपोर्ट के अनुसार, “आधिकारिक जांचकर्ता ऐसे मुकाम पर पहुंच गए जहां से आगे जांच का रास्ता ही नहीं था.”

● जिन दो लोगों ने वर्षों तक अडाणी समूह के स्टॉक में करोड़ों डॉलर का निवेश किया उनके नाम हमारी पड़ताल में सामने आए हैं. इनके नाम नासिर अली शाबान अहली और चांग चुंग-लिंग हैं.

● दोनों के अडाणी परिवार से गहरे संबंध हैं. ये लोग अडाणी की संबद्ध कंपनियों में निदेशक और शेयरधारक के रूप में भी दिखाई देते हैं.

● रिकॉर्ड बताते हैं कि अडाणी समूह के स्टॉक में निवेश करने के लिए इन दोनों ने जिस कंपनी से निर्देश प्राप्त किए वह कंपनी अडाणी परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य की मालिकाना कंपनी है.

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अडाणी समूह के व्यवसाय और निवेश से सीधे जुड़े लोगों ने इन दस्तावेजों की पुष्टि की है जिसके मुताबिक मॉरिशस में स्थित अपारदर्शी शेल कंपनियों के जरिए भारत के स्टॉक मार्केट में सार्वजनिक कारोबार करने वाले अडाणी समूह के शेयरों में करोड़ों डॉलर का निवेश किया गया. 

कम से कम दो मामलों में अडाणी स्टॉक होल्डिंग्स का प्रतिनिधित्व करते हुए, जिसकी बाजार कीमत एक समय 430 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी, गुप्त निवेशकों और समूह के बहुसंख्यक शेयरधारक अडाणी परिवार के बीच घनिष्ठ रिश्तों के सबूत सामने आए हैं.

दोनों व्यक्ति, नासिर अली शाबान अहली और चांग चुंग-लिंग, अडाणी परिवार के लंबे समय से व्यापारिक साझेदार हैं और ये अडाणी समूह की कंपनियों और परिवार के वरिष्ठ सदस्य विनोद अडाणी से जुड़ी कंपनियों में निदेशक और शेयरधारक के रूप में मौजूद नज़र आते हैं. 

हमें हासिल दस्तावेज़ों से पता चलता है कि, इन दोनों ने मॉरीशस स्थित ऑफशोर कंपनियों के जटिल जाल की मदद से अडाणी समूह के स्टॉक में लंबे वक्त तक निवेश और खरीद-फरोख्त की. अपारदर्शिता के चलते इनकी भागीदारी उजागर नहीं हुई. इस प्रक्रिया में उन्होंने मोटा मुनाफा कमाया. इतना ही नहीं, दस्तावेज़ यह भी बताते हैं कि इन दोनों के निवेश का प्रबंधन करने वाली कंपनी ने विनोद अडाणी की कंपनी को निवेश की सलाह देने के एवज में मोटा भुगतान किया.

यह भारत के मौजूदा बाज़ार कानूनों का उल्लंघन है या नहीं, यह सवाल इस बात पर निर्भर करता है कि क्या अहली और चांग को अडाणी समूह के मालिकों की ओर से काम करने वाला माना जाय. अगर ऐसा है, तो अडाणी समूह की होल्डिंग्स में अडाणी परिवार की हिस्सेदारी 75 प्रतिशत की अधिकतम सीमा को पार कर जाती है. और यह फ्लोटिंग शेयर की पच्चीस प्रतिशत सीमा का उल्लंघन है. यह इनसाइडर स्वामित्व की ओर इशारा करता है. 

भारतीय निवेश बाजार के विशेषज्ञ और अधिवक्ता अरुण अग्रवाल कहते हैं, "जब कंपनी 75 प्रतिशत से अधिक शेयर खरीदती है तो यह न केवल अवैध है, बल्कि यह शेयर की कीमतों में भी हेरफेर का जरिया है. इस तरह कंपनी अपने शेयर्स में बनावटी या नकली कमी पैदा कर सकती है और अपने शेयर की कीमतों को बढ़ा सकती है. यह अपनी बाजार पूंजी को भी बढ़ाने का तरीक़ा है.”

अरुण आगे कहते हैं, "इस तरह उन्हें बाजार में यह छवि बनाने में मदद मिलती है कि कंपनी बहुत अच्छा काम कर रही है. इससे कंपनी को नए ऋण प्राप्त करने, कंपनियों के मूल्यांकन को नई ऊंचाई पर ले जाने और फिर नई कंपनियां बनाने में मदद मिलती है."

इस रिपोर्ट को लेकर पूछे गए एक सवाल जवाब में अडाणी ग्रुप के एक प्रतिनिधि ने बताया कि आप जिस ‘मॉरीशस फंड’ की बात कर रहे हैं वह पहले से ही ‘हिंडनबर्ग रिपोर्ट’ में है. हिंडनबर्ग वह शॉर्ट-सेलर संस्था है जिसने इस घोटाले को जन्म दिया था. (हिंडनबर्ग रिपोर्ट में इन ऑफशोर कंपनियों का नाम तो बताया गया था, लेकिन अडाणी के स्टॉक में निवेश करने वालों के नाम का खुलासा उसमें नहीं था.) 

अडाणी ग्रुप के प्रतिनिधि ने अपने जवाब में यह भी कहा कि इस मामले की तह तक जाने के लिए बनाई गई सुप्रीम कोर्ट की विशेषज्ञ समिति ने कह दिया है कि इन आरोपों को ‘साबित नहीं’ किया जा सका.

इसके बाद प्रतिनिधि ने लिखा, "इन तथ्यों की रोशनी में कहा जा सकता है कि ये आरोप न केवल निराधार हैं, बल्कि सिर्फ हिंडनबर्ग के आरोपों का दोहराव भर हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘यह स्पष्ट है कि अडाणी ग्रुप की सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध सभी कंपनियां सार्वजनिक शेयर होल्डिंग्स से संबंधित सभी नियम और कानूनों का पालन करती हैं."

अहली और चांग ने ओसीसीआरपी के सवालों का जवाब नहीं दिया.

द गार्डियन के एक रिपोर्टर को दिए गए इंटरव्यू में चांग ने कहा कि उन्हें अडाणी स्टॉक की किसी भी गुप्त खरीद के बारे में कुछ नहीं पता है. लेकिन चांग ने यह नहीं बताया कि उन्होंने अडाणी स्टॉक में कोई खरीदारी की है या नहीं. इसके बदले वो पत्रकार से ही सवाल पूछने लगे कि वो उनके अन्य निवेशों में दिलचस्पी क्यों नहीं लेते. इंटरव्यू के खत्म होने से पहले चांग ने कहा, "हम साधारण व्यापारी हैं.”

विनोद अडाणी ने भी सवालों का जवाब नहीं दिया. हालांकि, अडाणी ग्रुप ने इस बात से इनकार किया था कि ग्रुप को चलाने में विनोद की कोई भूमिका है. लेकिन इसी साल मार्च में उन्होंने स्वीकार किया था कि वह इसके ‘प्रमोटर ग्रुप" का हिस्सा थे.  इसका मतलब है कि कंपनी के मामलों पर उनका नियंत्रण था और उन्हें अडाणी ग्रुप के शेयरों की सभी होल्डिंग्स के बारे में सूचित करना अनिवार्य था.  

अडाणी ग्रुप के एक प्रतिनिधि ने बताया कि विनोद अडाणी की भागीदारी की "विधिवत जानकारी" दी गई है. उन्होंने कहा कि वह एक "विदेशी नागरिक हैं... ‘‘पिछले तीन दशकों से विदेश में रह रहे हैं” और "अडाणी की किसी भी सूचीबद्ध इकाई, कंपनी या सहायक कंपनियों में किसी जिम्मेदार पद पर वो नहीं हैं."

'खुलेआम शेयरों में हेरफेर’

अडाणी ग्रुप का उदय बेहद चौंकाने वाला रहा. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से एक साल पहले यानी सितंबर 2013 में अडाणी का मार्केट कैपिटलाइजेशन आठ अरब डॉलर था जो पिछले साल बढ़कर 260 अरब डॉलर पहुंच गया था. 

बता दें कि अडाणी ग्रुप परिवहन और रसद, प्राकृतिक गैस वितरण, कोयला व्यापार और उत्पादन, बिजली उत्पादन और ट्रांसमिशन, सड़क निर्माण, डेटा संरक्षण और रियल एस्टेट समेत अनेक क्षेत्रों में सक्रिय है.

इसने कई बड़े सरकारी टेंडर भी हासिल किए हैं, जिसमें भारत के कई हवाई अड्डों के संचालन और पुनर्विकास के लिए 50 साल का कॉन्ट्रैक्ट भी शामिल हैं. हाल ही में इसने टेलीविजन चैनल एनडीटीवी को भी खरीदा है. 

अडाणी का उदय विवादों से जुड़ा रहा है. विपक्षी नेताओं का आरोप है कि अडाणी ग्रुप को सरकारी कॉन्ट्रैक्ट दिलाने में मोदी सरकार की विशेष सहायता मिली है. वहीं विश्लेषकों का कहना है कि गौतम अडाणी और पीएम मोदी के संबंधों का भी लाभ इन्हें मिला है. हालांकि, अडाणी ने इस बात से इनकार किया है कि उनकी व्यापारिक सफलता के लिए मोदी या उनकी नीतियां जिम्मेदार हैं.

अडाणी ग्रुप को इस साल जनवरी के अंत में तब बड़ा झटका लगा जब न्यूयॉर्क स्थित शार्ट सेलर ग्रुप ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ ने अपनी रिपोर्ट जारी की. इसमें दावा किया गया था कि ग्रुप ने दशकों तक "खुलेआम शेयरों की हेरफेर" और "अकाउंटिंग में धोखाधड़ी" करता रहा.

इसका हेडलाइन था- गौतम अडाणी ने कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े घोटाले को अंजाम दिया."

इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि अडाणी की कंपनी भारतीय प्रतिभूति कानून का उल्लंघन कर रही थी. इसके मुताबिक सार्वजनिक रूप से कारोबार करने वाली किसी भी कंपनी के स्टॉक का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा खुले बाजार में जनता की खरीद के लिए उपलब्ध होना चाहिए.

रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद अडाणी ग्रुप की कंपनियों के शेयर औंधे मुंह गिरे. गौतम अडाणी को महज कुछ ही दिनों में 60 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ. नतीजतन वह दुनिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी से लुढ़क कर 24वें स्थान पर पहुंच गए.

इसके जवाब में अडाणी ग्रुप ने भारतीय तिरंगे की आड़ लेकर इसका खंडन पेश किया. कंपनी द्वारा स्टेकहोल्डर्स को भेजे गए एक नोट में कहा गया, "यह केवल एक कंपनी पर हमला नहीं है, यह एक सोची समझी रणनीति के तहत भारत पर हमला है. इसकी स्वतंत्र और ईमानदार संस्थाओं की गुणवत्ता, भारत की विकास कहानी और महत्वाकांक्षा पर हमला है.”

ऐसा लगता है कि कई निवेशक इस कथन से प्रभावित हुए. जिसके बाद आगे चल कर अडाणी ग्रुप की प्रमुख कंपनियों के शेयरों ने अपने घाटे की काफी हद तक भरपाई कर ली.

imageby :शामभवी ठाकुर

अंधेरी सुरंग

हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद विपक्ष ने जबरदस्त हंगामा किया. सरकार से कार्रवाई की मांग की. नरेंद्र मोदी सरकार करवाई को लेकर सुस्त नजर आ रही थी. तब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की. विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट मई में प्रकाशित हुई. समिति के निष्कर्षों से पता चला कि अडाणी ग्रुप की जांच भारतीय वित्तीय नियामक प्राधिकरण ‘सेबी’ पहले ही जांच कर चुका है.

समिति के अनुसार, सेबी को सालों से इस बात की आशंका थी कि अडाणी ग्रुप के कुछ सार्वजनिक शेयरधारक वास्तव में सार्वजनिक शेयरधारक नहीं हैं और वे, अडाणी ग्रुप प्रमोटरों के मुखौटे हो सकते हैं.

सेबी ने 2020 में अडाणी स्टॉक रखने वाली 13 विदेशी इकाइयों की जांच शुरू की थी.

विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि जांच में कई मुश्किलें आईं, क्योंकि सेबी के जांचकर्ता यह पता नहीं लगा सके कि इस पैसे के पीछे कौन लोग हैं. 

समिति ने अपने निष्कर्ष में कहा कि यह ऐसा सफर है जिसकी कोई मंजिल नहीं है. बहुत सारी परतों के पीछे, अपारदर्शी कॉरपोरेट स्वामित्व वाले निवेशकों का इस्तेममाल वास्तविक मालिकों को छिपाने के लिए किया जा सकता है. 

हालांकि हमारे पत्रकारों के द्वारा प्राप्त दस्तावेजों से 13 कंपनियों में दो के गंतव्य का पता लग गया है. ये दोनों मॉरीशस में स्थित निवेश फंड इकाइयां हैं.

इनके नाम है इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड (ईआईएफएफ) और ईएम रिसर्जेंट फंड (ईएमआरएफ). ऊपर से देखने पर ये दोनों ऑफशोर इकाइयां निवेशक संस्थाएं दिखती हैं जो कई धनी निवेशकों द्वारा संचालित होती हैं. 

हमें मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि पैसे का एक बहुत बड़ा हिस्सा दो विदेशी निवेशकों द्वारा इन फंड में डाला गया. ये दोनों निवेशक ताइवान के चांग और संयुक्त अरब अमीरात के अहली हैं. इन्होंने 2013 से 2018 के बीच इसी फंड का इस्तेमाल कर चार अडाणी कंपनियों में बड़ी मात्रा में शेयरों की खरीद-फरोख्त की. 

मार्च 2017 में ऐसा भी समय आया जब अडाणी समूह के स्टॉक में इनके निवेश का मूल्य 430 मिलियन डॉलर हो गया था. 

सारा पैसा एक घुमावदार कंपनियों के जाल के जरिए आया था जिससे इनकी पहचान कर पाना मुश्किल था. यह पैसा इन चार कंपनियों और बरमूडा स्थित एक निवेश फंड ग्लोबल अपॉर्चुनिटीज फंड (जीओएफ) के जरिए आया था. 

कौन थी वह चार कंपनियां

निवेश में इस्तेमाल की गई चार कंपनियां लिंगो इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (बीवीआई), जिसका मालिकान हक चांग के पास था, गल्फ एरिज ट्रेडिंग एफजेडई (यूएई) इसका मालिकाना हक अहली के पास था, मिड ईस्ट ओशियन ट्रेड (मॉरीशस), जिसका मालिक अहली था, और गल्फ एशिया ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (बीवीआई), इसको भी अहली ही नियंत्रित करता था. 

हमें मिले दस्तावेजों के अनुसार, चांग और अहली के निवेश से बहुत बड़ा मुनाफा हुआ, जिससे उन्हें कई सौ करोड़ की कमाई हुई, क्योंकि उन्होंने कई बार अडाणी के शेयर कम कीमत पर खरीदे और ऊंची कीमतों पर बेचे.

जून 2016 में उनका निवेश शीर्ष पर था. उन्होंने जिन दो फंडों का इस्तेमाल किया था, उनके अडाणी समूह की चार कंपनियों में 8 से 14 प्रतिशत के बीच फ्री-फ्लोटिंग शेयर हो गए थे. ये चार कंपनियां अडाणी पावर, अडाणी एंटरप्राइजेज, अडाणी पोर्ट्स और अडाणी ट्रांसमिशन थीं.

चांग और अहली का अडाणी परिवार से संबंध पिछले कुछ सालों में विशेष रूप से सामने आया है. दो अलग-अलग सरकारी जांचों द्वारा इन लोगों को अडाणी परिवार की कथित गड़बड़ियों से जोड़ा गया था. हालांकि बाद में यह दोनों मामले खारिज हो गए. 

पहले मामले में 2007 में वित्त मंत्रालय के तहत भारत की प्रमुख जांच एजेंसी, डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई) द्वारा कथित रूप से अवैध हीरा व्यापार योजना की जांच शामिल थी.

डीआरआई की रिपोर्ट में पाया गया कि इस योजना में शामिल तीन अडाणी कंपनियों का निदेशक चांग था, जबकि अहली ने एक ट्रेडिंग फर्म का प्रतिनिधित्व किया था जो इसमें शामिल थी. इस पड़ताल के दौरान ही हमे पता चला कि चांग और विनोद अडाणी के सिंगापुर के आवासीय पते एक थे. विनोद अडाणी, गौतम अडाणी के बड़े भाई हैं.

दूसरा मामला एक कथित ओवर-इनवॉइसिंग का घोटाला था, जो 2014 की एक अलग डीआरआई जांच में सामने आया था. एजेंसी ने दावा किया कि अडाणी समूह की कंपनियां आयातित बिजली उत्पादन उपकरणों के लिए अपनी ही विदेशी सहायक कंपनी को एक बिलियन डॉलर से अधिक का भुगतान करके अवैध रूप से भारत से बाहर पैसा भेज रही थीं.

यहां भी चांग और अहली के नाम सामने आए. ये दोनों ही अलग-अलग वक्त पर उन दो कंपनियों के डायरेक्टर रहे हैं, जिनके मालिक बाद में विनोद अडाणी बने, जिन्होंने कि इससे हुई कमाई को संभाला, इनमें से एक कंपनी संयुक्त अरब अमीरात और दूसरी मॉरीशस में थी. 

हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, चांग भी सिंगापुर की उस कंपनी में डायरेक्टर या फिर शेयरधारक थे, जिसे की अडाणी की कंपनी ने डिस्क्लोजर में अपनी सहायक कंपनी (पार्टी) के तौर पर दिखाया था. 

imageby :साभार- फाइनेंशियल टाइम्स

स्पष्ट दिशानिर्देश

अडाणी से इन पूर्व संबंधों के अलावा भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं कि चांग और अहली द्वारा अडाणी के शेयरों की खरीद फरोख्त अडाणी परिवार के साथ मिलीभगत करके की जा रही थी. 

अडाणी परिवार के एक करीबी सूत्र जो कंपनी के कारोबार से परिचित हैं, नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताते हैं कि ईआईएफएफ और ईएमआरएफ में चांग और अहली के निवेश के निर्देश सीधे-सीधे अडाणी समूह से प्राप्त हुए.

सूत्र ने कंपनी का नाम एक्सेल इन्वेस्टमेंट एंड एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड बताया. यह संयुक्त अरब अमीरात में एक गुप्त स्थान पर स्थित है जहां इसके कारपोरेट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं.

लेकिन हमारे पत्रकारों को मिले दस्तावेज़ सूत्र की इस जानकारी की पुष्टि करते हैं. मसलन- 

  • ईआईएफएफ और ईएमआरएफ को सलाहकार सेवाएं प्रदान करने के लिए एक्सेल के साथ हुए एक समझौते पर 2011 में खुद विनोद अडाणी ने हस्ताक्षर किए थे.

  • साल 2015 तक, एक्सेल का स्वामित्व एसेंट ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के पास था, जिसके बारे में 2016 के एक ईमेल में कहा गया है कि इसका स्वामित्व विनोद अडाणी और उनकी पत्नी के पास था.

  • हालांकि मॉरीशस में पंजीकृत एसेंट के वर्तमान कारपोरेट रिकॉर्ड यह नहीं दिखाते हैं कि कंपनी का मालिक कौन है, लेकिन वे जरूर बताते हैं कि विनोद अडाणी इसके निदेशक मंडल में हैं.

  • बिल और लेनदेन के रिकॉर्ड से पता चलता है कि ईआईएफएफ, ईएमआरएफ और बरमूडा स्थित जीओएफ की प्रबंधक कंपनियों ने जून 2012 और अगस्त 2014 के बीच एक्सेल को "सलाह" शुल्क के तौर पर 1.4 मिलियन डॉलर से ज्यादा का भुगतान किया.

  • एक आंतरिक पत्राचार से पता चलता है कि आगामी ऑडिट के मद्देनजर फंड मैनेजर इस बात से चिंतित थे कि एक्सेल की निवेश सलाह को उचित ठहराने के लिए उनके पास पर्याप्त कागजी सबूत नहीं है.

एक ईमेल में, प्रबंधक कई कर्मचारियों को ऐसे रिकॉर्ड तैयार करने का निर्देश देता है जो इस निवेश को उचित उचित ठहराने का आधार बन सकें.

दूसरे ईमेल में, एक प्रबंधक एक्सेल से एक ऐसी रिपोर्ट मांगने का अनुरोध कर रहा है, जिसमें "फंड ने [वास्तव में] निवेश की गई प्रतिभूतियों की संख्या से अधिक में निवेश करने की सिफारिश की हो ताकि यह जताया जा सके कि [निवेश प्रबंधक] ने अपने विवेक का उपयोग किया है, इस निवेश का चयन करने के लिए."

पैसों की हेरा-फेरी

इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि अडाणी समूह के निवेश के लिए चांग और अहली का पैसा अडाणी परिवार से आया था. धन का स्रोत अज्ञात है. लेकिन ओसीसीआरपी द्वारा हासिल किए दस्तावेजों से पता चलता है कि विनोद अडाणी ने अपने निवेश के लिए मॉरीशस के उसी फंड में से एक का इस्तेमाल किया.

पत्रकारों को डीआरआई द्वारा 2014 में भारतीय नियामक सेबी को भेजा गया एक पत्र मिला, जिसमें दावा किया गया था कि एजेंसी के पास इस बात के सबूत हैं कि जिस कथित ओवर-इनवॉइसिंग योजना की वे जांच कर रहे थे, उसका पैसा मॉरीशस भेजा गया था.

डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यु इंटेलिजेंस (डीआरआई) के तत्कालीन महानिदेशक नजीब शाह ने एक पत्र में लिखा, "ऐसे संकेत हैं कि हेराफेरी के पैसे का एक हिस्सा अडाणी समूह में निवेश और विनिवेश के रूप में भारत के शेयर बाजारों में पहुंच गया है." 

डीआरआई मामले के अनुसार, कथित योजना से एक अरब डॉलर से अधिक की राशि इलेक्ट्रोजेन इंफ्रा एफजेडई नामक अमीराती कंपनी को भेजी गई, जिसने बाद में इसे मॉरीशस स्थित होल्डिंग कंपनी को भेज दिया, जिसका स्वामित्व अंततः विनोद अडाणी के पास था, जिसका इसी से मिलता जुलता नाम इलेक्ट्रोजेन इंफ्रा होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड था. 

हमारे रिपोर्टर्स इन फंड्स के जरिए हुए 100 मिलियन डॉलर से अधिक पैसा आने का पता लगाने में कामयाब हुए. 

इस कंपनी ने फिर विनोद अडाणी की एक अन्य कंपनी, एसेंट ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड को "एशियाई इक्विटी बाजार में निवेश करने के लिए" ऋण दिया. 

इलेक्ट्रोजेन इंफ्रा होल्डिंग और एसेंट, दोनों कंपनियों के मालिक चूंकि विनोद अडाणी थे इसलिए उन्होंने ही इस लोन के दस्तावेजों पर ऋणदाता और उधारकर्ता के रूप में हस्ताक्षर किए.

अंतत: यह पैसा जीओएफ में डाल दिया गया, वही मध्यस्थ कंपनी जो चांग और अहली द्वारा इस्तेमाल की गई थी. इसके बाद इसे ईआईएफएफ और मॉरीशस स्थित एशिया विजन फंड (मॉरिशस स्थित एक और निवेश इकाई) में निवेश किया गया.  

सेबी ने 2014 में प्राप्त हुए पत्र के बारे में हमारे रिपोर्टर्स द्वारा भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया. गौरतलब है कि इस साल हिंडनबर्ग रिपोर्ट में अडाणी समूह पर लगे आरोपों के बाद मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा. अपनी एक विशेषज्ञ समिति नियुक्त करने के अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने सेबी को जांच करने का भी निर्देश दिया था. यह रिपोर्ट अगले महीने आने वाली है. 

न्यूज़लॉन्ड्री इस रिपोर्ट को ओसीसीआरपी की अनुमति से प्रकाशित कर रहा है.

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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